Monday, October 29, 2018

“आओ चलें वेदों की ओर”आज युवाओं का वेद पढ़ना तो दूर देखने के लिए भी नसीब नहीं होते. आज...

“आओ चलें वेदों की ओर”

आज युवाओं का वेद पढ़ना तो दूर देखने के लिए भी नसीब नहीं होते. आज युवा अपनी जिंदगी में वेदों का मतलब भी नहीं जान पाते, हालाँकि जिसने वेद नहीं पढ़े उसको वैदिक परंपरा के अनुसार ब्राह्मण कहलाने का हक नहीं लेकिन देश की व्यवस्था के अनुरूप जन्मना ब्राह्मण और कर्मना ब्राह्मण एक ब्राह्मण स्वरुप ही देखे जाते हैं.

ॐ अनंता वै वेदा : Vedas Are Limitless ॐ

1) वेद का सामान्य अर्थ:

“वेदो अखिलो धर्म मूलम ”, “वेद धर्म का मूल हैं”, राजऋषि मनु के अनुसार मूलतः वेद शब्द ‘विद’ मूल शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ज्ञान.

2) कितने पुराणिक वेद:

वेद 1.97 बिल्लियन वर्ष पुराने हैं ,वेदों के अनुसार वर्तमान सृष्टि करीब 1 अरब, 96 करोड़, 8 लाख और लगभग 53000 वर्ष पुरानी है और इतने ही पुराने वेद भी हैं. ऋग्वेद मन्त्र 10/191/3 में कहा गया है कि यह सृष्टि, इससे पिछली सृष्टि के समान ही है और सृष्टि के चलने का क्रम शाश्वत है , इसलिए वेद भी शाश्वत हैं. वेदों का वास्तव में सृजन या विनाश नहीं होता, वेद केवल प्रकाशित और अप्रकाशित होते हैं. परन्तु, आदि शंकराचार्य “वेद अपौरुषेय हैं”.

3) वेद एवं वेद-पठन के फायदे:

वेद वास्तव में मात्र पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि यह वो ज्ञान है जो ऋषियों के ह्रदय में प्रकाशित हुआ. 'ईश्वर’ वेदों के ज्ञान को सृष्टि के प्रारंभ के समय चार ऋषियों को देता है जो जैविक सृष्टि के द्वारा पैदा नहीं होते हैं. इन ऋषियों के नाम हैं ,अग्नि ,वायु, आदित्य और अंगीरा.

अ). अग्नि ऋषि ने ऋग्वेद को, जोकि सर्वशक्तिमान ईश्वर के ज्ञान को प्रदान करता है.

ब). वायु ऋषि ने यजुर्वेद को, जोकि कर्मों के ज्ञान को प्रदान करता है.

स). आदित्य ऋषि ने सामवेद को, जोकि आराधना ,योग और दर्शन को समझाता है. और

द). अंगीरा ऋषि ने अथर्ववेद को, जोकि औषधियों और ईश्वर के बारे में जानकारी देता है, प्राप्त किया.

इसके बाद इन चार ऋषियों ने दूसरे लोगों को इस दिव्य ज्ञान को प्रदान किया.

वेदों का ज्ञान अपार है, उदाहरण के लिए 6 ऋतुएँ, सूर्य, चन्द्र, जीवन के क्रम, मृत्यु के क्रम, आराधना, योग, दर्शन, आणुविक ऊर्जा, कृषि, पशुपालन, राजनीति ,प्रशासनिक कार्य, सौर्य ऊर्जा,व्यापार, पुरुष, स्त्रियाँ बच्चे, विवाह, ब्रह्मचर्य, शिक्षा, कपड़े आदि … “तिनके से लेकर ब्रह्मा तक” का ज्ञान…इन वेदों में निहित है.

[1] ऋगवेद:

ऋग्वेद दिव्य मन्त्रों की संहिता हैI इसमें 1017 ऋचाएं अथवा सूक्त हैं जो कि 10300 छंदों में पंक्तिबद्ध हैं. ये आठ “अष्टको” में विभाजित हैं एवं प्रत्येक अष्टक के क्रमानुसार आठ अध्याय एवं उप- अध्याय हैंI माना जाता है कि ऋग्वेद का ज्ञान मूलतः अत्रि, कन्व, वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदाग्नि, गौतम एवं भरद्वाज ऋषियों को प्राप्त हुआ,ऋग वेद की ऋचाएं एक सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर की उपासना अलग अलग विशेषणों से करती हैं.

[2] सामवेद:

साम वेद संगीतमय ऋचाओं का संग्रह हैं I विश्व का समस्त संगीत सामवेद की ऋचाओं से ही उत्पन्न हुआ है, ऋगवेद के मूल तत्व का सामवेद संगीतात्मक सार हैं, प्रतिपादन हैं

[3] यजुर्वेद:

यजुर वेद मानव सभ्यता के लिए नीयत कर्म एवं अनुष्ठानों का दैवी प्रतिपादन करते हैं. यजुर वेद का ज्ञान मद्यान्दीन, कान्व, तैत्तरीय, कथक, मैत्रायणी एवं कपिस्थ्ला ऋषियों को प्राप्त हुआ.

[4] अर्थवेद:

'अथर्ववेद’ ऋगवेद में निहित ज्ञान को व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन प्रदान करता है ताकि मानव जाति उस परम ज्ञान से पूर्णतयः लाभान्वित हो सके.

अथर्ववेद जादू और आकर्षण के मन्त्रों एवं विद्या की पुस्तक नहीं है.

4) वेद में मूर्ति पूजा:

वेदों में मूर्ति पूजा का उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि वेदों में 'यज्ञ’ को ही ईश्वर के प्रति आस्था का मूल आधार माना गया है हालाँकि ब्रह्म तक योग द्वारा पहुँचने का 'मूर्ति पूजा’ एक जरिया है जरूर, बशर्ते 'मूर्ति पूजा’ एकांत में की जाए.

वेद: संरचना:

प्रत्येक वेद “संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् नामक चार भागों में विभाजित हैं.

ऋचाओं एवं मन्त्रों के संग्रहण से संहिता,

नियत कर्मों और कर्तव्यों से ब्राह्मण,

दार्शनिक पहेलू से आरण्यक एवं

ज्ञातव्य पक्ष से उपनिषदों का निर्माण हुआ है.

आरण्यक समस्त योग का आधार हैं. उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है एवं ये वैदिक शिक्षाओं का सार हैं.

वेद समस्त ज्ञान के आधार:

वैसे ये उनकी खुशकिस्मती है जो ब्राह्मण कुल में पैदा हुए तथापि बिना ज्ञान का ब्राह्मण किसी काम का नहीं. आज भले ही एक ब्राह्मण… डॉक्टर, इंजीनियर, सी.ए. आदि बन जाए पर असली जिंदगी मृत्यु के बाद शुरू होगी तब ब्राह्मण से पूछा जायेगा कि…

"आप अपने आप को ब्राह्मण बोलते रहे, ठीक है… ईश्वर ने पहले ही आपको ब्राह्मण वंश में जन्म देकर धरती पर भेजा था, उसको भुलाकर, स्वयं को सांसारिक कार्यो में लगाकर व वेदों के ज्ञान की अनदेखी कर, आपने अपने स्वार्थ के लिए सांसारिक डिग्री को सर्वोच्च महत्ता पदान करते हुए आपने जो भी नौकरी-पैसा अख्तियार किया, सो एक तरह से आपने पशु समान ही जिन्दगी जीकर जीवन निकाल दिया ! सो आप कैसे ब्राह्मण??? ”

अभी भी समय है, 'समस्त हिन्दू’ वेदों की ओर बढ़ें, और ब्राह्मणों के लिए तो यह नितांत आवश्यक है.


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