Tuesday, June 16, 2015

जो व्यक्ति अन्न वस्त्र गौ भूमि आदि पदार्थों का श्रेष्ठ पुरुषों एवं श्रेष्ठ संस्थाओं को दान करता है...

जो व्यक्ति अन्न वस्त्र गौ भूमि आदि पदार्थों का श्रेष्ठ पुरुषों एवं श्रेष्ठ संस्थाओं को दान करता है उसे ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार अनेक प्रकार का धन ऐश्वर्य प्राप्त होता है : : : : : : : ऋग्वेद 5- 42- 8


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🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 –~~***★ [] ओ३म् [] ★***~~– ~~~~~******★******~~~~~ खुदा का...

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–~~***★ [] ओ३म् [] ★***~~–
~~~~~******★******~~~~~
खुदा का मुख्य नाम “ओ३म् ” है
—~~~~~*****★*****~~~~~—
यदि कोई विद्वान हो तो इसे गलत साबित
करने का चुनौती स्वीकार करे
★लाजपतराय अग्रवाल वैदिक शात्रार्थ योद्धा★
कुरान मे सीधे शब्दों मे न
कहकर घुमा-फिरा कर ओ३म् का
उल्लेख किया गया है ताकि लोग कुरान को
वैदिक धर्म का नकल न बताने लगे।
जो भाषा विद्वानों के समझने
की बात है।
देखिये कुरान मे लिखा है
बिस्मिल्लाहि..….अलिफ लाम मीम
(कु. पारा १ सूरे बकर आ. १ )
शुरु करता हूँ अल्लाह
के नाम से जो नियाहत दयावान
और मेहरबान है।
-~~***★ समीक्षा ★***~~-
इस आयत के फुटनोट
मे कुरान के हिन्दी टीकाकार
मौ० अहमद बसीर एम. ए. लिखते हैं कि
अलिफ लाफ मीम
इनका क्या
अर्थ है ?
इसका
-~**★अर्थ खुदा को ही मालुम है ★**~-
हमारा कहना है कि यदि इन तीनों अक्षरों का ज्ञान मुसलमानों को नहीं तो इसका अर्थ यह है कि वे कुरान को समझने की योग्यता नहीं रखते हैं। हम यहाँ यह रहस्य खोल देते है। अरबी व्याकरण के अनुसार लाम अक्षर ’ वाउ’ मे बदल जाता है। तब अलिफ लाम मीम मिलकर अलीफ वाउ मीम बन जाते हैं। अलिफ + वायु , मिलकर ‘ओ’ का उच्चारण होगा और अन्त मे मीम मिला देने से अलिफ + वाउ + मीम अर्थात ओ३म् बन जावेगा -~*★जो कि ईश्वर का मुख्य नाम है।★*~-
कुरान का लेखक कुरान शुरु करने पर सर्वप्रथम ईश्वर को स्मरण करता हुआ कहता है कि “शुरु करता हूँ अल्लाह के नाम से जो नियाहत दयावान और मेहरबान है"… प्रश्न होता है कि दयावान मेहरबान अल्लाह का वह कौन सा नाम है जिसे लेकर कुरान शुरु किया गया था ? कुरान उत्तर देता है। “अलिफ" “लाम" “मीम" अर्थात
-~**★ ओ३म् ★**~-
इस प्रकार कुरान के लेखक ने चाहे वह अल्लाह हो या मुहम्मद हो ,सर्वप्रथम ओ३म् नाम से ईश्वर का स्मरण किये थे। कुरान मे कई स्थानों पर इसका उल्लेख है परन्तु वह है सिपारे या सूरत के शुरु में ही। यदि कुरान मे सीधे शब्दों मे ★ओ३म् ★ लिख दिया जाता तो लोग कुरान को हिन्दू धर्म का नकल बताने लगते अत: कुछ घुमा-फिरा कर ★ओ३म् ★ का उल्लेख उसमें किया गया है जो
भाषा विद्वानों के समझने की बात है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
-*★ “कुरान की विचारणीय बातें "★*-
–~~***★से साभार★***~~–
लेखक - श्री लाजपत राय अग्रवाल वैदिक
-~~***★शास्त्रार्थ योद्धा★***~~-
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


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🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 🙏🙏सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते🙏🙏 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ -~★ भारतीय...

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~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 🙏🙏सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते🙏🙏
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-~★ भारतीय कूटनीति का सम्राट ★~-
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💥🔥👉 चन्द्रगुप्त मोर्य व हेलेन 👈🔥💥
जब यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस चन्द्रगुप्त मौर्य से हार गया और उसकी सेना बंदी बना ली गयी तब उसने अपनी खूबसूरत बेटी हेलेन के विवाह का प्रस्ताव चन्द्रगुप्त मोर्य के पास भेजा।
सेल्यूकस की सबसे छोटी बेटी हेलेन बेहद खुबसूरत थी , उसका विवाह आचार्य चाणक्य ने प्रस्ताव मिलने पर सम्राट चन्द्रगुप्त से कराया पर उन्होने विवाह से पहले हेलेन और चन्द्रगुप्त से कुछ शर्ते रखी । जिसके बाद ही उन दोनों का विवाह हुआ।
-*★१★*-पहली शर्त यह थी की उन दोनों से उत्पन्न संतान उनके राज्य का उत्तराधिकारी नही होगा और इसका कारण बताया की हेलेन एक विदेशी महिला है और भारत के पूर्वजो से उसका कोई नाता नही है। भारतीय संस्कृति से हेलेन पूर्णतः अनभिग्य है ।…और…
-*★२★*-दूसरा कारण बताया की हेलेन विदेशी शत्रुओ की बेटी है उसकी निष्ठा कभी भारत के साथ नहीं हो सकती।
-*★३★*- तीसरा कारण बताया की हेलेन का बेटा विदेशी माँ का पुत्र होने के नाते उसके प्रभाव से कभी मुक्त नही हो पायेगा और भारतीय माटी, भारतीय लोगो के प्रति पूर्ण निष्ठावान नहीं हो पायेगा।
-*★४★*- एक और शर्त चाणक्य ने हेलेन के सामने रखी की वह कभी भी चन्द्रगुप्त के राज्य कार्य में हस्तक्षेप नही करेगी और राजनीति और प्रशासनिकन अधिकार से पूर्णतया विरत रहेगी। परंतु गृहस्थ जीवन मे हेलेन का पूर्ण अधिकार होगा।
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सोचिये मित्रो .. भारत ही नही विश्व भर में चाणक्य जैसा कुटनीतिक और नीतिकार राजनितिक आज तक दूसरा कोई नही पैदा हुआ। फिर भी आज भारत उनकी शिक्षा को भूल गया।
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★ प्रेषक - आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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।।ओ३म्।। धर्म बनाम धार्मिक+राजनीतिक संगठन- कुछ लोग भगवान को मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारे में...

।।ओ३म्।।

धर्म बनाम धार्मिक+राजनीतिक संगठन-

कुछ लोग भगवान को मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारे में ढूंढते रहते हैं।
मन शांत करके महसूस नहीं करते कि आखिर वो कहां है।अगर महसूस करें,तो पता चलेगा कि वो तो हर जगह है,हम ही खोये हुए हैं।
कहने का मतलब ये नहीं है कि हम मंदिर में न जायें,जायें जरूर जायें और जाना भी चहिये।लेकिन वहाँ जहाँ धर्म के बारे में ज्ञान मिलता हो,जहाँ राजनीति के बारे में ज्ञान मिलता हो और वहाँ पर दान भी दें।जहां इन उद्देश्यों को लेकर कोई काम न हो रहा हो,तो वहां कतई न जायें और न ही कोई दान दें।क्योंकि वहाँ पर दान देने से ऐसे स्थल और ज्यादा संख्या में पनपेंगे।जोकि हमें ही राजनीतिक रूप से कमजोर करेंगे।
बहुत समय पहले मंदिर सर्वसमाज को संगठित करने के लिए बनाये गये थे।वहाँ पर जाकर लोग शान्ति के साथ बैठकर धार्मिक बातें सुनते थे।अधर्मियों से कैसे लडा जाये,ऐसी बातें वहाँ पर लोगों को बताई जाती थी।आत्मा का परमात्मा के हाथ साक्षात्कार कैसे होता है,मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है,ऐसी बातें बताई जाती थी।लेकिन आज के समय में बहुत सारे मंदिर बिजनिस व नशाखोरी के अड्डे बन चुके हैं।जो अपना उद्देश्य ही खत्म कर चुके हैं।

पहले मंदिर की जगह सिर्फ यज्ञशालायें होती थी।कोई मूर्ति नहीं थी,एकेश्वर को ही माना जाता था।सब एक थे।जो लोग अधर्म का काम करते थे,वो सजा से नहीं बच पाते थे।जितना बडा वो गलत काम करते थे,उतना ही बडा दंड उनको तुरंत ही मिल जाता था।जब से यज्ञशालाओं की जगह मंदिर बने तब तक तो थोडा ठीक था,लेकिन जब मंदिरों में पोंगे पंडितों द्वारा कथित अवतारों की विभिन्न प्रकार की मूर्तियां सजा-सजाकर रखी जाने लगी,तो विभिन्न प्रकार की मूर्तियों से लोगों में वैचारिक विभिन्नता पैदा हो गई और लोग बंट गये।फलत: धीरेधीरे एक धर्म की जगह विभिन्न प्रकार के मत-मजहब बन खडे हुए।नतीजा आज सामने है।अधर्मी लोगों ने धर्म के नाम पर राजनैतिक संगठन बना लिए और एकजुट होकर वोटबैंक बन गये।आज के समय में जितने धर्म के नाम पर संगठन बने हुए हैं,वो सब के सब राजनीतिक संगठन हैं।जो धर्म की तो केवल आड लेते हैं,लेकिन करते राजनीति हैं।
आश्चर्य की बात ये है कि आज के समय के बहुत ज्यादा पढे-लिखे लोगों को भी ये तक पता नहीं है कि आखिर ये हो क्या रहा है कि वो किसी के वोटबैंक क्यों नहीं हैं।कारण क्योंकि वो किसी भी धार्मिक या राजनीतिक संगठन से नहीं जुडे हुए हैं।
जबसे विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थायें लागू हुई हैं,तब से जो एक जगह वोट देता है,वो ही सरकार बनवाता है।इसलिए उसकी बातों को ही प्राथमिकता दी जाती है।इस वजह से नेता लोग उनकी वोट के लालच में उनकी अनुचित बात भी मानते हैं और धार्मिक लोगों के विभिन्न प्रकार की अवतारवादी विचारधारा में बंटे हुए रहने के कारण उनकी उचित बात भी नहीं मानी जाती है।अब ऊपर जो व्यवस्था है,मतलब जो संविधान है वो धार्मिक नीतियों वाला नहीं है,बल्कि वो राज करने वाली नीतियों को आधार बनाकर बनाया गया है।राजनीति तोडती है,धर्म जोडता है।राजनीति धर्म की दुश्मन होती है।इसी वजह से नेता लोग फूट डालो और राज करो की नीति को अपना धार्मिक लोगों में फूट डालते हैं और जिन राजनीतिक संगठनों में वे फूट नहीं डाल पाते वे उन संगठनों के घुटनों में रहते हैं।यही कारण है कि ऐसे राजनैतिक संगठन जो वोटबैंक की राजनीति के कारण मुफ्त की सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं,उनमें अनेक लोग सुविधाएं प्राप्त करने के लिए मतांतरित होकर जा रहे हैं।वोट देने के बदले में वे चाहे कुछ भी करें,नेता लोग उनका उनकी वोट के लालच के लिए खुलेआम सपोर्ट करते हैं।आतंकवाद इसी वजह से फैल रहा है,अन्यथा सबको पता है कि इसमें कौन से तत्व लगे हुए हैं और क्यों।नेताओं को तो सबसे पहले पता है।
इस नाजायज सपोर्ट के कारण ही कुछ मत-मजहब वालों की संख्या बहुत ही भयानक रूप से बढ रही है।कुछ लोगों का तुष्टिकरण इसी वजह से किया जा रहा है कि वो अलग-अलग जगह वोट न डालकर एक ही पार्टी को वोट करते हैं।वोट के बदले किसी वर्ग को खुश रखना ही तुष्टिकरण है।
ऐसे लोग एकेश्वर में विश्वास करते हैं।इस कारण
उनमें कोई वैचारिक मतभेद नहीं होता।
लेकिन हमारे बीच के कुछ लोग अब भी खुले घूम रहे हैं भीड़ की तरह।उन्हें किसी संगठन से कोई मतलब नहीं है।आज के राजनैतिक माहौल में किसी धार्मिक/राजनैतिक संगठन में आना बहुत जरूरी है।अब राजनीतिक युग है,धार्मिक युग नहीं है कि आपके किसी राजनीतिक संगठन में आये बगैर ही हर किसी की समस्या का हल हो जायेगा।ये राजनैतिक आंदोलन का जमाना है,धार्मिक आंदोलन का नहीं।ऐसे किसी संगठन से जुडना जरूरी है,जो राजनीतिक भी हो व धार्मिक भी।जो अपने हक के बारे में आपको बताये।अपने हक के लिये इकट्ठा होकर लडना सिखाये।
कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत कट्टर हूँ।ऐसा कहने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला जब तक कि वो किसी अच्छे संगठन में न हो।उसे ये नहीं पता है कि धर्म एक होता है और आज उसकी आड में सिर्फ राजनीति की जा रही है।वो तो आज के राजनीतिक माहौल में है ही नहीं कहीं।आज के समय में स्वार्थी व राजनैतिक लोगों ने बहुत सारे नकली धर्म बना लिये हैं,जो धर्म नहीं बल्कि मत(अपने निजी विचार)कहलाते हैं।ईश्वर एक होता है,ईश्वर भी बहुत सारे बना लिए हैं।जिस संगठन में जितने कम धार्मिक तत्व हैं और जितने अधिक से अधिक राजनीतिक तत्व हैं,वो संगठन उतना ही देश के नेताओं को अपने घुटनों पर झुका रहा है।ईसाई व इस्लाम संगठन इसके बडे उदाहरण हैं।
इसलिए लोगों को धर्म की रक्षा व शान्ति स्थापना के लिए ऐसे संगठन से जुडना चहिये जो उन्हें राजनीतिक और धार्मिक रूप से जागरूक करे।अन्यथा अधर्म/पाप बढ रहा है।अधर्मी/राजनैतिक संगठन आपको उचित समय आने पर अपने संगठन में जबरदस्ती मिला लेंगे।न आपकी संस्कृति बचेगी और न ही संस्कार।


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Sunday, June 14, 2015

★ प्रिय बन्धुओं ! हमें आर्य होने पर गर्व है ★~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~आर्यावर्त हमारे देश का सर्वाधिक...

★ प्रिय बन्धुओं ! हमें आर्य होने पर गर्व है ★~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~आर्यावर्त हमारे देश का सर्वाधिक पुरातन नाम है और हमारी जाति का वास्तविक नाम आर्य है । जब मनुष्य जाति की उत्पति हुई , तभी से हमारी जाति का नाम आर्य पड़ा है । हमारी जाति का सबसे पुराना नाम आर्य ही है । अन्य नाम बाद में दिए गए हैं । हमारी जाति का वास्तविक नाम आर्य ही है इसके एक नहीं अनेक प्रमाण है। हमारी जाति का मूल स्थान भारत हीहै। भारत का सबसे पुराना नाम आर्यावर्त है ।मनुस्मृति में कहा गया है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~आसमुद्रात्तु वै पुर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।तयोरेवान्तरम् गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥- मनुस्मृति - २/२२`“”“”“”“”“”“”“”“”“”“अर्थात् - पुर्वीय समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र तक दोनों पर्वतों ( हिमालय और विन्ध्य ) के बीचवाले देशों को विद्वान लोग आर्यावर्त कहते है । उन दिनों विन्ध्य पर्वत के दक्षिण का भाग समुद्र में डूबा था या जन शुन्य था इसलिए आर्यावर्त की सीमा पूर्व में समुद्र तक, दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक, पश्चिम में समुद्र तक और उत्तर में हिमालय पर्वत तक बतलाई गई है। आर्यावर्त अर्थात आर्य जाति के रहने वाले देश-प्रदेश। अतः मनुस्मृति सेयही प्रमाणित होता है कि हमारी जाति का सब से पुराना नाम आर्य ही है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~एक और प्रमाण - हमारी संस्कृति कीयह परंपरा रही है की हम किसी कार्य को करने के पहले उसका संकल्प लें । अतः कोई भी पूजा पाठ आरम्भ करते समय सबसे पहले पुरोहित हम सेसंकल्प बुलवाते हैं । उस संकल्प में आता है -जम्बूद्वीपे भारतवर्षे - भरतखंडे आर्यावर्तांतरगतब्रह्मावर्तैक देशे … आदि। यहाँ भी भारत वर्ष को आर्यावर्त कहा गया है अर्थात् आर्य जाति के रहने का स्थान है।आर्य शब्द का अर्थ हैं - श्रेष्ठ ।आर्य शब्द का अर्थ है अच्छे गुणों , विचारों का धारण करनेवाला ।आर्य शब्द का अर्थ है वैर भाव को नहीं बढ़ानेवाला ,आर्य शब्द का अर्थ है अन्याय नहीं करनेवाला,आर्य शब्द का अर्थ है अन्याय नहीं सहनेवाला,आर्य शब्द का अर्थ है सदभावना को धारण करनेवाला ,आर्य शब्द का अर्थ है अपने कर्त्तव्य कर्म को दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाला।~~~~~~~~~~~~~~~~~~महाभारत में महात्मा विदुर ने कहा है -न वैरमुद्दीपयती प्रशान्तं न दर्पमारोहतिनास्तमेति ।न दुर्गतो स्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलंपरमाहुरार्या:॥~~~~~~~~~~~~~~~~~~ऊपर बताए गुण हमारी जाति में आरम्भ सेही थे । साथ ही मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए ये गुण आवश्यक हैं । अतः ये गुण हमारीजाति में आवश्यक रूप से होने ही चाहिए । ये गुण हमारी संस्कृति की पहचान हैं । इसीलिए हमारी जाति का नाम आर्य ही है । वेद में भी आर्य शब्द है। वेद में आर्य शब्द कई बार आया है और वहाँ आर्य शब्द का प्रयोग ऊपर बताए गए अर्थों में ही हुआ है ।~~~~~~~~~~~~~~~~~~ऋग्वेद में कहा है -अहन भूमिददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याम् । अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतामायन् ॥ऋग्वेद ४/२६/२……………………………………………………अर्थात् ( ईश्वर कहते हैं ) मैं आर्य के लिए भूमि देता हूँ । मैं दानशील मनुष्य के लिए धन की वर्षा करता हूँ । मैं घनघोर शब्द करनेवाले बादलों को धरती पर वर्षाता हूँ । विद्वानलोग मेरे ज्ञान ( उपदेश )के अनुसार चलते हैं।~~~~~~~~~~~~~~~~~~इस वेद मन्त्र में बतलाया गया है कि ईश्वर आर्य के लिए ही अर्थत अच्छे उत्तम मनुष्यों के लिए ही भूमि और धन देता है । वर्षा करता है और ज्ञान देता है ।~~~~~~~~~~~~~~~~~~ऋग्वेद में कहा है -इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥ऋग्वेद ९/६३/५:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::अर्थात् - आत्मा को बढ़ाते हुए दिव्य गुणों से अलंकृत करते हुए तत्परता के साथ कार्य करते हुए अदानशीलता, को, ईर्ष्या, द्वेष, द्रोह की भावनाओं को, शत्रुओं को परे हटते हुए सम्पूर्ण विश्व को, समस्त संसार को आर्यबनाएं ॥~~~~~~~~~~~~~~~~~~श्रीमद्भगवद्गीता में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से कहा है ———————————कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकिर्तिकरमर्जुन ।।श्री मद्भग्वद गीता २/२——————————अर्थात् - हे अर्जुन ! तुम को विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआ है , क्यों कि यह न तो आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों का प्रिय व उन द्बारा अपनाया गया है। न स्वर्ग देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला है। यह सभी जानते हैं की अर्जुन मोह में पड़कर अपना कर्तव्य - कर्म भूल चुका था और भिक्षा का अन्न खाने के लिए तैयार था ।अपने धर्म को छोड़कर निन्दित कर्म करने के लिए तैयार था । इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने उसे अनार्य कहा है और आर्यों के गुण अपनाने के लिए ही उसे पूरे गीता का उपदेश दिया है।भगवान श्री कृष्ण आर्य थे - अर्जुन आर्य था ।जब अर्जुन आर्य के कर्तव्य कर्म को छोड़कर अनार्य की तरह कर्म करने के लिए तैयार हुआ तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को धिक्कारा और आर्य बने रहने के लिए उपदेश दिया । अतः जोश्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते हैं वे आर्य हैं , नहीं तो अनार्य हैं ।रामायण में भी आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है । वाल्मीकीय रामायण में आर्य शब्द काअनेक बार प्रयोग हुआ है । भगवान राम के गुणों का वर्णन करने के पश्चात वाल्मीकि मुनि से नारद जी कहते हैं :-आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रिय दर्शनः॥१/१६वे आर्य एवं सब में समान भाव रखनेवाले हैं । उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है । एक मनुष्य में जितने अच्छे गुण होने चाहिए उन गुणों का वर्णन भगवान श्री राम में करने के पश्चात नारद जी उन्हें आर्य कहते हैं । अन्यअनेक ग्रन्थों में भी आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है । अन्य ग्रन्थों में भी आर्य शब्द का प्रयोग इन्हीं अर्थों में हुआ है ।निरुक्त में कहा गया है -आर्यः ईश्वर पुत्रः ॥अर्थात् - आर्य ईश्वर के पुत्र हैं ।आधुनिक विद्वान आर्य शब्द का प्रयोग इन्हींअर्थों में करते हैं । भारत के मूल निवासी जितने भी हैं वे आर्य हैं ।महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने भारत भारती में लिखा है -जग जान ले कि न आर्य केवल नाम के ही आर्य हैं।वे नाम के अनुरूप ही करते सदा शुभ कार्य हैं ॥यहाँ महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने स्पष्ट रूपमें भारतवंशी सनातन धर्मावलंबी मात्र कोआर्य कहा है और उन्हें शुभ कार्य करनेवाला बतलाया है। भारतवर्ष के मूल निवासी मात्र को महाकवि मैथिलिशरण गुप्त आर्य मानते थे - तभी तो उन्होंने लिखा है -मानस - भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती,भगवान ! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती..
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Kabhi kuch sachhai aur vaigyanikta ki bhi baat kar le.


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🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★इस्लाम मे वर्तमान में मौजूद फिरको की...

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★इस्लाम मे वर्तमान में मौजूद फिरको की सूची★
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१. महकमिय्या २. अजराकिया
३. अजुयी ४. नजरात
५. असफरिया ६. अबाजिया
७. अहसामय्या ८. बहशीस्यह
९. नगालियह. १०. अजाजदह
११. अखवस्या १२. शैबानियह
१३. मकरामय्या १४. वासलिय्या
१५. हजैलिय्या १६. नजामिया
१७. असवारिया १८. अस्काफिया
१९. मजवारिया २०. बशरिया
२१. असमरिया २२. हदामिया
२३. सालजियह २४. हाबतिया
२५. मुअक्मारिया २६. समामिया
२७. जाखतिया २८. हरुवा
२९. जाफरिया ३०. बहशमिया
३१. जबानिया ३२. काबेया
३३. ख्यातेया ३४. ग्रासनिया
३५. सोबानिया ३६. सोबेया
३७. अहदया ३८. बागोसिया
३९. जाफेरानिया ४०. कामलिया
४१. ब्यानिया ४२. मुगीरिया
४३. मनसूरिया ४४. खताबिया
४५. अजाबिया ४६. जमिया
४७. मुस्तदरकिया ४८. मुजसमिया
४९. करामिया ५०. जहीमिया
५१. हनफिया ५२. मालकिय्या
५३. शाफय्या ५४. हम्बिलिया
५५. सुफिया ५६. दावदिया
५७. सबाइया ५८. मजफलिया
५९. जारिया ६०. इसहाकिया
६१. शेतानिया ६२. मफुजिया
६३. कसानिया ६४. रजानिया
६५. इस्माइलिया ६६. नसीरिया
६७. जैदिया ६८. नारुसिया
६९. अफतहया ७०. वाकफिफ्या
७१. गलात. ७२. हशविया
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★ मुसलमान कहते है कि हम फिरकापरस्त नही है तो यह देखियें पण्डित सत्यदेव काशी की पुस्तक-इस्लाम के तीन सौ तेरह फिरके पृष्ठ ८ से १० से साभार उद्धृत ★ शेष क्रमशः ———-
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★ पेषक - आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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।।ओ३म्।। अवतारवाद का खंडन-मंडन:- धर्म से सम्बन्धित सभी विषय हमेशा रहते हैं,कभी न कम होते और न ही...

।।ओ३म्।।

अवतारवाद का खंडन-मंडन:-

धर्म से सम्बन्धित सभी विषय हमेशा रहते हैं,कभी न कम होते और न ही ज्यादा।धर्म के समस्त विषय स्वयंसिद्ध होते हैं,जो बाते अपने आप में सिद्ध नहीं होती वो धर्म की नहीं होती।

अवतार होता,तो वो भी कभी न कभी,कहीं न कहीं,किसी न किसी को जरूर दिखाई देता।क्या कभी किसी से सुनने में आता है कि फलां व्यक्ति ने कोई अवतार देखा है।अवतार का अर्थ सिर्फ इतना है कि जब धर्म व अधर्म के बीच तर्क-वितर्क,युद्ध होता है,तो उस समय जो व्यक्ति धार्मिक लोगों का नेतृत्व करता है,उन्हें अधर्मियों से जीतने के गुर बताता है,वो ही उस समय का अवतार समझिये।
अवतार के बारे में जो धारणा पोंगी पंडतों ने आमजन में बना रखी है,उसके पीछे मूर्ति को पुजवाने का राज छिपा है।भोले-भाले लोग मूर्ति को अवतार समझकर और उससे डरकर या सम्मान देने के उद्देश्य से उस पर चढावा चढाते हैं।जिससे पोंगे पंडत अपना पेट भरते हैं।अगर वो उनको हमारे जैसा ही मनुष्य बतलावे तो क्यूं कोई उन पर चढावा चढायेगा।फिर तो सब उनका अनुसरण करके उनके मार्ग पर चलने की कोशिश करेंगे।क्योंकि उनके मन में ये बात घर कर जायेगी कि भई ये तो हम मनुष्यों के बीच का ही कोई गुणवान मनुष्य था।

इस प्रकार जैसा झूठ-मूठ का अवतार पोंगे पंडितों ने बनाया है,वो कभी किसी को आज तक दिखाई नहीं दिया।अगर पोंगे पंडितों के पास हो तो वो दिखायें,कभी दिखाते क्यों नहीं।
बहुत समय पहले जब धार्मिक नीतियाँ लागू थ,तो लोगों के अंदर धार्मिक भाव ज्यादा थे।फलस्वरूप अधर्म कम था।इसलिए जब कभी धार्मिक व अधर्मी लोगों के बीच कोई कहासुनी,लडाई-झगडा होता था,तो उस समय का सबसे महान व्यक्ति धार्मिक लोगों का नेतृत्व करके उन्हें विजय दिलाता था।उसी को आज के समय के पोंगे पंडत जिन्हे पोप भी कहा जाता है,अवतार बताते हैं।
लेकिन जब से लोकतांत्रिक काल शुरू हुआ है या यूं कह लीजिये कि जब से अधार्मिक नीतियाँ लागू हुई हैं,तब से क्यों किसी को अवतार नहीं कहा गया।बल्कि अवतार न कहकर महापुरुष कहा गया।क्योंकि वो राजनीतिकवश या स्वार्थवश अधर्मी लोगों द्वारा मार दिए गये।
क्या शंकराचार्य,दयानंद,गुरुतेगबहादुर,
सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह ने अपनी जान देकर भी लाखों-करोडों लोगों का जीवन धन्य नहीं किया।लेकिन वो अधर्मियों के हाथो मरे,अपनी मौत नहीं मरे,इसलिए पोपों के अनुसार ये अवतार नहीं हैं।अगर वो धार्मिक काल में पैदा होते,तो पोंगे पंडत इनको भी अवतार कहते।विडंबना देखिये कि आज के सेकुलर नेता राजनीतिवश इनमें से कईंयों को तो आतंकवादी भी कहते हैं।

क्या धार्मिक काल में ही अवतार पैदा होते हैं।अगर ऐसा है,तो परमात्मा तो बडा पक्षपाती हुआ।जब अधर्म बहुत ज्यादा है,तो तब तो अवतार का आना बहुत ही जरूरी है।
सच तो ये है कि अवतार तो अब भी हैं,लेकिन वोट बैंक की राजनीति उन्हें प्रोत्साहित न करके हतोत्साहित करती है।असल में दिव्य गुणों वाले,सुपरनेचुरल व्यक्ति को ही महापुरुष या अवतार कहा जाता है।ऐसे लोग अब भी हैं।

अगर पोपों वाला अवतार होता,तो जब देश सैकड़ों सालों तक गुलाम रहा,महिलाओं व बच्चों तक पर भीषण अत्याचार किये गये,तो क्यों न आया?आज के समय में जब सीरिया,इराक आदि जगहों पर लोगों के सिर काटकर उनसे फुटबाल खेली जा रही है,लोगों को मारकर उनका मांस तक खाया जा रहा है,तो कोई अवतार क्यों न आकर संहार करता उनका।क्या ये बात सही नहीं है कि जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं,परमात्मा भी उन्हीं की सहायता करता है।इसलिए अगर आज के समय में भी किसी ऐसे महापुरुष जिसे कुछ लोग अवतार भी कहते हैं,को साक्षात देखना है,तो सबसे पहले आपको धर्म का साथ देकर अधर्मियों के खिलाफ एकजुट होना पडेगा,उनके खिलाफ तलवार उठानी पडेगी।जब जो धार्मिक लोगों का नेतृत्व करेगा,तो समझना कि वही उस समय का महापुरुष है,अवतार है।
जो धर्म के लिए,सत्य के पक्ष के लिये हथियार उठाता है,वो पोंगे पंडितों द्वारा मनघडंत अवतारों को नहीं मानता।जो कायर होते हैं,भाग्य में ही विश्वास करते हैं,दूसरों के लिये तो क्या अपने हक के लिए भी हथियार नहीं उठा सकते,तथाकथित अवतार के चक्कर मे अधर्मियों के हाथों अपनी जान गंवा देते हैं।ये सोचते हुए कि परमात्मा का कोई अवतार ही आकर हमें बचायेगा।

पुन: धार्मिक विषय हमेशा रहते हैं,सत्य होने से सनातन होते हैं।न कम होते और न ही ज्यादा।हां,अधर्म घटता बढता रहता है।धर्म विषय के कम या ज्यादा होने का प्रचार करने का कार्य परमात्मा नहीं,बल्कि पोंगे पंडत जैसे धूर्त लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये करते हैं।
क्या सभी जीवों का परमात्मा एक नहीं है?क्या विभिन्न मत-मजहबों ने अनेक स्वैच्छिक परमात्मा नहीं बना लिए हैं?क्या ये असत्य को मानने-मनवाने वाली बातें नहीं हैं।
इससे सिद्ध है कि अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए,अपनी राजनीति को बढाने के लिये धर्म के विषयों को घटाया बताया जाता है।

इसी प्रकार पौंगे पंडितों वाला अवतार न था,न है और न ही पैदा होगा कभी।इसलिए अपनी रक्षा स्वयं करें।इकट्ठा होकर करें तो ज्यादा बेहतर है।


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🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★ आर्य बन्धुओं — हुड़दंगो से सावधान !!!...

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★ आर्य बन्धुओं — हुड़दंगो से सावधान !!! ★
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प्रश्न:- हुड़दंगा कहता है कि :—
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क्यों जी ! पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं न पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं दन्तकटाकटेति किं कर्त्तव्यम् ?
हुड़दंगा कहता है कि जो पढ़ता है वह भी मरता है और जो नहीं पढ़ता वह भी मरता है फिर पढ़ने पढ़ानें में दाँत कटाकट क्यों करना ?
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उत्तर :- सज्जन कहता है कि :—
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न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् ।
अतो धम्मार्थ मोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥१॥
सज्जन कहता है कि सुन भाई हुड़दंगे ! जो तू जानता है सो विद्या का फल नहीं कि विद्या के पढ़ने से जन्म, मरण, आंख से देखना, कान से सुनना आदि ईश्वरीय नियम अन्यथा हो जायें किन्तु विद्या से यथार्थज्ञान होकर यथायोग्य व्यवहार करने कराने से आप और दूसरों को आनन्दयुक्त करना ‘विद्या का फल’ है क्योंकि बिना विद्या के किसी मनुष्य को निश्चल सुख नहीं हो सकता । क्या भया कि किसी को क्षण भर सुख हुआ, न हुआ सा है । किसी का सामर्थ्य नहीं कि अविद्वान् होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्वरूप को यथावत् जानकर सिद्ध कर सके । इसलिए सब को उचित है कि इनकी सिद्धि के लिए विद्या का अभ्यास तन, मन, धन से किया और कराया करें॥
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हुड़दंगा :- कहता है कि :—
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हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य विद्या पढ़े हुए दरिद्र और भीख मांगते तथा बिना पढ़े हुए राज्य धन का आनन्द भोगते हैं ।
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सज्जन :- कहता है कि :—
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सुनो प्रिय ! सुख दुःख का योग आत्मा में हुआ करता है । जहाँ विद्यारूप सूर्य्य का अभाव और अविद्यान्धकार का भाव है वहां दुःखों की तो भरमार, सुख की क्या ही कथा कहना है ? और जहां विद्यार्क प्रकाशित होकर अविद्यान्धकार नष्ट हो जाता है, उस आत्मा में सदा आनन्द का योग और दुःख को ठिकाना भी नहीं मिलता है ।
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हुड़दंगा सिर धुनकर चुप हो गया।
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★ प्रेषक - आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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🌺🙏सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते 🙏🌺 🏡🏤🏫🏡🏡🏡🏡🏡🏫🏤🏡 🔥🔥🔥[ ओ३म् ]🔥🔥🔥 ...

🌺🙏सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते 🙏🌺
🏡🏤🏫🏡🏡🏡🏡🏡🏫🏤🏡
🔥🔥🔥[ ओ३म् ]🔥🔥🔥
—~~~÷★÷~~~—
★★★ § ॥ मिशन आर्यावर्त ॥ § ★★★
—~~~÷★÷~~~—
★ वेदिक धर्म आंदोलन की सिंहगर्जना ★
★भारतीयता का उगता सूर्य★
–~~~****★****~~~–
★ दृष्टिकोण ★
★ THE VISION ★
≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈
वेदिक संस्कृति एक महान आदर्शवादी,
नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण संस्कृति है
क्योंकि
वेदिक संस्कृति का आधार सब सत्यविद्याओं
से युक्त परम-पवित्र चार वेद है।
और
जो कि पूर्णतया वैज्ञानिक

तर्कसंगत सिद्धान्तों से
युक्त है।
~*~*★*~*~
—–~~~~~÷÷★÷÷~~~~~—–
★ महान वेदिक धर्म - महान मार्गदर्शक ★
★ भारतीय गौरव की स्वर्ण-पताका ★
–~~~****★****~~~–
★ ऋषि-लक्ष्य ★
★ THE MISSION ★
≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈≈
आर्यावर्त राष्ट्र
प्रारम्भ से ही सत्य ज्ञान,
निष्पक्ष न्याय, धन-धान्य व प्रबुद्ध मानव
समाज का परिपूरक रहा है,
हमारा
उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ
आध्यात्मिक, बौद्धिक, शारीरिक व सामाजिक
विकास ही हमारी महत्वपूर्ण
शक्ति है।
हमारी वेदिक धर्म-संस्कृति
परम्परागत गौरवमयी सद्भावना के साथ
एक विशिष्ट सिंहासन
प्रदान करती
है।
–~~**★अर्थात्★**~~–
एक ईश्वर
एक धर्म-एक धर्मग्रंथ-एक मत
एक भाषा-एक राष्ट्र-एक विचार-एक आचार
एक विश्वगुरु आर्यावर्त
एक लक्ष्य
~*~*★*~*~
📕📗📘📙📓📔📒📙📘📗📕
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साई

साई
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First International yoga day 21 June 2015 Time period- 33 min. Part 1 (2...

First International yoga day

21 June 2015
Time period- 33 min.

Part 1 (2 min)

श्लोक

“संगच्छध्वम संवद्यध्वम, संवो मनासी जानताम् ।
देवाभागम् यथा पूर्वे, संजानाना उपासते ।।”

Part 2 (3 min)

Warming up
(For relextion)

Neck rotation
Shoulder rotation
Hip rotation
Knee rotation
etc…

Part 3 (15 min)

A) Yogasan in standing position

1) Tadasan ताड़ासन
2) Vrukshasan वृक्षासन
3) Pad Hastsan पादहस्तासन
4) Ardhchakrasan अर्धचक्रासन
5) Trikonasan त्रिकोणासन

B) Yogasan in seating position

1) Bhadrasan भद्रासन
2) Shashankasan शशांकासन
3) Ardh ushtrasan अर्धउष्ट्रासन
4) Vkrasan वक्रासन


C) Yogasan in sleeping position (on stomach)

1) Bhujangasan भुजंगासन
2) Shalbhasan शलभासन
3) Makrasan मकरासन

D) Yogasan in sleeping position

1) Setu bandh sarvangasan सेतुबंध सर्वांगसन
2) Pawan muktasan पवन मुक्तासन
3) Shwasan शवासन


Part 4 (2 min)

Kapalbhati कपालभाति
(10-12 strocks in 3 round)

Part 5 (5 min)

Pranayaam प्राणायाम
1) Nadishodhan नाडीशोधन (5 round)
2) bhramari Pranayaam भ्रामरी प्राणायाम (5 round)

Part 6 (6 min)

Seat in any kind of Dhyan mudra

(शांभवी मुद्रा, आँखे बंद और हातों की ज्ञान मुद्रा ।)

At the time of Meditation play melodies background music.

Lastly take Sankalp
संकल्प

“ हमें हमारे मन को हमेशा संतुलित रखना है। इसीमेही हमारा आत्मविकास समाया हुआ है। विश्व की ऐक्यता के लिये, स्वास्थ के लिये और शांतता के वृद्धि के लिये, विश्व के प्रति, समाज के प्रति, मेरे काम के प्रति, मेरे परिवार के प्रति और मेरे खुद केn प्रति जो कर्तव्य है मैं उन्हें पूरा करने का निश्चय करता हूँ।
Dear Citizens

Forward this msg to a minimum of twenty people on your contact list; and in turn ask each of them to do likewise.

In three days, most people in India will have this message.
This is one idea that really should be passed around.


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ख्वाजा गरीब नवाज़, अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया, हाजी अली, मामा - भांजा की मज़ार, आदि - आदि की दरगाह...

ख्वाजा गरीब नवाज़,
अमीर खुसरो,
निजामुद्दीन औलिया,
हाजी अली,
मामा - भांजा की मज़ार,
आदि - आदि की दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने वाले सनातन धर्मी हिन्दू लोगों के लिए विशेष :-

पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों, मजारों या दरगाहों पर हर वीरवार को जाकर शीश झुकाने व मन्नत करने वालों से कुछ प्रश्न :-

क्या एक कब्र जिसमें मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चुकी है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं ?
ज्यादातर कब्र या मजार उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजों का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म की रक्षा करते हुए बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे ?

क्या हिन्दुओं के भगवान श्री राम जी, श्री कृष्ण अथवा देवी - देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है ?
जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ है कि कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा ?

यान्ति देवव्रता देवान्
पितृन्यान्ति पितृव्रताः
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्तमद्याजिनोऽपिमाम

अर्थात, श्रीमदभगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मुर्दा, पितृ (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र,मजार अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत- प्रेत व पितृ की योनी में ही विचरण करते हैं व उसे ही प्राप्त करते हैं l
भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा, बंदा बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, भगवन बुद्ध, महावीर स्वामी, स्वामी विवेकानंद आदि वीरों की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं ? तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालों की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं ?क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको कहीं मिल सकता है ?

हिन्दू कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहे हैं जो वेदों-उपनिषदों-पुराणों-स्मृतियों आदि में कहीं नहीं कही गयीं हैं
कब्र, मजार पूजा को हिन्दू मुस्लिम सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओं
को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ? सेक्युलरता तो ये तब हो न, जब मुस्लिम भी वहाँ शीश झुकाएं । सूफी समाज इस्लाम की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है, अर्थात वे उन्हें मुस्लिम नहीं मानते।
आशा है आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा
अगर आप आर्य राजा श्री राम और श्री कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दें और अन्य हिन्दुओं को भी इस बारे में बता कर उनका अंधविश्वास दूर करें व आप अपने धर्म को जानिए l इस अज्ञानता के चक्र में से बाहर निकलिए l

विशेष : - पृथ्वी राज चौहान की समाधि पर कंधार, अफगानिस्तान में अभी हाल ही तक भी जूते चप्पल मारे जाते थे । जब तक एक हिन्दू वीर ने बड़ी चतुराई से उनकी अस्थियां वहां से भारत भेज कर माँ गंगा को अर्पण नहीं कर दीं । परंतु आज भी वे लोग उस बिना अस्थियों वाली कब्र पर अपने जूते - चप्पल ही झाड़ कर मोहम्मद गौरी की मज़ार में जाते हैं ।


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Friday, June 12, 2015

।। ईश्वर और भगवान मे अन्तर ।। पाठक गण ! ‘ईश्वर ’ पर सब कुछ अर्थात पूर्ण रूप से लिखना...

।। ईश्वर और भगवान मे अन्तर ।।

पाठक गण ! ‘ईश्वर ’ पर
सब कुछ अर्थात पूर्ण रूप से लिखना अल्पज्ञ और अल्प
शक्तिमान जीवात्मा की शक्ति से परे है |
एक संस्कृ��� के कवी ने लिखा है —-
असित गिरी समं स्यात कज्जलं सिन्धु पात्रे |
सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्र मूर्वी |
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ||
अर्थ –यदि समुद्र की दवात बने ,कृष्ण पर्वत
की स्याही बना कर उस दावत मै
डाली जाय ,कल्प तरु की शाखा
की लेखनी बने ,समस्त पृथ्वी
कागज के रूप में प्रयुक्त हो और साक्षात् सरस्वती
अनंत कल तक लिखती चली जाय तब
भी हे ईश्वर ! तुम्हारे गुणों का पर नहीं
पाया जा सकता | फिर भी विषय प्रवाह बनाये रखने हेतु
श्रेष्ठ व् उत्तम साहित्य के रहते भी कुछ चिंतन
प्रस्तुत करते है |
वेद का प्रत्येक मंत्र ईश्वर का वर्णन कर रहा है | वेद का
मुख्य विषय ,ईश्वर , ही है | मनुष्य जाति जब से
वेद से अलग हुई है तब से द्रश्य को मानाने और अद्रश्य को न
मानाने की आदी हो गयी है|
ईश्वर सच्चिदानंद स्वरुप ,निराकार , सर्व शक्तिमान ,
न्यायकारी ., दयालू .अजन्मा ,अनंत ,निर्विकार , अनादि ,
अनुपम , सर्वाधार ,सर्वेश्वर सर्व व्यापक ,
सर्वान्तर्यामी , अजर, अमर, अभय .नित्य ,पवित्र
और सृष्टि करता है | उसी की उपासना
करनी योग्य है |
किन्तु स्वाध्याय ,सत्संग और मनन के आभाव में किसी
साधारण मनुष्य द्वारा छल कपट का सहारा लेकर दिकाए गए चमत्कारों
से आज बड़े-बड़े बुद्धिजीवी
भी धोखा खा जातें हैं | यह देख आश्चर्य
भी होता है तो तरस भी आता है | क्यों
की वे ईश्वरों को ऑंखें खोल कर देखना
नहीं चाहते |
संसार में ईश्वर रचित हर वस्तु परमात्मा के अस्तित्व
की साक्षी दे रही है |
परन्तु भोतिक आँखों से वह कैसे दिखाई देगी |
एक पवित्र ऋचा में कैसे सुन्दर भाव हैं —–
अयम स्मि जरितः पश्य मेह विश्वा जतान्य भ्य स्मि मन्हा |
ऋतस्य माँ प्रदिशो वर्ध यन्त्या दर्दिरो भुवना दर्दरीभि ||
ऋग्वेद ८/१००/४
ईश्वर कहता है – जस्तिः :- हे स्तुति करने वाले भक्त क्यों
संदेह करता है |में तो यह रहा | तेरे ही पास |
पश्य मा इह – मुझे तू अपने अति निकट ही देख ले
|
प्रभु दर्शन हेतु ज्ञान - चक्षु की आवश्यकता
होती है | इसीलिए शायर कहता है —
रोशन हैं मेरे जलवे ,हर एक शै में लेकिन |
है कोर चश्म तेरी क्या है कसूर मेरा ||
किसी वस्तु के अस्तित्व में होने पर भी
उसके दिखाई न देने के आठ वेदोक्त कारन विद्वानों ने बताये हें |
(1)किसी वस्तु का अति दूर होना , जेसे आकाश में अति
दूर उडाता उपग्रह या रोकेट |एन तो जल अद्रश्य
(२) अति समीप होना , यथा ,आँखों में काजल अपने
आपको दिखाई नहीं देता |
(३) आवरण युक्त होना ,जैसे ,भूमि के अन्दर जल स्रोत ,खनिज
पदार्थ |
(४) इन्द्रयाँ दुर्बल होना (द्रष्टि शक्ति अति न्यून हो तो वस्तु
दिखाई नहीं देती )
(५) मन का एकाग्र न होना –मन और आंख का संयोग न होना |
(६) अपने से तीव्र वस्तु से अभिभूत होना–अति
तीव्र प्रकाश या अति अन्धकार से प्रभावित होना |
(७) सामान आकर की वस्तुएं मिल जाना —जैसे वायु में
,दूध में जल मिला दें तो जल अद्रश्य हो जायेगा |
(८) अति सूक्ष्म होना
उपरोक्त आठ बिन्दुओं पर गह राइ से चिंतन करने पर यह बात
स्पष्ट हो जाती है कि संसार में अनेक पदार्थ ऐसे हें
जिनका अस्तित्व है किन्तु नेत्रों से हम उन्हें देख
नहीं सकते | क्या परिवार भूख या प्यास लगाने पर माता
या पत्नी के समक्ष भूख ,प्यास को बाहर निकल कार
दिखा सकते हें | इसी प्रकार मरीज अपने
दर्द को डॉक्टर या वैद्य को नहीं दिखा सकता |
आइये देखें वह इश्वर कैसा है —–
ईशा वास्यमि दं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत | हे मनुष्यों | ये सब
चराचर ,स्थावर - जंगम , द्रश्य - अद्रश्य पदार्थ ब्रह्माण्ड में
हँ | वह सब इश्वर से ओत - प्रोत हें |
अणो रणी यान्महतो महीयानू –
कठोपनिषद बली - २
वह परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म और महँ से महँ है |
स हि सर्व वित् सर्व कर्ता – संख्य दर्शन ३/५६
वह परात्मा सर्वा न्तार्यामी और सब जगत का कर्ता
है |
तदेजति तन्ने जति तददूरिके तद्वन्ति के |
तदन्त रस्य सर्व स्य तदू सर्व स्यास्य बाह्यतः || यजुर्वेद अ.
४०
वह परात्मा सरे संसार को गति देता है किन्तु स्वयं गति शून्य है
,अचल है | वह दूर भी है और समीप
भी है | वही सरे संसार में अणु -
परमाणु के अन्दर भी है और बहार भी
है |
महान्तं विभु मात्मा नमू मत्वा धीरो न शोचति | |
कठोपनिषद / वल्ली –२
वह इश्वर सब शरीरों में बिना शारीर के
मोजूद है और चलायमान चीजों में स्थिर है | ऐसे
महान सर्व व्यापक परमात्मा को जानकर धीर जन शोक
रहित हो जाते है |
परमात्मा के इसी स्वरुप का वर्णन श्री
गोस्वामी तुलसी दस ने भी
निम्न शब्दों में किया है –
बिनु पग चलहिं ,सुने बिनु काना |
बिन कर कर्म करे विधि नाना | |
वाणी उस परमब्रह्म का स्वरुप वर्णन करने में
असमर्थ है | तभी उपनिषद कर ऋषि नेति-नेति कह
कर अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं |
इश्वर अणु से भी सूक्षम और महान से
भी महान है | इसी लिए वह नित्य है
,अमर है , अजर है , अभय है , और निर्अवयव है ,अकाय
है |

भगवान

अब हम भगवान विषय पर कुछ विचार करेंगे |
वर्त्तमान स्थिति में भारत के हर प्रान्त में अनेक भगवान पैदा हो
चुके हैं | जिधर देखिये उधर भगवान ही भगवान नज़र
आते हैं | पुराणों में इस कलयुग की २८ वीं
चतुर्यगी में भगवान ( ईश्वर ) के दशावतार
की चर्चा सुनते आये हैं |
यथा हम धन वाले को धनवान , विद्या वाले को विद्यावान कहते हैं
उसी प्रकार भग वाले को भगवान कहा जाता है | प्रथम
भग शब्द पर विचार करें |
भग संस्कृत का शब्द है |
एश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यश स श्रियः |
ज्ञान वैराग्य यो श्चैव श ण णो भग इतिरणा | |
अर्थात -सम्पूर्ण एश्वर्य, धर्म , यश ,श्री ,ज्ञान
और वैराग्य इन छः का नाम भग है | इन सब लक्षणों से
भी अनंत गुण जिसमें हैं वह इश्वर ( परम भगवान )
है , किन्तु जिन महा मानवों में भग के उपरोक्त गुण पाए जाते हैं
,या वे संसार भर के लिए इन गुणों के चरम उत्कर्ष को अपने
जीवन में धारण करते हुए आदर्श प्रस्तुत करते हैं
उन्हें भी हम भगवान कह के संबोधित करते हैं |
उपरोक्त गुणों से युक्त हो कर मानव जाति को अज्ञान, अत्याचार,
भय ,शोषण से मुक्ति दिलाने वालों को भी भगवान माना गया
है | जैसे भगवान राम , भगवान कृष्ण |
क्रमशः “देवता ईश्वर भगवान्” पुस्तक, लेखक श्री
कान्तिलाल 'अग्निमित्र’ आर्यापुरोहित से (संक्षिप्त में)
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बल-बुद्धिनाशक चाय नहीं,आयुर्वेदिकचाय लें।’ चाय वीर्य को पतला बना देती है ।-महात्मा नारायण स्वामी’...

बल-बुद्धिनाशक चाय नहीं,आयुर्वेदिकचाय लें।’ चाय वीर्य को पतला बना देती है ।-महात्मा नारायण स्वामी’ चाय ने हमारे हजारों स्त्री-पुरूषों की भूखउड़ा दी है ।-महात्मा गाँधी’ चाय-कॉफी से बुद्धि का नाश होता है ।-स्वामी दयानंद सरस्वती’ चाय से अनिद्रा-रोग होता है, स्मरणशक्ति नष्ट होती है तथा मूत्राशय कमजोर हो जाता है।-एडमंड शेफोटसबरी’ चाय पीने से थकावट मिटती नहीं अपितु बढ़ती है ।-डॉ. खिस कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ चाय से नासूर पैदा होता है ।-डॉ. हंसकेसर वोंशिन्ग्टन (अमेरिका)’ चाय पीने से पेट की गड़बड़ियाँ बढ़ रही हैं ।-डॉ. कार्तिकेय बोस’ चाय पीने से नेत्रों के नीचे कालापन और मानसिक उदासी छा जाती है ।-डॉ. जे डब्ल्यू. मार्टिन’ चाय के बाद पेशाब में यूरिक एसिड दुगना हो जाता हैं ।-प्रो. मेंडल’ बच्चों को चाय पिलाना शराब पिलाने से भी अधिक हानिकारक हैं ।-डॉ. लीला क्लाइस्ट’ दिन में तीन कप चाय पीने से मासंपेशियों में खिंचाव, सनायुरोग, चिंता, भय, ह्रदयकम्प तथा मस्तिष्क के रोग हो जाते हैं ।-डॉ. गिनमैन (अमेरिका)’ चाय-कॉफी से रक्तचाप बढ़ता है ।-मारिस फिशबेन’ चाय-कॉफी का अधिक सेवन करनेवालों को स्वप्नदोष आदि बिमारियाँ हो जाती हैं ।-हेरी मिलर’ चाय पीने से कब्ज होता है ।-डॉ. ब्लाडखाली पेट चाय-कॉफी से धातुनाश होता है, कमर कमजोर होती है, गुर्दे और वीर्यग्रंथियों को नुकसान पहुँचता है तथा ओज क्षीण व वीर्य पतला हो जाता है । अगर वीर्य ही पतला हो गया, ओज ही क्षीण हो गया तो इससे बड़ा घाटा और क्याहो सकता है? अत: सावधान! अपने और दूसरों के स्वास्थ्य की रक्षा करें, चाय से खुद बचें व दूसरों को बचायें ।आयुर्वेदिक चायलाभ– इस पेय के सेवन से शरीर में स्फूर्ति व मस्तिष्क में शक्ति आती है । पाचनक्रिया में सुधार होता है और भूख बढ़ती है । सर्दी, बलगम, खांसी, दमा, श्वास, कफजन्य ज्वर और न्युमोनिया जैसे रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है । इसे ओजस्वी चाय नाम दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।सामग्री(१) गुलबनपशा २५ ग्राम(२) छाया में सुखाये हुए तुलसी के पत्ते २५ ग्राम(३) तज २५ ग्राम(४) छोटी इलायची १२ ग्राम(५) सोंफ १२ ग्राम(६) ब्राह्मी के सूखे पत्ते १२ ग्राम(७) छिली हुई जेठीमधु १२ ग्रामविधि– उपर्युक्त प्रत्येक वस्तु को अलग-अलगकूटकर चूर्ण बना के मिश्रित कर लें । जब चाय-कॉफी पीने की आवश्यकता महसूस हो, तब मिश्रण में से ५-६ ग्राम चूर्ण लेकर ४०० ग्राम पानी में उबालें । जब आधा पानी बाकी रहे तब नीचे उतारकर छान लें । उसमें दूध-खांड मिलाकर धीरे-धीरे पियें । चीन जैसेदेशों में तो आयुर्वेदिक चाय का प्रचलन बढ़ रहा है, फिर हमारे देशवासी चाय-कॉफी पीकर अपनी तबाही क्यों करें ?


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घिया (लौकी) घिया (लौकी) की सब्जी में हैं अनेक रोग मिटने की क्षमता : दोस्तो अमेरिका की बड़ी बड़ी...

घिया (लौकी)

घिया (लौकी) की सब्जी में हैं अनेक रोग मिटने की क्षमता :
दोस्तो अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनिया जो दवाइया भारत
मे बेच रही है ! वो अमेरिका मे 20 -20 साल से बंद है ! आपको जो
अमेरिका की सबसे खतरनाक दवा दी जा रही है ! वो आज कल
दिल के रोगी (heart patient) को सबसे दी जा रही है !! भगवान
न करे कि आपको कभी जिंदगी मे heart attack आए !लेकिन अगर
आ गया तो आप जाएँगे डाक्टर के पास ! और आपको मालूम ही है
एक angioplasty आपरेशन आपका होता है ! angioplasty आपरेशन
मे डाक्टर दिल की नली मे एक spring डालते हैं ! उसको stent
कहते हैं ! और ये stent अमेरिका से आता है और इसका cost of
production सिर्फ 3 डालर का है ! और यहाँ लाकर वो 3 से 5
लाख रुपए मे बेचते है और ऐसे लूटते हैं आपको ! और एक बार attack मे
एक stent डालेंगे ! दूसरी बार दूसरा डालेंगे ! डाक्टर को
commission है इसलिए वे बार बार कहता हैं angioplasty
करवाओ angioplasty करवाओ !! इस लिए कभी मत करवाए ! तो
फिर आप बोलेंगे हम क्या करे ????! आप इसका आयुर्वेदिक इलाज
करे बहुत बहुत ही सरल है ! पहले आप एक बात जान ली जिये !
angioplasty आपरेशन कभी किसी का सफल नहीं होता !!
क्यूंकि डाक्टर जो spring दिल की नली मे डालता है !! वो
spring बिलकुल pen के spring की तरह होता है ! और कुछ दिन
बाद उस spring की दोनों side आगे और पीछे फिर blockage
जमा होनी शुरू हो जाएगी ! और फिर दूसरा attack आता है !
और डाक्टर आपको फिर कहता है ! angioplasty आपरेशन
करवाओ ! और इस तरह आपके लाखो रूपये लूटता है और आपकी
ज़िंदगी इसी मे निकाल जाती है ! ! ! अब पढ़िये इसका
आयुर्वेदिक इलाज !! ______________________ हमारे देश भारत मे
3000 साल एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे उनका नाम था महाऋषि
वागवट जी !! उन्होने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम है
अष्टांग हृदयम!! और इस पुस्तक मे उन्होने ने बीमारियो को ठीक
करने के लिए 7000 सूत्र लिखे थे ! ये उनमे से ही एक सूत्र है !!
वागवट जी लिखते है कि कभी भी हरद्य को घात हो रहा है !
मतलब दिल की नलियो मे blockage होना शुरू हो रहा है ! तो
इसका मतलब है कि रकत (blood) मे acidity(अमलता ) बढ़ी हुई है !
अमलता आप समझते है ! जिसको अँग्रेजी मे कहते है acidity !!
अमलता दो तरह की होती है ! एक होती है पेट कि अमलता ! और
एक होती है रक्त (blood) की अमलता !! आपके पेट मे अमलता जब
बढ़ती है ! तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है !! खट्टी खट्टी
डकार आ रही है ! मुंह से पानी निकाल रहा है ! और अगर ये
अमलता (acidity)और बढ़ जाये ! तो hyperacidity होगी ! और
यही पेट की अमलता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त मे आती है तो रक्त
अमलता(blood acidity) होती !! और जब blood मे acidity बढ़ती
है तो ये अमलीय रकत (blood) दिल की नलियो मे से निकल नहीं
पाता ! और नलिया मे blockage कर देता है ! तभी heart attack
होता है !! इसके बिना heart attack नहीं होता !! और ये आयुर्वेद
का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता
नहीं ! क्यूंकि इसका इलाज सबसे सरल है !! इलाज क्या है ??
वागबट जी लिखते है कि जब रकत (blood) मे अमलता (acidty)
बढ़ गई है ! तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो छारीय है !
आप जानते है दो तरह की चीजे होती है ! अमलीय और छारीय !!
(acid and alkaline ) अब अमल और छार को मिला दो तो क्या
होता है ! ????? ((acid and alkaline को मिला दो तो क्या
होता है )????? neutral होता है सब जानते है !! _______________
______ तो वागबट जी लिखते है ! कि रक्त कि अमलता बढ़ी हुई
है तो छारीय(alkaline) चीजे खाओ ! तो रकत की अमलता
(acidity) neutral हो जाएगी !!! और रक्त मे अमलता neutral हो
गई ! तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं !!
ये है सारी कहानी !! अब आप पूछोगे जी ऐसे कौन सी चीजे है
जो छारीय है और हम खाये ????? आपके रसोई घर मे सुबह से शाम
तक ऐसी बहुत सी चीजे है जो छारीय है ! जिनहे आप खाये तो
कभी heart attack न आए ! और अगर आ गया है ! तो दुबारा न
आए !! _________________ सबसे ज्यादा आपके घर मे छारीय चीज
है वह है लोकी !! जिसे दुदी भी कहते है !! english मे इसे कहते है
bottle gourd !!! जिसे आप सब्जी के रूप मे खाते है ! इससे ज्यादा
कोई छारीय चीज ही नहीं है ! तो आप रोज लोकी का रस
निकाल-निकाल कर पियो !! या कच्ची लोकी खायो !!
स्वामी रामदेव जी को आपने कई बार कहते सुना होगा लोकी
का जूस पीयों- लोकी का जूस पीयों ! 3 लाख से ज्यादा
लोगो को उन्होने ठीक कर दिया लोकी का जूस पिला
पिला कर !! और उसमे हजारो डाक्टर है ! जिनको खुद heart
attack होने वाला था !! वो वहाँ जाते है लोकी का रस पी पी
कर आते है !! 3 महीने 4 महीने लोकी का रस पीकर वापिस आते
है आकर फिर clinic पर बैठ जाते है ! वो बताते नहीं हम कहाँ गएथे ! वो कहते है हम न्योर्क गए थे हम जर्मनी गए थे आपरेशन
करवाने ! वो राम देव जी के यहाँ गए थे ! और 3 महीने लोकी का
रस पीकर आए है ! आकर फिर clinic मे आपरेशन करने लग गए है ! और
वो इतने हरामखोर है आपको नहीं बताते कि आप भी लोकी
का रस पियो !! तो मित्रो जो ये रामदेव जी बताते है वे भी
वागवट जी के आधार पर ही बताते है !! वागवतट जी कहते है रकत
की अमलता कम करने की सबे ज्यादा ताकत लोकी मे ही है !
तो आप लोकी के रस का सेवन करे !! कितना करे ????????? रोज
200 से 300 मिलीग्राम पियो !! कब पिये ?? सुबह खाली पेट
(toilet जाने के बाद ) पी सकते है !! या नाश्ते के आधे घंटे के बाद
पी सकते है !! _______________ इस लोकी के रस को आप और
ज्यादा छारीय बना सकते है ! इसमे 7 से 10 पत्ते के तुलसी के
डाल लो तुलसी बहुत छारीय है !! इसके साथ आप पुदीने से 7 से 10
पत्ते मिला सकते है ! पुदीना बहुत छारीय है ! इसके साथ आप
काला नमक या सेंधा नमक जरूर डाले ! ये भी बहुत छारीय है !!
लेकिन याद रखे नमक काला या सेंधा ही डाले ! वो दूसरा
आयोडीन युक्त नमक कभी न डाले !! ये आओडीन युक्त नमक
अम्लीय है !!!! तो मित्रो आप इस लोकी के जूस का सेवन जरूर
करे !! 2 से 3 महीने आपकी सारी heart की blockage ठीक कर
देगा !! 21 वे दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो
जाएगा !!! _____ कोई आपरेशन की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी !! घर
मे ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा !! और
आपका अनमोल शरीर और लाखो रुपए आपरेशन के बच जाएँगे !!
और पैसे बच जाये ! तो किसी गौशाला मे दान कर दे ! डाक्टर
को देने से अच्छा है !कि सी गौशाला दान दे !! हमारी गौ
माता बचेगी तो भारत बचेगा !! __________________ आपने पूरी
post पढ़ी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!
🌹स्वदेशी मंदिर, मद्रास 🌷


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परमात्मा निराकार है, अतः उसका मुख आदि हो नहीं सकता। यजुर्वेद ३१.११ मंत्र में अलङ्कार पूर्वक चारों...

परमात्मा निराकार है, अतः उसका मुख आदि हो नहीं सकता। यजुर्वेद ३१.११ मंत्र में अलङ्कार पूर्वक चारों वर्णों की समाज में उपयोगिता दर्शायी गयी है।उसका यह अर्थ कदापि नहीं कि ब्राह्मण ईश्वर के मुख से,क्षत्रिय भुजाओं से,वैश्य उदर से और शुद्र पैरों से उत्पन्न हुये हैं |


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“आर्य समाज” को खत्म करना चाहते थे गांधी 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 मोहनदास करमचन्द गाँधी वैसे तो भारत...

“आर्य समाज” को खत्म करना चाहते थे गांधी
🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥

मोहनदास करमचन्द गाँधी वैसे तो भारत के राष्ट्रपिता कहलाते हैं, लेकिन उन्होंने 1924 में मुसलमानों के प्रति अपना आगाह प्रेम प्रदर्शित करने के लिए आर्य समाज जैसे समाजिक व संस्कृति संस्था को प्रतिबंधित की वकालत करते हुए ब्रिटिश सरकार से कई बार निवेदन किया था। गाँधी ने आर्य समाज पर आक्रमण करवाने का घृणित कार्य भी किया और आर्य समाज की अपनी गहरे मन से निन्दा की थी।
👉आर्य समाज महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित की गई वैदिक व समाजिक संस्था है, जो वेद के रहस्य को प्रचारित करती है। यह संस्था मुस्लिम समुदाय द्वारा देश में फैलाए जा रहे कुव्यवस्थाओं को उजागर करता रहा है। इसलिए मुसलमानों को आर्य समाज के गतिविधियाँ ख़ासकर भारत को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने के उनके लक्ष्य में बाधा लगता था। लिहाजा गाँधी ने मुसलमानों को खुश रखने के लिए आर्य समाज पर हमले कराने जैसे पतित कार्य को भी संपादिक किया था।

👉यह खुलासा गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक में की है। उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम समुदाय नाराज न हो इसके लिए गाँधी किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। आर्यसमाज ने बहुत ही सभ्य ढंग से जब गाँधी के इस घृणित कार्य का उत्तर दिया तब गाँधी ने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके आर्य समाज को कमजोर करने के लिए षडयंत्र रचा। वास्तविकता तो यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती का कोई भी अनुयायी गाँधी पथ पर नहीं चल सकता, क्योंकि दोनों की स्थितियाँ एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु कुछ लोग नेता बनने की इच्छा से दोहरी चाल चलते रहे। एक ओर, वे आर्यसमाजी रहे और दूसरी ओर, गाँधीवादी काँग्रेसी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब सिन्ध में गाँधी के ईशारे पर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबंध लगा तो आर्य समाज इस विषय में अधिक कुछ न कर सका।

👉इसलिए आर्य समाज का प्रभाव और भी कम होता गया। आर्य समाज के सदस्य पक्के देशभक्त होते हैं। लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानन्द, दो पक्के आर्य समाजी थे, परन्तु अंत तक कांग्रेस के नेता रहे। वे गाँधी के अनुयायी नहीं थे, प्रत्युत उनकी मुसलमानों का पक्ष लेने की नीति के विरोधी थे, परन्तु वे महापुरुष शांत हो चुके थे। बहुत से आर्य समाजी वैसे ही रहे जैसे कि वे थे, किन्तु प्रायः स्वार्थी लोग उनका मार्ग दर्शन करते रहे और गाँधी के कारण आर्य समाज की वह शक्ति न रही जो किसी समय थी।

👉अलबत्ता, गाँधी ने जिस मकसद से आर्य समाज की निन्दा की थी, उससे गाँधी मुसलमानों में उतने लोकप्रिय नहीं हुए। प्रत्युत उनके इस आचरण ने मुसलमानों को उकसा दिया और एक मुसलमान युवक ने आरोप लगाया कि यह संस्था बुरी भावना फैलाने वाली है। यह आरोप नितांत असत्य था। प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि आर्य समाज ने हिन्दू समाज में अनेक सुधार किये हैं।

👉आर्य समाज ने विधवा विवाह प्रारंभ किए। आर्य समाज ने जातपात को समाप्त करने के क्रांतिकारी प्रयत्न किए और हिन्दुओं की ही नहीं, प्रत्युत उनकी एकता का प्रचार किया जो आर्य समाज के सिद्धांतों को मानते हों। तत्कालीन समाचार माध्यमों, अख़बारों और गाँधी के संस्थाएँ इस बात पर पर्दा डालने में सफल रहे कि गाँधी ने आर्य समाज को कितनी हानि पहुँचाई है। देश के आम लोग भी गाँधी के महिमा मंडन में उनके राष्ट्रविरोधी कार्यों को भूल गए हैं।

👉महर्षि दयानन्द जो आर्य समाज के निर्माता थे, हिंसा और अहिंसा के प्रपंच से निर्लिप्त थे। वे तो कहते थे कि जब आवश्यकता हो तब शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। एक समय ऐसा भी आया जब आर्य समाजियों के लिए धर्म संकट उपस्थित हुआ कि आर्य समाज में रहें या काँग्रेस में। क्योंकि कांग्रेस में तो उनको अहिंसा के सिद्धांत को स्वीकार करना पड़ता, परन्तु स्वामी की मृत्यु हो चुकी थी और गाँधी का सितारा चमक रहा था, इसलिए लोग गाँधी के अनुयायी हो गए। इसतरह आर्य समाज को खत्म करने का सपना गाँधी का सफल होता दिखने लगा। 👀
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३० जयेष्ठ 13 जून 15 😶 “ ब्रह्मचर्य महिमा ” 🌞 🔥🔥ओ३म् इयं समित् पृथ्वी...

३० जयेष्ठ 13 जून 15
😶 “ ब्रह्मचर्य महिमा ” 🌞

🔥🔥ओ३म् इयं समित् पृथ्वी द्यौर्द्वितीयोतान्तरिक्षं समिधा पृणाति ।🔥🔥
🍃🍂 ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकाँस्तपसा पिपर्त्ति ।। 🍂🍃
अथर्व० ११ । ५ । ४
शब्दार्थ :- यह पहली समिधा पार्थिव-जगत् की, दूसरी समिधा द्युलोक की,आत्मिक जगत् की, और वह अपनी तीसरी समिधा द्वारा मध्य के मनोमय अंतिरक्ष लोक को पूर्ण करता है । इस प्रकार ब्रह्मचारी समिधा से,त्रिविध दीप्ती से मेखला से,कटीबद्वता से श्रम से और तप से तीनों लोकों को,संसार के सब लोगों को पालित,पोषित और पूरित करता हैं ।

विनय :- यह संसार ब्रह्मचर्य से ही पालित,पोषित, और पूरित हो रहा है । इस जगत् के आधार में यदि ब्रह्मचरी का परमवीर्य न होता,तो यह जगत् कब का खत्म और खाली और छूछा हो चुका होता, अपने शारीरिक वीर्य की,ब्रह्मतेज की और आत्मिक वीर्य ( आत्म-तेज ) की रक्षा करनेवाले सयंमी ब्रह्मचारी लोग ही है जो इस त्रिलोकी को निरन्तर जीवन-तेज से पूरित कर रहे है । ब्रह्मचारी अपने शरीर को, अपने मन को,अपनी आत्मा( विज्ञानमय ) को तीन समिधाएँ बनाकर बृहद् अग्रि ( आचार्याग्रि या परमात्माग्रि ) में रखता है, उसके अर्पण कर देता है । इसका फल यह होता है कि उसकी ये तीनों समिधाएँ प्रदीप्त हो जाती है-उसके शरीर में वीर्य का तेज आ जाता है,उसका मन ब्रह्म-तेज से समिद्ध हो जाता है । इस प्रकार से संसार का प्रत्येक सच्चा ब्रह्मचारी अपने संचित,रक्षित,त्रिविध तेज (समिधा ) द्वारा इन तीनों लोकों को पालित कर रहा है । खूब श्रम करना,शरीर और मन से खूब काम लेकर इन्हें थका देने पर ही विश्राम करना-यह ब्रह्मचारी का धर्म है ; आराम पसन्द,कामचोर मनुष्य के भाग्य में ब्रह्मचारी का सुख नहीं है । तप करना सब द्वंदों को सहना,गर्मी सर्दी, भूख प्यास,सुख दुःख आदि को प्रसत्रतापूर्वक सहना-यह ब्रह्मचारी का तीसरा परमावश्यक व्रत है । इन्हीं में ब्रह्मचर्य की अपार महिमा का रहस्य है ।


🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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(योग दिवस और सूर्य नमस्कार का मुस्लिम समाज द्वारा विरोध करने पर गंगा जमुनी तहजीब को धिक्कारती मेरे...

(योग दिवस और सूर्य नमस्कार का मुस्लिम समाज द्वारा विरोध करने पर गंगा जमुनी तहजीब को धिक्कारती मेरे आक्रोश की ताज़ा कविता

सूरज से नफरत करते ये चाँद सितारा देखो जी,
गंगा को गाली देती जमुना की धारा देखो जी,

संविधान की शीतलता पर चढ़ता पारा देखो जी,
बैर-कपट से भरा हुआ है भाई चारा देखो जी.

हिन्दू मुस्लिम भाई भाई नारे,सुनते आये हैं
भारत माँ की आँखों के दो तारे,सुनते आयें हैं,

भारत माँ की आँखों की सच्चाई को पहचान लिया,
दो आँखों में एक आंख कानी है सबने जान लिया,

छोटी सोच नज़र छोटी ने फिर बईमानी कर डाली
कानी आँखों ने फिर देखो आनाकानी कर डाली,

कायनात के हर ज़र्रे में खुदा बसा,कुरआन कहे,
धरती अम्बर,सूरज चन्दा,सब में ही रहमान रहे,

वो धरती जिसके सीने से हमें निवाला मिलता है
वो सूरज जिसके दम से भरपूर उजाला मिलता है,

मेरा धर्म सनातन कहता कुदरत का सम्मान करो,
कुदरत में भगवान बसे हैं,कुदरत का गुणगान करो,

कैसा है इस्लाम तुम्हारा,कुदरत कुफ्र बताता है,
मज़हब है या कोई जिद है,जबरन ही मनवाता है,

हम तुमको भाई मानें तुम दुश्मन सा व्यवहार करो,
हम ख्वाजा पर सर पटकें, तुम ओमकार पर वार करो,

जिस पर दुनिया गर्व करे वो योग तुम्हे बदनाम लगा,
छोटी छोटी बातों से ही खतरे में इस्लाम लगा,

गीत मातरम वन्दे दिल पर चोट दिखाई देता है,
सूरज के अभिनन्दन में भी खोट दिखाई देता है,

गंगा जमुनी तहजीबों के ड्रामे सारे बंद करो
हिन्दू मुस्लिम भाई भाई वाले नारे बंद करो

तुलसी के गमले में बस दो चार फूल ही खिलते हैं
सौ में दो अब्दुल कलाम अब्दुल हमीद ही मिलते है

सच तो ये है,गाजी का अरमान बना कर रहते हैं,
ये भारत में खुद का पाकिस्तान बना कर रहते हैं,.


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Thursday, June 11, 2015

।।ओउम्।। क्‍या आप जानते हैं? आज-कल के बच्‍चे इतने समझदार और चतुर होते हैं कि कभी-कभी उनके धर्म...

।।ओउम्।।
क्‍या आप जानते हैं?
आज-कल के बच्‍चे इतने समझदार और चतुर होते हैं कि कभी-कभी उनके धर्म सम्‍बन्‍धी प्रश्नों का सटीक उत्तर उनके माता-पिता भी नहीं दे पाते हैं क्‍योंकि वे स्‍वयं स्‍वाध्‍याय ही नहीं करते। माता-पिता को निरुत्तर कर बच्‍चे स्‍वयं को ही श्रेष्‍ठ समझने लगते हैं। स्‍मरण रहे कि बच्‍चे की सर्वप्रथम गुरु उसकी माता होती है, द्वितीय गुरु उसके पिता तथा तृतीय गुरु उसके विद्यालय के शिक्षक होते हैं। यदि ये तीनों ही गुरु बच्‍चों को धार्मिक शिक्षा से वञ्चित रखते हैं तो आप ही सोचिये कि हमारे बड़े होने का क्‍या अर्थ रह जाता है तथा हमारी अपनी सन्‍तान बड़ी होकर क्‍या और कैसी बनेगी?
धर्म की सही जानकारी के बिना मनुष्‍य, मनुष्‍य नहीं बन सकता। दिखने में चाहे सभी मनुष्‍य जैसे लगते हों परन्‍तु वास्‍तव में वही मनुष्‍य है जिसे मनुष्‍यता का ज्ञान है तथा अपने कर्त्तव्‍यों का पालन करता है। धर्म किसी को हिन्‍दू, मूस्लिम, सिक्‍ख या ईसाई बनना नहीं सिखाता अपितु उसे मनुष्‍य बनना सिखाता है। क्रिश्चियन स्‍कूलों में मदर मैरी एवं जीसस् क्राईस्‍ट की प्रार्थना सिखाई जाती है, मुस्लिम मदरसों में इस्‍लाम का इल्‍म तथा नमाज़ पढ़ना सिखाया जाता है, हिन्‍दुओं के पाठशलाओं में मूर्ति के समक्ष प्रार्थना गीत गाने की शिक्षा दी जाती है और आर्य समाजों के विद्यालयों में संध्‍या और हवन करना सिखाया जाता है और साप्‍ताहिक ‘धार्मिक शिक्षा’ की कक्षा प्रदान की जाती है। शेष बच्‍चे ऐसे स्‍कुलों में पढ़ते हैं जहाँ प्रारम्भिक सुविधाएँ (लिखने के लिये काले बोर्ड, पढ़ने के लिये पुस्‍तकें और यहाँ तक कि बैठने तक की सुविधा) उपलब्‍ध नहीं होती। हमारा भविष्‍य कैसा होगा, इसका निर्णय आप महानुभव स्‍वयं ही लगा सकते हैं।
सर्वविदित है कि हमारे देश में धर्मनिर्पेक्ष का नारा लगाकर भोली-भाली जनता को गुमराह किया जाता है क्‍योंकि धर्म मात्र एक होता है, अनेक नहीं। बच्‍चे नादान होते हैं। उनको बचपन में जो पढ़ाएँगे सा सिखाएँगे, वे जीवन भर उसीको सत्‍य मानकर व्‍यवहार करते हैं। सत्‍यासत्‍य के भेद को समझने के लिये उन्‍हें धर्म का सही ज्ञान प्रदान कराना अत्‍यन्‍तावश्‍यक है।
कुछ वर्ष पूर्व मुझे अपने मित्रों सहित गान्‍धीधाम स्थित ‘जीवन प्रभात’ में जाने का सुवासर प्राप्‍त हुआ। वहाँ के बच्‍चों से मिलकर बहुत प्रसन्‍नता हुई। मैंने तत्‍काल निर्णय लिया कि मेरी आगामी पुस्‍तक आधुनिक बच्‍चों के लिये होगी, जिसका शीर्षक होगा “बाल प्रश्नोत्तरी”। “बाल प्रश्नोत्तरी” के माध्‍यम से हमारे देश के होनहार बच्‍चे ही नहीं, उनके माता-पिता एवं सगे-सम्‍बन्‍धी को भी सत्‍य सनातन वैदिक धर्म के बारे में सामान्‍य ज्ञान प्राप्‍त हो सकेगा। कुछ ही महीनों के भीतर ‘आर्य समाज गांधीधाम’ के आचार्य श्री वाचोनिधि के सहयोग द्वारा “बाल प्रश्नो प्रश्नोत्तरी” पुस्‍तक का प्रकाशन‘जीवन प्रभात’ के बच्‍चों के लिये निःशुल्‍क वितरण किया गया। इस पुस्‍तक में‘धार्मिक शिक्षा’ की प्रारम्भिक आवश्‍यक जानकारी उपलब्‍ध कराई गई है।
‘बाल पश्‍नोत्तरी’ को बच्‍चों तथा उनके परिवार के लोगों ने बहुत पसंद किया है। जिन बच्‍चों के माता-पिता ने इस पुस्‍तक को देखा है उनके विशेष आग्रह पर मैं उपरोक्‍त पुस्‍तक को परिवर्धित करके समाज के सभी स्‍कूली बच्‍चों के लिये ‘बाल शंका-समाधान’ के रूप में प्रस्‍तुत करने का प्रयास किया है ताकि आधुनिक स्‍कूलों (विद्या-मन्दिरों) के विद्यार्थी धार्मिक शिक्षा से परिचित हो सकें। ‘माडर्न स्‍कूलों’ में सब कुछ पढ़ाया जाता है और धर्मिक शिक्षा के नाम पर निजी मत-मज़हबों का पाठ पढ़ाया जाता है। माता-पिता अपने-अपने काम–काज में व्‍यस्‍त रहते हैं इसलिये मोर्डन बच्‍चों को सही मार्गदर्शन की अत्‍याधिक आवश्‍यकता होती है। जीवन में सही मार्गदर्शन मात्र धर्म ही प्रदान कर सकता है। मनुष्‍य कितना ही पढ़-लिख ले, कितनी ही डिग्रियाँ इकट्ठी कर ले, कितना ही धन कमा-जमा ले, फिर भी वह अपने जीवन में अधूरेपन का अनुभव करता है। धन-दौलत से जीवन की भौतिक आवश्‍यकताएँ तो पूर्ण हो सकती हैं। ज़‍न्दिगी में धन-दौलत ही सब कुछ नहीं है। सब कुछ होने पर भी हम किसी वस्‍तु की कमी को अनुभव करते हैं। जीवन के उस अधूरेपन को मात्र ‘धर्म’ ही दूर कर सकता है। धर्म को जानकर ही मनुष्‍य जीवन सफल बना सकता है। यही समय की माँग है। ईशकृपा एवं शुभ कामनाओं सहित
आपका अपना
मदन रहेजा
प्राथमिक विभाग
(6 से 10 वर्ष के बच्‍चो के लिये प्रश्न एवं उत्तर)
1. ऐसे कितने पदार्थ हैं जो कभी पैदा नहीं होते? (ईश्वर, जीव और प्रकृति)
2. वो कौन सी वस्‍तुएँ हैं जो कभी नष्ट नहीं होतीं? (ईश्वर, जीव और प्रकृति)
3. संसार को कौन बनाता है? (संसार को ईश्वर बनाता है।)
4. हम सब कौन हैं? (हम सब मनुष्‍य हैं - आत्‍माएँ हैं।)
5. हम कहाँ रहते हैं? (हम इस संसार में रहते हैं।)
6. यह सारा संसार किस में रहता है? (सारा संसार भगवान् में रहता है।)
7. भगवान् कहाँ रहता है? (ईश्वर सब जगह, सब वस्‍तुओं के भतर-बाहर तथा सब के दिल में रहता है।)
8. क्‍या मूर्ति में भी भगवान् रहता है? (हाँ, वह मूर्ति में भी रहता है।)
9. क्‍या मूर्ति भगवान् है? (नहीं! मूर्ति भगवान् नहीं है।)
10. क्‍या मूर्ति और भगवान् एक ही वस्‍तु है? (नहीं ! दोनों अलग-अलग वस्‍तुएँ हैं।
11. मूर्ति में यदि ईश्वर रहता है तो वह हमें दिखाई क्‍यों नहीं देता? (क्‍योंकि हम मूर्ति के अन्‍दर नहीं रहते, हम मूर्ति के बाहर रहते हैं इसलिये वह हमें दिखाई नहीं देता। जहाँ हम रहते हैं ईश्वर वहाँ दिखता है।)
12. हम तो यहाँ हैं फिर ईश्वर कहाँ रहता है? (वह हमारे अन्‍दर रहता है। हम आत्‍मा हैं, आत्‍मा में रहता है।)
13. शरीर में आत्‍मा कहाँ रहता है? (हमारे शरीर में आत्‍मा, दोनों भृकुटियों के बीच में, आँखों के पीछे, अन्‍दर की ओर रहता है।)
14. परमात्‍मा हमें कैसे दिखाई देता है? (आँख बन्‍द करके उसको याद करो तो उसका अनुभव अर्थात् दर्शन होने लगता है।
15. भगवान् को हम किस नाम से पुकारें? (‘ओ३म्’ नाम से)
16. परमात्‍मा कितने होते हैं? (ईश्वर एक होता है जिसका नाम –‘ओ३म्’ है।)
17. क्‍या ईश्वर हमारी आवाज़ सुनता है? (वह सब की आवाज़ सुनता है, हमारे मन की आवाज़ भी सुनता है।)
18. ईश्वर कौन सी भाषा समझता है? (वह सब की भाषा समझता है। हम अपने मन में जो भी सोचते हैं या मुँह से बोलते हैं, वह ईश्वर सब की सुनता है और सब समझता है।)
19. ईश्वर हमारा कौन लगता है? (वह हमारा सबकुछ लगता है। ईश्वर हम सब का माता-पिता-मित्र-बन्‍धु लगता है। हम सब उस परमात्‍मा की सन्‍तान हैं। हम उसके के बच्‍चे हैं।)
20. वह सारा समय क्‍या करता है? (परमात्‍मा हर समय हम सब की सहायता करता है। उसने हमारे लिये ही पृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश बनाया है। उसने हमारे लिये सूर्य, चन्‍द्रमा, तारे बनाए हैं। वह पूरा संसार बनाकर उसकी देख-भाल करता है।)
21. हमने भूत की कहानियाँ सुनी हैं, क्‍या भूत भी होते हैं? (नहीं ! भूत-वूत कुछ नहीं होते। अच्‍छे बच्‍चों को ऐसी कहानियाँ नहीं सुननी चाहियें।)
22. मास्‍टर जी के कमरे में टी॰ वी॰ लगी है। वे स्‍वयं देखते हैं किन्‍तु हम को देखने से मना करते हैं, ऐसा क्‍यों? (क्‍योंकि टी॰ वी॰ देखने से छोटे बच्‍चों की आँखें ख़राब होती हैं। जब आप बड़े हो जाओगे तो समझ जाओगे।)
23. हम बड़े कैसे होंगे? (रात को जल्‍दी सोना, सवेरे जल्‍दी उठना, पढ़ाई के मन लगाके पढ़ाई करना, खेल के समय ख़ूब खेलना और ठीक समय पर भोजन करना – फिर आप बड़े हो जाओगे।)
24. हवन करने से क्‍या होता है? (हवन करने से वायु शुद्ध होती है, बुद्धि तेज़ होती है, आयु बढ़ती है और मनुष्‍य स्‍वस्‍थ रहता है और वह कभी बीमार नहीं पड़ता है।)
25. क्‍या गाली देना बुरी बात होती है? (बहुत बुरी बात होती है। ईश्वर को भी अच्‍छा नहीं लगता इसलिये गाली देने से पाप लगता है। हमें कभी किसी को भी गाली नहीं देनी चाहिये। अच्‍छे बच्‍चे कभी किसी को गाली नहीं देते हैं।)
26. यदि कोई हमें गाली दे तो हमें क्‍या करना चाहिये? (उसको समझाना चाहिये कि अच्‍छे बच्‍चे गाली नहीं देते, गाली देना बुरी बात है, इससे पाप लगता है।)
27. पाप क्‍या होता है? (प्रत्‍येक बुरे काम को पाप कहते हैं। जैसे झूठ बोलना, किसी को बिना कारण के मारना, गाली देना आदि। पाप करने वाले को ईश्वर दु:ख देता है।)
28. क्‍या चोरी करने से भी पाप लगता है? (बिना पूछे किसी की वस्‍तु उठाकर अपने काम में लाना ‘चोरी’ कहाती है। चोरी करना बहुत बड़ा पाप होता है।)
29. यदि कोई वस्‍तु पूछकर लेंगे तो? (जिस की वस्‍तु है उससे पूछकर लेना अच्‍छी बात है। इससे कोई पाप नहीं लगता। अच्‍छे बच्‍चे किसी की वस्‍तु हो बिना पूछे कभी हाथ नहीं लगाते हैं।)
30. क्‍या झूठ बोलना भी पाप होता है? (हाँ! झूठ बोलना सब से बड़ा पाप होता है, इससे भगवान् बहुत बड़ा दु:ख देते हैं।)
31. क्‍या आपस में लड़ने से भी पाप लगता है? (हाँ! हर बुरे काम करने से पाप अवश्‍य लगता है।)
32. जब दो मित्र लड़ते हैं तो हम को क्‍या करना चाहिये? (सच्‍चे मित्र आपस में नहीं लड़ते। यदि वे लड़ते हैं तो आप उनके दोनों के बीच में जाकर खड़े हो जाएँ और दोनों के हाथ पकड़कर मिलाएँ और मुस्‍करा कर कहें – ‘आप मित्र हैं,आपस में लड़ना बुरी बात है’!)
33. व्रत का मतलब क्‍या होता है? (व्रत के दो अर्थ होते हैं। 1. बुरी बात को छोड़ने की प्रतिज्ञा करना और 2. कुछ समय के लिये भूखे पेट रहना।
34. व्रत किसको रखना चाहिये? (रोगी को डॉक्‍टर की सलाह के अनुसार ही कम खाना चाहिये। भूखे पेट रहने से शरीर में कमज़ोरी आती है। जो डॉक्‍टर कहे वही खाना चाहिये। उसके अलावा सब मनुष्‍यों को बुरी आदतों को हमेशा के लिये छोड़ने का व्रत लेना चाहिये अर्थात् उन आदतों को उसी समय त्‍यागने की प्रतिज्ञा करनी चाहिये या शपथ लेनी चाहिये। व्रत लेना अच्‍छी बात है।
35. गुरुकुल में आठ साल के बच्‍चों को यज्ञोपवीत (जनेऊ) क्‍यों पहनाया जाता है?(क्‍योंकि आठ वर्ष के बच्‍चे सब बातें समझते हैं। गुरुकुल में जब गुरु जी वेद का पठन-पाठन शुरु करते हैं तो उस समय आठ वर्ष के बच्‍चों को यज्ञोपवीत धारण कराते हैं।
36. यज्ञोपवीत धारण करने से क्‍या होता है? (यज्ञोपवीत में तीन धागे होते हैं जो बच्‍चों को तीन गुरुओं की याद दिलाते रहते हैं – 1. माता-पिता, 2. आचार्य और 3. परमात्‍मा। इन तीनों गुरुओं से हमें ज्ञान मिलता है जिससे हम जीवन में सुखी रहते हैं।)
37. यज्ञोपवीत किस-किस रंग के होते हैं? (यज्ञोपवीत केवल सफ़ेद रंग का ही होता है।)
38. पण्डित जी किस को कहते हैं? (जो हमें यज्ञ कराता है, धर्म की शिक्षा देता है और वेदों की बातें बताता है – उस गुरु को ‘पण्डित जी’ कहते हैं।)
39. हम बच्‍चों में से कोई गोरा है और कोई काला। ऐसा क्‍यों? (हम अलग-अलग माता-पिता से उत्‍पन्‍न हुए हैं – इसलिये। गोरे या काले का निर्णय परमात्‍मा करता है। जब आप बड़े हो जाओगे तो समझ जाओगे।)
40. जब मनुय बड़ी उम्र का हो जाता है तो मरता है परन्‍तु छोटे बच्‍चे भी मरते हैं, ऐसा क्‍यों? (इस समय आप बहुत छोटे हो। जब आप पढ़-लिख कर बड़े होगे,विद्वान बनोगे तो इस रहस्‍य को समझ सकोगे। अब इतना ही समझो कि ईश्वर जो भी करता है, उसी में सब की भलाई होती है।)
41. रात्रि में सोने से पहले हमें क्‍या करना चाहिये? (रात्रि में सोने से पहले 1. हाथ-पैर और मुँह धोने चाहियें, 2. अपने बिस्‍तर पर बैठकर, दोनों हाथ जोड़कर, ईश्वर के नाम ‘ओ३म्’ का जाप करना चाहिये और सब को ‘नमस्‍ते’ बोलकर सोना चाहिये।)
42. सवेरे उठकर सब से पहला काम क्‍या करना चाहिये? (सवेरे उठकर सब से पहले हाथ जोड़कर प्रभु को प्रार्थना करनी चाहिये – ‘‘हे ईश्वर मैं आपका धन्‍यवाद करता/करती हूँ। मुझे सद्-बुद्धि प्रदान करो। आज का दिन हम सब के लिये शुभ और सुखदायी हो!”
43. क्‍या परमात्‍मा बच्‍चों की प्रार्थना सुनता है? (जी हाँ! सच्‍चे मन से करो तो परमात्‍मा सब लोगों की बात सुनता है।
44. बड़ों के पाँव छूने से क्‍या होता है? (बड़ों के पैर छूने से उनकी आशीर्वाद मिलती है, उनकी दुआएँ लगती हैं जिससे हमारा मन प्रसन्‍न होता है। जो व्‍यक्ति बड़ों की आशीर्वाद प्राप्‍त करता है, उसकी 1) आयु, 2) विद्या, 3) यश और 4) बल बढ़ता है।)
45. नमस्‍ते करने से क्‍या होता है? (‘नमस्‍ते’ करने से आपस में मित्रता और प्रेम बना रहता है।)
46. क्‍या नमस्‍ते सब को करनी चाहिये? (हाँ! सब को करनी चाहिये।)
47. नमस्‍ते का मतलब क्‍या होता है? (नमस्‍ते का अर्थ होता है – मैं आप को नमन करता / करती हूँ। आपका आदर करता / करती हूँ।)
48. क्या ईश्वर को भी नमस्‍ते कर सकते हैं? (सवेरे उठते ही सब से पहले अपने मन में ईश्वर को ही नमस्‍ते करनी चाहिये।)
49. ईश्वर की प्रार्थना आँखें खोलकर करनी चाहिये या बन्‍द करके करनी चाहिये?(छोटे बच्‍चों को दोनों आँखें बन्‍द करके उच्‍चारण करके करनी चाहिये। बड़े लोगों को मन में करनी चाहिये।)
50. ईश्वर को प्रार्थना में क्‍या कहना चाहिये? (हे ईश्वर! हम सब को अच्‍छी बुद्धि प्रदान कीजिये।)
51. प्रार्थना करने से क्‍या भगवान् ख़ुश होता है? (प्रार्थना करने से भगवान् ख़ुश नहीं होता, वह हम को ख़ुश रखता हैं।
52. परमात्‍मा को किस समय प्रार्थना करनी चाहिये? (कहीं भी, किसी भी समय, जब आप का मन करे, उसी समय करनी चाहिये।)
53. उपासना किसे कहते हैं? (उपासना अर्थात् पास में बैठना। ईश्वर के समीप बैठकर बातें करने को उपासना कहते हैं।
54. क्‍या ईश्वर से बातें कर सकते हैं? (हाँ, क्‍यों नहीं! ईश्वर से हम अपने मन की सब बातें कर सकते हैं।
55. क्‍या ईश्वर हमारी बातों का उत्तर देता है? (हाँ! आप बात करके देखिये, वह आप से बात करेगा और प्यार भी करेगा।
आओ बच्‍चो! अब हम मिलकर मन्‍त्र पाठ करेंगे और ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। सब आप हाथ जोड़े, आँखें बन्‍द करें और एक स्‍वर में पाठ करें :
‘ओ३म्! असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्‍योतिर्गमय। मृत्‍योर्मा अमृतं गमय’॥
हे ईश्वर ! आप हमें असत्‍य से छुड़ाकर सत्‍य की ओर ले चलिये!
हे परमेश्वर ! आप हमें अज्ञानता से छुड़ाकर ज्ञान की ओर ले चलिये!
हे भगवान् ! आप हमें मृत्‍यु से छुड़ाकर अमृत की ओर ले चलिये!
ओ३म्! शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


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