Sunday, June 14, 2015

🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★ आर्य बन्धुओं — हुड़दंगो से सावधान !!!...

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★ आर्य बन्धुओं — हुड़दंगो से सावधान !!! ★
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प्रश्न:- हुड़दंगा कहता है कि :—
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क्यों जी ! पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं न पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं दन्तकटाकटेति किं कर्त्तव्यम् ?
हुड़दंगा कहता है कि जो पढ़ता है वह भी मरता है और जो नहीं पढ़ता वह भी मरता है फिर पढ़ने पढ़ानें में दाँत कटाकट क्यों करना ?
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उत्तर :- सज्जन कहता है कि :—
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न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् ।
अतो धम्मार्थ मोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥१॥
सज्जन कहता है कि सुन भाई हुड़दंगे ! जो तू जानता है सो विद्या का फल नहीं कि विद्या के पढ़ने से जन्म, मरण, आंख से देखना, कान से सुनना आदि ईश्वरीय नियम अन्यथा हो जायें किन्तु विद्या से यथार्थज्ञान होकर यथायोग्य व्यवहार करने कराने से आप और दूसरों को आनन्दयुक्त करना ‘विद्या का फल’ है क्योंकि बिना विद्या के किसी मनुष्य को निश्चल सुख नहीं हो सकता । क्या भया कि किसी को क्षण भर सुख हुआ, न हुआ सा है । किसी का सामर्थ्य नहीं कि अविद्वान् होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्वरूप को यथावत् जानकर सिद्ध कर सके । इसलिए सब को उचित है कि इनकी सिद्धि के लिए विद्या का अभ्यास तन, मन, धन से किया और कराया करें॥
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हुड़दंगा :- कहता है कि :—
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हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य विद्या पढ़े हुए दरिद्र और भीख मांगते तथा बिना पढ़े हुए राज्य धन का आनन्द भोगते हैं ।
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सज्जन :- कहता है कि :—
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सुनो प्रिय ! सुख दुःख का योग आत्मा में हुआ करता है । जहाँ विद्यारूप सूर्य्य का अभाव और अविद्यान्धकार का भाव है वहां दुःखों की तो भरमार, सुख की क्या ही कथा कहना है ? और जहां विद्यार्क प्रकाशित होकर अविद्यान्धकार नष्ट हो जाता है, उस आत्मा में सदा आनन्द का योग और दुःख को ठिकाना भी नहीं मिलता है ।
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हुड़दंगा सिर धुनकर चुप हो गया।
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★ प्रेषक - आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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