🌞 ओ३म् 🌞
नमस्ते जी, सुप्रभातम्
वेदामृतम्
उत स्वया तन्वा संवदे तत्कदा न्वन्तर्वरुणे भुवानि। (ऋग्वेद ७/८६/२)
मैं अपने शरीर के साथ संवाद करता हूं , कि कब मैं अन्तर्यामी परमात्मा के ही आधार से रहने लगूंगा ।
हे अन्तर्यामिन् मेरे स्वामिन् परमात्मा देव ! मेेरा आधार तू है । मैं अपने शरीर द्वारा तुझ से पूछता हूं, तू मुझे बता कि मैं कब सब कुछ भूला कर तेरे भरोसे रहने लगूंगा ।
सुभाषितम्
।। सन्तोष ॥
सन्तोषामृततृप्तानां, यत्सुखं शान्तचेतसाम् । कुतस्तद्धन लुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ (हितोपदेश १४३)
सन्तोष रुपी अमृत से तृप्त हुए शान्त चित्त वाले मनुष्यों को जो सुख प्राप्त होता है , वह सुख धन के लोभी और इधर - उधर निरन्तर भाग दौड करने वालों को कहां ?
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