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🙏 सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते 🙏
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🍇🍇 सभी के लिये प्रभु-प्रसाद 🍇🍇
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शुक्रोसि भ्राजोसि स्वरसि ज्योतिरसि |
आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम ||
अथर्ववेद २.११.५
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भावार्थ-हे जीव तू मेरी उपासना द्वारा ज्ञान, बल, आनन्द, तेज आदि गुणों से युक्त होकर व सबको साथ लेकर आगे बढ और नि:श्रेयस अर्थात मुक्ति को प्राप्त कर ।
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प्रश्न:-जब मुसलमान व ईसाई लोग भी परमात्मा की सीधी उपासना कर सकते हैं तो हिन्दु मित्रों को ये पत्थरों की मूर्ति बना कर पूजने की किसलिए आवश्यकता पडती है ? क्या आप में उनके तुल्य भी बुद्धि नहीं जो ईश्वर की ऋषि मुनियों की तरह सीधी उपासना करना नहीं जानते हो ?
यह पत्थरपूजा हिन्दु मुस्लिम में दूरी व द्वेष का एक मुख्य कारण है, क्या यह कारण दूर नहीं हो सकता ? क्या हिन्दु नेता व धर्म गुरु हिन्दुओं को इस धर्म व वेद विरुद्ध कार्य का त्याग कर ध्यान द्वारा ईश्वर की सीधी उपासना का आदेश व उपदेश नहीं दे सकते ??
ईश्वर सबको शक्ति,भक्ति व सद्बुद्धि प्रदान करे !
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★★★ लेखक-डा मुमुक्षु आर्य ★★★
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मूर्तिपूजा एक प्रकार का चिढ़़ाने का कार्य है और चिढ़ाने वाले का न कोई मित्र होता है न भाई यही कारण है कि हिन्दू परिवारों मे भाई-भाई, पड़ोसी-पड़ोसी अर्थात आपसी फूट व सामाजिक अलगाववाद होता है । मूर्तिपूजा एक प्रकार का मानसिक आतंकवाद है जिसके कारण सब विद्वान लोग ड़रे-सहमे से जीवन बिताते है । मूर्तिपूजक तो अपनी संतान की भी तार्किकता को स्वीकार नहीं करते । ऐसे समाज की कौन रक्षा करेगा ? कौन नेता पक्ष की बात करेगा । यह मूर्तिपूजक तो किसी के साथ किसी प्रकार की विश्वसनीयता का सम्बन्ध बनाना ही नही चाहते । यह चाहते है सब इनका आदर करे सम्मान करें परन्तु वह स्वयं किसी का सम्मान न करे । बस एक वोट लिए नेता इनका गुलाम बन जाये । विद्वान सच न बोलें । यदि बोलें भी तो जो चाहे बोलें परन्तु मूर्तिपूजा के कारण होने वाली दुर्गति के विषय में कुछ न बोलें । मूर्तिपूजक चाहता है कि सारा संसार इनका गुणगान करे और यह स्वयं पड़ोसी का भी सत्कार न करे चाहे वह प्रकाण्ड विद्वान ही क्यों न हो । धिक्कार है ऐसी मूर्तिपूजा पर जो सत्य कहने से रोकती है - सत्य करने से रोकती है - सत्य सुनने से रोकती है - सत्य देखने से रोकती है । भाई को भाई का दुश्मन बना देती है । समाज मे सब के लिये मुर्तिपुजक अविश्वसनियता, संदेहस्पदता व मानसिक मूर्खता का प्रमाणपत्र धारी बन कर रह गया है और उपर से तुर्रा यह हम विश्वगुरु थे और जल्दी ही विश्वगुरु बन जायेंगें अर्थात समस्त विश्व को मुर्ख बनाकर उनके मुर्खाधिपति बन जायेंगें । धिक्कार है ।
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★ प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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★ मूर्तिपूजा समाजसुधार के विपरित कर्म है ★
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★ समाजसुधार के लिये सत्यार्थप्रकाश पढे़ ★
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