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🌺 🌺सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते 🌺🌺
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🙏🙏प्रिय आर्य-हिन्दु बन्धुओं 🙏🙏
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आईये आज हम अपने खोये हूए सम्मान को फिर से प्राप्त करने के लिये विचार करते है । मै अपने स्वाध्याय के अनुभव से कहता हूँ कि हमारे बौद्धिक महापुरुषों ने हमारे सम्मान वृद्धि हेतु बहुत से प्रयास किये है । यही प्रयास आगे चलकर संप्रदायों के रूप मे विकसित हूए है । विचारों की श्रृंखलाओं से युक्त ये संप्रदाय जब तक मुख्य व्यक्ति के संरक्षण मे रहते हैं तब तक समाज के हितलाभ मे कार्य होता है । संरक्षक की मृत्यु या पृथक होने के बाद ये संप्रदाय कोरे व्यवसाय बन जाते है । ये समाज को बांटने, लुटने, स्वार्थ सिद्धि करने का काम करते है । इन्हीं स्वार्थ सिद्धों द्वारा प्रतिपादित एक अत्यन्त भ्रामक, निंदनीय व सम्मानहीन सिद्धान्त का नाम है :-
💥💥💥 बहुदेववाद 💥💥💥
इस कुटिलतायुक्त सिद्धान्त के कारण हमने अपनी संस्कृति को अत्यन्त हानि पहुँचायी है । अतर्कता से युक्त इस सिद्धान्त का सहारा लेकर स्वार्थी लोगो ने पृथक-पृथक संप्रदाय बना लिये है । बचे हूए सज्जन पुरूष इन घातक संप्रदायों का शिकार बन रहे है । जिनकी रक्षा करने वाला कोई नही है और बहुदेववादी आज भी निर्भीकता से अपनी स्वार्थ सिद्धि मे यथापुर्वक लगे हुये है । यदि हमे खोए हूए सम्मान व सुरक्षा को पुन: प्राप्त करना है तो अपने सदां से चलते आए
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★ शुद्ध सत्य सनातन वेदिक एक-ईश्वरवाद ★
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सिद्धांत की पुनर्सस्थापना करनी होगी अन्यथा हमें एक भयंकर दर्दनाक परिस्थिति का बार-बार सामना करना होगा । आईये जानें कि सनातन एक-ईश्वरवाद क्या है :-
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एको देव: सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
सर्वाध्यक्ष: सर्वभूताधिवास:साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।।१।।
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उपासना दो प्रकार की है-
★एक सगुण और दूसरी निर्गुण★
उन में से (सपर्यगा०) इस मन्त्र के अर्थानुसार शुक्र अर्थात् जगत् का रचनेवाला , वीर्यवान् तथा शुद्ध , कवि , मनीषि , परिभ्रू और स्वयम्भू इत्यादि गुणों के सहित होने से परमेश्वर सगुण है और अकाय , अव्रण , अस्नाविर इत्यादि गुणों के निषेध होने से वह निर्गुण कहाता है ।
भाषार्थ —(एको देव:) एक देव इत्यादि, गुणों के सहित होने से परमेश्वर सगुण , और (निर्गुणश्च) इस के कहने से निर्गुण समझा जाता है तथा ईश्वर के सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान , शुद्ध , सनातन , न्यायकारी, दयालु , सब में व्यापक , सब का आधार , मङ्गलमय , सब की उत्पत्ति करनेवाला और सब का स्वामी इत्यादि सत्य गुणों के ज्ञानपूर्वक उपासना करने को सगुणोपासना कहते हैं और वह परमेश्वर कभी जन्म नहीं लेता , निराकार अर्थात् आकार वाला कभी नहीं होता , अकाय अर्थात् शरीर कभी नहीं धारता , अव्रण अर्थात् जिसमें छिद्र कभी नहीं होता , जो शब्द , स्पर्श , रूप , रस , और गन्धवाला कभी नहीं होता , जिस में दो तीन आदि संख्या की गणना नहीं बन सकती , जो लम्बा चौड़ा हल्का भारी कभी नहीं होता , इत्यादि गुणों के निवारणपूर्वक उस का स्मरण करने को निर्गुण उपासना कहते हैं ।
इससे क्या सिद्ध हुआ कि जो अज्ञानी मनुष्य ईश्वर के देहधारण करने से सगुण और देहत्याग करने से निर्गुण उपासना कहते हैं , सो यह उन की कल्पना सब वेद शास्त्रों के प्रमाणों और विद्वानों के अनुभव से विरुद्ध होने के कारण सज्जन लोगों को कभी न माननी चाहिए । किन्तु सब को पूर्वोक्त रीति से ही उपासना करनी चाहिए ।
—–ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका
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★ प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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★सच्चे एक-ईश्वरवादी बनें-सत्यार्थप्रकाश पढ़ें★
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