Wednesday, June 3, 2015

🌻🌺🌻🌹🌻🌷🌻🌸🌻💐 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★ सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते ★ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★★★★★...

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★ सादर हार्दिक करबद्ध नमस्ते ★
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★★★★★ प्रेमालाप ★★★★★
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दुनिया का खेल तीन अनादि वस्तुओं को लेकर है। इसमें एक परमात्मा, जो ज्ञान में परिपूर्ण है। दुसरी प्रकृति जो ज्ञान शून्य है और तीसरी जीवात्मा में कुछ ज्ञान है और कुछ अज्ञानता। परमात्मा, अमर है, अजन्मा है, जो मरता नहीं और न ही जन्म लेता है। जीवात्मा को जन्म लेना इस लिए पड़ता है की अपने कर्मों के फल को उसे भुगतना है। प्रकृति अपने आपमें जड़ है न उसका कोई कर्म और न उसका कोई भोग। कारण जब कर्म ही नहीं तो भोगेगा क्या ? तो जीवात्मा कर्म करता है और भोगता है। फल दाता परमात्मा है। फल देना परमात्मा का काम है न किसीको ज्यादा देता न किसी को कम जो जितना किया है। उसे ठीक उतना ही देना उसकी न्याय व्यवस्था है। किसी को ज्यादा देना किसी को माफ़ कर देना। यह परमात्मा की न्याय व्यवस्था नहीं होगी जो इस्लाम और ईसाईयत वालों की मान्यता है। यह परमात्मा पर दोष लगता है की जिसको चाहे दे जिसे चाहे न दे यह तो कुरान और बाईबिल की है वेद के परमात्मा का नहीं, कारण फिर वह न्यायकारी नहीं कहला सकते। परमात्मा वही है जिसपर कोई “दोष" न लगे। किसी प्रकार का “आरोप" परमात्मा पर लगने से परमात्मा का होना संभव नहीं। यही कारण है किसी के देना किसी को न देना यह दोष है। अब जीवात्मा को परमात्मा ने कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतंत्र छोड़ा। नियंत्रण परमात्मा का ही है अर्थात यह जीवात्मा कर्म अपने अनुसार तो करेगा किन्तु फल अपने आप नहीं ले सकता, फलदाता परमात्मा ही हैं। कारण अपने आप फल लेने वाला होता तो न अपनी गलती को न मानता और न सजा पाना चाहता तो इसलिये न्याय व्यवस्था का फल दाता ईश्वर ही है । तुम जैसे कर्म करोगे मै तुम्हे ठीक वैसा ही फल देगा न किसी को कम और न किसी को ज्यादा। जितना करोगे उतना ही पाओगे न तो ईश्वर न तुम्हे माफ़ करेगा और न किसी प्रकार की कोई ढील देगा। तुम मानव हो कर्म करने का अधिकार ईश्वर ने तुम्हे दिया है किसी पशु, पक्षी आदि को नहीं। तुम्हारे कर्मों का फल तुम पर ही निर्भर है। तुम्हारे कर्म तुम्हे देवता बना दें या फिर राक्षस। यह तुम्हे ही अपने आप में कर्मों से ही अपनी तैयारी करनी होगी। ईश्वर ने तुम्हें दो प्रकार का ज्ञान दिया है।
साधारण और नैमित्तिक।
सुख दुःख लाभ हानि यह सभी तुम मानवों के लिए ही है तुम सुख चाहते हो तो तुम्हारा कर्म ही तुम्हे सुख दिला सकता है और जो काम मानवता विरोधी है उस काम को करोगे तो दुःख झेलना पड़ेगा।
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★प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव★
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★वेदिक ज्ञान के लिये सत्यार्थप्रकाश पढे़★
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★ मुर्तिपुजा अनेकतावाद का बीज है ★
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