😶 “ वह एक है ” 🌞
🔥🔥ओ३म् इन्द्रं मित्रं वरुणमग्रिमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान् ।🔥🔥
🍃🍂 एकं सद्धिप्रा बहुधा वदन्त्यग्रिं यमं मातरिश्वानमाहु: ।। 🍂🍃
ऋ० १ । १६४ । ४६ ; अथर्व० ९ । १०। २८
शब्दार्थ :- ज्ञानी पुरष एक ही होते हुए को अनेक प्रकार से बोलते है । उस एक ही को इन्द्र,वरुण,मित्र,अग्रि कहते है । और वही दिव्य,सुपर्ण,,गरुत्मान् कहलाता हैं उस एक ही को अग्रि,यम और मातरिश्वा कहते हैं ।
विनय :- हे मनुष्य !
इस संसार में एक ही परमात्मा है । हम सब मनुष्यो का एक ही प्रभु है । हम चाहें किसी सम्प्रदाय,किसी पन्थ,किसी मत के माननेवाले हों,पर संसार-भर के हम सब मनुष्यों का एक ही ईश्वर है । भित्र-भित्र देशों में भित्र-भित्र सम्प्रदायवाले उसे भित्र-भित्र नाम से पुकारते हैं,पर वह तो एक ही है । जो जिस देश में व् जिस सम्प्रदाय के वायुमण्डल में रहा हैं, वह वह़ा के प्रचलित प्रभु नाम से उसे पुकारता है । कोई ’ राम ’ कहता है,कोई ‘शिव’ कहता है,कोई 'अल्लाह'कहता है,कोई 'गॉड'कहता है । 'विप्रो’ ने,ज्ञानी पुरषों ने, उस प्रभु को जिस रूप में देखा उसके जिस गुणोत्कर्ष का उन्हें अनुभव हुआ,आपनी भाषा में उसी के वाचक शब्द से पुकारने लगे । उन ज्ञानियों द्वारा वही नाम समाज में फैला और सम्प्रदाय बन गया । कोई अपने गुरु से नाम लेकर ओउम् या नारायण पुकारता है कोई खुदा या रहीम पर वह प्रभु एक ही है ।
हम मनुष्य ने सम्प्रदाय बना कर बड़े बड़े उपद्रव किये और आश्चर्य ये की सब दंगे फसाद प्रभु के नाम पर हुए । वैष्णवों और शैवों के झगडे हुए हिन्दू मुस्लिम के हुए यहूदी और ईसाई में रक्तपात हुआ पर यह सब क्यों ? जब वो एक है ईश्वर होने से वही 'इन्द्र’ है वही 'ओउम्'है
वेद मन्त्रों में नाना प्रकार नामों से पुकारा जाता है पर अज्ञानियों ने उसे भित्र भित्र नामों से जुदा जुदा समझ लिया ।
वेद की पुकार सुनो -
वह एक है -
वह एक है -
एकं सत् -
ओउम् नाम -ओउम् सत् 👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏
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ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे
🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚
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