Sunday, May 10, 2015

ओ३म् ईश्वरस्तुति का सही तरीका क्या है ????? मेरा आज का लेख स्वर्ग के ठेकेदारो , धर्म...

ओ३म्
ईश्वरस्तुति का सही तरीका क्या है ?????
मेरा आज का लेख स्वर्ग के ठेकेदारो , धर्म के व्यपारियो , गुरूघंटालो और बाबओ को हजम नही होगी क्योकी इससे इनके व्यापार मे दखल पडने वाला है |
हमारे देश के अलग अलग भागो मे भिन्न भिन्न प्रचलन है कही राम का , कही कृष्ण का , कही राधा का , कही राधास्वामी का , कही जगरनांथ स्वामी , कही कार्तिक , शेरावाली , कही दुर्गा कही काली , कही गणेश , अर्थात् जिसने जिसे चाहा ईश्वर बनाकर पूजनीय बना लिया और अभी भी रोजाना नये नये ईश्वर पैदा हो ही रहे है जैसे क साई , निरंकारी , निर्मल बाबा , पीर , मजार , जीन , जीनाद , फादर आदी आदी |
इनमे से आधे से ज्यााद काल्पनिक है जिनका होना कभी संभव ही नही है जो सृष्टि नियम विरूद्ध है , ये पीर मजार हमारे ही वीर बहादुर पूर्वजो के कातिल है लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है जो आज का समाज इनका पूजन कर रहा है |
मै यहाँ दो महापुरूष श्रीराम और श्रीकृष्ण मे से राम का प्रमाण दूगाँ की ईश्वरस्तुति का सही रास्ता क्या है इन्होने किसकी उपासना की थी ??????? और सही रास्ता क्या है ?? हमे किस रास्ते पर चलना चाहीए ??
क्योकी हमे सीखाया जाता है राम नाम की लूट है …..
जपे जा राधे राधे
राधा के बिना श्याम आधा
राम जी चले न हनुमान के बिना …
भोले शंकर पधारो ..
माँ शेरावाली तेरा बेटा आ गया ..
माता जिनका नाम पुकारे वो किस्मत वाले होते है …
राधा का भी मीरा का भी श्याम
यानी ईश्वर के नाम पर व्यापार बना रखा है धर्म के ठेकेदारो ने और समाज को लगातार गुमराह कर रहे है लेकिन सत्य क्या है ??????

वैदिक संस्कृति , वैदिक मान्यताओ , वैदिक सिद्धान्तो , वैदिक ज्ञान पर तथाकथित धर्म और स्वर्ग के ठेकेदारो ने जो कुठाराघात कर कलंक लगाया है उसे आज का समाज चाहे कितना ही छिपा ले पर मिटा नही सकते सच्चाई तो सामने आती ही है | इस बात केवल एक छोटा सा प्रमाण दे रहा हूँ
तथाकथित धर्म के ठेकेदारो ने कहाँ है
और आज भी धर्म के ठेकेदार बन उपदेश देते है :- स्त्रीशूद्रौ नाधीयातामिति श्रुतेः अर्थात् स्त्री और शूद्र न पढ़े यह कहाँ इन्होने | ध्यान दे इन्होने पढ़ने के लिए ही मना कर दिया | यह बात राजीव भाई ने भी खुलकर नही बताई केवल संकेत दिया यह कह कर हमारे मूल मंत्रदाता महर्षि दयानन्द है और स्वदेशी चिकित्सा वाले व्यख्यान मे स्पष्ट रूप से महर्षि दयानन्द को पढ़ने के लिए बताया है | उनका मुख्य मुद्दा अलग था इसलिए इसपर कुछ नही कहा केवल संकेत मात्र दिया | हमारे पतन के कारण केवल अंग्रेज और मुल्ले ही नही बल्कि सबसे ज्यादा धर्म के ठेकेदार ही है |
जबकी वेद मे ही आया है
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्याः यजु २६/२
यह कल्याणी वाणी समस्त मानव मात्र के लिए है |

ये है धर्म और स्वर्ग के ठेकेदारो के योगदान का एक छोटा सा नमूना | इन्होने देश की जड़ को कमजोर किया और मुस्लमानो , अंग्रेजो और विदेशी लूटेरे ने आकर पेड़ को काटा |
रामचरित मानस मे बहुत ज्यादा दोष है जैसे राम का मूर्तिपूजन , राम द्वारा महर्षि की पत्नि अहिल्या को पैर द्वारा स्पर्श , स्वयंवर की गलत परिभाषा देकर सीता स्वंयवर को गलत तरीके से परिभाषित करना , राम को ईश्वर और अन्तर्यामी कहना , हनुमान और सभी वानरो की पूछँ होने को बताना हनुमान द्वारा सूर्य को निगलना , राम को कभी ईश्वर को कभी विष्णु के अवतार के रूप मे वर्णन आदी आदी
इसलिए मै उदाहरण महर्षि बाल्यमिकी कृत रामायण से दे रहा हूँ :– बाल्यकांड चतुर्दशः सर्ग श्लोक संख्या ( ०२, ०३ ११ ) | रामायण मे स्पष्ट महर्षि बाल्यमिकी जी ने लिखा है श्रीराम सन्ध्योपासन ( ब्रह्मयज्ञ ) करते थे | तो जब सही रास्ता ब्रह्मयज्ञ का हो उसे छोड़ ढोलक , झाल लेकर हम असत्य का रास्ता क्यो धारण करे ??? ब्रह्मयज्ञ मे एक पैसे का खर्च नही है जो समय आप माला जपने , ढोलक पीटने मे खर्च करते है वही आप सन्धयोपासन मे करे बस |
जो आपको किसी का नाम जपने , माला फेरने को कहे उससे आप एक ही प्रश्न करे राम और कृष्ण ने किसका नाम जपा था ??????
हमारा दुर्भाग्य यह है की हमे रामायण के नाम पर रामचरित मानस पढ़ाया जाता है जिसमे हद से ज्याद गलत लिखा हुआ है |
महर्षि दयानन्द ने अपनी पुस्तक पंचमहायज्ञ विधि मे ब्रह्मयज्ञ का बहुत ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया है | यही सत्य मार्ग है क्योकी यही वेद का रास्ता है यहा रास्ता श्रीराम , श्रीकृष्ण और सभी महापुरूषो ने अपनाया है | अतः सत्य को पहचाने और वेद की ओर लौटे |
ब्रह्मयज्ञ या सन्धयोपासन का चलभाष अनुप्रयोग प्राप्त करने के लिए

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धन्यवाद


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★★★★★ हार्दिक नमस्ते ★★★★★
★★★ सभी के लिए प्रभु-प्रसाद ★★★
*********आर्यों का विज्ञान***********
*****व ए. ओ. ह्यूम की अज्ञानता******
आर्यों का विज्ञान व ए.ओ. ह्यूम की अज्ञानता १० आषाढ़ शुदि १९३२ वि. को अपने एक प्रवचन में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि “प्राचीन काल में दरिद्रों के घर में भी विमान थे । उपरिचर नामक राजा सदा हवा मे ही फिरा करता था , पहले के लोगों को विमान रचने की कला ,विद्या भली प्रकार से विदित थी । पहले के लोग विमान आदि के द्वारा लड़ाई लड़ते थे । मैंने भी एक विमान-रचना का पुस्तक देखा है । भला आप सोचे कि उस व्यवस्था और विज्ञान के सन्मुख आज इस रेलगाड़ी की प्रतिष्ठा ही क्या हो सकती है। ”ए. ओ. ह्यूम जिन्होंने बाद में भारतीय कांग्रेस की स्थापना की , उन्होने स्वामी जी का उपहास करते हुए कहा , ‘व्यक्ति का उड़ना गुब्बारों तक ही सीमित रह सकता हैं , यान बनाकर तो केवल सपनों में ही उड़ा जा सकता है लेकिन जब विमान का आविष्कार हुआ तो ए. ओ. ह्यूम ने बाद में उदयपुर में स्वामी श्रद्धानंद जी ( स्वामी दयानन्द जब देह त्याग चुके थे और स्वामी श्रद्धानंद उनके उत्तराधिकारी समझे जाते थे , इसलिए क्षमा उनसे मांगी गयी ) से अपने उपहास के लिए क्षमा मांगी थी ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
साभार :-स्वामी दयानन्द–अनुज जैन,
पृष्ठ १४२*
ऋषि दयानन्द निर्वाण शताब्दी १९८३ स्मारिका – संपादक क्षितीश वेदलंकार, पृष्ठ- ७३
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★ प्रेषक -आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव ★
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★ शुद्ध सम्बुद्ध बनें - सत्यार्थप्रकाश पढ़ें ★
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★गुड्डे-गुड़िया-खेल सदृश मूर्तिपूजा त्याज्य है★
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★★★★हार्दिक नमस्ते★★★★
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★★सभी के लिए प्रभु-प्रसाद★★
***********वेद अमृत***********
बरस रहा-बरस रहा दरबार ,
अमृत वेदों का !
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१.वेद ज्ञान कि सच्ची पुस्तक !
सब के दिलो मे–देती दस्तक !
यहां है जीवन का आधार –अमृत वेदों का !
बरस रहा ………..
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२.वेद के मन्त्र- हीरे मोती !
जिससे मिल जाए- जीवन ज्योति !
भरे सुखों के भण्डार – अमृत वेदों का ! बरस रहा……..
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३.वेदों में कोई- कमी नहीं है !
बिन इसके कोई धनी नहीं है !
यही खोले दशवां द्वार–अमृत वेदों का ! बरस रहा…………
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
४.वेद पढ़ो और, वेद पढाओ !
घर-२ वेद की, ज्योति जलाओ !
जिसकी पूजा करे संसार–अमृत वेदों का !
बरस रहा बरस रहा दरबार ….
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५.खुद पियो औरों को पिलाओ !
ज्ञान की गंगा में, गोता लगाओ !
करदे जीवन नैया पार –अमृत वेदों का ! बरस रहा…….
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६.उत्तर दक्षिण, पूर्व पश्चिम !
लहरा दो तुम, वेद का परचम !
ऐसा “रत्न” करो प्रचार –अमृत वेदों का !
बरस रहा ………..
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लेखक, गायक, संगीतकार :-
रत्न लाल मांडला , संगरूर (पंजाब)
Mobile: 09144-01573
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★प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव★
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★वेद ज्ञान ओर बढ़ें-सत्यार्थप्रकाश पढ़ें★
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★मुर्ति-पूजा मनुष्य-बुद्धि की हत्या है★
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★मुर्ति-पुजा संगठन के लिए विष है★
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★★★★हार्दिक नमस्ते★★★★
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★★सभी के लिए प्रभु-प्रसाद★★
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 ★वैदिक संस्कार—सर्वश्रेष्ठ धन★
व्याख्या-स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
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ओ३म्‌ समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी।
चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेक वृषो भव ।।
(अथर्ववेद 6.86.2)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शब्दार्थ- (स्रवताम्‌) बहने वाले जलों, नदी-नालों पर (समुद्रः) समुद्र (ईशे) शासन करता है (पृथिव्याः) पृथिवी पर उत्पन्न होने वाले पदार्थों को (अग्निः) अग्नि (वशी) वश में किये हुए है (नक्षत्राणाम्‌) नक्षत्रों में (चन्द्रमा) चन्द्रमा (ईशे) सब पर शासन करता है, उन्हें अपने तेज से दबा लेता है, उसी प्रकार हे मनुष्य ! तू सम्पर्ण प्राणियों में (एक-वृषः) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ (भव) बन, बनने का प्रयत्न कर।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
भावार्थ - 1. बहने वाले नदी-नालों को देखिये और समुद्र के ऊपर एक दृष्टि डालिए। समुद्र अपनी विशालता, गहनता, गम्भीरता और महान्‌ जलराशि के कारण सभी नद और नदियों पर शासन करता है। समुद्र सभी नदी-नालों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।
2. अपने तेज और दाहक शक्ति के कारण अग्नि सारी पृथिवी को, पृथिवी पर उत्पन्न होने वाली सभी वनस्पतियों को अपने वश में रखता है।
3. आकाश में करोड़ों तारे टिमटिमाते हैं, चन्द्रमा अपने तेज से उन सबको दबाकर उन पर शासन करता है।
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वेद इन तीन दृष्टान्तों को मनुष्य के सम्मुख रखकर उसे उद्‌बोधन देते हुए कहता है, जिस प्रकार नदियों में समुद्र सर्वश्रेष्ठ है, जिस प्रकार पृथिवी पर अग्नि सब पर शासन करती है, नक्षत्रों में जिस प्रकार चन्द्रमा सर्वश्रेष्ठ है। हे मानव ! तू भी इसी प्रकार सब प्राणियों मेें सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न कर।
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★प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव★
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★सत्य की ओर बढे़ं-सत्यार्थप्रकाश पढे़ं★
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★मुर्तिपूजा बुद्धमानों का घोर अपमान है★
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श्री मान पांडू रंग जी एक महान तपस्वी व्यक्ति हुए हैं । बताते हैं कि उन्होंने बड़ा स्वाध्याय किया...

श्री मान पांडू रंग जी एक महान तपस्वी व्यक्ति हुए हैं । बताते हैं कि उन्होंने बड़ा स्वाध्याय किया हुआ था ।
स्वाध्याय परिवार उन्हीं का चलाया हुआ है ।
उनका एक चेला मेरा मित्र है ।
ये लोग रोज कक्षाएँ लगाते हैं शाम को । गाँव गाँव में इनके सन्गठन हैं ।
एक दिन जब हम कार में दूर की यात्रा कर रहे थे तो मेरा वो मित्र बोला कि आओ आज आपको कुछ धार्मिक गीत सुनाता हूँ । उसने सीडी लगाई । एक घंटे बाद वो बोला -आया समझ में स्वाध्याय परिवार क्या चीज है ?

मैं बोला - आप तो कह रहे थे कि धार्मिक गीत सुनो । मगर ये सब तो गुरु भक्ति के गीत थे । तुम लोगों ने धार्मिकता को गुरु के गुणगान तक क्यों सिमित कर दिया है । और तुम्हारा ही नहीं सबका यही हाल है ।

एक और बात पता चली कि स्वाध्याय की इन कक्षाओं में देश भक्ति का कुछ भी नहीं पढाया जाता न बताया जाता ।
न ही देश भक्ति की कोई चर्चा होती।

मैंने निवेदन किया कि आप ये काम तो कर ही सकते हो कि बच्चों को थोडा सा देश भक्ति पर भी कुछ बता दिया करो । पूरे देश के लाखों बच्चे रोज इस सभा में होते हैं । तो वो बोला- स्वर्गीय गुरु जी का ऐसा कोई आदेश नहीं था ।😀😄😃😀😄😃😀😄😃


पांडुरंग जी की एक पुस्तक है “मूर्तिपूजा” नाम की । उस पुस्तक में उन्होंने पुराणों के उदाहरण दे दे कर सही ठहराने की कोशिश की है । अपनी बात को सच सिद्ध करने के लिए उन्होंने वेद के एक मन्त्र का भी हवाला दिया

उस मन्त्र को लिख कर मैं एक आर्य वेद विद्वान के पास ले गया । मैंने मन्त्र पढ़ा तो वे तुरंत बोले कि यह तो यजुर्वेद के सोलवें अध्याय का दूसरा मन्त्र है । मैंनें श्री मान पांडू रंग जी का लिखा अर्थ बोला तो वे मुस्कुरा भर दिए ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

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🚩🇮🇳🚩जागो हिंदुस्तानी🚩🇮🇳🚩 😡हो रहा है कानून में बड़ा पक्षपात😡 😡कैसा पक्षपात भरा कानून है? जिस कानून...

🚩🇮🇳🚩जागो हिंदुस्तानी🚩🇮🇳🚩

😡हो रहा है कानून में बड़ा पक्षपात😡

😡कैसा पक्षपात भरा कानून है? जिस कानून में न्याय के नाम पर अन्याय हो, केवल नेता और अभिनेता को ही जहाँ न्याय मिले वह कैसा
पक्षपाती है?

⛳सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने भारतीय न्याय प्रक्रिया पर बड़ा हमला बोला है। काटजू ने कहा 50 फीसदी भारतीय जज  भ्रष्ट हैँ।
👇👇👇
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⛳कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस के एल मंजूनाथ बोले
इस देश में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए कोई स्थान नहीं है और इस देश में न्याय के लिए कोई जगह नहीं। मैं सच्चाई का खुलासा नहीं करना चाहता। यह मेरे साथ ही दफन हो जाएगी। 👇👇👇
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😡सलमान को 13 साल में सजा मिलती है और 2 घण्टे मे जमानत और 2 दिन के बाद सजा पर रोक ।
जयललिता को 18 साल सुनवाई के बाद सजा और 2 दिन में जमानत।
लालू प्रसाद यादव,संजय दत्त, तरुण तेजपाल जैसों को आरोप सिद्ध होने के बाद तुरंत जमानत।

⛳बाम्बे हाई कोर्ट ने कहा जब सुनवाई चल रही है तो सलमान खान को जेल क्यूँ भेजे ?
⛳फिर ये बात तो संत श्री आसारामजी बापू , साध्वी प्रज्ञाजी , श्री धनंजयदेसाई जी, असीमानंद पे भी लागू होती है उनकी सुनवाई भी चल रही है फिर इन लोगो को जेल में क्यूँ रखा गया है?


😡साध्वी प्रज्ञाजी के मामले में न्याय करने वालों ने अन्याय की सीमा ही लांघ दी।

😡एटीएस जवानों ने न सिर्फ उनकी पिटाई की बल्कि उनके लिए ‘वेश्या’ शब्द का भी इस्तेमाल किया।

😡साध्वी प्रज्ञा को वहां पहले से ही बंद कुछ पुरुष अपराधियों के साथ खड़ा किया गया। वहां उन्हें अश्लील ऑडियो सीडी सुनाई गई। इस दौरान गैर कानूनी ढंग से प्रज्ञा के दो नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्रफी व साइकॉलजी टेस्ट कराए गए। उन पर कोई भी आरोप तय नहीं हो सका। अभी कैंसर से पीड़ित हैं उसके बाद भी जमानत नही ?

😡महाराष्ट्र के वीर हिंदुराष्ट्र सेना के अध्यक्ष धनंजयभाई देसाई
झूठे सबूतों के साथ धनंजय भाई को भी फंसाया गया है।
धनंजय देसाई जी उनके पास जो धर्म ,इतिहास ,ज्ञान ,राष्ट्र के प्रति जो ज्ञान है वो अनमोल है। क्या वो हिन्दू संस्कृति के समर्थक हैं इसलिए जमानत नही दी जा रही है ?

😡अजमेर, मालेगांव और हैदराबाद इन तीनों शहरों में हुए बम धमाकों में स्वामी असीमानंद को बिना सबूत के गिरफ्तार कर लिया ? असीमानंद गुजरात के डांग जिले के शबरी धाम में शबरी माता सेवा समिति चलाते थे। इस समिति का काम जिन आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है उनको पुनःहिन्दू धर्म में लाना है
और सनातन धर्म के लिए कार्य तन-मन-धन से करते हैं इसलिए उनको जेल ?बेल क्यू नही ?

😡75 वर्ष के सन्त श्री आशारामजी बापू जिन्होंने पूरा जीवन धर्म,समाज,राष्ट्र,
सनातन संकृति के लिए लगा दिया।उनके ऊपर भी न जाने कितने झूठे आरोप लगाये,आज तक एक भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ फिर भी
19 माह से जेल में और जमानत नहीं ?
क्या यही है हमारे देश की न्याय व्यवस्था?


😡भारत के सेकुलर नेता,मिडिया ऐसे है, जो आतंकवादियों ,अभिनेताओ को सम्मान देते है और राष्ट्रवादीयों को गालियां देते ह ऐसा ?
क्या हीरो हीरोइन हमारे साधू संतो से महान है?

😡नालत है ऐसी मिडिया और सरकार को।
धिक्कार है सरकार की कायरता को।

👊अब हे हिन्दुओ सजाग और सतर्क होकर हिंदुत्व की आन मान सम्मान के लिए तैयार रहे।हिन्दू संत है तो ही सनातन संस्कृति है। अतः सभी हिन्दू भाई -बहनो संतो का सन्मान करो और उनकी रक्षा करने के लिए कटिबद्ध हो जावो। अगर हम हिन्दू ही हिन्दू संतो का अपमान करेगे तो हिंदुत्त को मिटने की देर नही।पृथ्वी पर से हिन्दू संस्कृति गई तो पुर्थ्वी पर सुख शांति अमन्-चमन गायब और अशांति और नरक बन जायेगा अब तो जागो वीर हिंदुस्तानी।नही तो ईसाई मिशनरी, मिडिया, नेता, न्याय प्रणाली,ये तो हिंदुत्व को मिटा में लगे है।

🚩🇮🇳🚩जागो हिंदुस्तानी🚩🇮🇳🚩


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लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं—— माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं जमीन पर खिंच जाएँ...

लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं——
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं
जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं
खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं
और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं..
एक रूपया एक लाख नहीं होता ,
मगर फिर भी एक रूपया एक लाख से निकल जाये तो वो लाख भी लाख नहीं रहता
हम आपके लाखों दोस्तों में बस वही एक रूपया हैं … संभाल के रखनI , बाकी सब मोह माया है

. एक बार, गांव वालों ने सूखे के हालात देखकर तय किया कि वे
भगवान से बरसात के लिए प्रार्थना करेंगे, प्रार्थना वाले दिन
सभी लोग प्रार्थना के लिए इकट्ठे हुए, लेकिन एक
लड़का छाता लेकर आया.!!!
इसे कहते हैं : विश्वास

2. जब आप एक बच्चे को ऊपर की तरफ उछालते हो, तो वह
हंसता है। क्योंकि, वह जानता है कि आप उसे पकड़ लोगे:
इसे कहते हैं : यकीन

3. हर रात हम बिस्तर पर सोने जाते हैं, यह जाने बगैर कि हम
अगली सुबह जीवित रहेंगे भी कि नहीं और हर रात नई सुबह के
लिए अलार्म भी सैट करते हैं।
इसे कहते हैं उम्मीद:

4. हम आने वाले कल की बड़ी-बड़ी प्लानिंग करते हैं, बावजूद
इसके कि हमें भविष्य का जरा भी ज्ञान नहीं हैं।
इसे कहते हैं: कान्फिडेंस

5. अपने दोस्तों-यारों और परिचितों को उनकी शादी के बाद हम
बीवी के नाम पर रोते-बिलखते और परेशान होते हुए देखते हैं।
हम फिर भी शादी करते हैं….???????
इसे कहते हैं: ओवर कान्फिडेंस :
1) अगर लगातार दौडने से लक्ष्मी मिलती तो,
आज कुत्ता लक्ष्मीपति होता…..

2) मौत रिश्वत नही लेती लेकिन,
रिश्वत मौत ले लेती है…..

3)काम मेँ ईश्वर का साथ मांगो लेकिन,
ईश्वर काम कर दे ऐसा मत मांगो……

4) कडवा सत्य एक गरीब पेट के लिए सुबह
जल्दी उठकर दोडता है और एक अमीर पेट
कम करने के लिए सुबह जल्दी उठकर
दौडता है..

5) 50 रुपे मेँ 1 लीटर कोल्डंड्रीक आती है..
जिसमे स्वाद और पोषण जीरो.. और
कमाता कौन? मल्टीनेशनल कम्पनिया और
उसके सामने 50 रुपे मे 1 किलो फल आते
है स्वाद भरपुर और पोषण लाजवाब और
कमाता कौन? धुप मेँ,सर्दी मेँ,बरसात मेँ
लारी लेकर घुमता अपना एक गरीब
भारतवासी..

6) सबंध भले थोडा रखो लेकिन,एसा रखो
कि शरम किसी की झेलनी ना पडे मौत
के मुह से जिदंगी बरस पडे और मरने
के बाद शमशान की राख भी रो पडे..

7) जब तालाब भरता है तब,मछलीया
चीटीँयो को खाती है और जब तालाब
खाली होता है तब चीटींया मछलियो
को खाती है, मौका सबको मिलता है
बस अपनी बारी का इन्तजार करो..

8)दुनिया मेँ दो तरह के लोग होते है.. एक
जो दुसरो का नाम याद रखते है और
दुसरा जिसका नाम दुसरे याद रखते है..

9) सुख मेँ सुखी हो तो दु:ख भोगना सिखो
जिसको खबर नही दु:ख की तो सुख
का क्या मजा.?

10) जीवन मेँ कुछ बडा मिल जाए तो छोटे
को मत भुलना.. क्योकिँ जहा सुई काम
हो वहा तलवार काम नही आती..

11) माँ-बाप का दिल दुखाकर आजतक
दुनिया मेँ कोई सुखी नही हुआ..

12) भगवान का उपकार है कि आँसुऔ को रंग
नही दिया वरना रात को भींगा तकिया सवेरे
कुछ ना कुछ भैद खोल देता..

13) जो इंसान प्रेम मेँ निष्फल होता है
वो जिदगी मे सफल होता है..

14) आज करे कल कर कल करे
सो परसो ईतनी भी क्या जल्दी है जब
जीना है बरसो..

15) दुनिया का सबसे कीमती प्रवाही
कौनसा है? आँसु जिसमेँ 1%पानी
और 99% भावनाए होती है..

16) दुनिया का सबसे अमीर आदमी भी
माँ के. बिना गरीब है..

17) गुस्से मे आदमी कभी कभी व्यर्थ बाते
करता है, तो कभी मन की बात भी
बोल देता है..

18) भगवान खडा है तुझे सब कुछ देने के
लिए लेकिन तु चम्मच लेकर खडा है
पुरा सागर माँगने के लिए..

19) आप यह पोस्ट पढ रहे
हो ईसका असतित्व
आप के माँ बाप है…
अच्छा लगा तो share जरुर करे
शिर्फ़ १ मिनट लगेगा


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🙏वैदिक जीवनशैली व परमेश्वरिय विचार🙏 वैदिक जीवनशैली को धर्म की संज्ञा दी जाती है। प्रायः समुदाय...

🙏वैदिक जीवनशैली व परमेश्वरिय विचार🙏

वैदिक जीवनशैली को धर्म की संज्ञा दी जाती है। प्रायः समुदाय विषेश की जीवनशैली व आचार-विचार के आधार को धर्म की संज्ञा दी जाती है। वैदिक आचार-विचार में सम्पूर्ण प्रकृति की महत्ता अधिक है व इसे परमेश्वर के सदृश्य माना जाता है। वैदिक विचारधारा में परमेश्वर की व्याख्या इतनी उदार है कि, अव्यक्त सत्ता या त्रिकालाबाधित असितत्व का नाम रखने के लिए उसे कोई विषेश आग्रह नहीं है। ईसाई उसे गॉड, मुस्लिम उसे अल्लाह व आजकल के वैज्ञानिक उसे ओरिजनल सोर्स या प्राइमरी सबस्टेन्स के रुप से सम्बोधित करने पर जोर देते है। वहीँ वैदिक विचार से उसे आप चाहें जिस नाम से पुकार सकते हैं।

इन्द्रं मित्रं वरुणमगिनमाहुरथो द्विव्यः स सुपर्णो गरुत्मान।
एकं सद विप्रा बहुधा वदन्त्यगिनं यमं मातारिश्वानमाहुः।।

वेद की दृष्टी में परम-तत्त्व के नाम का कोई आग्रह नहीं हैं। उसे तो परमेश्वर - भगवान के अतिरिक्त ओर भी किसी नाम या मानवीय सम्बन्ध अर्थात माता, पिता, भाई, सखा, गुरु या राजा के नाम से पुकार सकते हैं। वह तो परमं सत्य है, सलिल है, यह अव्यक्त, अस्पर्श, अरूप तथा अगन्ध अमृत हैं।

वेदों मे परमात्मा के विषय मे उल्लेख इस प्रकार है -

एकं सद विप्रा बहुधा वदन्ति।। - ऋग्वेद।

एक ही परमं तत्व परमेश्वर को विद्वान् कई नामों से बोलते हैं। वैदिक विचारधारा के अनुसार आप उसे चाहे जो प्राकृतिक नाम दे सकते हैं। वह तो एक दिव्य, अनुपम अद्वितीय शक्ति की कल्पना इष्ट है, जो इस विश्व का उत्पादन, संरक्षण और संहरण करते हुए इसका संचालन कर रही हैं।

तदेजति तन्नेजति तददूरे तद्वनितके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाहतः।।

वह परमात्मा चलता भी है व नहीं भी चलता, अर्थात वह कूटस्थ होते हुए सर्वव्यापक है। वह दूर भी है व पास भी। वह इस समस्त जगत के अन्दर भी है व बाहर भी है अर्थात ऐसा कोई स्थान नहीं जहां परमात्मा न हो।

यस्मान जातः परो अन्योअसित।।

परमं तत्व परमात्मा के परे अथवा उससे बढ़कर अन्य कुछ व कोई भी नहीं हैं।

प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे।। - अथर्ववेद

जिसके अधीन यह सब जगत है उस प्राण रूपी परमेश्वर के लिए मेरा नमस्कार हैं।

वैदिक दर्शन के संवर्धन में प्रकाशित।


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खूबसूरत शायरी -: 👍 यह जिस्म तो किराये का घर है; एक दिन खाली करना पड़ेगा:!!👌 👍 सांसे हो जाएँगी जब...

खूबसूरत शायरी -:
👍 यह जिस्म तो किराये का घर है; एक दिन खाली करना पड़ेगा:!!👌
👍 सांसे हो जाएँगी जब हमारी पूरी यहाँ; रूह को तन से अलविदा कहना पड़ेगा:!!👌
👍 वक्त नही है तो बच जायेगा गोली से भी; समय आने पर ठोकर से मरना पड़ेगा:!!👌
👍 मौत कोई रिश्वत लेती नही कभी; सारी दौलत को छोंड़ के जाना पड़ेगा:!!👌
👍 ना डर यूँ धूल के जरा से एहसास से तू; एक दिन सबको मिट्टी में मिलना पड़ेगा:!!👌
👍 सब याद करे दुनिया से जाने के बाद; दूसरों के लिए भी थोडा जीना पड़ेगा:!!👌
👍 मत कर गुरुर किसी भी बात का ए दोस्त:! तेरा क्या है..? क्या साथ लेके जाना पड़ेगा…!!👌
👍 इन हाथो से करोड़ो कमा ले भले तू यहाँ… खाली हाथ आया खाली हाथ जाना पड़ेगा:!!👌
👍 ना भर यूँ जेबें अपनी बेईमानी की दौलत से… कफ़न को बगैर जेब के ही ओढ़ना पड़ेगा..!!👌
👍 यह ना सोच तेरे बगैर कुछ नहीं होगा यहाँ; रोज़ यहाँ किसी को ‘आना’ तो किसी को 'जाना’ पड़ेगा…!
🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐


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🌹यदि कोई व्यक्ति हमें गुस्सा दिलाने में सफल रहता है तो समझ लीजिये हम उसके हाथ की कठपुतली है। 🙏😊भोर...

🌹यदि कोई व्यक्ति हमें गुस्सा दिलाने में सफल रहता है
तो समझ लीजिये हम उसके हाथ की कठपुतली है।

🙏😊भोर सुहानी दिन मस्ताना जी😊🙏

हमेशा प्रेममय,शांत और संयमित रहते हुए
अपने व्यवहार के रिमोट कंट्रोल को अपने हाथ में रखने का प्रयास करते बीते वक्त हम सभी का ।

🙏🌹🌹🌹💐💐🌹🌹🌹🙏


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प्रश्न-यजुर्वेद ४०.९ में ईश्वर ने उपदेश किया है कि प्रकृति अथवा प्रकृति से बने जड पदार्थों की पूजा...

प्रश्न-यजुर्वेद ४०.९ में ईश्वर ने उपदेश किया है कि प्रकृति अथवा प्रकृति से बने जड पदार्थों की पूजा करने से घोर कष्टमय अन्धकारमय लोकों की प्राप्ति होती है| तो ऐसा वेदविरुद्ध मूर्ति पूजा,मजार पूजा,लिंग पूजा का कर्म अधर्म क्यों न माना जाए ? जिससे लोक परलोक दोनों बिगडते हैं और विधर्मियों के उपहास का कारण बनते हैं| निराकार भगवान की पूजा कितनी सरल है- आचरण शुद्ध रखो और अर्थ सहित गायत्री आदि वेद मंत्रों का जप करो|फिर जड पूजा के इतने झंझट क्यों ?


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Saturday, May 9, 2015

ईश्वर के साथ अगर तुम्हे सम्बन्ध बनाना है तो स्वाध्याय करो। योग दर्शनकार ने कहा “...

ईश्वर के साथ अगर तुम्हे सम्बन्ध बनाना है तो स्वाध्याय करो।
योग दर्शनकार ने कहा “ स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः”
अर्थ - स्वाध्यायात्=स्वाध्याय करने से,
इष्टदेवतासंप्रयोगः=ईश्वर के साथ सम्बन्ध होता है।

क्योकि स्वाध्याय करने वाले व्यक्ति की आध्यात्मिक पथ पर चलने की श्रद्धा, रूचि बढ़ती है तथा ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावोँ को अच्छी प्रकार जानकर उसके साथ सम्बन्ध भी जोड़ लेता है।


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जब दहेज में दिया हिन्दुस्तान! By Farhana Taj  दिल्ली जीतने के बाद कर्णसिंह रजिया के समक्ष थे,...

जब दहेज में दिया हिन्दुस्तान!
By Farhana Taj 

दिल्ली जीतने के बाद कर्णसिंह रजिया के समक्ष थे, ‘‘तुम्हारा खेल खत्म हो गया सुलताना, इस पवित्र तख्त से उतर जाओ और इसे हमारे हवाले कर दो।’’
‘‘आओ भईया आओ! आज रक्षा बंधन का दिन है, मैं भी सोच रही थी कोई वीर भाई आज राखी बंधाने नहीं आया।’’ इतना कहकर रजिया ने दो ताली बजाई और उसके तालियाँ बजाते ही दासियाँ पूजा का थाल ले लायी।
राणा सा अवाक् खड़े रहे।
‘‘हाथ आगे बढ़ाओ भइया!’’ रजिया ने भावनात्मक चाल चलते हुए कहा।
राणा ने हाथ आगे बढ़ा दिया, लेकिन उसकी आँखों में आँसू आ गये।
राखी बांधने के बाद रजिया ने कहा, ‘‘कोई उपहार नहीं दोगे भइया!’’
‘‘बोलो क्या उपहार चाहिए बहन!’’
‘‘एक बहिन और क्या चाहती है, अपनी रक्षा।’’
‘‘ठीक है बहिन तुम्हारी रक्षा की जाएगी। लेकिन…..।’’
‘‘लेकिन क्या भइया?’’
‘‘हम यवनों के शासन का खात्मा करने की सौगंध खा चुके हैं, आप चाहें तो हमारे साथ हमारे महल में रहें, लेकिन हम अब इंद्रप्रस्थ पर यवनों का शासन नहीं रहने देंगे।’’
‘‘पर भइया?’’
‘‘पर क्या?’’
‘‘मैं तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ। मेरे दिल में भी वे सब अरमान हैं, जो एक लड़की के अंदर होते हैं। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी डोली अपने महल से विदा करो और मेरी शादी बड़े ठाठ-बाट से करो।’’
‘‘ऐसा ही होगा बहिन!’’
‘‘लेकिन यह तो असंभव है?’’
‘‘क्यों, एक राणा के लिए असंभव कुछ भी नहीं।’’
‘‘मैं किसी हिन्दू से विवाह करना चाहती हूँ, क्या कोई हिन्दू मेरे साथ विवाह करेगा?’’
‘‘कोई भी हिन्दू किसी मुस्लिम युवती से विवाह….असंभव…मन में सोच भी नहीं सकता!’’
‘‘तो फिर मेरा क्या होगा भइया, क्या आपकी बहिन जीवनभर क्वारी रहेगी?’’
‘‘नहीं…नहीं…बहिन तुम जीवनभर क्वारी नहीं रहोगी, इसका कोई न कोई रास्ता खोज ही लिया जायेगा।’’
‘‘एक रास्ता है भइया!’’
‘‘क्या रास्ता है बहिन?’’
‘‘याकूत!’’
‘‘याकूत! अर्थात् तुम्हारा गुलाम!’’ फिर उसने मन में सोचा, ‘एक गुलाम को गुलाम ही भाया!’ और प्रत्यक्ष बोले, ‘‘याकूत ही क्यों?’’
‘‘याकूत मात्र गुलाम ही नहीं है, वह जन्म से मुसलमान नहीं है। वह पहले हिन्दू था, उसे एक जंग के दौरान कैदकर गुलाम बनाया गया और बाद में मुसलमान। चोरी छिपे अभी भी रात्रि में अग्नि मंदिर में पूजा करने जाता है। वह एक महान शक्तिशाली योद्धा है, वेदों का प्रकांड विद्वान है। यदि हम उससे शादी कर लेंगे तो मुस्लिम तो इसलिए चुप कर जाएँगे कि हमने एक काफिर को सही ढंग से मुसलमान बना लिया और हिन्दू इसलिए प्रसन्न होंगे कि हम वेदों के विद्वान की अर्द्धाग्नी हो गईं।’’
‘‘तुम कौन सा खेल खेलना चाहती हो बहन!’’
‘‘हम मुहब्बते जिहाद का खेल खेलना चाहते हैं।’’
‘‘मतलब!’’
‘‘यह आपकी समझ से परे की बात है भइया।’’ उसने कुटिल मुसकान बिखेरी थी।
‘‘तो हम उसके साथ तुम्हारा विवाह कर देंगे।’’
‘‘लेकिन एक अड़चन है भइया?’’
‘‘क्या?’’
‘‘अमीर?’’
‘‘उन सबका हम सर धड़ से अलग कर देंगे।’’
‘‘यही तो मैं चाहती हूँ।’’
‘‘लेकिन भइया मुझे दहेज में क्या दोगे?’’
‘‘एक राणा अपनी बहन को दहेज में भला क्या नहीं दे सकता! वह माँग कर तो देखे, सारा हिन्दुस्तान दे देंगे।’’ राणा ने भावना में बहकर जोश में कहा।
‘‘यही तो मैं चाहती हूँ भइया!’’
‘‘क्या?’’
‘‘दहेज में हिन्दुस्तान!’’ फिर उसने गंभीरता से आगे कहा, ‘‘आप वचन दे चुके हैं भइया, बहिन की रक्षा का भी और दहेज में हिन्दुस्तान देने का भी।’’
और इस प्रकार राणा-सा शब्दों के जाल में फँसकर जीतकर भी हिन्दुस्तान को हार गए और वापस चित्तौड़गढ़ कूच कर गये। लव जिहाद एक राजनैतिक षडयंत्र का एक अंश


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इस भ्रांति का कि आर्य नाम की कोई एक प्रजाति है, जो भारत की मूल निवासिनी न थी वरन बाहर से आई, संसार...

इस भ्रांति का कि आर्य नाम की कोई एक प्रजाति है, जो भारत की मूल निवासिनी न थी वरन बाहर से आई, संसार के इतिहास में सानी नहीं है। पहले-पहल इस भ्रांत मत का उच्‍चतर संवत १८९८ ( सन १८४०) में हुआ। तब जॉन शोर ने, जो ईस्‍ट इंडिया कंपनी के विदेश विभाग में था तथा विलियम बेंटिंक के बाद कुछ काल के लिए गवर्नर जनरल बना, अपनी पुस्‍तक में इसे प्रतिपादित किया। इसके पहले यह किसी की कल्‍पना में भी न था। यह समय था जब भारत के सांस्‍कृतिक जीवन को समाप्‍त कर अंग्रेजीकरण की नीति बनाई गई।

जब अंग्रेज भारत में व्‍यापार करने और प्रारब्‍ध ने उन्‍हें इस देश का स्‍वामी बनाया, तब अपनी साम्राज्‍य- लिप्‍सा के समर्थन में उन्‍होंने यह कहना प्रारंभ किया कि ‘अंग्रेजों ने यह देश हथियारों के बल पर जीता, वैसे ही जैसे मुगलों ने कभी जीता था। उसी प्रकार यहॉं के आर्य भी बाहर से आए थे और यहॉं के अनार्यों को जीतकर उनका सब छीन लिया। इस भूमि पर जितना अधिकार आर्यों का है उतना ही मुगलों का था और उतना ही अंग्रेजों का है।‘ यह कहकर उन्‍होंने यहॉं के निवासियों को झुठलाने का यत्‍न किया। पहले उन्‍होंने ‘द्रविड़’ को एक अलग प्रजाति कहकर यहॉं का मूल निवासी बताया। बाद में पादरियों ने एक नया दावा प्रारंभ किया कि ये द्रविड़ भी कहीं बाहर से आए-

‘शायद भूमध्‍य सागर के “बर्बर” थे। भारत के मूल निवासी यहॉं के वनवासी, कोल, भील, संथाल आदि हैं।’ (इतिहास उलटा जानता है कि बर्बर दक्षिण-पूर्व से यूरोप में गए।)

पहले इन्‍हीं को ‘विंध्‍याचल पर्वत के अवशिष्‍ट द्रविड़’ कहते थे, अब इन्‍हें ‘आदिवासी’ की एक अलग संज्ञा दे दी। नृवंशीय दृष्टि से इन द्रविड़ या आदिवासीजन का आकार, बनावट, चेहरा-मोहरा भारत के अन्‍य निवासियों से मिलता-जुलता है और ऊपरी रूपांतर सम्मिश्रण या सहस्‍त्राब्दियों के भिन्‍न प्राकृतिक वातावरण तथा उत्‍परिवर्तन का परिणाम है।

‘आर्य’ का शाब्दिक अर्थ है ‘श्रेष्‍ठ’। यह कोई जाति न थी। पर ‘आर्य’ शब्‍द का प्रयोग कभी-कभार गेहुँए रंग की भारत-यूरोपीय प्रजाति (Indo-European Race) का बोध, पिंगल तथा नीग्रो प्रजातियों से वैषम्‍य दिखाने के लिए होता है। आर्य भारत की प्राचीन हिंदु सभ्‍यता है, जिसने कभी संसार की सभी प्रुख प्राचीन सभ्‍यताओं को प्रभावित किया।

आर्यो के अस्तित्‍व तथा आदि निवास के बारे में आज भी पश्चिमी इतिहासज्ञ अनिश्चित हैं। पहले कहा जाता था कि आर्य मध्‍य एशिया से—कश्‍यप सागर तथा अरल सागर के बीच के भूभाग-या प्राचीन कैकय प्रदेश ( काकेशिया: Caucasus) से, जहॉं की दशरथ की रानी कैकई थी, आए। पर चतुर्थ हिमाच्‍छादन के समय कश्‍यप सागर और अरल सागर का मध्‍यवर्ती प्रदेश सागर तल था और कैकय प्रदेश हिमाच्‍छादित। अतएव डेन्‍यूब (Danube) नदीतल में कुछ प्राचीन घरों के अवशेष मिलने पर एक नया मत चल निकलाकि आर्य डेन्‍यूब घाटी के निवासी थे और वहॉं से निकलकर चारों ओर फैले। शायद इस कल्‍पना के पीछे एक मनोग्रंथि (complex) हावी थी, जिसने पिछली तीन-चार शताब्दियों से यूरोपवासियों को स्‍वप्रदत्‍त ‘गोरों’ का कर्तव्‍य-भार (white man’s burden)—संसासर को सभ्‍य बनाना है’ के नाम पर घोर अत्‍याचार, उत्‍पीड़न और जाति-संहार करने की छूट दी। आखिर यह महिमामय आर्य प्रजाति यूरोप के किसी कोने केअतिरिक्‍त और कहॉं पैदा हो सकती है ?

एक चुटकुला है। एक बार एक पादरी ने सब कामनाओं की पूर्ति करने वाला,सब सुखों से पूर्ण स्‍वर्ग का चित्र खींचा और एक देहाती से पूछा,

‘क्‍या तुम स्‍वर्ग नहीं जाना चाहते ?’

बेचारे देहाती ने सिर हिलाया,

‘नहीं।’

देहाती ने इतना ही कहा,

‘यदि वह कोई अच्‍छी जगह होती तो गोरों ( यूरोपवासियों) ने उसे पहले ही हथिया लिया होता।’

यूरोपवासियों के दंभ ने पहले एटलांटिस नामक एक काल्‍पनिक महाद्वीप की सृष्टि की जो प्रलय के समय अटलांटिक महासागर में डूब गया। वहॉं के निवासी बड़ीउन्‍नत सभ्‍यता के धनी कहे गए। पर इसका जब कोई प्रमाण न मिला तो यूरोप में मानव सभ्‍यता के आदि चिन्‍ह ढूँढ़ना प्रारंभ किया। डेन्‍यूब घाटी या कश्‍यपसागर के पास की भूमि में चतुर्थ हिमाच्‍छादन के बर्फानी तूफानों को तथा वहॉं के विपत्ति भरे जीवन की दृष्टि-ओट कर दिया और जब पिल्‍टडाउन (इंग्‍लैंड) में अस्थि-अवशेष प्राप्‍त हुए तो उसे पॉंच लाख वर्ष पुराना ‘उषा-मानव’ (dawn-man) कहा। बाद में पता चला किरासायनिक प्रक्रिया द्वारा इसे प्राचीन बनाया गया था।

इस कल्‍पना ने कि आर्य कहीं बाहर से आए, भारतीय इतिहास का एक विकृत अध्‍याय रचा। भ्रमित कल्‍पना कहती है कि संवत् से एक हजार वर्ष पूर्व आर्य हिंदुकुश पर्वत के दर्रों से होकर भारत आए और पहले पंजाब में बसे। वहॉं से वे नदियों के किनारे सिंधु-सागर तक और पूर्व में गंगा के किनारे बंगाल तक फैल गए। यहॉं के मूल, जंगली एवं गिरि-कंदराओं में रहने वाले अनार्यों से उनका युद्ध हुआ होगा। आर्यो ने उनकी संपूर्ण भूमि छीनकर दक्षिण में भगा दिया। फिर दक्षिण में भी आक्रमण कर इनको जीतकर आत्‍मसात कर लिया। इस तरह कल्‍पना बेलगाम दौड़ती है।

परंतु अपने प्राचीन ग्रंथों में आर्यों के कहीं बाहर से आने का उल्‍लेख या किंवदंती नहीं मिलती। आर्यों-अनार्यों के युद्ध का वर्णन उक्‍त ग्रंथों में नहीं है। केवल देवासुर संग्राम का वर्णन आता है, जिसे कुछ पुरातत्‍वज्ञ प्रतीकात्‍मक (allegorical) मानते हैं। ‘देव’ तथा ‘असुर’ आर्यों की ही दो शाखाऍं थीं। आर्य-अनार्यों के तथाकथित संघर्ष की कोई झलक हमें ऐतिहासिक सामग्री में नहीं मिलती। इसके विरूद्ध महाभारत में भारत को मानव का आदि देश कहा गया है। अपनी सभी दंतकथाओं, पौराणिक आख्‍यानों, परंपराओं एवं मान्‍यताओं में यह अंतर्निहित है कि आर्यों का आदि देश भारत है। ब्राम्‍हणों की प्रमुख शाखाऍं पंच-गौड़ (उत्‍तरी भारत की) एवं पंच- द्रविड़ ( दक्षिण भारत की) कहलाती हैं। संसार का सांस्‍कृतिक ( विशेषकर प्राचीन बृहत्‍तर भारत के पूर्वी भाग तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का) इतिहास बताता है कि जिन्‍होंने वहॉं से आगे बढ़कर सुदूर मध्‍य तथा दक्षिण अमेरिका तक भारतीय आर्य सभ्‍यता का प्रसार किया, वे द्रविड़ (द्रृ = द्रष्‍टा; विद अथवा विर = ज्ञानी) कहाते थे। वे दिग्दिगंत में आर्य सभ्‍यता के अधीक्षक थे।


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Friday, May 8, 2015

प्रश्न-यजुर्वेद ४०.९ में ईश्वर ने उपदेश किया है कि प्रकृति अथवा प्रकृति से बने जड पदार्थों की पूजा...

प्रश्न-यजुर्वेद ४०.९ में ईश्वर ने उपदेश किया है कि प्रकृति अथवा प्रकृति से बने जड पदार्थों की पूजा करने से घोर कष्टमय अन्धकारमय लोकों की प्राप्ति होती है| तो ऐसा वेदविरुद्ध मूर्ति पूजा,मजार पूजा,लिंग पूजा का कर्म अधर्म क्यों न माना जाए ? जिससे लोक परलोक दोनों बिगडते हैं और विधर्मियों के उपहास का कारण बनते हैं| निराकार भगवान की पूजा कितनी सरल है- आचरण शुद्ध रखो और अर्थ सहित गायत्री आदि वेद मंत्रों का जप करो|फिर जड पूजा के इतने झंझट क्यों ?


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~~~~~ ओ३म् ~~~~~ **** सुबह की आठ गलतियों से बचें **** *झटके से ना उठें सुबह धीमी गति का समय है....

~~~~~ ओ३म् ~~~~~
**** सुबह की आठ गलतियों से बचें ****

*झटके से ना उठें
सुबह धीमी गति का समय है. सुबह उठते समय खुदको समय दें और मांसपेशियों को धीरे धीरे हिलाएं. नींद खुलते ही हड़बड़ाना नहीं चाहिए. सुबह की गलतियों का हमारे दिन की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है और लंबे समय में इसका गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती पर भी होता है. कुछ मिनट शांति से बिताएं, लंबी सांसें लें और कमरे के तापमान का पानी पिएं

**स्ट्रेचिंग
जब हम उठते हैं तब हमारी मांसपेशियां खासकर रीढ़ कठोर होती है. सुबह उठकर बिना स्ट्रेचिंग किए हम इस कड़ेपन को आगे ढोते हैं. इससे भी हमारे पूरे दिन के कामकाज पर बुरा असर होता है. सुबह उठने के साथ शरीर को हल्के हल्के हिलाएं. अगर हैमस्ट्रिंग और पिंडलियों में खिंचाव महसूस हो तो धीरे से स्ट्रेचिंग करें और लंबी सांसें लें.


***दिन की शुरुआत
अच्छे चयापचय का राज सुबह में चाय के साथ शुरूआत नहीं, बल्कि क्षारीय पदार्थ है. सुबह उठकर नींबू का रस और पानी लेना चाहिए और उसके बाद ही चाय या फिर ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए.

****फोन और ईमेल
सुबह उठते ही अपने फोन और ईमेल को चेक करने से बचना चाहिए. ऐसे सोचिए कि आपको उठने के दो घंटे के भीतर ही दुनिया भर की समस्याएं नहीं सुलझानी हैं. आपकी ऊर्जा को सबसे अहम काम पर केंद्रित करना चाहिए ना कि सबसे गैरजरूरी काम पर. सुबह सुबह ईमेल चेक करने से आपकी उत्पादकता नहीं बढ़ सकती. इसके उलटत आपका मिजाज खराब हो सकता है.

*****सुबह का नाश्ता
हाल की कुछ रिपोर्टों में सुबह का नाश्ता नहीं करने को मोटापे, डायबिटीज और कमजोर प्रतिरक्षा से जोड़ा गया है. जरूरी नहीं है कि आप महाराजाओं की तरह नाश्ता करें लेकिन यह जरूरी है कि कुछ खाएं. सुबह के समय ब्लड शुगर का स्तर कम होता है क्योंकि डिनर और नाश्ते के बीच लंबा अंतराल होता है. अगर उठने के आधे घंटे के भीतर कुछ नहीं खाते हैं तो स्तर और गिर जाता है और हम सुस्त हो जाते हैं.

****** तुनकमिजाज
कई ऐसे लोग होते हैं जो सुबह उठकर हर किसी पर चीखते चिल्लाते हैं. लेकिन सुबह का खराब मिजाज सिर्फ 20 मिनट तक रहता है. अपनी सुबह को बेहतर बनाने के लिए प्राकृतिक शांतिदायक आवाजों को सुनें, जैसे चिड़ियों का चहचहाना, सागर की आवाज और मंत्रों का जाप.

******* दिन की योजना
एक दिन पहले ही अगले सुबह की तैयारी कर लें. जैसे दफ्तर के लिए कपड़े तैयार करना और रात में नाश्ते का इंतजाम कर लेना, तो आपकी सुबह जरूर ज्यादा सुकूनभरी होगी और दिन की अच्छी शुरुआत होगी.


******** सिगरेट और कैफीन
बहुत से लोग उठते ही सिगरेट जला लेते हैं या फिर कड़क कॉफी पीते हैं, लंबे समय तक ऐसा करने का शरीर पर बहुत बुरा असर होता है. सुबह उठते ही एक गिलास पानी पीजिए और पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद कोई फल खाइए. इसके बाद ही कॉफी पीजिए.


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दृष्टिकोण ********************************** एक...

दृष्टिकोण **********************************
एक नौजवान चीता पहली बार शिकार करने निकला। अभी वो कुछ ही आगे बढ़ा था कि एक लकड़बग्घा उसे रोकते हुए बोला, ” अरे छोटू , कहाँ जा रहे हो तुम ?”
“मैं तो आज पहली बार खुद से शिकार करने निकला हूँ !”, चीता रोमांचित होते हुए बोला।
“हा-हा-हा-“, लकड़बग्घा हंसा ,” अभी तो तुम्हारे खेलने-कूदने के दिन हैं , तुम इतने छोटे हो , तुम्हे शिकार करने का कोई अनुभव भी नहीं है , तुम क्या शिकार करोगे !!”
लकड़बग्घे की बात सुनकर चीता उदास हो गया , दिन भर शिकार के लिए वो बेमन इधर-उधर घूमता रहा , कुछ एक प्रयास भी किये पर सफलता नहीं मिली और उसे भूखे पेट ही घर लौटना पड़ा।
अगली सुबह वो एक बार फिर शिकार के लिए निकला। कुछ दूर जाने पर उसे एक बूढ़े बन्दर ने देखा और पुछा , ” कहाँ जा रहे हो बेटा ?”
“बंदर मामा, मैं शिकार पर जा रहा हूँ। ” चीता बोला।
“बहुत अच्छे ” बन्दर बोला , ” तुम्हारी ताकत और गति के कारण तुम एक बेहद कुशल शिकारी बन सकते हो , जाओ तुम्हे जल्द ही सफलता मिलेगी।”
यह सुन चीता उत्साह से भर गया और कुछ ही समय में उसने के छोटे हिरन का शिकार कर लिया।
मित्रों , हमारी जिंदगी में “शब्द” बहुत मायने रखते हैं। दोनों ही दिन चीता तो वही था, उसमे वही फूर्ति और वही ताकत थी पर जिस दिन उसे हतोत्साहित (discourage) किया गया वो असफल हो गया और जिस दिन प्रोत्साहित (encourage) किया गया वो सफल हो गया।

इस छोटी सी कहानी से हम तीन बातें सीख सकते हैं :
पहली , हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अपने “शब्दों” से किसी को प्रोत्साहित (encourage) करें , हतोत्साहित (discourage) नहीं। बेशक(Ofcourse), इसका ये मतलब नहीं कि हम उसे उसकी कमियों से अवगत न करायें , या बस झूठ में ही प्रोत्साहित करें।
दूसरी, हम ऐसे लोगों से बचें जो हमेशा नाकारात्मक सोचते और बोलते हों, और उनका साथ करें जिनका सकारात्मक दृष्टिकोण(outlook positive) हो।
तीसरी और सबसे अहम बात , हम खुद से क्या बात करते हैं ,स्वयं की बातचीत (self-talk) में हम कौन से शब्दों का प्रयोग करते हैं इसका सबसे ज्यादा ध्यान रखें , क्योंकि ये “शब्द” बहुत ताकतवर होते हैं , क्योंकि ये “शब्द” ही हमारे विचार बन जाते हैं , और ये विचार ही हमारी ज़िन्दगी की हकीकत बन कर सामने आते हैं , इसलिए दोस्तों , शब्दों की ताकत को पहचानिये, जहाँ तक हो सकें साकारात्मक शब्दों का प्रयोग करिये , इस बात को समझिए कि ये आपकी जिंदगी बदल सकते हैं।


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स्कूल से एक 6th क्लास का बच्चा अपने घर आ कर अपनी माँ से पूछता है - “माँ ये sc और st क्या हैं...

स्कूल से एक 6th क्लास का बच्चा अपने घर आ कर अपनी माँ से पूछता है -

“माँ ये sc और st क्या हैं ?”

माँ: बेटा ये तुम्हे क्यों जानना है ?
बच्चा: माँ आज सर हमसे पूछ रहे थे की कौन कौन sc st का हैं !!!!!

माँ: बेटा उन्होंने ऐसा क्यों पूछा उन्होंने नहीं बताया क्या ?

बच्चा: बताया पर सिर्फ इतना की जो जो sc st के हैं उन्हें पैसे मिलेगे और हो सकता है की obc वालो को भी दे दे पर माँ ये क्या होता हैं कास्ट?

माँ: बेटा हमारे सविधान में 4 कास्ट बनायीं है sc st obc और जनरल तो सरकार उन्हें गरीब और पिछड़े हुए लोगो को मदद करने के लिए सुविधा दी हैं।

बच्चा: पर माँ सिर्फ उन्हें ही क्यों मिलती हैं और मेरा दोस्त तो गरीब भी नहीं हैं फिर
भी उसे मिलेगे पैसे ..ये सुविधा गरीब के लिए हैं तो हम भी गरीब है न तो हमको क्यों नहीं मिलेंगे पैसे?

माँ: बेटा ये सविधान में लिखा है ।

बेटा: पर माँ सविधान के बारे में कहा था की सब को एक जैसा हक़ है तो फिर ये क्यों ?

माँ: बेटा ये सब राजनीति का गन्दा खेल हैं उनकी वजह से आज धर्म और जाति के नाम पर लोग एक सामान नही हैं
बेटा: पर माँ हम क्या हैं जिस से हम को पैसे नहीं मिलेगे ।

माँ: बदनसीब।
हम लोग बदनसीब है बेटा ।
पूरे विश्व में कही पर इस तरह का नियम नहीं है बस हमारे भारत में है ये सुविधा । …सविधान निर्माता ने इसको सिर्फ 10 वर्ष के लिए रखा था पर ये देश के दलालो ने इसको पूर्ण रूप से लागू कर
दिया ।
….अगर इन्हें लागू करना ही है तो राजनीति में भी लागू करना चाहिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी sc और st का होना चाहिए तब पता चलेगा उन्हें भी ।

बेटा: माँ क्या आगे भी मुझे मुझे इसी तरह की दिक्कत होगी ???

माँ: हाँ बेटा ।
आगे तुझे पढ़ाई में,नोकरी में ,प्रमोशन में, हर जगह दिक्कत आएगी …
जातिवाद का जहर तुझे मजबूर कर देगा और तू कितना भी सहन कर ले एक दिन तू जरूर बोलेगा की ये कोटा बंद करो ।

बेटा: माँ तो क्या हमारी मदद कोई नहीं करेगा काश में भारत छोड़ कही और पैदा हुआ होता ।

माँ: ऐसा नहीं बोलते बेटा इस धरती को हमारे पूर्वजो ने खून से सींचा हैं और बलिदान दिया है तुम्हे गर्व होना चाहिए की तुम एक भारतीय हो ।
बस ये सत्ता के भूखे लोग हमारी गरीबी दूर करने के बजाये वोट पाने की होड़ में हैं ।

बेटा: माँ मेरा दोस्त बोलता हैं की पैसे मिलेगे तो पार्टी करेगे. माँ हमें एक रोज
की रोटी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं और मेरे दोस्त पार्टी करेगे । माँ में नहीं जाउगा स्कूल कल से ।

माँ: नहीं बेटा तुम रोज स्कूल जाओ और पढ़ो ….पढ़ लिख कर शायद तुम इस कोटा को बदल दो
बेटा : हा माँ में खूब पडूंगा पर हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं की आगे पढ़ सकूँ…!!!

माँ: तू चिंता न कर मैं काम करुँगी न तेरी पढ़ाई के लिए |

इसे इतना शेयर करे कि ये सन्देश हमारे राजनेताओ तक पहुचे और वो सिर्फ गरीबो को कोटा दे न कि विकसित लोगो को |
यदि ये masage आपको बार बार मिले तो परेशान न होए ।
इसे फिर शेयर कर दें। आपकी एक पहल शायद किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति का जीवन सुधार दे।

धन्यवाद —🙏


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एक संत लोगों की शंकाओं का व्यावहारिक समाधान देते थे. एक बार उनके पास सेना का वरिष्ठ अधिकारी आया और...

एक संत लोगों की शंकाओं का व्यावहारिक समाधान देते थे. एक बार उनके पास सेना का वरिष्ठ अधिकारी आया और बोला– लोग स्वर्ग-नरक की बातें खूब करते हैं पर आखिर यह बला है क्या?

संत ने उसके कार्यों के बारे में पूछा तो वह गर्व से अपने फौजी जीवन की उपलब्धियां गिनाने लगा. बातों से फौजी रौब दिख रहा था. तभी संत ने उसे टोका और बोले- मुझे तो शक्ल सूरत से तुम फौज अधिकारी नहीं गली के उचक्के लगते हो.

यह सुनते ही वह तमतमा गया. पिस्तौल निकालकर संत के सिर पर तान दी. इस पर संत बोले- मैंने कहा था न कि तुम उचक्के हो. नकली बंदूक रखते हो ताकि लोगों को डरा सको. अब तो उसके क्रोध की सीमा न रही. उसने बोल्ट किया और गोली मारने को तैयार हो गया. इससे पहले कि वह गोली चलाता, संत बोले- यही भाव नरक है.

क्रोध मे चूर होकर आपने अपना संतुलन खो दिया. कुछ समय पहले आप मेरे चरण छू रहे थे. आपको लगता था कि मैं आपकी सभी समस्याओं का निदान कर सकता हूं किंतु चंद मिनटों में आप मेरी हत्या को उतारू हो गए. फौजी ने शर्मिंदा होकर पिस्तौल वापस रख ली. उसकी आंखों में शर्म और पश्चाताप के भाव थे.
संत बोले- विवेक के जागृत होने पर व्यक्ति को अपनी भूल का अहसास होने लगता है. मन शांत होने के बाद स्थिरता आती है और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है. यही अनुभूति स्वर्ग है.

आत्मनियंत्रण से विवेक जाग्रत होता है. विवेक शरीर में ऐसा पहरेदार है जो हमें अनुचित करने से रोकता है. यदि हम विवेक की बात समझ लेते हैं तो जीवन में शांति और सुख प्राप्त होते हैं. स्वर्ग यही है.

परंतु जैसे ही हम विवेक के संकेतों की अनदेखी करनी शुरू करते हैं, तब निस्संदेह कई क्षणिक आनंद तो प्राप्त होते हैं किंतु वे आनंद अस्थाई हैं. वे जल्द ही दुखों का कारण बनते हैं और यही नरक है.


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चाणक्य निति – अगर कोई आदमी जवान भी हो ,सुंदर भी हो , धन भी खूब हो , अधिकार भी उसे मिले हुए हो...

चाणक्य निति –

अगर कोई आदमी जवान भी हो ,सुंदर भी हो , धन भी खूब हो , अधिकार भी उसे मिले हुए हो ,
और उसके कुल में कोई जितेन्द्रिय पुरुष भी नहीं हो जो उसे समझा सके ।

तो निश्चित जानों कि उसका विनाश होने से कोई नहीं रोक सकता । उसका पतन अवश्यम्भावी है ।

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