Sunday, May 10, 2015

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 ★★★★हार्दिक नमस्ते★★★★ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ★★सभी के लिए...

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★★★★हार्दिक नमस्ते★★★★
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★★सभी के लिए प्रभु-प्रसाद★★
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 ★वैदिक संस्कार—सर्वश्रेष्ठ धन★
व्याख्या-स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
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ओ३म्‌ समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी।
चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेक वृषो भव ।।
(अथर्ववेद 6.86.2)
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शब्दार्थ- (स्रवताम्‌) बहने वाले जलों, नदी-नालों पर (समुद्रः) समुद्र (ईशे) शासन करता है (पृथिव्याः) पृथिवी पर उत्पन्न होने वाले पदार्थों को (अग्निः) अग्नि (वशी) वश में किये हुए है (नक्षत्राणाम्‌) नक्षत्रों में (चन्द्रमा) चन्द्रमा (ईशे) सब पर शासन करता है, उन्हें अपने तेज से दबा लेता है, उसी प्रकार हे मनुष्य ! तू सम्पर्ण प्राणियों में (एक-वृषः) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ (भव) बन, बनने का प्रयत्न कर।
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भावार्थ - 1. बहने वाले नदी-नालों को देखिये और समुद्र के ऊपर एक दृष्टि डालिए। समुद्र अपनी विशालता, गहनता, गम्भीरता और महान्‌ जलराशि के कारण सभी नद और नदियों पर शासन करता है। समुद्र सभी नदी-नालों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।
2. अपने तेज और दाहक शक्ति के कारण अग्नि सारी पृथिवी को, पृथिवी पर उत्पन्न होने वाली सभी वनस्पतियों को अपने वश में रखता है।
3. आकाश में करोड़ों तारे टिमटिमाते हैं, चन्द्रमा अपने तेज से उन सबको दबाकर उन पर शासन करता है।
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वेद इन तीन दृष्टान्तों को मनुष्य के सम्मुख रखकर उसे उद्‌बोधन देते हुए कहता है, जिस प्रकार नदियों में समुद्र सर्वश्रेष्ठ है, जिस प्रकार पृथिवी पर अग्नि सब पर शासन करती है, नक्षत्रों में जिस प्रकार चन्द्रमा सर्वश्रेष्ठ है। हे मानव ! तू भी इसी प्रकार सब प्राणियों मेें सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न कर।
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★प्रेषक-आर्य ओमप्रकाश सिंह राघव★
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★सत्य की ओर बढे़ं-सत्यार्थप्रकाश पढे़ं★
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★मुर्तिपूजा बुद्धमानों का घोर अपमान है★
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