Saturday, May 2, 2015

💐।। वेदामृतम् ।। 💐 *********************************** 💥सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेमम् उच्च...

💐।। वेदामृतम् ।। 💐
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💥सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेमम्
उच्च तिष्ठ महते सौभगाय ।
मा ते रिषन् उपसत्तारो अग्ने
ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये ।।
- अथर्व.2/6/2
🌷अन्वय- हे अग्ने, सम् इध्यस्व च, इमं च प्र वर्धय । महते सौभगाय च उत् तिष्ठ । हे अग्ने, ते उपसत्तार: मा रिषन् । ते ब्रह्माण: यशस: सन्तु, मा अन्ये ।

🍀शब्दार्थ- (हे अग्ने) हे अग्नि, (सम् इध्यस्व च) तुम प्रदीप्त हो, प्रज्वलित हो । (इमं च) और इस यजमान को, (प्रवर्धय) बढ़ाओ, समृद्ध करो । (महते) महान, (सौभगाय च) सौभाग्य के लिए, (उत् तिष्ठ) उठो, पुरुषार्थ करो । (हे अग्ने) हे अग्नि, (ते) तेरे, (उपसत्तार:) उपासक, (मा रिषन्) न नष्ट हों । (ते) तेरे, (ब्रह्माण:) स्तुतिकर्ता, (यशस:) यशस्वी, (सन्तु) हों, (मा अन्ये) और व्यक्ति नहीं ।

🌺हिंदी अर्थ- हे अग्नि ! तुम प्रदीप्त हो और इस यजमान को समृद्ध करो । महान सौभाग्य के लिए उठो (प्रयत्नशील हो) । हे अग्नि ! तेरे उपासक कभी नष्ट न हो । तेरे स्तुतिकर्ता यशस्वी हो, अन्य नहीं ।
🌿Eng. Tr.- 0 fire-god ! be kindled and make the devotee prosperous. Arise for the great fortune. O Fire-god ! let not your devotee be harmed. May your devotee alone be glorious, not others.

🍇अनुशीलन: इस मन्त्र में अग्नि का उदाहरण देकर शिक्षा दी गई है कि यदि जीवन में सौभाग्य की कामना है तो उठो और आगे बढ़ो । जो अग्नि के समीप रहते है और यज्ञ करते है, वे ही सदा यशस्वी होते हैं, अन्य व्यक्ति नहीं ।
अग्नि तेज का पुंज है । अग्नि की शिक्षा सदा उपर की और रहती है । अग्नि का स्वाभाविक धर्म उष्णता है । अग्नि को जन्मसिद्ध तेजस्विता मिली है । इस मन्त्र में अग्नि का उदाहरण दिया है की जिस प्रकार अग्नि प्रदीप्त है, उसी प्रकार ऐश्वर्य की कामना करनेवाले को सदा प्रबुद्ध होना चाहिए । सौभाग्य का इच्छुक सदा जागरूक हो, सदा प्रगतिशील हो, सदा अपना लक्ष्य ऊँचा रखे और अग्नि के तुल्य जीवन में कभी भी अनुत्साह न आने दे । जो प्रगतिशील है, कर्मण्य है और सदा जागरूक है, उसे जीवन में सफलता और सिद्धि अवश्य मिलती है । अतएव ऐतरेय ब्राह्मण मे कहा गया है की -प्रगतिशील को श्री मिलती है । सूर्य सदा गतिशील है, अतः उसमें तेजस्विता है ।
चरैवेति चरैवेति इंद्र इच्चरतः सखा ।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं, यो नः तन्द्रयते चरन् ।। (ऐत. ब्रा.)
जो उत्साही है, क्रियाशील है, उनके लिए ही संसार है । उन्हे ही जीवन में सिद्धि और सफलता मिलती है । उनका ही सौभाग्य और ऐश्वर्य बढ़ता है । मंत्र मैं शिक्षा दी गई है कि जो अग्नि के समीप बैठते है, यज्ञ करते है और अग्नि के गुणों से शिक्षा लेते है, वे ही संसार में यशस्वी होते है, विख्यात होते है और श्री-संपन्न होते हैं, अन्य व्यक्ति नहीं ।
(वेदामृतम् पुस्तक ड़ॉ. कपिलदेव द्विवेदी से उद्धृत)
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💐।। सुभाषितम् ।। 💐
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💥आत्मज्ञानी धनैरयुक्तो, ज्ञानहीनो च निर्धनः ।
आत्मज्ञाता सदानंदे मोदते सर्वकर्मसु ।।

🌷भावार्थ- जो व्यक्ति आत्मा एवं परमात्मा संबंधी सत्य शुद्धज्ञान से युक्त है - वही व्यक्ति धनवान, ऐश्वर्यशाली है- क्योकि सुखो को प्राप्त करना ही धन का मुख्य प्रयोजन हैं और वास्तव में वही व्यक्ति सुखी होता है - जो की शुद्धज्ञान से युक्त हो तथा जिसके पास मुक्ति की ऒर बढ़ने के अवसर (योग्यता) अधिक हों, वही व्यक्ति वास्तव में ऐश्वर्यशाली होता है ।
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💐।। श्लोक: ।। 💐
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💥क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

-श्रीमद् भगवत गीता 2:63

🌷भावार्थ : क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।
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🙏आप सभी का दिन शुभ हो 🙏


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