🙏वैदिक जीवनशैली व परमेश्वरिय विचार🙏
वैदिक जीवनशैली को धर्म की संज्ञा दी जाती है। प्रायः समुदाय विषेश की जीवनशैली व आचार-विचार के आधार को धर्म की संज्ञा दी जाती है। वैदिक आचार-विचार में सम्पूर्ण प्रकृति की महत्ता अधिक है व इसे परमेश्वर के सदृश्य माना जाता है। वैदिक विचारधारा में परमेश्वर की व्याख्या इतनी उदार है कि, अव्यक्त सत्ता या त्रिकालाबाधित असितत्व का नाम रखने के लिए उसे कोई विषेश आग्रह नहीं है। ईसाई उसे गॉड, मुस्लिम उसे अल्लाह व आजकल के वैज्ञानिक उसे ओरिजनल सोर्स या प्राइमरी सबस्टेन्स के रुप से सम्बोधित करने पर जोर देते है। वहीँ वैदिक विचार से उसे आप चाहें जिस नाम से पुकार सकते हैं।
इन्द्रं मित्रं वरुणमगिनमाहुरथो द्विव्यः स सुपर्णो गरुत्मान।
एकं सद विप्रा बहुधा वदन्त्यगिनं यमं मातारिश्वानमाहुः।।
वेद की दृष्टी में परम-तत्त्व के नाम का कोई आग्रह नहीं हैं। उसे तो परमेश्वर - भगवान के अतिरिक्त ओर भी किसी नाम या मानवीय सम्बन्ध अर्थात माता, पिता, भाई, सखा, गुरु या राजा के नाम से पुकार सकते हैं। वह तो परमं सत्य है, सलिल है, यह अव्यक्त, अस्पर्श, अरूप तथा अगन्ध अमृत हैं।
वेदों मे परमात्मा के विषय मे उल्लेख इस प्रकार है -
एकं सद विप्रा बहुधा वदन्ति।। - ऋग्वेद।
एक ही परमं तत्व परमेश्वर को विद्वान् कई नामों से बोलते हैं। वैदिक विचारधारा के अनुसार आप उसे चाहे जो प्राकृतिक नाम दे सकते हैं। वह तो एक दिव्य, अनुपम अद्वितीय शक्ति की कल्पना इष्ट है, जो इस विश्व का उत्पादन, संरक्षण और संहरण करते हुए इसका संचालन कर रही हैं।
तदेजति तन्नेजति तददूरे तद्वनितके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाहतः।।
वह परमात्मा चलता भी है व नहीं भी चलता, अर्थात वह कूटस्थ होते हुए सर्वव्यापक है। वह दूर भी है व पास भी। वह इस समस्त जगत के अन्दर भी है व बाहर भी है अर्थात ऐसा कोई स्थान नहीं जहां परमात्मा न हो।
यस्मान जातः परो अन्योअसित।।
परमं तत्व परमात्मा के परे अथवा उससे बढ़कर अन्य कुछ व कोई भी नहीं हैं।
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे।। - अथर्ववेद
जिसके अधीन यह सब जगत है उस प्राण रूपी परमेश्वर के लिए मेरा नमस्कार हैं।
वैदिक दर्शन के संवर्धन में प्रकाशित।
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