Saturday, May 2, 2015

💐।। वेदामृतम् ।। 💐 ************************************ ।। मेधा बुद्धि की मांग करे ।। 🌿ऋषि:- त्रित...

💐।। वेदामृतम् ।। 💐
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।। मेधा बुद्धि की मांग करे ।।
🌿ऋषि:- त्रित आप्त्य: ।। देवता- पवमानः ।। छन्द:- उष्णिक् ।। स्वरः- ऋषभ: ।।

💥 जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये।
अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा ।।
- साम वेद.101
🍀 योगदर्शन में योग-मार्ग आठ मंजिलोंवाला है । आठवीं मंजिल समाधि है, (जिसमें प्रभु का साक्षात्कार हो जाता है ।) उससे पहले सात मंजिलें हैं, जिन्हें हम साधना का नाम दे सकते हैं । ये सातों मानव-जीवन को स्वस्थ, सबल, सूंदर व सुप्रज्ञ बनाकर बडा उत्तम बना देतीं हैं । इस निर्माण के कारण इन्हे मंत्र में ‘सप्त मातरः’ कहा है । इन सात मंजिलों को पार कर मनुष्य प्रभु का साक्षात् कर पाता है । मंत्र में कहा है कि ('सप्त मातृभिः’) = योग की इन सात (यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान) मंजिलों द्वारा (जज्ञान:) = वह प्रभु तुम्हारे सामने प्रादुर्भूत हुए हैं (जनि प्रादुर्भावे) ।
'प्रभु से जीव क्या याचना करे ?’ याचना करने की सहस्त्रों वस्तुएँ हो सकती हैं- 'प्रजा, पशु, आयु, प्राण, द्रविण, कीर्ति’ एक-एक वस्तु मनुष्य के लिए आकर्षण रखती हैं । वेद कहता है कि (श्रिये)= अपने जीवन को संपन्न बनाने के लिए 'मेधाम्’= मेधा बुद्धि को (आशासत)= मांगो । श्री शब्द 'धर्म, अर्थ, काम’ तीनो पुरुषार्थो को एक शब्द से कहने के लिए प्रयुक्त होता है । यदि मनुष्य यह चाहता हो कि उसके जीवन में धर्म, अर्थ व काम तीनो का सूंदर समन्वय हो तो वह मेधा की याचना करे । मेधा उसे कहीं भी आसक्त न होने देती हुई धर्म, अर्थ, काम इन सभी पुरुषार्थो की श्री से संपन्न कर देती है ।
'प्रभु का दर्शन होने पर मेधा ही मांगनी है’, ऐसा हम निश्चय करें, कहीं ऐसा न हो कि उस विस्मय में हमें कुछ सूझें ही नहीं या हम कुछ गलत वस्तु मांग बैठें । (अयम्)= यह प्रभु तो (रयीणाम्)= सब प्रकार की संपत्तियों के (ध्रुव:)= अवधिभूत स्थान हैं- पवित्र पात्र हैं । ऐसा ही वह प्रभु (आ)= सर्वत्र (चिकेतत्)= जाना गया है । उन संपत्तियों में से हम 'धर्म में स्थिर बुद्धि’ को ही चाहें । हमारी याचना सात्विक संपत्ति के लिए हो । यह सर्वोत्तम सात्विक संपत्ति ही 'मेधा’ है । इसके होने पर कुछ भी अप्राप्य न रहेगा । इस प्रकार हम प्राप्त करनेवालो में श्रेष्ठ, इस मंत्र के ऋषि 'आप्त्य’ होंगे और संसार-सागर को तैरनेवालों में उत्तम होकर (तीर्णतम्)= त्रित कहलायेंगे ।
🌸भावार्थ- हम योग की सात भूमिकाओं से उस प्रभु का दर्शन करें और सदा मेधा की कामना करें ।
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🎉।। सुभासितम् ।। 🎉

।। मुक्तिमार्ग की बाधाएँ ।।

💥अतिसंगो$तिवादश्च,चापलयमतिभोजनम् ।
श्रेयोमार्ग इमे दोषा:, प्रोक्ता वै साधकैर्जनै: ।।
🍀भावार्थ : श्रेयमार्ग में चलने के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह लौकिक व्यक्तिओ का संग कम से कम करे, अत्यावश्यक प्रतीत होने पर ही करे । किसी से भी अनावश्यक बातें न करे - व्यर्थ की इधऱ उधर - की बातें करने से व्यक्ति राग-द्वेष-चंचलता आदि दोषों से युक्त हो जाता है । आवश्यकता पडने पर अवश्य बोलना चाहिए, क्योकि श्रेयमार्ग में अधिक बोलना तथा आवश्यक होने पर भी न बोलना, उत्तर न देना आदि बाधक होते है । वाक्संयम के लिए एकांतसेवन आवश्यक होता हैं । श्रेयमार्ग के पथिक के लिए चंचलता सबसे अधिक बाधक विषय है । इसी प्रकार भोजन आदि पर नियंत्रण न रखते हुए आवश्यकता से अधिक खाना भी बाधक है । भोजन के विषय में हमे अतियोग, आयोग, मिथ्यायोग, समयोग आदि बातों पर ध्यान देते हुए आहार लेना चाहिए ।
ये श्रेयमार्ग के कुछ दोष प्रस्तुत किए है, जो कि साधक सज्जनों द्वारा बताये गए हैं ।


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