Sunday, July 5, 2015

😶 “ पृथिवी-धारक। ” 🌞 ओ३म् सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति...

😶 “ पृथिवी-धारक। ” 🌞

ओ३म् सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरूं लोकं पृथिवी न:कृणोतु।।  
अथर्व० १२। १ । १ 
ऋषि:- अथर्वा । । देवता-भूमि: ।। छन्द:-त्रिष्टुप् ।।

शब्दार्थ :- महान् सत्य, कठोर सत्याचरण, व्रतग्रहण, कष्टसहन, अनुभव-ज्ञान, नि:स्वार्थ कर्म-ये छह गुण पृथिवी को धारण कर रहे हैं। भूत और भव्य की रक्षा करनेवाली वह हमारे लिए विस्तृत लोक को, विशाल क्षेत्र को करे।

विनय :- हे प्रभो !
जिस भूमि पर हम रहते हैं वह भूमि हमें उन्नत करें, हमें विशाल बनाये। हम इसे धारण करने का पूरा यत्न कर रहे हैं। जब कभी हम मोहवश यह समझ लेते हैं कि कूटनीति अर्थात झूठ, कपट, चालाकी आदि से अपने देश, राष्ट्र व मातृभूमि की धारणा होगी तब हम भूले होते हैं। पृथिवी को धारण करनेवाले जो आवश्यक गुण हैं, उनमें तो सबसे पहला सत्य है। वह महान् सत्य, जिससे विश्व ब्रह्माञ्ड स्थित है, हमारी भूमि को भी वही धारण किये हुए है और केवल सत्य का ज्ञान ही नहीं, किन्तु उसका आचरण राष्ट्र को स्थिर रखता है। हमें कठोरता के साथ, तेजस्विता के साथ, पूरा-पूरा सत्याचरण करना चाहिए। भूमि को कोई राजा, शासन या प्रजा नहीं धारण करते, किन्तु वहाँ के वासियों में स्थित ये छह गुण ही एकमात्र भूमि के धारण करनेवाले होते हैं। यह जानकार इन गुणों को हम अपने में लाने का पूरा यत्न करते हुए ही यह प्रार्थना करते हैं कि हमारी प्यारी मातृभूमि हमें विस्तृत और विशाल बनाये। हम इन गुणों की साधना द्वारा अपनी मातृभूमि को धारण करें और यह भूमि हमारे भूत और भव्य की रक्षा करनेवाली होकर हमें उन्नत करे। राष्ट्र का व्यक्ति मातृभूमि के जीवन और मरण के साथ ही जीता या मरता है।मातृभूमि की अनन्यभाव से उपासना मनुष्य को कितनी विस्तृत आयु (जीवन) प्रदान कर देती है! तब मनुष्य क्षुद्र बातों से कितना ऊँचा हो जाता है।
आओ, हम आज से उन सत्य आदि महान् गुणों को अपने में धारण करते हुए अपनी मातृभूमि की सच्ची पूजा किया करें , जिससे यह भगवती मातृभूमि हमारे भूत के दृढ़ चट्टान पर हमारे उज्जवल भव्य की रचना को सुरक्षित करती हुई, हमारे लिए उतने विशाल क्षेत्र को खोल दे-उस भूत और भव्य को व्याप्त कर लेनेवाले विस्तृत लोक को हमारा बना दे।

ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

 वैदिक विनय से 


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