🌞 ओ३म् 🌞
नमस्ते जी, सुप्रभातम्
वेदामृतम्
विभूतिरस्तु सूनृता ।(ऋग्वेद १/३०/५)
हमारा ऐश्वर्य , संपत्ति मीठी हो ।
हमें ऐश्वर्य की प्राप्ति, उपयोग तथा उपभोग इस प्रकार करना चाहिए जिससे वह किसी के दु:ख का हेतु न बने ।
सुभाषितम्
॥ मानसिक तप ॥
मन:प्रसाद: सोम्यत्वं, मौनमात्मविनिग्रह : । भावसंशुद्धिरित्येतत् , तपो मानसमुच्यते ॥
(महाभारत भीष्मपर्व ४१/१६)
मन की प्रसन्नता, शान्तस्वभाव, उत्तम चिन्तन -मनन, मन को वश में रखना और विचारों की पवित्रता, यह सब मानसिक तप कहा जाता है ।
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