🚩llओ३म्ll🚩
सभी को सादर नमस्ते
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वाटस्एप साभार
–~~*ओ३म् जप ही क्यों ?
वेदों, उपनिषदों, दर्शनों, गीता, रामायण, महाभारत आदि समस्त आर्ष ग्रन्थों में ॥ओ३म् ॥ जप की महिमा गाई गई है -
ओ३म् क्रतो स्मर
यजुर्वेद ४०.१५ अर्थात
॥ हे जीव ! तू ॥ओ३म् ॥ का ही स्मरण कर ॥
योगदर्शन में महर्षि पतंजलि जी ने कहा है-
तस्य वाचक: प्रणव: १.२७
तज्जपस्तदर्थभावनम-१.२८
तत: प्रत्यक्चेतनाधिगमो अपि
अन्तरायाभावश्च-१.२९
इन तीनों श्लोकों का अर्थ है कि ओ३म् का अर्थ सहित जप करने से ईश्वर का साक्षात्कार होता है और योग के सब विघ्नों का विनाश होता है।अर्थ सहित जप करने का अर्थ है-ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव का चिन्तन और ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना। कुछ प्राणायाम के पश्चात ॥ओ३म् ॥ का जप करते हुये ईश्वर के सर्वव्यापक निराकार दयालु आदि का गुणों का चिन्तन करने से मन एकाग्र और शान्त होने लगता है | ईश्वर का ध्यान करने की यह सर्वोत्तम विधि है।
ईश्वर के सर्वोत्तम व निज नाम ओ३म् का जप छोड कर राम-राम, राधे-राधे, कृष्णा-कृष्णा आदि का जप अवैदिक है। ध्यान की इस सर्वोत्तम विधि को छोड अन्य विधियों पर माथापच्ची करना मात्र समय नष्ट करना है। आती जाती सांस को देखते रहो, मौन हो कर विचारों को देखते रहो, नृत्य करते करते बेहोश होकर गिर जाओ आदि आदि ध्यान की विधियों को अपनाना भी समय बर्बाद करना है। वह ध्यान ही क्या जिसमें ईश्वर का चिन्तन न हो ! ईश्वर को चौथे वा सातवें आसमान में एकदेशी मानना अथवा उसकी तरह तरह की मूर्तियां बना कर ध्यान करना तो और भी नादानी है।
ओ३म् का जप मन को एकाग्र व ईश्वर साक्षात्कार में ही सहायक नहीं अपितु इसके और भी कई वैज्ञानिक लाभ हैं जो शरीर व मन को स्वस्थ रखनें बहुत कारगर हैं |
—~~**★डा० मुमुक्षु आर्य
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