Tuesday, September 11, 2018

🌺🌼 *।।ओ३म्।।* 🌼🌺ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।यद् भद्रं तन्न आसुव।।1।।*तू सर्वेश सकल...

🌺🌼 *।।ओ३म्।।* 🌼🌺

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।

यद् भद्रं तन्न आसुव।।1।।

*तू सर्वेश सकल सुखदाता शुद्धस्वरूप विधाता है।*

*उसके कष्ट नष्ट हो जाते जो तेरे निज आता है।।*

*सारे दुर्गुण, दुर्व्यसनों से हमको नाथ बचा लीजै।*

*मंगलमय गुण कर्म पदार्थ प्रेम सिन्धु हमको दीजै।।*

ओ३म् हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।2।।

*तू ही स्वयं प्रकाशक, सुचेतन, सुखस्वरूप शुभ त्राता है।*

*सूर्य-चन्द्र लोकादिक को तो तू रचता और टिकाता है।।*

*पहिले था अब भी तू ही है घट-घट में व्यापक स्वामी।*

*योग, भक्ति, तप द्वारा तुझको, पावें हम अन्तर्यामी।।*

ओ३म् य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।

यस्यच्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।3।।

*तू ही आत्मज्ञान बल दाता, सुयश विज्ञजन गाते हैं।*

*तेरी चरण-शरण में आकर, भवसागर तर जाते हैं।।*

*तुझको ही जपना जीवन है, मरण तुझे विशराने में।*

*मेरी सारी शक्ति लगे प्रभु, तुझसे लगन लगाने में।।*

ओ३म् यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव।

य ईशेSअस्य द्विपदश्चतुश्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।4।।

*तूने अपनी अनुपम माया से जग की ज्योति जगाई है।*

*मनुज और पशुओं को रचकर निज महिमा प्रगटाई है।।*

*अपने हिय-सिंहासन पर श्रद्धा से तुझे बिठाते हैं।*

*भक्ति-भाव से भेंटें लेकर शरण तुम्हारी आते हैं।।*

ओ३म् येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।।

योSअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।5।।

*तारे, रवि, चन्द्रादि बनाकर निज प्रकाश चमकाया है।*

*धरणी को धारण कर तूने कौशल अलख लखाया है।।*

*तू ही विश्व-विधाता, पोषक, तेरा ही हम ध्यान धरें।*

*शुद्ध भाव से भगवन्, तेरे भजनामृत का पान करें।।*

ओ३म् प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव।

यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोSअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।।6।।

*तूझसे बडा न कोई जग में, सबमें तू ही समाया है।*

*जड चेतन सब तेरी रचना, तुझमें आश्रय पाया है।।*

*हे सर्वोपरि विभो, विश्व का तूने साज सजाया है।*

*धन दौलत भरपूर दूजिए यही भक्त को भाया है।।*

ओ३म् स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।

यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त।।7।।

*तू गुरु है, प्रजेश भी तू है, पाप-पुण्य फलदाता है।*

*तू ही सखा-बन्धु मम तू ही, तुझसे ही सब नाता है।।*

*भक्तोंको इस भव-बन्धन से, तू ही मुक्त कराता है।*

*तू है अज, अद्वैत, महाप्रभु सर्वकाल का ज्ञाता है।।*

ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम ।।8।।

*तू है स्वयं प्रकाश रूप प्रभु, सबका सिरजनहार तू है।*

*रसना निशि-दिन रटे तुम्हीं को, मन में बसता सदा तू ही।।*

*कुटिल पाप से हमें बचाते रहना, हरदम दयानिधान।*

*अपने भक्त जनों को भगवन्, दीजै यहीं विशद वरदान।।*

_*इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम्*_

ओ३म्!!


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