🍎परमात्मा के दर्शन 🍎
मन की दो अवस्थाएँ होती है, एक मलविक्षेप-आवरण दोषों से युक्त, दूसरी इन दोषों से रहित ।इन दोषों से युक्त मन के द्वारा परमात्मा को नही जान सकते । इन दोषों से रहित, शुद्ध मन के द्वारा परमात्मा जाना जाता है । जैसे आंख और उसमें लगें अंजन को जानने के लिए दर्पण एक साधन है, दर्पण के बिना आंख और उसमें लगे अंजन को नहीं देख सकते, किन्तु अन्धेरी रात्रि में दर्पण से भी आंख और उसमें लगे अंजन को नही देख सकते,अथवा जब दर्पण स्वच्छ न हो, मलिन हो अथवा जब दर्पण टिका हुआ न हो, हिल जुल रहा हो, अस्थिर हो, वेग से गति कर रहा हो अथवा दर्पण पर कोई आवरण हो =परदा पड़ा हो ,तब भी दर्पण के द्वारा आंख और उसमें लगा अंजन दिखाई नहीं देता । ऐसे ही जब मन ज्ञान शून्य हो,पाप -वासनाओं से मलिन हो,काम , क्रोध आदि के कारण चंचल हो रहा हो,विक्षिप्त हो या उस पर अविद्या का आवरण पड़ा हो ,तब उसके द्वारा आत्मा और परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते ।
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