🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏ॐ प्रतीची दिग्वरुणो धिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः ~~~~~~~~~मन्त्र का पद्य में भाव~~~वैदिक संध्या के मनसापरिक्रमा मन्त्र का तीसरा मंत्र ~~पश्चिम के तुम अधपति स्वामी, वरुणदेव हे अंतर्यामी| सर्प आदिको दूर हटाते, विषयी भाव से हमे बचाते| पृथ्वी आदि जग के पदार्थ, हर तपोनिष्ठ साधु महात्मा| प्रेरक बन कर मार्ग सुझाते, तेरी शरण में रह परमात्मा| कभी परस्पर द्वेष करें न, करें प्रेम, तज सारे द्वेष| बाकी तेरे न्याय पर छोड़ें, मस्त फिरें हर दम विमलेश||~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~विमल विनती~~~~~~~👏|हे वरुण देव,सर्वश्रेष्ठ, न्यायकारी, परमेश्वर! आप हम सबको सदैव कुपथ से हटा सुपथ पर ले चलो हे प्रभु हम सब विषयों के विष से बचते हुए पृथ्वीआदि से प्राप्त अन्नआदि से भरपूर लाभ लेते हुए ज्ञानी जनों की संगति द्वारा तुझ परमात्मा की शरण को नित्य प्राप्त करें ऐसी आपसे विमल विनती है हमारे परस्पर मनों को विमल निर्मल पावन बनाइये जिससे हम कभी भी किसी से किसी भी प्रकार का द्वेष न करें|| हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये||
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