Wednesday, March 25, 2015

देवता, मनुष्य तथा दानव, तीनों प्रजापति की संतानें थीं. एक बार तीनों प्रजापति से उपदेश ग्रहण के लिए...

देवता, मनुष्य तथा दानव, तीनों प्रजापति की संतानें थीं. एक बार तीनों प्रजापति से उपदेश ग्रहण के लिए आए. प्रजापति ने सबसे पहले देवता को उपदेश दिया-“द”. देवता उपदेश लेकर जाने लगे. प्रजापति ने पूछा- इसका क्या अर्थ तुमने सोचा. देवता बोले- हमें दमन करने का उपदेश मिला है.


प्रजापति ने कहा-भोग विलास, नृत्य-संगीत आदि का त्याग करके संयमित जीवन बिताते और परोपकारी बनके व्रत पूजा पाठ करना देवत्व का गुण माना जाएगा. इसका पालन करने वाला ही स्वर्ग का अधिकारी होगा. इसलिए दमन करो.


इसके बाद मनुष्य आए. प्रजापति ने उन्हें भी कहा- “द” फिर अर्थ पूछा. मनुष्य बोले- आपने हमें दान का आदेश दिया. प्रजापति प्रसन्न हुए- उचित अर्थ निकाला है तुमने. मनुष्यों में स्वार्थ हावी होगा तब दान ही से उसका उपकार हो पाएगा.


अब दानवों की बारी थी. प्रजापति ने उन्हें भी “द” का उपदेश दिया. दानव संतुष्ट होकर जाने लगे तो प्रजापति उपदेश का क्या अर्थ पूछा.दानव बोले- आपने हमें दया का आदेश किया है.


प्रजापति ने कहा- तुम्हारा कुल बहुत क्रोधी और आततायी हो गया है. यदि तुमने दया नहीं की तो अस्तित्व संकट में आ जाएगा.


प्रजापति का संदेश है- पृथ्वी पर “द” को धारण करने वाले उत्तम कोटि के जीव होंगे. अपने-अपने स्वभाव के अनुकूल उन्हें लोक में सम्मान और उसके बाद परलोक में स्थान मिलेगा.


समाज के संत महात्माओं को “द” का संकेत लेने वाले देवता, दानी कर्मयोगियों को “द” का संकेत लेने वाले मनुष्य और खल प्रवृति के लोगों को “द” का संदेश लेने वाले दानव कुल का जानना चाहिए.


ऐसी अनुपम संग्रह पढ़ने के लिए फ्री प्रभु शरणम् (prabhu sharnam) एंड्रॉयड एप्प डाउनलोड करें.

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Tuesday, March 24, 2015

किसी मज़ार पर एक फकीर रहते थे। 👳 सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे। 😪😪😪😪😪😪😪😪 उन...

किसी मज़ार पर एक फकीर रहते थे।

👳

सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे।

😪😪😪😪😪😪😪😪

उन भक्तों में एक बंजारा भी था।

👴

वह बहुत गरीब था,


फिर भी,

नियमानुसार आकर माथा टेकता,


फकीर की सेवा करता,


और

फिर अपने काम पर जाता,

उसका कपड़े का व्यवसाय था,

🌋🌌🌠🌁🌈🌋🌌🌠🌁

कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर

लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता,

कपड़े बेचता।

🎑

एक दिन उस फकीर को उस

पर दया आ गई,

उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया।


अब तो बंजारे

की आधी समस्याएं हल हो गईं।

वह सारे कपड़े गधे पर लादता और

जब थक जाता

तो


खुद भी गधे पर बैठ जाता।

🏇

यूं ही कुछ महीने बीत गए„


एक दिन गधे की मृत्यु हो गई।

🐎

बंजारा बहुत दुखी हुआ,

उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया,

उसकी कब्र बनाई


और

फूट-फूट कर रोने लगा।

😂

समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने

जब यह दृश्य देखा,

तो सोचा

जरूर किसी संत की मज़ार होगी।

तभी यह

बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है।

यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर

माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया।

😛

कुछ दिनों के उपरांत ही उस

व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई। उसने

खुशी के मारे सारे गांव में

डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण फकीर की मज़ार है।

वहां जाकर

जो अरदास करो वह पूर्ण होती है।

मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं वहां।


उस दिन से उस कब्र पर

भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया।

🚶🏃🚶🏃👫👪👬👭👯

दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादे बख्शाने वहां आने लगे।

बंजारे की तो चांदी हो गई,


बैठे-बैठे उसे कमाई

का साधन मिल गया था।

👍

एक दिन वही फकीर

जिन्होंने बंजारे

को अपना गधा भेंट स्वरूप

दिया था वहां से गुजर रहे थे।

😣

उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-

“आपके गधे ने

तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था

तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था

और

मरने के बाद

मेरी जीविका का साधन बन

गया है।”

👴

फकीर हंसते हुए बोले,

“बच्चा!

जिस मज़ार

पर तू नित्य माथा टेकने आता था,


वह मज़ार इस गधे की मां की थी।”😜

🐴🐴🐴🐴


सबक-मेरा भारत महान ।

Incredible India.




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ज्योतिषीयो के बताए उपायो से अगर ग्रह ठीक नहीँ हो रहेँ हो तो इन बातो पर गौर करे । सूर्य :- जल तो आप...

ज्योतिषीयो के बताए उपायो से अगर ग्रह ठीक नहीँ हो रहेँ हो तो इन बातो पर गौर करे ।


सूर्य :- जल तो आप हर दिन देते ही है, एक दिन यह देँखे कि वह जा किधर रहा है. कोई भी काम करने से पहले गुङ खाकर पानी पीते ही होगेँ, फिर भी काम नहीँ बन रहेँ है. अगली बार जीरा, अजवायन, मिर्च, आदि खा कर जूस, लस्सी पी कर देखेँ क्या पता काम बन जाए ।


चन्द्रमा :- पूर्णिमा या सोमवार का व्रत करते हुए थक चुके ऊपर से सूर्यास्त के पश्चात दूध भी नहीं पीकर सेहत का और सत्यानाश. चांदी तो बहाने से रहे - मंहगा जो है. अपना वजन अभी जितना है उसका 1/6 कर के देखिए. क्या पता चन्द्रमा प्रसन्न हो जाए ।


मंगल :- मसूर की दाल पूरे परिवार ने खाई नहीँ होगी, जितनी आप बहा चुके है. रेवङिया बताशे बहाने की बजाय घर ले जाते तो मंगल का तो पता नहीँ, आपके बच्चे बहुत खुश होते. आन्खो मे सफेद सूरमा लगा कर कभी दूसरो से भी पूछ लेना चाहिए कि आप कैसे लग रहेँ है ।


बुध :- बुआ मौसी बहन आदि जहाँ भी जिस चौराहे पर मिलती होँगी उतनी बार आप पाँव छू कर आशीर्वाद लेते ही होगेँ जो गलत बात भी नहीँ है - पर बुध पहचान पा रहा है बुआ मौसी को किसे पता. हरे रंग का तोता तो पाला ही हुआ है, जब आप स्वयं इन्सान हो कर भी बुध को ठीक नहीँ कर सकते, वह तो बेचारा तोता ही है ।


गुरु :- पीले रंग का रुमाल तो जेब मे रखा मिल ही जाएग. यह अलग बात है कि आपकी जेब मे पङे हुए रुमाल को गुरु देख पाता हो या नहीँ. पीपल का वृक्ष टैरेस पर तो लगता नहीँ है. कहीँ दूर किसी गांव मे लगाया होगा तो जब तक वह बङा होकर आपके गुरु को ठीक करने लायक होगा - तब तक गुरु की दशा ही नहीँ रहेगी. हल्दी रोज खाते ही है. जब पेट मे जाकर भी वह गुरु को ठीक नहीँ कर पाई तो …


शुक्र :- गन्दे नाले - गटर मे नीला फूल बहाया ही होगा. अब मत बहाए हर रोज बदबू सेहत के लिए अच्छी नहीँ होती है. चान्दी की डिब्बी मे शहद भी किसी अलमारी मे पङा होगा - शहद की बजाय उसमे जैम भरे और बाथरुम, रसोई, या कहीँ और रख कर देखेँ. शायद कुछ हो जाए. चान्दी की गोली तो जेब मे रखी ही है. पर जेब फिर भी खाली है. चान्दी की गोली की बजाय कन्चे रख कर देखिए - क्या पता जेब भर जाए ।


शनि :- रोज कौवो को रोटी देते ही होगेँ. जहाँ पर देते हैं, वहां पर CCTV लगा कर देखिए - पता तो चले कौन खा रहा है. मछलियो को आटे की गोलियाँ भी बहुत खिलाई - पर वह तो बताने से रही कि शनि ठीक हुआ या नहीँ. कभी शार्क मछली को आटा खिला कर देखिए. वह बङी मछली होती है शायद ठीक कर दे. शार्क भी काम न कर पाए तो व्हेल मछली की तलाश करे - वह पक्का शनि को ठीक कर देगी ।


राहु :- घर मे रोज टोपी पहन कर रखते होगें. सोते समय भी नहीँ उतारते होगेँ. क्योँकि दफतर कितने दिन टोपी पहन कर जाएगेँ, ऊपर से गर्मी. अब आपको क्या पता कि ज्योतिषी ने आपको टोपी पहना दी है - वह भी कई हजार की. मूली सिरहाने रख कर भी देख ली होगी. पर राहु को आंच भी न आई. उपर से मूली की बदबू बर्दाश्त करनी पङ्ती है वह अलग. कभी गाजर, भिंडी, टिन्डे, शलगम आदि रख कर देखिए. क्या पता राहु को मूली पसन्द न हो ।


केतु :- कुते को रोटी देते ही होगेँ. अच्छी बात है बजाय पानी मे बहाने के, किसी का पेट भर जाता है. और काला कुता तो मोटा ताजा हो ही गया होगा तेल मे चुपङी हुई रोटी खा कर. 43 दिन बाद उस से पूछना न भूलें कि आपका केतु ठीक हुआ या नहीँ - आखिर केतु तो उसी ने ठीक करना है ।


इन उपायो को करने की आवश्यकता ही नहीँ है. पढ़ने मात्र से ही सब ग्रह अच्छे हो जाएगेँ. अगर दिमाग पर कुछ जोर डालेँ तो




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अपूर्ण आरक्षण में मानती हु की आरक्षण से sc/st वर्ग को बहुत लाभ प्राप्त हुआ हे। और वो आज समाज के हर...

अपूर्ण आरक्षण

में मानती हु की आरक्षण से sc/st वर्ग को बहुत लाभ प्राप्त हुआ हे। और वो आज समाज के हर वर्ग के साथ खड़ा रह कर अपने अधिकारो का उपयोग भी कर रहे हे। खास कर सरकारी नोकरियो और राजनीती के साथ साथ अन्य क्षेत्रो में आरक्षण के माध्यम से जबरन अपना आधिपत्य स्थापित करने में सफल रहे।

आरक्षण को स्वतंत्रता के पश्चात कुछ समय के लिए सामाजिक एकता और समानता को ध्यान में रखते हुए लागु किया गया था। परंतु अब ये नाशुर के रूप में हमारे समाज और देश में फेल चुका हे।

वर्तमान में ना सिर्फ इसके मायने बदल गए। बल्कि काफी हद तक एक खास तबका दूसरे तबके में बदले की भावन जेसे साफ साफ़ नजर आ रही हे। आज आरक्षण का मूल लाभ कमजोर और मजबूर जातिया ना उठा कर सक्तिशाली और संपन्न लोग उठा रहे हे। और गरीब आज भी गरीब हे। उसे दो वक़्त की रोटी तक नशीब नहीं होती हे। क्यू की उनको सिस्टम की जानकारी नही हे। कुछ जातियां जिनको आरक्षण से कोई लेना देना नहीं। चाहे वो सरकारी क्षेत्र हो या राजनेतिक ये जातिया आज भी अपने अस्तित्व को लेकर जुंझ रही हे। आज एक मेहनतकस इंसान के मुह का निवाला छिन कर उसे उसके अधिकारो से वंछित रखा जाता हे। और उसे एक ऐसे ईन्सान के अंदर काम करने को मजबूर किया जाता जो योग्यता में उससे कही कम हे। जिसके 90’/, हो वह मामूली मुलाजिम और 35-40’/, वाला ऑफिसर बन कर देश का क्या भला कर देंगे और इए कहा का न्याय हे। और इस तरह से कैसे समानता स्थापित की जा सकती हे। क्या इए पॉलिसी आज देश की तरक्की में बाधक नहीं हे? और क्या इए अन्याय नही हे?एक मेहनतकस विद्यार्थी के साथ। फिर समानता कहा रही। और इस प्रकार देश कैसे तरक्की करेगा? जो मूल रूप से उच्च पद के योग्य हे । और वो पूर्ण काबिलियत रखता हे। उस पद पर रहने की, परंतु उस स्थान पर एक ऐसे व्यक्ति को स्थापित कार दिया जाता हे। जो एक पियोंन के योग्य हे। इसका परिणाम क्या होगा, इये हम वर्तमान में देखा ही रहे हे। यही हाल राजनीति में भी हे। जिस जाती की जनसख्या अधिक हे। उसे ही राजनिति में बने रहने का अधिकार प्राप्त स्वत ही हो जाता हे बाकी की जातिया बेचारी अपने अस्तित्व को लेकर आज भि चिन्तितहे। ये घोर असमानता नहीं तो और क्या हे।

आज आरक्षण के आवरण तले योग्यता जाने कहा लुप्त हो गई हे। वर्तमान में समाज का वास्तविक ढांचा धूमिल होता नजर आ रहा हे। हर वो व्यक्ति जो आरक्षण का लाभ उठा सकता हे। वो ज़मीन से उठ कर आसमान की तरफ देखता हे। अच्छी बात हे। पर क्या ये पूर्ण न्याय हे मानवता के साथ। आज योग्यता सिर्फ वोट बैंक के रूप में पहचानी जाती हे। आज वो ही जाती विशेष राजनीती में अपने पावँ पसार पाती हे, जिसका जनबल अधिक हो। बाकि सब मुह ताकते रह जाते हे। क्या ये लोकतंत्र पर और उसके भविष्य पर प्रश्न चिन्ह नहीं हे? सही मायने में लोकतंत्र की पॉलिसी तभी सफल हो साकती हे। जब उस देश के सभी नागरिको के साथ सामान न्याय किया जाए। और उनकी योग्यतानुसार उनको उनके अधिकार दिए जाए। ना की जातिगत आधार पर। देश में समानता स्थापित करने के लिए हम को आरक्षण जातीगत आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर देने की आवशयक्ता हे। हा अगर आपको गरीबी मिटनी हे तो ऐसे परिवारो को चिन्हित करो जिसमे कमाने वाले नहीं हे और हे भी तो बेरोजगार हे। उनको रोजगार मुहैया करवाएं। ताकि देश की गरीबी कुछ हद तक कम हो। जरूरी नहीं की एक आरक्षित जाती विशेष ही। गरीबी की रेखा में आते हो। उच्च जातियो में भी आपको अत्यन्त गरीब मिल जायेंगे जिनको वास्तव में रोजगार की आवशयक्ता हे। परन्तु आपके आरक्षण के कारण योग्यता रखते हुए भी। वो पिछड़ रहे हे। और अयोग्य योग्यता ना होते हुए भी सरकारी तंत्र के मजे मार रहे हे।

एक तरफ तो सरकार कहती हे की जाति-पाती उच-नीच का भेद भाव मिटाना हे। और दूसरी तरफ आरक्षण देकर उनमे हीन भावना भर रही हे। की हां आप निम्नजाति के हे इसलिए आप उस पोस्ट पर आज हे। नहीं तो तुम मेरी जगह और में तुम्हारी जगह होता। ऐ वो अनकहे शब्द हे। जो ना केहते हुए भी मन में अंकुरित हो जाते हे। यहां से वैचारिक मतभेद उत्पन्न होना स्वाभाविक हे। जिसे कोई भी योजना नहीं भर सकती। क्यू की आप आरक्षण जाती और धर्म के आधार पर दे रहे हे। योग्यता के आधार पर नहीं। और वर्तमान में आपसी वेमनस्य का मूल कारण भी ये ही हे। और यही से हमारी सोच को लकवा मार जाता हे। और जाने अनजाने 16वी सताब्दी याद दिला जाता हे। जिसमे आरक्षण एक धर्म विशेष को दिया जाता था। और वर्तमान में जाती विशेष को। और इसी वजह से हम एक धर्म के होते हुए भी अनेको जातियो में स्वतः ही बट जाते हे। और और येही बटवारा हमारी एकता में सेंध लगा रहा हे। तो क्या। हमें तो आरक्षण चाहियें और लेकर रहेंगे चाहे इसके लिए दंगा फसाद या आंदोलन ही क्यू न करना पड़े शर्म आनी चाहिए ऐसी सोच पर। स्वाभिमानी बनो और अपनी मेहनत से। वो मुकाम हासिल करो जो आप करना चाहते हो। ना की आरक्षण की भीख के माध्यम से।




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Monday, March 23, 2015

एक बार तपस्वी से एक जिज्ञासु ने पूछा की स्वामी जी आपने आज तक यह नही बताया की मृत्यु के उपरान्त क्या...

एक बार तपस्वी से एक जिज्ञासु ने पूछा की स्वामी जी आपने आज तक यह नही बताया की मृत्यु के उपरान्त क्या होता है? उसकी बात सुनकर तपस्वी मुस्कुराये, फिर उन्होंने उससे पूछा, पहले मेरी एक बात का जवाब दो । अगर कोई व्यक्ति कही जा रहा हो और कही से आकर उसके शरीर में विषभुझा बाण घुस जाए तो उसे क्या करना चाइये? पहले शरीर में घुसे बाण को हटाना ठीक रहेगा या फिर देखना की बाण किधर से आया है और किसे लक्ष्य कर मारा गया है । जिज्ञासु व्यक्ति ने कहा पहले तो शरीर में घुसे बाण को तुरन्त निकालना चाइये, अन्यथा विष पुरे शरीर में फेल जाएगा…तपस्वी ने कहा, बिलकुल ठीक कहा तुमने, अब यह बताओ की पहले इस जीवन के दुखो के निवारण का उपाय किया जाए या मृत्यु के बाद की बातों के बारे में सोचा जाए .. जिज्ञासु व्यक्ति अब समझ चूका था और उसकी जिज्ञासा शांत हो गई । ऐसे ही सवाल आजकल के लोग करते है, इस जगत को कौन बनाया, किसलिए बनाया, यह जगत सिमित है या असीमित है, ईश्वर है या नही है , अगर इनके सवालो के जवाब उसे मिल जायेगे तो उनके दुःख दूर हो जायेगे इन उत्तरो से क्या पूछने वाले का विकाश सम्भव है क्या …

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Sunday, March 22, 2015

"नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः। जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।। कभी विना पूछे..."


नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः।

जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।।


कभी विना पूछे वा अन्याय से पूछने वाले को कि जो कपट से पूछता हो उस को उत्तर न देवे। उन के सामने बुद्धिमान् जड़ के समान रहें। हां! जो निष्कपट और जिज्ञासु हों उन को विना पूछे भी उपदेश करे।।




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याज्ञवल्क्य ने भी धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं: अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:। दानं...

याज्ञवल्क्य ने भी धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं:


अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।

दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।।

(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति)

…अब क्या आर्यो के अलावा इन्हें और कोई मानता है?, और मानता और पालन करता है तो वह बेशक आर्य है।




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आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए अपनाएं ये आयुर्वेदिक. - यूं तो शरीर का हर एक अंग महत्वपूर्ण होता है...

आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए अपनाएं ये आयुर्वेदिक. - यूं तो शरीर का हर एक अंग महत्वपूर्ण होता है लेकिन आंखों के बिना जीवन अधूरा लगता है। आयुर्वेद के ग्रंथों में नेत्र रक्षा के विभिन्न उपायों का वर्णन किया गया है। आइए जानते हैं उनके बारे में-


1. हरीतकी, बहेड़ा और आंवला का नियमित प्रयोग नेत्र ज्योति को बढ़ाता है। इन तीनों चूर्ण के मिश्रण की 3-6 ग्राम मात्रा रोजाना ली जा सकती है।

2. त्रिफला के क्वाथ से रोजाना आंखों को धोने से नेत्र रोग दूर होते हंै। त्रिफला क्वाथ को शहद या घी के साथ लेने से भी नेत्र रोगों में लाभ होता है। त्रिफला चूर्ण को एक भाग घी व तीन भाग शहद के साथ लेने से लाभ होता है।

3. रोजाना एक चम्मच शहद खाने से भी आंखों की रोशनी दुरूस्त रहती है। लेकिन ध्यान रहे कि शहद शुद्ध हो।

4. सुश्रुत संहिता के अनुसार रतौंधी यानी रात के अंधेपन के लिए अगस्त्य वृक्ष के फूल उपयोगी होते हैं। इन फूलों को पानी में भिगो दें कुछ देर बाद इन्हें मसलकर बंद आंखों पर रखें।

5. आंखों को स्वस्थ रखने के लिए मुंह में ठंडा पानी भरकर तीन बार आंखों पर पानी के छींटे डालें।

6. पांव के तलवों की रोजाना मालिश करने से भी आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए नारियल तेल या तिल का तेल फायदेमंद होता है।

7. तला हुआ भोजन आंखों को नुकसान पहुंचाता है, जबकि दूध में पका हुआ अन्न आंखों के लिए लाभकारी होता है। ठंडी खीर में शहद मिलाकर सुबह-सुबह खाने से आंखों की रोशनी दुरूस्त रहती है।

8. आंखों को सेहतमंद बनाए रखने के लिए देर रात भोजन करने से बचें और गरिष्ठ भोजन से भी परहेज करें।

9. भेषज रत्नावली ग्रंथ के अनुसार जौ का नियमित प्रयोग आंखों को ठीक रखता है। इसके लिए पांच किलो गेहूं के आटे में एक किलो जौ का प्रयोग किया जा सकता है।

10. मूंग की दाल भी नेत्र ज्योति को स्वस्थ बनाए रखती है।

11. शुद्ध घी को लोहे के बर्तन में रखना चाहिए। इस घी के प्रयोग से आंखों की रोशनी बनी रहती है। पुराने लेकिन श




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शरीर , विचार , और भाव सभी की उम्र होती है „, एक समय सभी को मरना होता है शरीर की उम्र पूरी...

शरीर , विचार , और भाव

सभी की उम्र होती है „,

एक समय

सभी को मरना होता है

शरीर की उम्र पूरी होने पर

” मृत्यु ” होती है

विचार की मृत्यु होने पर

” शांति ”

और

भाव की उम्र पूरी होने पर

” समाधि ” है-




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'सर्व धर्म समभाव' कहना ही गलत है, क्योंकि धर्म एक ही होता है। मत, सम्प्रदाय अनेक होते हैं। एक वैदिक...

'सर्व धर्म समभाव' कहना ही गलत है, क्योंकि धर्म एक ही होता है। मत, सम्प्रदाय अनेक होते हैं। एक वैदिक धर्म।




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जब तक हिन्दू ब्रह्ममहूर्त में उठकर गायत्री मंत्र के जप द्वारा ईश्वर का ध्यान नहीं करेगा, जब तक...

जब तक हिन्दू ब्रह्ममहूर्त में उठकर गायत्री मंत्र के जप द्वारा ईश्वर का ध्यान नहीं करेगा,



जब तक मंदिरों से अविद्वान, पाखण्डी,वाममार्गी व स्वार्थी पण्डितों को हटा कर वेदज्ञों को नियुक्त नहीं किया जाएगा,


जब तक मंदिरों को गुरुकुल,गोशाला व यज्ञशाला में न बदला जाएगा,


जब तक मूर्ति की जगह हवन कुण्ड न रखा जाएगा,


जब तक भागवत आदि अनार्ष ग्रन्थों की कथाओं को त्याग कर वेदमंत्रों की व्याख्या प्रारम्भ नहीं होगी,

•••••••••••••

•••••••••••••


तब तक हिंदुओं का कुछ नहीं होने वाला।हिन्दू अगर अपने आप को संगठित करना चाहते हैं,तो वाममार्ग अर्थात वेदविरुद्ध मार्ग को छोड़कर वेदों की ओर लौटना ही पडेगा।




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Friday, March 20, 2015

यस्य नाम महद्यशः ।। यजु०।। परमेश्वर का नाम बड़े यश अर्थात् धर्मयुक्त कामों का करना है। जैसे ब्रह्म,...

यस्य नाम महद्यशः ।। यजु०।।

परमेश्वर का नाम बड़े यश अर्थात् धर्मयुक्त कामों का करना है। जैसे ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर, न्यायकारी, दयालु, सर्वशक्तिमान् आदि नाम परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से हैं। जैसे ब्रह्म सब से बड़ा, परमेश्वर ईश्वरों का ईश्वर, ईश्वर सामर्थ्ययुक्त, न्यायकारी कभी अन्याय नहीं करता, दयालु सब पर कृपादृष्टि रखता, सर्वशक्तिमान् अपने सामर्थ्य ही से सब जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता, सहाय किसी का नहीं लेता। ब्रह्मा विविध जगत् के पदार्थों का बनानेहारा, विष्णु सब में व्यापक होकर रक्षा करता, महादेव सब देवों का देव, रुद्र प्रलय करनेहारा आदि नामों के अर्थों को अपने में धारण करे अर्थात् बड़े कामों से बड़ा हो, समर्थों में समर्थ हो, सामर्थ्यों को बढ़ाता जाय। अधर्म कभी न करे। सब पर दया रक्खे। सब प्रकार के साधनों को समर्थ करे। शिल्प विद्या से नाना प्रकार के पदार्थों को बनावे। सब संसार में अपने आत्मा के तुल्य सुख-दुःख समझे। सब की रक्षा करे। विद्वानों में विद्वान् होवे। दुष्ट कर्म और दुष्ट कर्म करने वालों को प्रयत्न से दण्ड और सज्जनों की रक्षा करे। इस प्रकार परमेश्वर के नामों का अर्थ जानकर परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुकूल अपने गुण, कर्म, स्वभाव को करते जाना ही परमेश्वर का नामस्मरण है।




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Thursday, March 19, 2015

शंका- ईश्वर सर्वत्र हैं,इसलिए उसकी मूर्ति बनाकर उसे नहीं पूजना चाहिए।H2O भी हवा में सर्वत्र है,तो...

शंका- ईश्वर सर्वत्र हैं,इसलिए उसकी मूर्ति बनाकर

उसे नहीं पूजना चाहिए।H2O भी हवा में

सर्वत्र है,तो फिर गिलास से पानी पीने

की क्या आवश्यकता है,पानी को हवा से

प्रत्यक्ष रूप से ही ग्रहण करो।

समाधान- गिलास से पानी पीना और हाथ से

पानी पीने के उदाहरण से इस मूर्खतापूर्ण

अपनी शंका को समझ लीजिये-

देखिये,जो चीजें मनुष्य

नहीं बना सकता,वो सब ईश्वर ने बनायी है।

मालूम हो कि तीन चीजें अनादि हैं-

आत्मा,परमात्मा,प्रकृति(जीव,परमात्मा,परमाणु)।

सभी जीव प्रकृति से चीजें

प्राप्त करता है।कोई भी चीज वह अपने

आप न तो बना सकता और न

ही प्रकृति की किसी चीज

को नष्ट कर सकता।इस बात की पुष्टि विज्ञान का

द्रव्य

की अविनाशिता वाला सिद्धांत भी करता है।

ईश्वर प्रदत्त चीजों का रूप बदलकर मनुष्य अपने

प्रयोग की चीजें बनाता है।मनुष्य अपने

द्वारा बनायी चीजों के प्रयोग के

बिना भी जीवित रह सकता है।जैसे आप

ईश्वर प्रदत्त हाथ से पानी पी सकते

हैं,क्योंकि मनुष्य खुद ईश्वर की एक

अनूठी कृति है।इसी प्रकार अन्य वस्तुएं

जो मनुष्य ने बनायी है।जैसे,मोटर

साइकिल,गाडी,ट्रेन,हवाई जहाज आदि वाहनों व

मोबाइल,घड़ी,केकुलेटर आदि सभी प्रकार

की चीजों बिना भी मनुष्य

जीवित रह सकता है।क्योंकि जितने

भी ईश्वर प्रदत्त माध्यम है,हम उनके ऊपर निर्भर

रहकर भी जीवित रह सकते हैं।विकास

धीरे-धीरे हुआ है,क्योंकि विकास एक सतत

और निरन्तर होने वाली प्रक्रिया है।

सृष्टि की शुरुआत में पानी पीने

के लिए गिलास नहीं था।लोग ईश्वर प्रदत्त बरसात के

पानी से,जो विभिन्न जगहों पर ऊंची-

नीची जमीन में होने वाले

गड्ढों में भरा रहता था।उसे अपने हाथों से पीकर

अपनी प्यास बुझा लेते थे।तब गिलास

तो था ही नहीं,अन्य विकास परक

चीजें भी नहीं थी।

गिलास आदि प्रयोग करने वाली चीजें हमने

विकास तेज करने के लिए बनाई हैं।कौन कहता है कि

मूर्ति,गिलास,सा

इकिल या किसी भी मेटेरियल में

परमात्मा नहीं है।होता है,क्योंकि वो सर्व्यापक है।

लेकिन हम ये कहते हैं कि वो इन

चीजों जैसा नहीं होता।भौतिक

चीजों के आकार का ईश्वर को माने तो वो साकार

हो जाएगा।

लेकिन ईश्वर तो निराकार है।जो लोग ईश्वर को

साकार कहते हैं

तो वो लोग वेदों की”न तस्य प्रतिमा अस्ति”

वाली बात को गलत साबित करके दिखाए।अगर गलत

सिद्ध

नहीं क्र सकते तो क्यों गिलास के उदाहरण से ईश्वर

को बदनाम करने पे लगो हो।ईश्वर की मूर्ति और

गिलास

जैसा बताने वाले लोग नास्तिक हैं,क्योंकि उन्हें ईश्वर

के बारे में

जानकारी नहीं है।जब प्राचीन

काल में गिलास आदि चीजें

नहीं थी,हम तब

भी जी लेते है।लेकिन ईश्वर तब

भी था,अब भी है और आगे

भी रहेगा,क्योंकि ईश्वर अनादि है।लोग उसे तब

भी महसूस करते थे।डरने की स्थिति में

डरते थे,हँसने की स्थिति में हंसते थे।उत्साहित व

दुखी भी होते थे।ये स्थितियां मनुष्य के अंदर

ईश्वरत्व विद्यमान होने से पैदा होती हैं।मनुष्यों के

साथ-साथ सभी जीवों में रहने

वाली इन स्थितियों के कारण ही मनुष्य लोग

ईश्वर को जानते-मानते आये हैं।

समस्त माध्यम ईश्वर प्रदत्त है।हमने क्या बनाया है?कुछ

भी नहीं।हमने उनका रूप बदलकर अपने

प्रयोग की चीजें

बनायी है,ताकि हम लगातार विकास करते रहें।अब उन

चीजों को ईश्वर जैसा बताकर उनका उपहास उड़ाना

है।

जो लोग मूर्ति पूजा को गिलास से पानी पीने के

द्वारा समझाते है।हमारा उनसे ये सवाल हैं कि प्रकृति

5 तत्वों से

मिलकर बनी है।इन पाँचों चीजों को स्वयं

बनाके दिखाओ।क्यों खाने पीने के लिए

गेंहू,चना,गन्ना

,मक्का आदि विभिन्न प्रकार की चीजें

धरती माता में उगाते हो?क्यों इन चीजों से

प्रोटीन,कैल्सियम,विटामिन कार्बोहाइड्रेट

आदि चीजें प्राप्त करते हो।ये भी प्रकृति में

सर्वत्र है।इनको प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करो।हम तो

प्रत्यक्ष

ग्रहण नहीं कर सकते।ये काम मूर्ति पूजा वाले करके

दिखाएँ।हाँ,हम इतना वादा जरूर कर सकते हैं कि हमने

प्रकृति से

पदार्थ लेकर विभिन्न प्रकार की जो चीजें

बनायी है,जब तक ईश्वर को साकार मानने वाले

कहेंगे,तब तक इनका प्रयोग किये बिना जीवित रह

लेंगे,चाहे इसका एफिडेविट ले लो।जिस प्रकार जीव-

जन्तु

ईश्वर प्रदत्त चीजें से अपना जीवन

निर्वाह कर लेते हैं ऐसे ही हम

भी जीकर दिखा देंगे।लेकिन ईश्वर को साकार

बताने वाले लोग प्रकृति से खाने-पीने चीजें

प्रत्यक्ष लेकर दिखाए।

बिना किये अगर कुछ मिलता,तो ईश्वर की सत्ता

कहाँ रह

जाती,कैसे सृष्टि चलेगी।कर्मफल के

सिद्धान्त का क्या होगा?इसको भी विस्तार से

समझाएं।




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धर्म और मजहब में अंतर क्या हैं? प्राय:अपने आपको प्रगतिशील कहने वाले लोग धर्म और मज़हब को एक ही समझते...

धर्म और मजहब में अंतर क्या हैं?

प्राय:अपने आपको प्रगतिशील कहने वाले लोग धर्म

और मज़हब को एक ही समझते हैं।

मज़हब अथवा मत-मतान्तर अथवा पंथ के अनेक अर्थ हैं

जैसे वह रास्ता जी स्वर्ग और ईश्वर प्राप्ति का हैं

और जोकि मज़हब के प्रवर्तक ने बताया हैं। अनेक जगहों

पर ईमान अर्थात विश्वास के अर्थों में भी आता हैं।

१. धर्म और मज़हब समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म

ईमान या विश्वास का प्राय: हैं।

२. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मज़हब विश्वासात्मक वस्तु

हैं।

३. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी

प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका

आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं। परन्तु मज़हब

मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक

हैं। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा

परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा

बनावती होने का प्रमाण हैं।

४. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह

सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी

सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता। मज़हब

अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा

ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और

सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के

अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना

हुआ हैं।

५. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये

सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मज़हबी अथवा

पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं

हैं। अर्थात जिस तरह तरह धर्म के साथ सदाचार का

नित्य सम्बन्ध हैं उस तरह मजहब के साथ सदाचार का

कोई सम्बन्ध नहीं हैं। क्यूंकि किसी भी मज़हब का

अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा

(सदाचारी) बन सकता हैं।

परन्तु आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस

वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब

तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास

नहीं लाता। जैसे की कोई कितना ही सच्चा ईश्वर

उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह

जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत

मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब

तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।

६. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म

अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही

मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का

अधिकारी बनता हैं। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व

पर्याय हैं। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व हैं।

कहा भी गया हैं-

खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म

मनुष्यों और पशुयों के एक समान हैं। केवल धर्म ही

मनुष्यों में विशेष हैं जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं।

धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान हैं। परन्तु मज़हब मनुष्य

को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी

बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन

से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा

मुस्लमान बनता हैं नाकि सदाचारी या धर्मात्मा

बनता हैं।

७. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं

और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा

सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं परन्तु मज़हब

मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी

बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए

सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की

मान्यताओं का पालन बतलाता हैं।

जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम

पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी

व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान

चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न

हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा

क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना

विश्वासनहीं लाया हैं।

८. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं

क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं

अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं।

परन्तु मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना

अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार

टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य हैं।

९. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता हैं क्यूंकि वह

ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष

प्राप्ति की शिक्षा देता हैं परन्तु मज़हब मनुष्य को

आलस्य का पाठ सिखाता हैं क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों

मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें

सिखाया जाता हैं।

१०. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर

मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता हैं

क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी भी

मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता। परन्तु

मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता

हैं क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के

बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता।

११. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने

प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि

मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की

प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश

देता हैं।

१२. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना

सिखाता हैं जबकि मज़हब मनुष्य को प्राणियों का

माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता हैं।

१३. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक

प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों

द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध

को मिटाता हैं तथा एकता का पाठ पढ़ाता हैं।

परन्तु मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के

कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और

विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते हैं।

१४. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता हैं जबकि

मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य आदि की

पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं।

धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर

मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार

करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में

पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में

सभी का कल्याण हैं।




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Wednesday, March 18, 2015

🎯 पौराणिकों के कारण हमें 3 बार की ग़ुलामी हमें झेलनी पड़ी- 1.मुगलों 2.अंग्रेजो और,...

🎯 पौराणिकों के कारण हमें 3 बार की ग़ुलामी हमें झेलनी पड़ी-

1.मुगलों

2.अंग्रेजो

और, अब…

3.धर्मनिरपेक्षता की।




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Hinduism News हमारी प्रिय बहन फरहाना ताज मधु जी कासिम रिजवी की प्रपौत्री हैं । कासिम रिजवी हैदराबाद...

Hinduism News


हमारी प्रिय बहन फरहाना ताज मधु जी कासिम रिजवी

की प्रपौत्री हैं । कासिम रिजवी हैदराबाद निजाम को

बंधक बनाकर खुद शासक बनना चाहते थे, और रजाकारों के

मुखिया और हैदराबाद के पीएम भी थे । बहन फरहाना जी

इस्लाम त्याग कर सनातन धर्म में लौटी हैं । आप एक उत्कृष्ट

वेदिक विद्वान हैं और लेखिका हैं । इनके एक लेख ’ वेद की

ओर लौटो’ की चन्द पंक्तियाँ नीचे पेश कर रहा हूँ । आप

सभी , खासतौर पर अपने बिछुडे मुसलमान भाइयों , से

निवेदन है कि इनसे जुडें और सत्य सनातन वेदिक धर्म में अपना

खोया हुआ गौरवशाली स्थान पुन: प्राप्त करें ।

’ मेरी बेटी नानी को आज कहती है नानी तेरी कूरान को

काले चोर ले गये, बाकी जो बचा था उसे पढ हम बोर हो

गये।’

- फरहाना ताज मधु forward by आरय कांतिलाल भुज करछ




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परमपिता की उपासना यज्ञ संध्या से नित्य करना चाहिए, पाखंडों को त्याग कर धर्म को अपनाते हुए वेद पथ पर...

परमपिता की उपासना यज्ञ संध्या से नित्य करना चाहिए, पाखंडों को त्याग कर धर्म को अपनाते हुए वेद पथ पर चलना ही मानव मात्र के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए, यदि सम्पूर्ण मानव प्रजाति इस बात को समझते हुए वेद मार्ग पर चल निकले तो सम्पूर्ण विश्व को आर्यवर्त बनने में समय नहीं लगेगा


अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों को वेदों से जुड़ने को कहे क्यूंकि यही ईश्वर का ज्ञान है अन्य ग्रन्थ मनुष्यकृत है,


परमेश्वर की उपासना से सभी के दुखों का निवारण हो सकता है अर्थात सुख प्राप्ति के लिए कर्म तो करना पड़ेगा परन्तु उस कर्म की सम्पूर्णता के लिए ईश्वर की उपासना करनी योग्य है, इसलिए कर्म करें बीमारियों के उपचार के लिए औषधियां दें और उनसे उत्तम फल प्राप्ति के लिए ईश्वर की उपासना करें और फल प्राप्ति के पश्चात उस परम पिता परमात्मा को धन्यवाद दें


यजुर्वेद ३-५९ (3-59)


भे॑ष॒जम॑सि भेष॒जङ्गवे श्वा॑य॒ पुरु॑षाय भेष॒जम् । सु॒खम्मे॒षाय॑ मेष्यै ॥३-५९॥


भावार्थ:- परमेश्वर की उपासना के बिना किसी मनुष्य का शरीर, आत्मा और प्रजा का दुःख दूर होकर सुख नहीं हो सकता, इससे उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना आदि के करने और औषधियों के सेवन से शरीर, आत्मा, पुत्र, मित्र और पशु आदि के दुःखों को यत्न से निवृत्त करके सुखों को सिद्ध करना उचित है।।


वेदों की ओर लौटिये यही सत्य ज्ञान है


पण्डित लेखराम वैदिक मिशन ने आप लोगों की सेवा में कुछ वेबसाइट बनाई है जिससे आप साहित्य आदि निःशुल्क डाउनलोड कर सकते है,


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एक वेबसाइट है जो वेद का सर्च इंजन है, जहाँ जाकर वेद मन्त्र संख्या से या शब्द से उसे चुटकियों में खोज सकते है


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ईश्वर आज्ञा से विपरीत चलने वाले मनुष्य दुखों के अम्बार लगाये बैठे रहते है, और विश्वास कीजिये...

ईश्वर आज्ञा से विपरीत चलने वाले मनुष्य दुखों के अम्बार लगाये बैठे रहते है, और विश्वास कीजिये वेदविरुद्ध कार्य करने वाले लोग इन दुखों से कभी बाहर नहीं निकल सकते


आज का वातावरण ऐसा है की लोग यज्ञ संध्या आदि को त्याग कर पाषण पूजा में लगे है, वेदों का ज्ञान रति भर नहीं है, ना लेना चाहते है, हर कोई पैसों के पीछे दोड़ रहा है, यहाँ तक की धर्म को भी व्यापार बना दिया है, धर्म रक्षक संस्थाए भी भवन निर्माण और पुस्तक व्यापार मात्र में लगी है, विद्वान निर्माण से उनका कोई सरोकार नहीं रहा


मनुष्यों को चाहिए की जो विद्वान उपलब्ध है उन विद्वानों की संगती में रहे, और नित्य यज्ञ, संध्या करें जिससे दुखों का नाश हो और जीवन सुखमय बने क्यूंकि जिस प्रकार आप नित्य माता पिता का आशीर्वाद लेकर कार्य करते है क्यूंकि आपमें यह विशवास है की उनके आशीर्वाद से कार्य सिद्ध होगा उसी प्रकार उस जगतपिता का आशीर्वाद यज्ञ संध्या करके जरुर लें क्यूंकि उसकी उपासना बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता यही सार्वभौमिक सत्य है जिसे स्वीकार करना ही होगा


यजुर्वेद ३-५८ (3-58)


अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒ह्यव॑ दे॒वन्त्र्य॑म्बकम् । यथा॑ नो॒ वस्य॑स॒स्कर॒द्यद्यथा॑ नः॒ श्रेय॑स॒स्कर॒द्यद्यथा॑ नो व्यवसा॒यया॑त् ॥३-५८॥


भावार्थ:- कोई भी मनुष्य ईश्वर की उपासना वा प्रार्थना के बिना सब दुःखों के अन्त को नहीं प्राप्त हो सकता, क्योंकि वही परमेश्वर सब सुखपूर्वक निवास वा उत्तम-उत्तम सत्य निश्चयों को कराता है। इससे जैसी उसकी आज्ञा है, उसका पालन वैसा ही सब मनुष्यों को करना योग्य है।।


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Amit Aarya ईश्वर आज्ञा से विपरीत चलने वाले मनुष्य दुखों के अम्बार लगाये बैठे रहते है, और विश्वास...

Amit Aarya


ईश्वर आज्ञा से विपरीत चलने वाले मनुष्य दुखों के अम्बार

लगाये बैठे रहते है, और विश्वास कीजिये वेदविरुद्ध कार्य करने

वाले लोग इन दुखों से कभी बाहर नहीं निकल

सकते

आज का वातावरण ऐसा है की लोग यज्ञ संध्या आदि को त्याग

कर पाषण पूजा में लगे है, वेदों का ज्ञान रति भर नहीं है, ना

लेना चाहते है, हर कोई पैसों के पीछे दोड़ रहा है, यहाँ तक

की धर्म को भी व्यापार बना दिया है, धर्म रक्षक

संस्थाए भी भवन निर्माण और पुस्तक व्यापार मात्र में

लगी है, विद्वान निर्माण से उनका कोई सरोकार नहीं

रहा

मनुष्यों को चाहिए की जो विद्वान उपलब्ध है उन विद्वानों

की संगती में रहे, और नित्य यज्ञ, संध्या करें

जिससे दुखों का नाश हो और जीवन सुखमय बने क्यूंकि जिस

प्रकार आप नित्य माता पिता का आशीर्वाद लेकर कार्य करते है

क्यूंकि आपमें यह विशवास है की उनके आशीर्वाद

से कार्य सिद्ध होगा उसी प्रकार उस जगतपिता का

आशीर्वाद यज्ञ संध्या करके जरुर लें क्यूंकि

उसकी उपासना बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो

सकता यही सार्वभौमिक सत्य है जिसे स्वीकार

करना ही होगा

यजुर्वेद ३-५८ (3-58)

अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒ह्यव॑ दे॒वन्त्र्य॑म्बकम् । यथा॑ नो॒ वस्य॑स॒स्कर॒द्य

द्यथा॑ नः॒ श्रेय॑स॒स्कर॒द्यद्यथा॑ नो व्यवसा॒यया॑त् ॥३-५८॥

भावार्थ:- कोई भी मनुष्य ईश्वर की उपासना वा

प्रार्थना के बिना सब दुःखों के अन्त को नहीं प्राप्त हो सकता,

क्योंकि वही परमेश्वर सब सुखपूर्वक निवास वा उत्तम-उत्तम

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