Thursday, January 14, 2016

आर्य सन्यासी एवं महान दर्शनाचार्य- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी का जीव ब्रह्म का अंश नहीं है पर...

आर्य सन्यासी एवं महान दर्शनाचार्य- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी का जीव ब्रह्म का अंश नहीं है पर प्रवचन का कुछ अंश….अवश्य श्रवण करें
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-डा मुमुक्षु आर्य

अद्वैतमत खण्डन ( जीव ब्रह्म का अंश नहीं) –भाग २

जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति– ये तीन तत्व नित्य हैं, शाश्वत हैं ,eternal हैं- न इनका आदि है; न अंत है। न इनको कोई पैदा करने वाला है, न मारने वाला है। ये हमेशा से है; अब भी हैं और आगे भी रहेगें। विज्ञान भी कहता है- matter can neither be created nor can be destroyed by any physical or chemical means अर्थात प्रकृति (matter) को किसी भी भौतिक व रासायनिक क्रिया द्वारा न तो बनाआ जा सकता है और न ही बिगाडा जा सकता है अर्थात वह अनादि है- जैसे प्रकृति अनादि है वैसे ही आत्मा व परमात्मा भी अनादि हैं | इस प्रकृति में अपनी कोई चेतन शक्ति नहीं है। यह तो जगत निर्माण में साजो-सामान रूपी उपकरण का कार्य करती है, उसका उपादान कारण है जबकि परमेश्वर सृष्टि का निमित्त कारण है।
ईश्वर जीव प्रकृति-ये तीन तत्व अनादि हैं- यही वैज्ञानिक व वेदानुकूल त्रैतवाद का सिद्धान्त है | प्रकृति व प्रकृति से बने सब पदार्थों में जो शक्ति व गति दिखाई दे रही है वह सब ब्रह्मा अर्थात परमात्मा की ही दी हुई है- इसके लिए एक बहुत अच्छा उदारहण हमारे उपनिषदों में आया है।। कहते हैँ कि एक बार असुरों और देवताओं में युद्ध छिड़ गया; जिसमें देवताओं की विजय हुई।। और वे देवता अभिमान वश होकर कहने लगें कि हमनें असुरों को हराया है।। उनके इस अहंकार को परमेश्वर ने पहचान लिया; क्योंकि उससे तो कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। तो वह परमेश्वर एक यक्ष का रूप लेकर उनसे कुछ दूरी पर जाकर खड़ा हो गया। तब देवताओं का राजा इंद्र अग्निदेव को कहता है कि उसके पास जाओ और पता करो कि ये कौन है? अग्निदेव उस यक्ष के पास दौड़ कर जाता है । जैसे ही वहाँ पहुँचता है तो यक्ष उससे परिचय जानकर कहता है कि तुम अग्नि देव में क्या सामर्थ्य है; तुम क्या कर सकते हो ? अग्नि देव ने कहा कि मैं पल भर में सब कुछ जला कर भस्म कर सकता हूँ। यक्ष कहता है कि ; अच्छा! ये सुखा तिनका जला कर दिखाओ। अग्निदेव ने अपना सारा बल लगाया पर उस सूखे तिनके को जला न सका। वह घबरा गया, दौड़ कर वापिस इंद्र देवता के पास गया और कहा,“ मैं उसको जान नही सका; उसने तो मेरा सारा बल ही हर लिया। इसी प्रकार वायु देवता ने सारा बल लगा दिया; परन्तु एक सूखे तिनके को उड़ा न सका; उसका भी बल उस यक्ष ने हर लिया। अंत में उमा देवी ने इन देवताओं को बताया कि तुम अपनी जीत में अंहकार वश अपना बल देख रहे थे; यह बल किसका है-यह बताने के लिए स्वयं प्रभु एक यक्ष का रूप लेकर तुम्हारे सामने आये थे। अर्थात ये जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य आदि व ब्रह्माण्ड सब कुछ जो हमें कार्य करते नज़र आ रहे है; ये इनका अपना बल नहीं है; यह सब प्रभु की शक्ति लेकर ही नियमानुसार कार्य कर रहे हैं।
इसी प्रकार हमारा ये स्थूल शरीर ही मरता है; इसमें रहने वाली आत्मा कभी मरती नहीं है।। इस मरणशील शरीर में रहते हुए अमर आत्मा को अमर परमात्मा में रमण कराना ही उस परमेश्वर की "उपासना” है, पूजा है; क्योंकि वह परमात्मा कण-कण में विराजमान है। परन्तु उसे हम इन नंगी आँखों से नही देख सकते। प्रकृति का स्थूल रूप तो देख सकते है; पर उसमें व स्थूल शरीर में विचरने वाली चेतन-शक्ति को नहीं देख सकते।। तो फिर उस चेतन- शक्ति को देखने के लिए हम अष्टांग योग के अभ्यास द्वारा अपनी इन्द्रियों, मन, बुद्धि की गति को आंतरिक करते हैं और इस शरीर को चलाने वाली चेतन-शक्ति का मस्तिष्क या हृदयदेश में साक्षात् दर्शन करते हैं और कह उठते हैं कि,“उपासना योग के अभ्यास में हम मरणशील मनुष्य उस अमर– कभी न मरने वाले परमेश्वर की ही पूजा करते है; जो परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य के अंदर यजनीय है पूज्यनीय है।”

,“आज के अद्वैतवादी नवीन वेदान्ती वेद के कपोल-कल्पित अर्थ निकाल कर जगत की हानि कर रहे हैं तथा मनुष्यों को हठ- अभिमान आदि दोषों में डाल कर उन्हें दुःख सागर में डूबा देते हैं। अज्ञानी लोग इनके उपदेश जाल में फंस के क्लेश पाते हैं। बन्धनों में बंधे रहते है। ये क्या मानते हैं-
1. जीव को ही ब्रह्म मानते हैं !
2. स्वयं पाप करें और कहें कि हम अकर्ता हैं !
3. जगत को मिथ्या बताते हैं !
4. मोक्ष में जीव का लय मानते हैं !

इनकी ये सब बातें गलत हैं कपोल कल्पित हैं-

समीक्षा – जीव ही ब्रह्मा है –इसके लिए यह इस वाक्य का प्रमाण देते हैं कि,” प्रज्ञानमानंदम ब्रह्म"— इसको ऋग्वेद का वाक्य कहते हैं। परन्तु ऋग्वेद के आठों अष्टकों में यह वाक्य कहीँ भी नहीं है। किन्तु ऋग्वेद का व्याख्यान “ऐतरेय ब्राह्मण” में यह वाक्य है। उसमें ऐसा पाठ है ,“ प्रज्ञानं ब्रह्म”-अर्थात जिसमें प्रकृष्ट सर्वोत्तम अनन्त ज्ञान है; वह “प्रज्ञान” कहलाता है। -अर्थात जिसको कभी भी अविद्या अज्ञान का अंधकार से लेशमात्र का भी सम्बन्ध नहीं होता; न हुआ और न होगा। “ब्रह्म”-जो सबसे वृद्ध (बड़ा) है और सब जगत को बढ़ाने वाला है; स्वभक्तों को अनन्त मोक्ष सुख से अनन्त आनंद में बढ़ाने वाला है तथा बड़े सुख का देने वाला है— अतः “ब्रह्म” नाम परमात्मा का है। क्योंकि यही परमात्मा का स्वभाव और स्वरूप है। (अतः जीव कभी भी इन लक्षणों वाला नहीं हो सकता)- नवीन वेदान्तियों ने इस वाक्य का नाम “महावाक्य” रखा है। जो अप्रमाण है। क्योंकि किसी ऋषि कृत ग्रन्थ में इसका “महावाक्य” नाम नहीं लिखा है।
,“अहं ब्रह्मास्मि”–वेदान्ती लोग इसका अर्थ करते हैं कि ,“मैं ब्रह्म हूँ” अर्थात भ्रान्ति से मैं जीव बना था; सो अब मैंने जान लिया कि मैं तो साक्षात् ब्रह्म हूँ-यह अनर्थ है, यह अर्थ इनका बिलकुल खोटा है।। क्योंकि पहले के ग्रन्थ का सम्बन्ध देखें बिना चोर की तरह बीच में से एक टुकड़ा लेके अपना मतलब सिद्ध करके अपनी स्वार्थ पूर्ति की है।। देखो इस वचन का पूर्व का सम्बन्ध इस प्रकार है:-,“शतपथ ब्राह्मण: कांड 14: प्रपाठक 3: ब्राह्मण2: कण्डिका 18से 22,” अर्थ,“ सब जीव "परमेश्वर” की उपासना करें और किसी की नहीं। क्योंकि सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी जो परब्रह्म है; वह सबसे प्रियस्वरूप है-अर्थात सबसे प्रिय इस परमेश्वर को जानना। पुत्र, धन तथा सब जगत के सत्य पदार्थो से वही ब्रह्म (परमेश्वर) प्रियतर है।(सबसे प्रिय है) तथा अन्तरतर आत्मा का अंतर्यामी परमात्मा है; जोकि अपने सबों का आत्मा है। जो कोई इस आत्मा से अन्य को प्रिय कहता है उसके प्रति यह कहे कि,“ परमात्मा से अन्य को तू प्रिय बतलाता है सो तू दुःख के सागर में गिर के सदा रोवेगा और जो कोई परमात्मा को छोड़ के अन्य की उपासना व प्रीति करेगा; सो सदा रोवेगा और जो पत्थर आदि जड़ पदार्थो की उपासना करेगा; सो रोवेगा।

हे मनुष्यों! वह परमेश्वर एक ही है। दो नहीँ है। यह जो हमारे शास्त्र- पुराणों आदि में अनेक परमेश्वर का वर्णन आता है; वह अनेक नहीँ है; एक ही है। मनुष्यों ने उस परमेश्वर की अनेक शक्तियों को देख कर; अनुभूत करके उसके अनेक नाम रख दिए। परमात्मा तो एक ही है; उसकी शक्तियों के अनुसार ऋषियों ने साधारण बुद्धि के मनुष्यों को समझाने के लिए अलग-अलग नाम रख दीये।। और उन साधारण बुद्धि के लोगों ने उन नामों के प्रतीक(मूर्ति) बना कर पूजा करनी शुरू कर दी; जो कि उनकी अज्ञानता ही है। परमात्मा अलग-अलग नहीं है; वह एक ही है। जैसे परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि व जीवों के सर्जन का कार्य करती है-मनुष्यों ने इस शक्ति का नाम "ब्रह्मा” रख दिया और उसका प्रतीक बना कर उसकी पूजा करने लगे। परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि-जीवों का पालन- पोषण करती है। मनुष्यों ने इस शक्ति का नाम “विष्णु” रख दिया; और उसका प्रतीक (मूर्ति) बना कर उसकी पूजा करने लगे। परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि-जीवों के शरीरों का नाश करने का कार्य करती है। मनुष्यों ने उसका नाम “शिव” रख दिया। और प्रतीक बना कर पूजा करने लगे। परमेश्वर की मानसिक शक्ति को “इंद्र” नाम देकर पूजने लगे और सब देवताओं का सरदार कहने लगे। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रह आदि सबमें परमात्मा की शक्ति है; परन्तु इनको इनके गुण-कर्म की शक्ति से जानने लगे। जबकि परमात्मा एक ही है; उसके गुण-कर्म शक्तियों के अनुसार उस एक ही परमात्मा के नाम अलग हो गए है। यह एक परमात्मा ही सभी जीव-जगत का सर्वदृष्टा है। वह सभी को हर क्षण देखता रहता है और वह सर्वशक्तिमान है। यह सब जीव-जगत-मनुष्य आदि मिल कर एक हो जाये तो भी उसकी एक शक्ति का भी मुकाबला नहीं कर सकते।। वह सबका सर्वद्रष्टा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही सबका पालक हुआ है। उसको पता है कि किस समय किसको क्या देना है; क्या नहीं देना है। उसके बिना इस जगत में एक पत्ता भी नहीं हिलता है। हे मनुष्यों! ऐसे परमेश्वर को तुम अपने शरीर के अंदर “अष्टांग योग ” अभ्यास से हृदयदेश में साक्षात देख- वहाँ उसकी ही स्तुति; उपासना कर


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🔴मकर संक्रांति का महत्व🔴 भारतीय संस्कृति में सूर्य का बड़ा महत्व है | सूर्य हमारे वैदिक देवता हैं |...

🔴मकर संक्रांति का महत्व🔴
भारतीय संस्कृति में सूर्य का बड़ा महत्व है | सूर्य हमारे वैदिक देवता हैं | सूर्यदेव के बारे में वेद में कहा गया हे “सूर्य आत्मा जगत:” अर्थात सूर्य विश्व का आत्मा है | ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है| मेष आदि १२ राशियाँ है | हर राशि में सूर्य एक माह तक
रहते हैं | जब सभी १२ राशियों का परिभ्रमण समाप्त होता है तब एक संवत्सर यानी वर्ष समाप्त होता है| काल गणना का विस्तृत विज्ञानं हमारे भारतीय ग्रंथो में वर्णित है |जिसके अनुसार अहोरात्र का एक दिन, सात दिन का सप्ताह,दो सप्ताह का एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण इन दो पक्षों का एक मास, दो मास की एक ऋतु,तीन ऋतुओ का एक अयन और दो आयनो का एक वर्ष होता है | जब
सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब से ६ महीने उत्तरायण के महीने होते हैं | जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते हैं तब से ६ महीने दक्षिणायन|

🔴उत्तरायण का वैशिष्ट्य🔴
उत्तरायण के समय में दिन बड़े, आकाश स्वच्छ और सूर्य की किरणे स्पष्ट,तीव्र एवं सीधी होती हैं | प्रकृति के विकास के लिए यह समय उत्कृष्ट समय माना गया है | इसी समय में ऋतुओं के राजा वसंत का आगमन होता है | अतः उत्तरायण का काल शुभ माना जाता है | कृषिप्रधान हमारे भारत में इस काल में धान और फसल को कटा जाता है |“ उत्तरम् अयनम् अतीत्य व्यावृत्तः क्षेम सस्य वृद्धिकरः |” उत्तरायण का सूर्य क्षेम एवं धान्य वृद्धि करानेवाला होता है |

🔴संक्रांति का अर्थ🔴
जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तब उस पुण्य काल को संक्रांति कहते हैं | वैसे तो हर महीने संक्रांति होती है और हर संक्रांति महत्वपूर्ण है परन्तु जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है | भारत के विभिन्न क्षेत्रो में विभिन्न नामों से इस पर्व को मनाया जाता है | हम सूर्य और अग्नि की उपासना को अधिक महत्व देते हैं | अतः यज्ञ और सूर्य की उपासना करना हमारा कर्त्तव्य है | मानव धर्म के प्रणेता मनु ने कहा है जो आहुति हम अग्नि में स्वाहाकार द्वारा प्रदान करते हैं वह सूर्य को प्राप्त होती है सूर्य वह स्वीकार कर वृष्टि कर रूप में हमें वापस देते हैं उसी से अन्न उत्पन्न होता है और उससे प्रजा की निर्मिति होती है | “अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् आदित्यमुपतिष्ठते | आदित्यात् जायते वृष्टिः ततः अन्नम् ततः प्रजाः||"  श्रीमद् भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है "अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्न संभव| यज्ञाद् भवति पर्जन्यः यज्ञ कर्म समुद्भवः||” यज्ञ करना हमारा कर्त्तव्य है अतः मकर संक्रांति के दिन यज्ञ करना शुभ और हितावह माना गया है |

🔴प्रकृति की चेतावनी🔴
इस वर्ष यानि २०१६ में मकर संक्रांति १५ जनवरी को है | प्रकृति में आ रहे परिवर्तन और हमारे द्वारा फैलाये जा रहे प्रदुषण के कारण ग्लोबल वॉर्मिंग से पृथ्वी और सूर्य की कक्षा में जो अंतर निर्माण हो रहा है उसी के कारण जो संक्रांति प्रतिवर्ष १४ तारीख को होती थी इस वर्ष से अब हर साल १५ को ही होगी | शास्त्रो की गणना के अनुसार आनेवाले ८२ वर्ष तक मकर संक्रांति १५ जनवरी को होगी और उसके बाद १६ जनवरी को हो जाएगी | यदि हम सावधान नहीं हुए तो
स्थिति और गंभीर होती जाएगी | हमारी वैदिक प्रार्थना है की “काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी सस्य शालिनी….” समय पर ही बारिश हो और पृथ्वी धान्य से भर जाए | परन्तु सिर्फ वर्षा ऋतु के दौरान ही नहीं अब तो कभी भी बारिश हो जाती है | पिछले दो वर्षो का अवलोकन करें तो पता चलेगा की हर महीने बारिश होती है | इससे कितना नुक्सान होता है यहाँ बताना अनिवार्य नहीं है | यदि हम प्रकृति के उपकार का बदला लौटाना चाहते हैं तो एक मात्र उपाय है यज्ञ |

🔴मकर संक्रांति को क्या करना चाहिए🔴

इस वर्ष मकर संक्रांति १५ जनवरी २०१६ को है | इस दिन यथाशक्ति
वस्त्र,अन्न,बर्तन,तिल,घी,गुड,सुवर्ण,घोड़े,गाय या गौचारे का दान करना
चाहिए |हो सके उतना अधिक समय जप अनुष्ठान करना चाहिए | यज्ञ करना अति श्रेष्ठ पर्याय है | अच्छे विचार करना और लोगो से अच्छा व्यव्हार करना तथा पुरे वर्ष के लिए किसी अच्छी प्रवृत्ति या नियम का संकल्प लेना | शास्त्र अभ्यास या गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की शुरुआत करना |
🌹🌻🌺🍀🌸💐🌷


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मकर संक्रांति की आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाएं💐💐💐 १ माघ 14 जनवरी 2016 😶 “ हम...

मकर संक्रांति की आप सभी को हार्दिक शुभ कामनाएं💐💐💐

१ माघ 14 जनवरी 2016

😶 “ हम तेरे हो गये ! ” 🌞

🔥🔥 ओ३म् वयं घा ते त्वे इद्विन्द्र विप्रा अपि ष्मसि । 🔥🔥
🍃🍂 नहि त्वदन्य: पुरुहूत कश्चन मघवत्रस्ति मर्डिता ।। 🍂🍃

ऋक्० ८ । ६६ । १३

ऋषि:- कलि: प्रागाथ: ।। देवता- इन्द्र: ।। छन्द:- विराड्बृहती ।।

शब्दार्थ- हे परमेश्वर!
हम निश्चय से तेरे हैं और मुझमें, तेरे आश्रय से ही हम ज्ञानी, विप्र भी होवें।हे बहुतों से पुकारे गये! हे ऐश्वर्यवाले! तुझसे अन्य कोई सुख देनेवाला निश्चय से नहीं है।

विनय:- हे परमेश्वर!
हम तेरे हैं, निश्चय से तेरे हैं। हम सोच-समझकर तेरे हो चुके हैं, अपने-आपको तुझे समर्पित कर चुके हैं और अब तुझमें ही रहना चाहते हैं, तुझमें ही अपना सब आत्मविकास पाना चाहते हैं। ज्ञानी, विप्र भी हम तुझमें, तेरे आश्रय से ही होना चाहते हैं। वह ज्ञान तो नहीं है, निरा अज्ञान है, जो तेरे आश्रय से उत्पन्न नहीं हुआ है। ऐसी विप्रता को, ऐसी पण्डिताई को हम क्या करेंगे, जो हमें तुझसे दूर करनेवाली हो? उससे तो मूर्खता भली है। हमें पण्डित कहलाने की, ब्राह्मण कहलाने की, विद्वान कहलाने की तनिक भी इच्छा नहीं है, यदि यह तुझसे दूर हटने से मिलती हो। हम तो संसार के प्रत्येक ज्ञान में, प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक बात में पहले यह देख लेते हैं कि उसमें तेरा अवलम्बन है या नहीं। जिसमें तेरा अवलम्बन, तेरा निवास नहीं होता उससे हमारा कुछ भी मतलब नहीं रहता, फिर वह वस्तु इस संसार मे चाहे बड़े-से-बड़ा धन हो, बड़ी-से-बड़ी सेना हो, बड़े-से-बड़ा साम्राज्य हो। हमारे लिए यह सब नि:स्सार है, क्योंकि हमने खूब अच्छी प्रकार जान लिया है कि इस संसार में तेरे सिवाय और कहीं सुख नहीं है, तेरे सिवाय इस संसार में और कोई सुख देनेवाला नहीं है, दे सकनेवाला ही नहीं है। हमने संसार की एक-एक वस्तु को परख-परखकर देख लिया है कि जहाँ तू नहीं है वहाँ कहीं भी सुख नहीं है तो हे पुरुहूत! हे सदा सबसे बहुत बार पुकारे गये प्रभो! तुझे छोड़कर हम और कहाँ जाएँ? हम तो इसलिए हे मघवन! तेरे होकर शान्त हो गये हैं। तेरे हो गये हैं, पूरी तरह तेरे हो गये हैं।

🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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Wednesday, January 13, 2016

लोहड़ी पर्व की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं💐💐 २९ पौष 13 जनवरी 2016 😶 “ सच्चा...

लोहड़ी पर्व की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं💐💐

२९ पौष 13 जनवरी 2016

😶 “ सच्चा पिता ! ” 🌞

🔥🔥 ओ३म् मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्य: स्तोतारं ते शतक्रतो । 🔥🔥
🍃🍂 सकृत् सु नो मघवत्रिन्द्र मृळयाधा पितेव नो भव ।। 🍂🍃

ऋक्० १० । ३३ । ३

ऋषि:- कवष ऐलूष: ।। देवता- इन्द्र: ।। छन्द:- शक्वरी ।।

शब्दार्थ- हे बहुत कर्मवाले! तेरे स्तोता होते हुए भी मुझको मानसिक पीड़ाएँ विविध प्रकार से खा रही हैं जैसे चूहे आटे से स्नान कराये गये, पान किये हुए सूत को खाते हैं। हे ऐश्वर्यवाले! हे इन्द्र! तू हमें एक बार अच्छी प्रकार सुखी कर दे और हमारा पिता की तरह रक्षक हो जा।

विनय:- मैं तेरा स्तोता हूँ, तेरा सन्ध्या-वन्दन करनेवाला हूँ, तेरा हवन-पूजन करनेवाला हूँ। तो भी, हे शतक्रतो! मुझे ये आधियाँ, ये मानसिक पीड़ाएँ खाये जा रही हैं। जैसे पान चढ़ाये गये, आटे से स्नान कराये गये सूत को चूहे काटने लगते हैं, सब तरह से चिपटकर खाने लगते हैं, उसी तरह ये मानसिक पीड़ाएँ मुझे नाना तरह से सता रही हैं, खाये जा रही हैं। अपूर्ण रहती हुई मेरी अनगिनत कामनाएँ मुझे काट रही हैं, काम-क्रोध-लोभ मुझमें उछल रहे हैं, राग-द्वेष मुझे पीड़ित कर रहे हैं, नाना मोह मुझे दबा रहे हैं, भयंकर भी मुझे व्यथित कर रहे हैं, मद-मत्सर मुझे मार रहे हैं, विविध चिन्ताएँ मुझे जला रही हैं, इस प्रकार अनगिनत आधियाँ मुझपर सब ओर से चढ़ रही हैं, मुझे पल-पल में व्याकुल कर रही हैं।
हे प्रभो!
मैं कब तक इनका भक्ष्य बना रहूँगा? कब तक इस प्रकार बेचैन बना रहूँगा? इनसे मेरी कौन रक्षा करेगा? तेरे स्तोता की और कौन रक्षा करेगा?
हे माघवन!
तुम्हीं मुझे एक बार अच्छी प्रकार सुखी कर दो। इन आधियों को हटाकर, इन मूषकों को भगाकर मुझे सुखी कर दो और पिता की तरह मेरे पालक हो जाओ। तेरे सिवाय इस दुनिया में मेरा रक्षक कौन है? मेरा पिता कौन है? इसलिए हे इन्द्र! तुम्हीं मुझ स्तोता के, मुझ पुत्र के पिता होओ, रक्षक होओ। पिता की तरह मुझे अब अपनी गोद में उठा लो। मुझे अपनी उस शान्त, निरूपद्रव, सुरक्षित शरण में उठा लो जहाँ इन मूषको की गति नहीं है।

🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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क्या आप जानते हैं ? लोहड़ी का पर्व एक मुस्लिम राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी की याद में पूरे पंजाब और...

क्या आप जानते हैं ?

लोहड़ी का पर्व एक मुस्लिम राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी की याद में पूरे पंजाब और उत्तर भारत में मनाया जाता है ।

लोहड़ी की शुरुआत के बारे में मान्यता है कि यह राजपूत शासक दुल्ला भट्टी द्वारा गरीब कन्याओं सुन्दरी और मुंदरी की शादी करवाने के कारण शुरू हुआ है । दरअसल दुल्ला भट्टी पंजाबी आन का प्रतीक है ।पंजाब विदेशी आक्रमणों का सामना करने वाला पहला प्रान्त था । ऐसे में विदेशी आक्रमणकारियों से यहाँ के लोगों का टकराव चलता था ।

दुल्ला भट्टी का परिवार मुगलों का विरोधी था । वे मुगलों को लगान नहीं देते थे ।मुगल बादशाह हुमायूं ने दुल्ला के दादा सांदल भट्टी और पिता फरीद खान भट्टी का वध करवा दिया ।

दुल्ला इसका बदला लेने के लिए मुगलों से संघर्ष करता रहा । मुगलों की नजर में वह डाकू था लेकिन वह गरीबों का हितेषी था । मुगल सरदार आम जनता पर अत्याचार करते थे और दुल्ला आम जनता को अत्याचार से बचाता था ।

दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उस समय पंजाब में स्थान स्थान पर हिन्दू लड़कियों को यौन गुलामी के लिए बल पूर्वक मुस्लिम अमीर लोगों को बेचा जाता था।

दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न सिर्फ मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लडको से करवाई और उनकी शादी की सभी व्यवस्था भी करवाई।

सुंदर दास नामक गरीब किसान भी मुगल सरदारों के अत्याचार से त्रस्त था । उसकी दो पुत्रियाँ थी सुन्दरी और मुंदरी । गाँव का नम्बरदार इन लडकियों पर आँख रखे हुए था और सुंदर दास को मजबूर कर रहा था कि वह इनकी शादी उसके साथ कर दे ।

सुंदर दास ने अपनी समस्या दुल्ला भट्टी को बताई. दुल्ला भट्टी ने इन लडकियों को अपनी पुत्री मानते हुए नम्बरदार को गाँव में जाकर ललकारा । उसके खेत जला दिए और लडकियों की शादी वहीं कर दी। जहाँ सुंदर दास चाहता था. इसी के प्रतीक रुप में रात को आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है.!!

दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी। इसी कथा की हमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है :

सुंदर मुंदरिए - हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया - हो!

दुल्ला भट्टी मुगलों की धार्मिक नीतियों का घोर विरोधी था। वह सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष था.उसके पूर्वज संदल बार रावलपिंडी के शासक थे जो अब पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था। आज भी पंजाब(पाकिस्तान)में बड़ी आबादी भाटी राजपूतों की है जो वहां के सबसे बड़े जमीदार हैं।

लोहड़ी दी लख लख बधाईया ।🙏🙏🙏


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सूर्य 14 जनवरी को अद्र्धरात्रि के बाद 1.26 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगें । इस कारण मकर संक्रांति 15...

सूर्य 14 जनवरी को अद्र्धरात्रि के बाद 1.26 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगें ।
इस कारण मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी ।
संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को सूर्योदय से सायंकाल 5.26 मिनट तक रहेगा।
मकर संक्रांति15/01/ 2016
पूण्य काल मुहूर्त = 07:18 to 12:47
समय = 5 घंटे 29 मिनट
संक्रांति की गति = 01:35
महापुन्यकाल मुहूर्त
= 07:18 to 09:08 प्रातः
समय= 1 घण्टा 49 मिनट
देहली सूर्योदय 07:16;32
पर है ।
महूरत समय देहली समय अनुसार है।
आपको और आपके सपरिवार को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएं


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य ईश्वर का स्वरुप:- यदि ईश्वर साकार है तो दिखना चाहिए,परन्तु दिखता नहीं? यदि...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

ईश्वर का स्वरुप:-
यदि ईश्वर साकार है तो दिखना चाहिए,परन्तु दिखता नहीं?
यदि चीटी के समान शरीर है तो सूर्य,भूमि,चन्द्रादि लोक को धारण नहीं कर सकता और यदि पर्वत के समान शरीर है तो चीटी आदि छोटे जन्तुओं के सिर में आंख जैसी सूक्ष्म वस्तु की रचना नहीं कर सकता।
यदि एक ही समय में ईश्वर निराकार और साकार दोनों प्रकार का है तो दो विरोधी बातें ईश्वर में नहीं हो सकती ?क्योंकि-
नैकस्मिन्न सम्भवात् (वेदान्त २/२/३३)
विप्रतिषेधाच्च (वेदान्त २/२/४५)
अर्थात एक ही वस्तु में एक साथ दो विरोधी धर्म नहीं यह सकते।जैसे निराकार और साकार।
निराकार और साकार दोनों का परस्पर में विरोध होने से निराकार ईश्वर साकार नहीं है सकता।

अत: ईश्वर निराकार है और तीनों कालों में निराकार ही रहता है।क्योंकि वेदादि शास्त्रों में ईश्वर को निराकार निर्विकार,कूटस्थ(न बदलने वाला) एकरस कहा है।

राम,क्रष्ण,परशुराम,बुद्ध आदि ये भी मनुष्य (जीव) ही थे।क्योंकि इनमें राग,द्वेष,क्षुधा,त्रषा,भय,शोक,दु:ख,सुख,जन्म,मरण आदि सभी बातें थी।

प्रमाण-इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दु:ख ज्ञानान्यत्मनोलिंगमिति।
(न्याय दर्शन अ. १/आ. १/सूत्र १०)
प्राणापान निमेषोन्मेष मनोगतीन्द्रियान्तर विकारा: ।
सुखदु:खे द्वेष प्रयत्नाश्यात्मनो लिंगानि।(वैशेषिक दर्शन अ. ३/आ. २/ सूक्त ४)

अर्थ-जिसमें इच्छा (पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा),द्वेष,प्रयत्न(पुरुषार्थ बल),सुख,दु:ख,विवेक (ज्ञान) हो उसे जीव कहते हैं।
प्राण(श्वास को भीतर से बाहर निकालना,अपान(वायु को बाहर से भीतर लेना),निमेश(आंख का भींचना),उन्मेश(आंख का खोलना,मन(निश्चय,स्मरण और अहंकार करना),गति(चलना),इन्द्रिय(सब इन्द्रियों को चलाना),अन्त:विकार(भूख,प्यास,त्रषा,हर्ष,शोकादि) जिसमें हो उसे जीव कहते हैं।
परशुराम,राम,क्रष्ण,बुद्ध आदि में ये सभी बातें थी।अत: वे सभी मनुष्य(जीव) थे।

श्रीराम ने अपने आपको मनुष्य ही माना और कहा है।सीता जी से कहते हैं कि-या त्वम् विरहिता नीता चल चित्तेन रक्षसा दैव सम्पादितो दोषो मानुषेण मया जीत: ५ ।
यत्कर्तव्यम् मनुष्येण धर्षणा प्रतिमार्जिता।
तत्क्रतम् रावणम् हत्वा मयेदं मानकांक्षिणा ।। १३
बाल्मिकिय रामायण युद्धकांड सर्ग ११५ अन्य में-११२/५/१३ प्र. ९०८/९०९ प्रष्ट,रामायण मूल गुटिका निर्णय सागर प्रेस१९२०

अर्थात् जो तू चलायमान चित्त से राक्षस रावण से हर ली गयी थी।यह देवक्रत दोष था।जो मुझ मनुष्य ने जीत लिया।
शत्रु द्वारा किये गये अपमान को मिटाने के लिए मनुष्य को जो कुछ करना चाहिए वह मैने मान चाहते हुए रावण को मारकर किया।

आथात्मानम् मानुषम मन्येरामं दशरथात्मजम्। १३ ।।
बाल्मिकिय रामायण युद्धसर्ग ११७ अन्य में सर्ग ११४-११ प्र. ९११

अर्थात् मैं अपने आपको दशरथ का पुत्र-मनुष्य-राम मानता हूं।

दूसरा प्रमाण-१.य: सर्वज्ञ सर्वविद् (मुंडकोपनिषद १/१/९)
२.स हि सर्ववित् सर्वाकर्त्ता (सांख्य दर्शन ३/५६)
३.तत्र निरतिशय सर्वज्ञ बीजम(योगदर्शन १/२५)

अर्थात् अज्ञान,भ्रम,भ्रान्ति,अल्पज्ञता,भूल आदि ये सभी मनुष्य(जीव) में ही होती हैं।

देखिये !श्रीराम में भ्रान्ति,अज्ञान आदि तथा साथ में ये भी देखिये कि श्रीराम सीता के विरह में किस प्रकार विलाप करते वन में फिरते थे।
राम,लक्ष्मण से कहते हैं-
मन्ये लक्ष्मण वैदेहि राक्षसे: कामरुपिभि:।
भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति ।।
(बाल्मिकिय रामायण आरण्य काण्ड सर्ग ६४ श्लोक ४२)
अर्थात् हे लक्ष्मण! मैं समझता हूं कि इच्छानुकूल रुपधारण करने वाले राक्षसों ने सीता काट काट कर बांट ली या खा ली होगी । ४२ ।

देवी भागवत में-राम में अज्ञान,भ्रम,भ्रान्ति-

१.सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्ति: कुतो गता ।
यद्यमृगविज्ञानम न ज्ञातं हरिणाकिल ।। ३९ ।
अर्थात् सर्वज्ञता और प्रभु शक्ति कहां गयी थी ? कि वह राम स्वर्ण के मृग के विषय में कुछ नहीं जान सके । ३९ ।
रावण ने जब पूर्व जानकी का हरण किया तब राम कुछ नहीं जान सके।वन में अज्ञानी के समान ढूंढते फिरे थे। १२ ।।

न ज्ञातो स्वसुतौ तेन रामेण च कुशलवौ।
मुनिना कथितौ तु तस्य पुत्रौ महाबलौ ।। १९ ।

अर्थात वन में लव कुश नामक जो उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए उनको वह(राम) नहीं जान सके।फिर महर्षि बाल्मिकि के कहने पर वह जान सके।

पूर्व मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्य संस्क्रत क्रतानि।
तत्रायमद्दापततो विपाको दु:खेन दु:खमयदहम विशामि ।।(बाल्मिकिय रामायण आरण्य कांड सर्ग ६३ श्लोक ४)
अर्थात् निश्चय ही मैने अनेक बार मन चाहे पाप किये हैं।
उन्हीं का फल आज मुझे प्राप्त हुआ है जिससे कि मैं एक दु:ख से दूसरे दु:ख को प्राप्त होता हूं। ४ ।


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वास्तविक घरवापसी 卐 पृथ्वी के समस्त संगठनों एवं नागरिकों से अनुरोध है, कि इस प्रथ्वी 🌍 को...

वास्तविक घरवापसी 卐

पृथ्वी के समस्त संगठनों एवं नागरिकों से
अनुरोध है, कि
इस प्रथ्वी 🌍 को पुनः
भारतवर्ष बनाने के लिए
सनातन धर्म स्वीकार करें एवं
👉 पुनः वास्तविक घर वापसी करें ।

👉卐 सत्य एक है 🌍
सत्य की प्रतिष्ठा के लिए एवं व्यक्ति कल्याण के लिए ।
ब्रह्मचर्य आश्रम को प्रतिष्ठित करे ।
प्रत्येक व्यक्ति को 25
वर्ष की आयु तक निःशुल्क शिक्षा सुलभ कराना
समस्त सरकारों का प्रथम कर्तव्य है, और प्रत्येक नागरिक का प्रथम जनाधिकार। 🌍卐

👉卐 प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए एवं परिवारकल्याण के लिए ग्रहस्थ आश्रम को प्रतिष्ठित करे।🌍
प्रतिपरिवार एक रोजगार के आधार पर पात्रतानुसार कृषि, वाणिज्य, राज्य, नेतृत्व इत्यादि चार में से एक रोजगार प्रदान करे।
समस्त सरकारों का यह द्वितीय कर्तव्य है एवं नागरिक का द्वितीय जनाधिकार है ।

👉卐 न्याय की प्रतिष्ठा के लिए एवं समाज कल्याण के लिए वानप्रस्थ आश्रम प्रतिष्ठित करे ।🌍
प्रत्येक ग्राम आधार पर सुविधाएं सडक पानी बिजली बीमा बैंक की सुविधाएं प्रदान करे ।
समस्त सरकारों का यह तृतीय कर्तव्य है एवं नागरिकों का तृतीय जनाधिकार है ।

👉卐 पुण्य की प्रतिष्ठा के लिए एवं सृष्टि के कल्याण के लिए ।
सन्यास आश्रम प्रतिष्ठित करे।🌍
सृष्टि के चारों संवर्गो जैसे जडपदार्थ, वृक्षवनस्पति, पशु-पक्षी एवं मनुष्यवर्ग को संरक्षण प्रदान करे।
🌍वसुधैवकुटुम्बकम 🌍

-(राकेश/अमृतगगन)
छत्तीसगढ
न्यायधर्मसभा हरिद्वार भारत


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Tuesday, January 12, 2016

॥ सामवेद ॥ ॥ ओ३म् ॥ नि त्वा नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् । सुवीरमग्न आहुत ॥ ॥ सामवेद...

॥ सामवेद ॥
॥ ओ३म् ॥ नि त्वा नक्ष्य विश्पते द्युमन्तं धीमहे वयम् । सुवीरमग्न आहुत ॥
॥ सामवेद ।पूर्वार्चिकः । आग्नेयकाण्डम् ।प्रथमोSध्यायः ।प्रथमप्रपाठकस्य प्रथमोSर्ध: । तृतीया दशति: । मंत्रः ६ ॥
भावार्थ :- हे सर्वरक्षक प्रभो ! हमारा लक्ष्य तो आपकी निकटता प्राप्त करना है , इसलिए हम आपके ज्ञान प्रकाश के तेज का ध्यान करते है और उसे धारण करते है । हे प्रभु ! आप प्रजा के पालक है । हे प्रभु आप अपनी ज्ञानमयी ज्योति की दीप्ती से हमारे अज्ञानान्धकार को हटाकर हम सबको प्रगति मार्ग पर अग्रगामी बनानेवाले सर्वोत्तम वीर है ।
हे प्रभु ! आपने ही हमें उत्तम पदार्थो की प्राप्ति करायी है । हमारे उत्कर्ष के लिए आवश्यक सभी साधन और पदार्थ भी आपने उपलब्ध कराए है ।
हे प्रभु ! आपकी कृपा से हम भी , निः स्वार्थ भावसे औरों को दुःख से छुड़ाकर उत्तम स्थिति प्राप्त कराने में ही वीरता का अनुभव करें । औरों का पथ प्रदर्शन करते हुए स्वयं भी अग्रगामी बनें ।


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।।ओ३म्।। सभी को नमस्ते जी वैदिक संध्या  संध्या आर्यों के लिए प्राण सदृशा थी, इसमें विधिहिनता और...

।।ओ३म्।।
सभी को नमस्ते जी

वैदिक संध्या 
संध्या आर्यों के लिए प्राण सदृशा थी, इसमें विधिहिनता और निरर्थकता ने इसे सार हीन कर दिया था। इसके कारण यह थोड़े से लोगों में सिमट कर रह गयी थी। जो आस्तिकता को भरने वाली प्राण सदृशा संध्या 5-6 वर्ष के बालक बालिका से लेकर मृत्यु पर्यंत बिना नगा दोनों समय प्रातः और सांय की जाती थी, तभी प्रातराश एवं आहार लिया जाता था। एक और इसकी सारहीनता और दूसरी और ईश्वरीय संविधान वेदादि के पठन-पाठन की लुप्तता और तीसरे तीसरे स्त्री वर्ग को इसके पढने के अधिकार से वंचित कर देना आदि कारणों से सभ्यता एवं संकृति का वर्धन करने हारी संध्या आर्यों एवं आर्याओं के जीवन से समाप्त सी हो गयी, और इसका स्थान भिन्न भिन्न क्षेत्रीय भाषाओँ में चालीसा अथवा सरल संस्कृत में स्तोत्र आदि ने ले लिया जैसे शरीर में रक्त को प्राण पुरे शरीर में भ्रमण करवाता है, शुद्ध रक्त पंहुचता है, अशुद्ध रक्त को लाकर शुद्ध करवा पुनः पंहुचता है और यह अनवरत चलता रहता है तभी जीवन संभव है। यदि इसमें व्यवधान आ जाये तो प्रथमतः रोगी और अंततः प्राणान्त हो जाता है। आर्यों को यही संध्या आस्तिक बनाये रखती थी और धर्मं अर्थ, काम मोक्ष रुपी लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत प्रेरित करती रहती थी। आर्य और आर्या अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो, पुरुषार्थ कर इहलोक और परलोक के लक्ष्य को प्राप्त कर लिए करते थे। साथ ही साथ विपरीत विचार एवं शंशय आदि के आने पर इन्ही नैतिक कर्तव्यों के करते रहने मात्र से यह दूर होते रहते थे और सुर्यासम प्रखर तेजस्वी एवं तेजस्विनी आर्य-आर्यायें होती थी और तब राष्ट्र रहता था सुरक्षित, वैभवशाली और अपराजेय।
  पुनः इसी स्थिति की प्राप्ति हेतु ऋषि दयानंद ने संध्या को अन्धविश्वास, रूढ़ी एवं जटिलताओं से मुक्त कर मनुष्यमात्र के लिए सुलभ बनाकर आर्य एवं आर्याओं के पुनर्निर्माण हेतु द्वार खोल दिया है, अतः हम अपने श्रेष्ठ पूर्वजों के इन श्रेष्ठतम कर्मों को ग्रहण कर अपने गौरवशाली स्वरुप को वर्त्तमान में लावें। आर्यों! यही मनुष्ट है, यही मनुष्यों की रक्षा का उपाय है और शांति का द्वार है।
  प्रत्येक आर्य के लिए संध्या कर्तव्य कर्म है, पूर्ण प्रयत्न हो की संध्या, संध्या काल में ही हो। संध्या के समय का प्रतिदिन आर्य लोग निर्धारण करें, जिससे संध्काल में संध्या करने का पालन एवं एकरूपता बन सके।

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राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा
(वेद विद्या को जन जन तक पहुँचाने के लिए सङ्कल्पबद्ध)


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आर्य सन्यासी एवं महान दर्शनाचार्य- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी का जीव ब्रह्म का अंश नहीं है पर...

आर्य सन्यासी एवं महान दर्शनाचार्य- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी का जीव ब्रह्म का अंश नहीं है पर प्रवचन का कुछ अंश….अवश्य श्रवण करें
——————————–
-डा मुमुक्षु आर्य

अद्वैतमत खण्डन ( जीव ब्रह्म का अंश नहीं) –भाग २

जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति– ये तीन तत्व नित्य हैं, शाश्वत हैं ,eternal हैं- न इनका आदि है; न अंत है। न इनको कोई पैदा करने वाला है, न मारने वाला है। ये हमेशा से है; अब भी हैं और आगे भी रहेगें। विज्ञान भी कहता है- matter can neither be created nor can be destroyed by any physical or chemical means अर्थात प्रकृति (matter) को किसी भी भौतिक व रासायनिक क्रिया द्वारा न तो बनाआ जा सकता है और न ही बिगाडा जा सकता है अर्थात वह अनादि है- जैसे प्रकृति अनादि है वैसे ही आत्मा व परमात्मा भी अनादि हैं | इस प्रकृति में अपनी कोई चेतन शक्ति नहीं है। यह तो जगत निर्माण में साजो-सामान रूपी उपकरण का कार्य करती है, उसका उपादान कारण है जबकि परमेश्वर सृष्टि का निमित्त कारण है।
ईश्वर जीव प्रकृति-ये तीन तत्व अनादि हैं- यही वैज्ञानिक व वेदानुकूल त्रैतवाद का सिद्धान्त है | प्रकृति व प्रकृति से बने सब पदार्थों में जो शक्ति व गति दिखाई दे रही है वह सब ब्रह्मा अर्थात परमात्मा की ही दी हुई है- इसके लिए एक बहुत अच्छा उदारहण हमारे उपनिषदों में आया है।। कहते हैँ कि एक बार असुरों और देवताओं में युद्ध छिड़ गया; जिसमें देवताओं की विजय हुई।। और वे देवता अभिमान वश होकर कहने लगें कि हमनें असुरों को हराया है।। उनके इस अहंकार को परमेश्वर ने पहचान लिया; क्योंकि उससे तो कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। तो वह परमेश्वर एक यक्ष का रूप लेकर उनसे कुछ दूरी पर जाकर खड़ा हो गया। तब देवताओं का राजा इंद्र अग्निदेव को कहता है कि उसके पास जाओ और पता करो कि ये कौन है? अग्निदेव उस यक्ष के पास दौड़ कर जाता है । जैसे ही वहाँ पहुँचता है तो यक्ष उससे परिचय जानकर कहता है कि तुम अग्नि देव में क्या सामर्थ्य है; तुम क्या कर सकते हो ? अग्नि देव ने कहा कि मैं पल भर में सब कुछ जला कर भस्म कर सकता हूँ। यक्ष कहता है कि ; अच्छा! ये सुखा तिनका जला कर दिखाओ। अग्निदेव ने अपना सारा बल लगाया पर उस सूखे तिनके को जला न सका। वह घबरा गया, दौड़ कर वापिस इंद्र देवता के पास गया और कहा,“ मैं उसको जान नही सका; उसने तो मेरा सारा बल ही हर लिया। इसी प्रकार वायु देवता ने सारा बल लगा दिया; परन्तु एक सूखे तिनके को उड़ा न सका; उसका भी बल उस यक्ष ने हर लिया। अंत में उमा देवी ने इन देवताओं को बताया कि तुम अपनी जीत में अंहकार वश अपना बल देख रहे थे; यह बल किसका है-यह बताने के लिए स्वयं प्रभु एक यक्ष का रूप लेकर तुम्हारे सामने आये थे। अर्थात ये जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य आदि व ब्रह्माण्ड सब कुछ जो हमें कार्य करते नज़र आ रहे है; ये इनका अपना बल नहीं है; यह सब प्रभु की शक्ति लेकर ही नियमानुसार कार्य कर रहे हैं।
इसी प्रकार हमारा ये स्थूल शरीर ही मरता है; इसमें रहने वाली आत्मा कभी मरती नहीं है।। इस मरणशील शरीर में रहते हुए अमर आत्मा को अमर परमात्मा में रमण कराना ही उस परमेश्वर की "उपासना” है, पूजा है; क्योंकि वह परमात्मा कण-कण में विराजमान है। परन्तु उसे हम इन नंगी आँखों से नही देख सकते। प्रकृति का स्थूल रूप तो देख सकते है; पर उसमें व स्थूल शरीर में विचरने वाली चेतन-शक्ति को नहीं देख सकते।। तो फिर उस चेतन- शक्ति को देखने के लिए हम अष्टांग योग के अभ्यास द्वारा अपनी इन्द्रियों, मन, बुद्धि की गति को आंतरिक करते हैं और इस शरीर को चलाने वाली चेतन-शक्ति का मस्तिष्क या हृदयदेश में साक्षात् दर्शन करते हैं और कह उठते हैं कि,“उपासना योग के अभ्यास में हम मरणशील मनुष्य उस अमर– कभी न मरने वाले परमेश्वर की ही पूजा करते है; जो परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य के अंदर यजनीय है पूज्यनीय है।”

,“आज के अद्वैतवादी नवीन वेदान्ती वेद के कपोल-कल्पित अर्थ निकाल कर जगत की हानि कर रहे हैं तथा मनुष्यों को हठ- अभिमान आदि दोषों में डाल कर उन्हें दुःख सागर में डूबा देते हैं। अज्ञानी लोग इनके उपदेश जाल में फंस के क्लेश पाते हैं। बन्धनों में बंधे रहते है। ये क्या मानते हैं-
1. जीव को ही ब्रह्म मानते हैं !
2. स्वयं पाप करें और कहें कि हम अकर्ता हैं !
3. जगत को मिथ्या बताते हैं !
4. मोक्ष में जीव का लय मानते हैं !

इनकी ये सब बातें गलत हैं कपोल कल्पित हैं-

समीक्षा – जीव ही ब्रह्मा है –इसके लिए यह इस वाक्य का प्रमाण देते हैं कि,” प्रज्ञानमानंदम ब्रह्म"— इसको ऋग्वेद का वाक्य कहते हैं। परन्तु ऋग्वेद के आठों अष्टकों में यह वाक्य कहीँ भी नहीं है। किन्तु ऋग्वेद का व्याख्यान “ऐतरेय ब्राह्मण” में यह वाक्य है। उसमें ऐसा पाठ है ,“ प्रज्ञानं ब्रह्म”-अर्थात जिसमें प्रकृष्ट सर्वोत्तम अनन्त ज्ञान है; वह “प्रज्ञान” कहलाता है। -अर्थात जिसको कभी भी अविद्या अज्ञान का अंधकार से लेशमात्र का भी सम्बन्ध नहीं होता; न हुआ और न होगा। “ब्रह्म”-जो सबसे वृद्ध (बड़ा) है और सब जगत को बढ़ाने वाला है; स्वभक्तों को अनन्त मोक्ष सुख से अनन्त आनंद में बढ़ाने वाला है तथा बड़े सुख का देने वाला है— अतः “ब्रह्म” नाम परमात्मा का है। क्योंकि यही परमात्मा का स्वभाव और स्वरूप है। (अतः जीव कभी भी इन लक्षणों वाला नहीं हो सकता)- नवीन वेदान्तियों ने इस वाक्य का नाम “महावाक्य” रखा है। जो अप्रमाण है। क्योंकि किसी ऋषि कृत ग्रन्थ में इसका “महावाक्य” नाम नहीं लिखा है।
,“अहं ब्रह्मास्मि”–वेदान्ती लोग इसका अर्थ करते हैं कि ,“मैं ब्रह्म हूँ” अर्थात भ्रान्ति से मैं जीव बना था; सो अब मैंने जान लिया कि मैं तो साक्षात् ब्रह्म हूँ-यह अनर्थ है, यह अर्थ इनका बिलकुल खोटा है।। क्योंकि पहले के ग्रन्थ का सम्बन्ध देखें बिना चोर की तरह बीच में से एक टुकड़ा लेके अपना मतलब सिद्ध करके अपनी स्वार्थ पूर्ति की है।। देखो इस वचन का पूर्व का सम्बन्ध इस प्रकार है:-,“शतपथ ब्राह्मण: कांड 14: प्रपाठक 3: ब्राह्मण2: कण्डिका 18से 22,” अर्थ,“ सब जीव "परमेश्वर” की उपासना करें और किसी की नहीं। क्योंकि सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी जो परब्रह्म है; वह सबसे प्रियस्वरूप है-अर्थात सबसे प्रिय इस परमेश्वर को जानना। पुत्र, धन तथा सब जगत के सत्य पदार्थो से वही ब्रह्म (परमेश्वर) प्रियतर है।(सबसे प्रिय है) तथा अन्तरतर आत्मा का अंतर्यामी परमात्मा है; जोकि अपने सबों का आत्मा है। जो कोई इस आत्मा से अन्य को प्रिय कहता है उसके प्रति यह कहे कि,“ परमात्मा से अन्य को तू प्रिय बतलाता है सो तू दुःख के सागर में गिर के सदा रोवेगा और जो कोई परमात्मा को छोड़ के अन्य की उपासना व प्रीति करेगा; सो सदा रोवेगा और जो पत्थर आदि जड़ पदार्थो की उपासना करेगा; सो रोवेगा।

हे मनुष्यों! वह परमेश्वर एक ही है। दो नहीँ है। यह जो हमारे शास्त्र- पुराणों आदि में अनेक परमेश्वर का वर्णन आता है; वह अनेक नहीँ है; एक ही है। मनुष्यों ने उस परमेश्वर की अनेक शक्तियों को देख कर; अनुभूत करके उसके अनेक नाम रख दिए। परमात्मा तो एक ही है; उसकी शक्तियों के अनुसार ऋषियों ने साधारण बुद्धि के मनुष्यों को समझाने के लिए अलग-अलग नाम रख दीये।। और उन साधारण बुद्धि के लोगों ने उन नामों के प्रतीक(मूर्ति) बना कर पूजा करनी शुरू कर दी; जो कि उनकी अज्ञानता ही है। परमात्मा अलग-अलग नहीं है; वह एक ही है। जैसे परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि व जीवों के सर्जन का कार्य करती है-मनुष्यों ने इस शक्ति का नाम "ब्रह्मा” रख दिया और उसका प्रतीक बना कर उसकी पूजा करने लगे। परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि-जीवों का पालन- पोषण करती है। मनुष्यों ने इस शक्ति का नाम “विष्णु” रख दिया; और उसका प्रतीक (मूर्ति) बना कर उसकी पूजा करने लगे। परमात्मा की एक शक्ति सृष्टि-जीवों के शरीरों का नाश करने का कार्य करती है। मनुष्यों ने उसका नाम “शिव” रख दिया। और प्रतीक बना कर पूजा करने लगे। परमेश्वर की मानसिक शक्ति को “इंद्र” नाम देकर पूजने लगे और सब देवताओं का सरदार कहने लगे। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रह आदि सबमें परमात्मा की शक्ति है; परन्तु इनको इनके गुण-कर्म की शक्ति से जानने लगे। जबकि परमात्मा एक ही है; उसके गुण-कर्म शक्तियों के अनुसार उस एक ही परमात्मा के नाम अलग हो गए है। यह एक परमात्मा ही सभी जीव-जगत का सर्वदृष्टा है। वह सभी को हर क्षण देखता रहता है और वह सर्वशक्तिमान है। यह सब जीव-जगत-मनुष्य आदि मिल कर एक हो जाये तो भी उसकी एक शक्ति का भी मुकाबला नहीं कर सकते।। वह सबका सर्वद्रष्टा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही सबका पालक हुआ है। उसको पता है कि किस समय किसको क्या देना है; क्या नहीं देना है। उसके बिना इस जगत में एक पत्ता भी नहीं हिलता है। हे मनुष्यों! ऐसे परमेश्वर को तुम अपने शरीर के अंदर “अष्टांग योग ” अभ्यास से हृदयदेश में साक्षात देख- वहाँ उसकी ही स्तुति; उपासना कर


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🌷🌻ओ३म्🌷🌻 भूपेश आर्य दिव्य औषधियां- १.प्रतिदिन प्रात: एक चम्मच मेथी दाना पानी के साथ निगलने से...

🌷🌻ओ३म्🌷🌻

भूपेश आर्य

दिव्य औषधियां-
१.प्रतिदिन प्रात: एक चम्मच मेथी दाना पानी के साथ निगलने से घुटनों का दर्द,आमवात,लकवा,मधुमेह,रक्तचाप आदि रोग नहीं
होते,पेट नहीं बढता,मुटापा नहीं होता,दुबलापन भी नहीं होता,वजन घटाने में अद्भुत गुणकारी है।इसके सेवन से आंखों की ज्योति बढेगी। शरीर स्वस्थ रहेगा।

२.भूँई आंवला १० ग्राम को घोटपीसकर पानी में मिलाकर पिला दें।पीलिया
तीन दिन में ही निर्मूल हो जाता है।
कुछ दिन सेवन करने से पथरी भी गलकर निकल जाती है।

३.जवान आदमी को ३ ग्राम चूना बिना बुझा पके
हुए केले में रखकर खिला दो इससे पीलिया रोग नष्ट होता है। बच्चों को १ ग्राम दें।

४.गर्भवती के वमन जब किसी भी औषधि से बन्द न होते हों तो बेर की गुठली को फोडकर उसकी मींगी निकालकर पानी के साथ निगलवा दें।वमन तुरन्त बन्द हो जायेगी।

गर्भरोधक-
५.यदि स्त्री प्रतिदिन १ लोंग निगल लिया करे तो गर्भ कभी न रहे।

गर्भस्थापक-
६.चैत्र शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को अशोक के छह फूल दहीं के साथ खाने से
गर्भ की स्थापना होती है।
यह प्रयोग फेलोपियन टयूब को सुद्रढ बनाता है,जिससे धीरे धीरे बांझपन दूर हो जाता है।

७.एक बढिया जायफल लेकर बारीक पीस लें और इसकी सात पुडिया बना लें।मासिक धर्म से शुद्ध होने के पश्चात १ पुडिया पानी के साथ दें।प्रभुक्रपा से ७ दिन में गर्भ स्थापित हो जायेगा।

८.गिलोय रसायन-गिलोय का कपडछन चूर्ण १०० ग्राम,गुड तथा शहद १६-१६ ग्राम,गोघ्रत २० ग्राम- सबको मिलाकर रख लें।यह अम्रत रस है।६ ग्राम प्रतिदिन गोदुग्ध के साथ सेवन करें।
इसके सेवन से व्याधियां उत्पन्न नहीं होती,केशों की सफेदी,जरावस्था,ज्वर,विषम ज्वर,प्रमेह नष्ट होता है।यह उत्क्रष्ट रसायन है।
यह जरावस्था(बुढापा) को
दूर करने वाला,बुद्धिदायक और त्रिदोषनाशक है।
निरन्तर सेवन करने से १०० वर्ष की आयु होती है।

८.पीपल की दातुन करने और उसका रस चूसने से मलेरिया व अन्य प्रकार के
बुखार उतर जाते हैं।

९.दमा-निर्मली के ३२ दानें मिट्टी के बरतन में पानी में डाल दें।पानी को प्रतिदिन बदल दें। पाँचवें दिन से दो दानें प्रात: और दो दाने सांय लगातार ८ दिन तक सेवन करने से दमा,खाँसी,काली खाँसी जड मूल से समाप्त हो जाती है।
साँस फूलना,खाँसी के कारण रात में रात्रि में नींद न आना,दुर्बलता के कारण चक्कर आना आदि सभी
उपद्रव शाँत हो जाते हैं।
नोट-दूध इस दोरान बिल्कुल न पीये।
इसके सेवन से शरीर दिन प्रतिदिन स्वस्थ होता जाता है।रक्त शुद्ध होकर नया रक्त बनने लगता है।पेट के कीडे मर जाते हैं।कब्ज दूर हो जाती है।
इन बीजों को चबाकर खाना चाहिए।


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🌻🌷🌻ओ३म्🌻🌷🌻 भूपेश आर्य 🌻चोटी (शिखा)🌻 वैदिक धर्म में सिर पर शिखा(चोटी) धारण करने का असाधारण महत्व...

🌻🌷🌻ओ३म्🌻🌷🌻

भूपेश आर्य

🌻चोटी (शिखा)🌻

वैदिक धर्म में सिर पर शिखा(चोटी) धारण करने का असाधारण महत्व है।प्रत्येक बालक के जन्म के बाद मुण्डन संस्कार के पश्चात सिर के उस विषेश भाग पर गौ के नवजात बच्चे के खुर के प्रमाण आकार की चोटी रखने का विधान है।

यह वही स्थान होता है जहाँ सुषुम्ना नाड़ी पीठ के मध्य भाग में से होती हुई ऊपर की और आकर समाप्त होती है और उसमें से सिर के विभिन्न अंगों के वात संस्थान का संचालन करने को अनेक सूक्ष्म वात नाड़ियों का प्रारम्भ होता है।

सुषुम्ना नाड़ी सम्पूर्ण शरीर के वात संस्थान का संचालन करती है।

यदि इसमें से निकलने वाली कोई नाड़ी किसी भी कारण से सुस्त पड़ जाती है तो उस अंग को फालिज मारना कहते हैं।समस्त शरीर को शक्ति केवल सुषुम्ना नाड़ी से ही मिलती है।

सिर के जिस भाग पर चोटी रखी जाती है उसी स्थान पर अस्थि के नीचे लघुमस्तिष्क का स्थान होता है जो गौ के नवजात बच्चों के खुर के ही आकार का होता है और शिखा भी उतनी ही बड़ी उसके ऊपर रखी जाती है।

बाल गर्मी पैदा करते हैं।बालों में विद्युत का संग्रह रहता है जो सुषुम्ना नाड़ी को उतनी ऊष्मा हर समय प्रदान करते रहते हैं जितनी की उसे समस्त शरीर के वात-नाड़ी संस्थान को जागृत व उत्तेजित करने के लिए आवश्यकता होती है।

इससे मानव का वात नाड़ी संस्थान आवश्यकतानुसार जागृत रहते हुए समस्त शरीर को बल देता है।किसी भी अंग में फालिज पड़ने का भय नहीं रहता है और साथ ही लघुमस्तिष्क विकसित होता रहता है,जिसमें जन्म जन्मान्तरों के एवं वर्तमान जन्म के संस्कार संग्रहीत रहते हैं।

सुषुम्ना का जो भाग लघुमस्तिष्क को संचालित करता है,वह उसे शिखा द्वारा प्राप्त ऊष्मा से चैतन्य बनाता है,इससे स्मरण शक्ति भी विकसित होती है।

वेद में शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये–

शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)
अर्थ-चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।

यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)
अर्थ-यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।

याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा।-(यजुर्वेदीय कठशाखा)
अर्थात् सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटु रखनी चाहिये।

केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।
केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।।-(पारस्कर गृह्यसूत्र)
अर्थ-मुण्ड़़न संस्कार के बाद जब भी सिर के बाल कटावें,तो चोटी के बालों को छोड़कर शेष बाल कटावें,यह मंगलकारक होता है।

और देखिये:-

सदोपवीतिनां भाव्यं सदा वद्धशिखेन च ।
विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत्कृतम् ।। ४ ।।
-(कात्यायन स्मृति)

अर्थ-यज्ञोपवीत सदा धारण करें तथा सदा चोटी में गाँठ लगाकर रखें।बिना शिखा व यज्ञोपवीत के कोई यज्ञ सन्ध्योपासनादि कृत्य न करें,अन्यथा वह न करने के ही समान है।

बड़ी शिखा धारण करने से बल,आयु,तेज,बुद्धि,लक्ष्मी व स्मृति बढ़ती है।

एक अंग्रेज डाक्टर विक्टर ई क्रोमर ने अपनी पुस्तक ‘विरिलकल्पक’ में लिखा है,जिसका भावार्थ निम्न है:-
ध्यान करते समय ओज शक्ति प्रकट होती है।किसी वस्तु पर चिन्तन शक्ति एकाग्र करने से ओज शक्ति उसकी ओर दौडने लगती है।

यदि ईश्वर पर ध्यान एकाग्र किया जावे,तो मस्तिष्क के ऊपर शिखा के चोटी के मार्ग से ओज शक्ति प्रवेश करती है।

परमात्मा की शक्ति इसी मार्ग से मनुष्य के भीतर आया करती है।सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न योगी इन दोनों शक्तियों के असाधारण सुंदर रंग भी देख लेते हैं।

जिस स्थान पर शिखा होती है,उसके नीचे एक ग्रन्थि होती है जिसे पिट्टयूरी ग्रन्थि कहते हैं।इससे एक रस बनता है जो संपूर्ण शरीर व बुद्धि को तेज सम्पन्न तथा स्वस्थ एवं चिरंजीवी बनाता है।इसकी कार्य शक्ति चोटी के बड़े बालों व सूर्य की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।

डाक्टर क्लार्क ने लिखा है:-
मुझे विश्वास हो गया है कि आर्यों का हर एक नियम विज्ञान से भरा हुआ है।चोटी रखना हिन्दुओं का धार्मिक चिन्ह ही नहीं बल्कि सुषुम्ना की रक्षा के लिए ऋषियों की खोज का एक विलक्षण चमत्कार है।

शिखा गुच्छेदार रखने व उसमें गाँठ बांधने के कारण प्राचीन आर्यों में तेज,मेधा बुद्धि,दीर्घायु तथा बल की विलक्षणता मिलती थी।

जब से अंग्रेजी कुशिक्षा के प्रभाव में भारतवासियों ने शिखा व सूत्र का त्याग कर दिया है उनमें यह शीर्षस्थ गुणों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है।

पागलपन,अन्धत्व तथा मस्तिष्क के रोग शिखाधारियों को नहीं होते थे,वे अब शिखाहीनों मैं बहुत देखे जा सकते हैं।

जिस शिखा व जनेऊ की रक्षा के लिए लाखों भारतीयों ने विधर्मियों के साथ युद्धों में प्राण देना उचित समझा,अपने प्राणों के बलिदान दिये।

महाराणा प्रताप,वीर शिवाजी,गुरु गोविन्दसिंह,वीर हकीकत राय आदि हजारों भारतीयों ने चोटी और जनेऊ की रक्षार्थ आत्म बलिदान देकर भी इनकी रक्षा मुस्लिम शासन के कठिन काल में की,उसी चोटी और जनेऊ को आज का मनुष्य बाबू टाईप का अंग्रेजीयत का गुलाम अपने सांस्कृतिक चिन्ह(चोटी और जनेऊ) को त्यागता चला जा रहा है,यह कितने दुःख की बात है।

उसे इस परमोपयोगी धार्मिक एवं स्वास्थयवर्धक प्रतीकों को धारण करने में ग्लानि व हीनता लगती है परन्तु अंग्रेजी गुलामी की निशानी ईसाईयत की वेषभूषा पतलून पहनकर खड़े होकर मूतने में उसे कोई शर्म महसूस नहीं होती है जो कि स्वास्थय की दृष्टि से भी हानिकारक है और भारतीय दृष्टि से घोर असभ्यता की निशानी है।

स्त्रियों के सिर पर लम्बे बाल होना उनके शरीर की बनावट तथा उनके शरीरगत विद्युत के अनुकूल रहने से उनको अलग से चोटी नहीं रखनी चाहिये।स्त्रियों को बाल नहीं कटाने चाहियें।


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करे सहाय किरतार तो अगन मां आंच ना आवे,, करे सहाय किरतार तो जेर अम्रुत थइ जावे,, ★ करे सहाय किरतार...

करे सहाय किरतार तो अगन
मां आंच ना आवे,,

करे सहाय किरतार तो जेर
अम्रुत थइ जावे,,

करे सहाय किरतार तो शत्रु
शीष नमावे,,

करे सहाय किरतार तो दुस्ट
नडे नहि दावे,,

करे सहाय किरतार तो रंक ने
रीध्धी आपे,,

करे सहाय किरतार तो बंध
बेळी ना कापे,,

करे सहाय किरतार तो भीखारी
ने भुपत स्थापे,,

करे सहाय किरतार तो खडग
नी धार ना कापे,,

दिनो नाथ दयाळु छे,शु तेना
वखाण करो,,

सदगुरु प्रतापे दास सवो कहे
दुरीजन से डरता रहो,,
★परबत गोरीया★


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वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी वाणी जीवतां परणावी वाले मुवे घेर आणी वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी...

वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी वाणी
जीवतां परणावी वाले मुवे घेर आणी
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी
★प
खीलो रे दुजे ने मारे भेंस रे
वलोवे
ससरो पारणीये ने वहु हिचोळे
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी
★र
खेतर रे पाक्यु ने खाधो रखवाळो
उलटो मरघे पाराधी ने बांध्यो
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी
★ब
हेठे रे हांडी ने उपर चुलो चडीयो
जल केरी माछलीये बगला ने गळीयो
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी
★त
आभ वरसे ने जमी परसे नेवा ना
पाणी ते मोभे चडसे
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी

बावो बोल्यो मछंदर को पुत
मेली ममता ने भाये अदभुत
वाणी रे वाणी मारा सदगुरु नी
★परबत गोरीया★


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जो आनंद संत फकीर करे वो आनंद ना ही अमीरी मे सुखदुख मे समता साध रहे कुछ खोफ ना ही जागीरी मे जो...

जो आनंद संत फकीर करे
वो आनंद ना ही अमीरी मे
सुखदुख मे समता साध रहे
कुछ खोफ ना ही जागीरी मे
जो आनंद संत फकीर करे,,,
★प
हर रंग मे सेवक रुप रहे
अम्रुत का जल ज्यु कुप रहे
सत कर्म करे और चुप रहे
भले ने छांव रहे या धुप रहे
निस्पुही बने जग मे विसरे
रहे वो धीर गंभीरी मे
जो आनंद संत फकीर करे,,,
★र
जग तारण कारण देह धरे
सतसेवा करे जग पाप हरे
जीग्नासु के घट मे ग्नान भरे
संतवाणी सदा मुख से उचरे
संडरीपुको बंसकर रंग मे रहे
रहे वो सदा शुरवीरी मे
जो आनंद संत फकीर करे,,,
★ब
सदबोध जगत मे आइ कहे
सत्य मारग को दिखलाइ कहे
गुरु ग्नान से पद ये गाय कहे
कहे सतार शब्द समजाइ कहे
मरजीवा बने सो मोजु करे
रहे वो अलमस्त फकीरी मे
जो आनंद संत फकीर करे,,,
★परबत गोरीया★


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌻गीता का वैदिक उपदेश🌻 🌻ईश्वर का स्वरुप:- (1) ईश्वर जन्म तथा मृत्यु से परे...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌻गीता का वैदिक उपदेश🌻

🌻ईश्वर का स्वरुप:-

(1) ईश्वर जन्म तथा मृत्यु से परे है।वह अवतार नहीं लेता। -(८.३.)

(2) ईश्वर अत्यन्त सूक्ष्म होने से बाहर की आंख तथा त्वचा से जानने योग्य नहीं।ईश्वर न आता है और न ही कहीं जाता है।क्योंकि वह दूर तथा पास सब स्थानों पर विद्यमान है,पर निराकार होने से दिखायी नहीं देता। –(१३.१५.)

(३) हे अर्जुन! यदि तू इस निराकार अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक ईश्वर को जानना चाहता है तो अपने ह्रदय में ही ध्यान करके जान सकता है वहीं मिल सकता है जहां आत्मा भी हो,दोनों का वास ह्रदय में ही है बाहर नहीं है।–(१८.३१.)

(4) हे अर्जुन! वह परमात्मा ही व्याप्त होकर इस सारे संसार को यन्त्र के समान चलाता है।–(१८.३१.)

(5) हे अर्जुन!उसी निराकार सर्वव्यापक संसार को बनाने तथा चलाने वाले की शरण में पूर्ण भावना सहित जा।उसी की शरण में जाने से सर्वोत्तम शान्ति तथा शाश्वत सुख मिल सकता है।–(१८.६२.)

🌻ओ३म् का जप और योगेश्वर कृष्ण:-

(१) प्राणायाम के साथ दोनों आंखों के मध्य में ध्यान लगाकर,ओंम् का जाप करो।–(८,१०,१३)

(२) यह ओंम् ही उस ‘ब्रह्म’ सर्व सृष्टिकर्त्ता परमात्मा का मुख्य नाम है।इसी ओंम् को (मेरे से पूर्व भी) सब वैदिक विद्वानों ने ध्याया और गाया है।–(८.११.)

(३) इसी प्यारे ओंम् को जो भक्त नित्य नियम से जपता है,वह बार-बार के जन्म तथा मृत्यु के दुःख से बचकर परमगति(मोक्ष) को प्राप्त होता है।–(८-१४,१५)

🌻वेद और यज्ञ परमात्मा का उपदेश है:-
यह यज्ञ-अग्निहोत्र आदि पवित्र कर्म वेद ने बताये हैं और वेद परमपिता परमात्मा का आदेश हैँ


🌻दो आवश्यक शंकाएं🌻

🌻(1) शंका:-कृष्ण जी महाराज की गीता में वेद का खण्ड़न किया गया है?

समाधान:-अभी-अभी हम गीता के श्लोक ८.११ तथा श्लोक ३.१५ द्वारा यह लिख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ओंम् के जप तथा यज्ञ को वेद का आदेश कहकर अनिवार्य रुप से उसे आचरण में लाने का उपदेश कर रहे हैं।अन्यत्र भी गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेदों में मैं सामवेद हूं।-(गीता-१०/१२)।

इससे पता चलता है कि उनकी वेद के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी।इतिहास को देखने से पता चलता है कि उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य काल में आचार्य श्री सन्दीपन ऋषि के चरणों में बैठकर वेद का अभ्यास किया था।जो लोग 'त्रैगुण्य’ विषया वाले श्लोक से वेद का खण्ड़न दिखाने वाली बात किया करते हैं वे स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा गीता में आये वेदों के प्रति श्रद्धा रखने वाले आदेशों का खण्ड़न करके कृष्ण महाराज के विरोधी सिद्ध होते हैं।

यहां इस 'त्रैगुण्यं’ विषया वेदा’ वाले श्लोक में भी गीता ने वेद का खण्ड़न न करके वेदों के नाम से प्रचलित दूसरे वेदविरुद्ध कर्मों का ही खण्ड़न किया है।आज भी लोगों ने अपनी मर्जी से पुराणों को बनाकर उसको पांचवां वेद कहना शुरु कर दिया है।

🌻(2) शंका:-श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को कहते हैं कि अर्जुन तू मेरा अनुसरण कर।इससे तो यही पता चलता है कि श्रीकृष्ण ही ईश्वर थे।

समाधान:-नहीं ऐसी बात नहीं है;यदि श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वर होते तो वे अध्याय १८ के ६१,६२ तथा अध्याय १३ के १३,१५ श्लोक में निराकार सर्वव्यापक ईश्वर की चर्चा न करके अपनी चर्चा करते।हम पूर्व इन श्लोकों के अर्थ लिख चुके हैं,ध्यान से पढ़े और गीता में भी देख लें।

वास्तविकता यह है कि जहाँ-जहाँ गीता में अपने आपको ईश्वर के स्थान पर 'मैं’ या 'मेरा’ ऐसा करके कहा है,वहां भी उनका संकेत ईश्वर की ही और है।जब कोई योगी व्यक्ति ईश्वर भक्ति या समाधि में लीन हो जाता है तो वहां पर केवल परमात्मा के ही आनन्द को मुख्य रुप से अनुभव किया करता है।इसके साथ ही यह भी जानने योग्य है कि जहाँ जहाँ कृष्ण महाराज ने मेरा ध्यान करो,मेरे पीछे चलो,ऐसा कहा है वहां वे ईश्वर की भक्ति में रंगे हुए यही कह रहे है कि मेरे भगवान् ओंम् का जाप करो और जिस ईश्वर के मार्ग पर मैं चलता हूं,तुम भी उसी मार्ग पर मेरे पीछे चलो।

मैंने एक युवक का कल्याण करने के लिए उपदेश किया कि प्रतिदिन व्यायाम,प्राणायाम तथा अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय करो ।यदि जीवन दुःखों से छुड़ाना चाहते हो तो मेरे पीछे चलो।

यहां 'मेरे पीछे चलो’ का अर्थ यह नहीं कि अब मैं यदि सहारनपुर से दिल्ली जा रहा हूं तो वह भी मेरे साथ गाड़ी में बैठ जायें और आगे जैसे जैसे मैं गाड़ियों को बदलूं ,वैसा ही वह भी करते जायें।जैसा यहां पर पीछे चलने का वास्तविक अर्थ यही है कि वह मेरे बताये सत्यसनातन वैदिक मार्ग पर चलें,ठीक यही अभिप्राय योगेश्वर कृष्ण को बताने का अर्जुन को था।

वेदान्त दर्शन में इसी बात को सूत्र १.१.२९ द्वारा समझाया गया है कि जहाँ-जहाँ ईश्वर-भक्त ईश्वर के ध्यान में डूबा ,'मैं’ शब्द का प्रयोग करता है;वहाँ उसको ईश्वर के लिए समझना चाहिये,न कि उस कहने वाले व्यक्ति के लिए ।

अतः इससे यही निश्चित होता है कि श्रीकृष्ण ईश्वर अवतार न थे अपितु वे तो ईश्वर तथा वेदों के भक्त थे और हम मनुष्यों को भी अपना कल्याण चाहने के लिए ईश्वर के मुख्य नाम ओंम् का श्रद्धापूर्वक जप करना व यज्ञ करना चाहिये।

अतः गीता पढ़ने वालों को चाहिये कि वे वेद की अवहेलना न करें।

डा. श्री सम्पूर्णानन्द जी भू० राज्यपाल राजस्थान के शब्दों में,जो उन्होंने एक गीता सम्मेलन के विषय में कहे थे,ध्यान से पढ़िये–“गीता के गीत गाते रहना और उसकी चाहना करते रहना,पर जहाँ से यह गीता निकली है उस। ईश्वरीय वाणी वेद को भूल जाना ठीक वैसे ही है जैसे कि दूध की चाहना करना और गाय को भूल जाना।”


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