Tuesday, January 12, 2016

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌻गीता का वैदिक उपदेश🌻 🌻ईश्वर का स्वरुप:- (1) ईश्वर जन्म तथा मृत्यु से परे...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌻गीता का वैदिक उपदेश🌻

🌻ईश्वर का स्वरुप:-

(1) ईश्वर जन्म तथा मृत्यु से परे है।वह अवतार नहीं लेता। -(८.३.)

(2) ईश्वर अत्यन्त सूक्ष्म होने से बाहर की आंख तथा त्वचा से जानने योग्य नहीं।ईश्वर न आता है और न ही कहीं जाता है।क्योंकि वह दूर तथा पास सब स्थानों पर विद्यमान है,पर निराकार होने से दिखायी नहीं देता। –(१३.१५.)

(३) हे अर्जुन! यदि तू इस निराकार अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक ईश्वर को जानना चाहता है तो अपने ह्रदय में ही ध्यान करके जान सकता है वहीं मिल सकता है जहां आत्मा भी हो,दोनों का वास ह्रदय में ही है बाहर नहीं है।–(१८.३१.)

(4) हे अर्जुन! वह परमात्मा ही व्याप्त होकर इस सारे संसार को यन्त्र के समान चलाता है।–(१८.३१.)

(5) हे अर्जुन!उसी निराकार सर्वव्यापक संसार को बनाने तथा चलाने वाले की शरण में पूर्ण भावना सहित जा।उसी की शरण में जाने से सर्वोत्तम शान्ति तथा शाश्वत सुख मिल सकता है।–(१८.६२.)

🌻ओ३म् का जप और योगेश्वर कृष्ण:-

(१) प्राणायाम के साथ दोनों आंखों के मध्य में ध्यान लगाकर,ओंम् का जाप करो।–(८,१०,१३)

(२) यह ओंम् ही उस ‘ब्रह्म’ सर्व सृष्टिकर्त्ता परमात्मा का मुख्य नाम है।इसी ओंम् को (मेरे से पूर्व भी) सब वैदिक विद्वानों ने ध्याया और गाया है।–(८.११.)

(३) इसी प्यारे ओंम् को जो भक्त नित्य नियम से जपता है,वह बार-बार के जन्म तथा मृत्यु के दुःख से बचकर परमगति(मोक्ष) को प्राप्त होता है।–(८-१४,१५)

🌻वेद और यज्ञ परमात्मा का उपदेश है:-
यह यज्ञ-अग्निहोत्र आदि पवित्र कर्म वेद ने बताये हैं और वेद परमपिता परमात्मा का आदेश हैँ


🌻दो आवश्यक शंकाएं🌻

🌻(1) शंका:-कृष्ण जी महाराज की गीता में वेद का खण्ड़न किया गया है?

समाधान:-अभी-अभी हम गीता के श्लोक ८.११ तथा श्लोक ३.१५ द्वारा यह लिख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ओंम् के जप तथा यज्ञ को वेद का आदेश कहकर अनिवार्य रुप से उसे आचरण में लाने का उपदेश कर रहे हैं।अन्यत्र भी गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेदों में मैं सामवेद हूं।-(गीता-१०/१२)।

इससे पता चलता है कि उनकी वेद के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी।इतिहास को देखने से पता चलता है कि उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य काल में आचार्य श्री सन्दीपन ऋषि के चरणों में बैठकर वेद का अभ्यास किया था।जो लोग 'त्रैगुण्य’ विषया वाले श्लोक से वेद का खण्ड़न दिखाने वाली बात किया करते हैं वे स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा गीता में आये वेदों के प्रति श्रद्धा रखने वाले आदेशों का खण्ड़न करके कृष्ण महाराज के विरोधी सिद्ध होते हैं।

यहां इस 'त्रैगुण्यं’ विषया वेदा’ वाले श्लोक में भी गीता ने वेद का खण्ड़न न करके वेदों के नाम से प्रचलित दूसरे वेदविरुद्ध कर्मों का ही खण्ड़न किया है।आज भी लोगों ने अपनी मर्जी से पुराणों को बनाकर उसको पांचवां वेद कहना शुरु कर दिया है।

🌻(2) शंका:-श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को कहते हैं कि अर्जुन तू मेरा अनुसरण कर।इससे तो यही पता चलता है कि श्रीकृष्ण ही ईश्वर थे।

समाधान:-नहीं ऐसी बात नहीं है;यदि श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वर होते तो वे अध्याय १८ के ६१,६२ तथा अध्याय १३ के १३,१५ श्लोक में निराकार सर्वव्यापक ईश्वर की चर्चा न करके अपनी चर्चा करते।हम पूर्व इन श्लोकों के अर्थ लिख चुके हैं,ध्यान से पढ़े और गीता में भी देख लें।

वास्तविकता यह है कि जहाँ-जहाँ गीता में अपने आपको ईश्वर के स्थान पर 'मैं’ या 'मेरा’ ऐसा करके कहा है,वहां भी उनका संकेत ईश्वर की ही और है।जब कोई योगी व्यक्ति ईश्वर भक्ति या समाधि में लीन हो जाता है तो वहां पर केवल परमात्मा के ही आनन्द को मुख्य रुप से अनुभव किया करता है।इसके साथ ही यह भी जानने योग्य है कि जहाँ जहाँ कृष्ण महाराज ने मेरा ध्यान करो,मेरे पीछे चलो,ऐसा कहा है वहां वे ईश्वर की भक्ति में रंगे हुए यही कह रहे है कि मेरे भगवान् ओंम् का जाप करो और जिस ईश्वर के मार्ग पर मैं चलता हूं,तुम भी उसी मार्ग पर मेरे पीछे चलो।

मैंने एक युवक का कल्याण करने के लिए उपदेश किया कि प्रतिदिन व्यायाम,प्राणायाम तथा अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय करो ।यदि जीवन दुःखों से छुड़ाना चाहते हो तो मेरे पीछे चलो।

यहां 'मेरे पीछे चलो’ का अर्थ यह नहीं कि अब मैं यदि सहारनपुर से दिल्ली जा रहा हूं तो वह भी मेरे साथ गाड़ी में बैठ जायें और आगे जैसे जैसे मैं गाड़ियों को बदलूं ,वैसा ही वह भी करते जायें।जैसा यहां पर पीछे चलने का वास्तविक अर्थ यही है कि वह मेरे बताये सत्यसनातन वैदिक मार्ग पर चलें,ठीक यही अभिप्राय योगेश्वर कृष्ण को बताने का अर्जुन को था।

वेदान्त दर्शन में इसी बात को सूत्र १.१.२९ द्वारा समझाया गया है कि जहाँ-जहाँ ईश्वर-भक्त ईश्वर के ध्यान में डूबा ,'मैं’ शब्द का प्रयोग करता है;वहाँ उसको ईश्वर के लिए समझना चाहिये,न कि उस कहने वाले व्यक्ति के लिए ।

अतः इससे यही निश्चित होता है कि श्रीकृष्ण ईश्वर अवतार न थे अपितु वे तो ईश्वर तथा वेदों के भक्त थे और हम मनुष्यों को भी अपना कल्याण चाहने के लिए ईश्वर के मुख्य नाम ओंम् का श्रद्धापूर्वक जप करना व यज्ञ करना चाहिये।

अतः गीता पढ़ने वालों को चाहिये कि वे वेद की अवहेलना न करें।

डा. श्री सम्पूर्णानन्द जी भू० राज्यपाल राजस्थान के शब्दों में,जो उन्होंने एक गीता सम्मेलन के विषय में कहे थे,ध्यान से पढ़िये–“गीता के गीत गाते रहना और उसकी चाहना करते रहना,पर जहाँ से यह गीता निकली है उस। ईश्वरीय वाणी वेद को भूल जाना ठीक वैसे ही है जैसे कि दूध की चाहना करना और गाय को भूल जाना।”


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