Thursday, January 28, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्यः 🌻जीवेम शरदः शतम्🌻 शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ। एतौ यक्ष्मं वि...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्यः

🌻जीवेम शरदः शतम्🌻

शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुन्ञतो अंहसः ।।-(अथर्व० ८/२/१८)
चावल और जौ तेरे लिए कल्याणकारी हों,ये कफ न करने वाले व खाने में मधुर हैं।ये रोग को रोकते हैं और कष्टों से बचाते हैं,अर्थात् जौ और चावल के प्रयोग से रोग आते ही नहीं और मनुष्य रोग पीड़ा से बचा रहता है।

त्रयायषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् ।
त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूँषि तेs करम् ।।-(अथर्व० ५/२८/७)
जमदग्नि-जिसकी जठराग्नि मन्द नहीं होती,उस जमदग्नि की आयु तीन सौ साल होती है।
कश्यपस्य-वस्तुओं के स्वरुप व तत्त्व को समझने वाले के लिए भी तिहरी आयु है।इनमें शरीर,मन व बुद्धि तीनों प्रकार से अमरता सी दिखाई देती है,अर्थात् इनकी बुद्धि तीन सौ वर्ष तक उर्वरा रहती है,इनके मन मलिन नहीं होने पाते,शरीर रोगी नहीं होते।मैं भी तेरी आयु तीन सौ वर्ष की करता हूं।

अयं मे हस्तो भगवान् अयं में भगवत्तरः ।
अयं मे विश्वभेषजोsयं शिवाभिमर्शनः ।।-(अथर्व० ४/१३/६)
अर्थ:-वैद्य रोगी से अत्यन्त विश्वास के साथ कहता है कि –“यह मेरा हाथ बड़ा सौभाग्यवाला है।यह दूसरा उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है।यह हाथ सब रोगों की ओषधि है,तथा छूते ही कल्याण करने वाला है।”

इस मन्त्र में सम्मोहन विद्या व चिकित्सा की चर्चा है।

अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद्वशी।
तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्चर ।।-(अथर्व० ४/१७/८)
अपामार्ग सब ओषधियों को वश में रखने वाली एक ओषध है।उससे तेरे शरीर में स्थित् रोग को हम दूर करते हैं,अतः तू अब निरोग होकर चल।

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते ।
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते ।।-(अथर्व० १९/३८/१)
अर्थ-जिसको इस ओषध गुल्गुल का सुगन्ध प्राप्त होता है उसे न रोग व्याप्ता है और न ही कोई शाप प्रभावित करता है।

अश्ववत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजामृतं हविः ।
व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमत्य्रौ ।।-(अथर्व० ८/७/२०)
वृक्षों में पीपल,घासों में कुशा,लताओं में सोमलता,पेय पदार्थों में जल तथा भक्ष्य पदार्थों में घृत प्रमुख है।वृष्टिजल से उत्पन्न व्रीहि और यव अमर्त्य औषध हैं।इनके होते हुए असमय के रोगों से मृत्यु का प्रश्न ही नहीं उठता।


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