Wednesday, January 27, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य 🌻गर्भवती स्त्री के लिए उपदेश🌻 गर्भवती स्त्री के लिए शोक,चिन्ता,पुरुष...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

🌻गर्भवती स्त्री के लिए उपदेश🌻

गर्भवती स्त्री के लिए शोक,चिन्ता,पुरुष स्पर्श,असमय सोना और जागना,ऊँचे नीचे स्थानों पर चलना,छलांग लगाना,बहुत जोर से कुछ चिर हंसना रोना,भूख प्यास धूप में चलना,थकान,बोझ उठाना,अधिक परिश्रम करना,घोड़े,टांगे,रिक्षा,स्कूटर,की ऊंची-नीची आदि गढ़ों वाली सड़क पर स्वारी,डरावनी कथा सुनना,जुलाब लेना,कुनीन बर्तना,गरम पदार्थ(जैसे छुआरा,सूखा नारियल,काजू,बैंगन,करेला,सूखा,बादाम,पिस्ता,गुड़,तिल,मोठ,मसूर,ब्रांडी,लहसुन,अण्ड़ा,लालमिर्च खाना और हर समय लेटे रहना निषिद्ध है।

मोटर और तांगे की स्वारी में अन्धेरे में और चलाने वाले की असावधानी से यह खतरा होता है कि सड़क में कहीं गड्ढ़ा होने से ऐसा झटका लगता है। कि रक्त जारी होकर गर्भपात हो जाता है।सावधान रहें।

मावा,मैदा,बारीक आटे की रोटी,उड़द,मसूर,कचनार,कचालू,मांस,खुम्भ,अनार,केला,दही,चावल,भिण्ड़ी विबन्ध अर्थात् कब्ज करते हैं।गर्भवती को कभी कब्ज न होने पाये।हो जाये तो दूध,दलिया,पालक,घिया तोरी,टिण्डा,चने का शोरबा,गाजर,मूली,शलजम,पत्तों वाले साग,खरबुजा,नाशपाती,लोकाट,पपिता आदि लाभदायक होंगे।

सोते समय दो तीन तोले गुलकन्द या एक तोला इसबगोल का छिलका या हरड़ का मुरब्बा थोड़े दूध के साथ निःसंकोच खिला सकते हैं।

यदि गर्भवती के किसी रोग के लिए हकीम,वैद्य या डाक्टर से औषधि मांगी जाए ,तो गर्भ का हाल बता देना अत्यन्त आवश्यक है।

चलना फिरना,सैर करना,सदा प्रसन्न रहना,नारियल या सरसों के तेल की मालिश करना,साफ सुथरे कपड़े पहनना,स्वस्थ बलिष्ठ सुन्दर योद्धा और सुचरित्र तथा धार्मिक महा-विद्वान् पुरुषों के चित्र देखना तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना–ये बातें गर्भवती के लिए बहुत लाभदायक है।माता-पिता के स्वास्थय एवं उनके विचारों का सन्तान पर बहुत प्रभाव पड़ता है।बुद्धिमान और सुन्दर माता पिता के बच्चे प्रायः बुद्धिमान और सुन्दर ही होते हैं।
यह भी देखा गया है कि सहवास के समय माता या पिता में से कोई किसी रोग से पीड़ित हो,तो बच्चे के शरीर में भी उस रोग का विष जाकर आयु भर उसे दुःख देता है।नशे में चूर होकर सम्भोग करने वाले लोगों के बच्चे प्रायः दुराचारी,पागल और कुबुद्धि होते हैं।अश्लील उपन्यास पढ़ने वालों तथा विषय-सम्बन्धी बातें कहने सुनने और करने वालों के बच्चे बहुत विषय-विलासी,चालाक और नटखट होते हैं।

माता-पिता का क्रोधी होना,निन्दक होना,झूठा और चालाक होना,या सत्यवादी,धर्मात्मा होना आदि गुण-अवगुण भी सन्तान में प्रस्थान कर जाते हैं।

गर्भ के दिनों में स्त्री क्या खाये,जिससे स्वस्थ रहे और सन्तान भी स्वस्थ पैदा हो,यह अवश्य जानने योग्य बात है।प्रायः दाल,सब्जी,मक्खन,दूध,चावल,लस्सी,दही,घी,मलाई,ऋतु के ताजे फल,भिगोकर छिलका उतारे बादाम,मोटे आटे की रोटी,घी पड़ी हुई खिचड़ी, और दलिया लाभकारी है।
परन्तु गर्म चीजें-बैंगन,प्याज,अण्ड़ा,माँस,मछली,सिरका,बाजरा,काजू,छुआरा,नारियल आदि हानिकारक हैं।
वात,कफ,शीतल प्रकृति वाली स्त्रियाँ अनार,लस्सी,उड़द की दाल,ककड़ी,तरबूज आदि न खायें।

एक आँवले के उत्तम मुरब्बे पर एक चाँदी का वर्क,एक सोने का वर्क,इलायची के दानें और तबाशीर मोटी,एक एक माशा पीसकर लगातार प्रतिदिन प्रात।काल खा लेना चाहिये।गर्मियों में सोने का वर्क न मिलायें।
सबसे अधिक शक्तिदायक ‘सैर’ है ,अर्थात् प्रातः सांय घण्टा भर के लिए बाग-बगीचा में वायु सेवनार्थ जाना बहुत लाभदायक है।

कई स्त्रियाँ गर्भवती को मिथ्या परामर्श दिया करती हैं कि तुम्हें अपना और बच्चे का पालन करना है,इसलिए दुगना भोजन किया करो।यह उनकी बड़ी भूल है।अधिक खाने से गर्भवती का स्वास्थय बिगड़ जाता है।जितना वह प्रसन्नता पूर्वक खा सके और भली-भाँति पचा सके,तथा भोजन करके किसी प्रकार का पेट में बोझ न प्रतीत हो,उतना ही खाये।

कहा गया है कि 'गर्भवती की प्रत्येक इच्छा पूरी होनी चाहिये,'इसलिए वह जिस अच्छी या बुरी वस्तु की इच्छा करती है,वह लाकर देने का पूर्ण प्रयत्न किया जाता है।लोग इस नियम के समझने में भूल करते हैं।
अभिप्राय तो यह है,कि उसे प्रसन्न रखा जाये,किसी प्रकार का क्रोध,शोक या चिन्ता न होने पाये।यह नहीं कि किसी भूल पर सास ,ससूर,पति आदि उसे बुरा भला कहकर उसका जी जलाते रहें और उसके खाये-पिये का कोयला बनाते रहें।यह भी नहीं,कि गजनी या चूल्हे की मिट्टी,कोयला,आदि स्वास्थय नाशक,या रबड़ी,मावा,कचालू,मांस,उड़द आदि गरिष्ठ व तामसिक पदार्थ दिये जायें।

एक और बात ! गर्भ के पहले ६ महिनों में घर के काम काज आदि में उचित परिश्रम करती रहे और उसके बाद के तीन महिने थोड़ा काम और अधिक आराम करे।


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