Friday, January 15, 2016

🍀 नियोग प्रथा उचित या अनुचित? आजकल नियोग प्रथा को लेकर चर्चा चल रही है कि इसे मानें या न...

🍀 नियोग प्रथा उचित या अनुचित?

आजकल नियोग प्रथा को लेकर चर्चा
चल रही है कि इसे मानें या न मानें।

धर्म के दो स्वरूप होते हैं—
शाश्वत धर्म और युग धर्म।
शाश्वत धर्म का अर्थ है हमेशा रहने
वाला धर्म, जैसे—- सत्य , दया, प्रेम
आदि । यह पहले भी था और अब भी
आगे भी रहेगा।

दूसरा धर्म है—– युग धर्म।
युग धर्म का अर्थ है—- परिस्थितियों
के अनुसार बनाई गई प्रथाएँ।

जिस युग में जिस चीज़ की आवश्यकता होती है उस युग के विद्वान उसे प्रथा का रूप प्रदान कर
देते हैं । जब उसकी आवश्यकता
खत्म हो जाती है तब उसे नष्ट कर
देते हैं। फिर नयी प्रथाएँ बना देते हैं।
ऐसा युगों से चलता आया है और
विश्व के हर देश में चलता आया है।

महाभारत काल में जो युग धर्म था
उसे आज लागू नहीं किया जा सकता।
आज की परिस्थितियाँ अलग हैं। उनकी परिस्थितियाँ अलग थीं।

हम सब बुद्धिजीवी हैं। हमें अच्छे बुरे
का ज्ञान है। आज हमारी परिस्थितियों
के अनुसार जो उचित है उसे ही हमें
स्वीकार करना चाहिए। उस समय के
लिए जो उचित था उसे उन्होंने
स्वीकार किया । आज जो उचित है
उसे हम स्वीकार करते हैं।

पुराणमित्येव न साधु सर्वम्।

पुराना है इसलिए अच्छा है , ऐसा
मानकर गलत बातों को स्वीकार नहीं
करना चाहिए। प्राचीन महापुरुषों
के युगधर्म को स्वीकार न करने से
उनका अपमान नहीं होता बल्कि
सम्मान ही होता है।

ऋषि स्वयं घोषित करते हैं,
हे पुत्र, जो हमारे सुचरित हैं उन्हें
ही तुम आचरण में लाना, हमारी
बुराइयों को नहीं।

यदि हमारे पुराने ग्रंथों में कहीं कुछ
ऐसा दिखाई देता है जो आज के
लिए उचित नहीं लगता तो उसे छोड़
देना चाहिए।

ऋषि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में
जिस नियोग प्रथा का वर्णन किया है
और महाभारत का प्रमाण प्रस्तुत
किया है उसका सिर्फ इतना ही
तात्पर्य है कि यदि सन्तानोत्पत्ति
की समस्या उत्पन्न हो जाए तो प्राचीन
काल के लोगों ने यह तरीका अपनाया
था । इसे अपनाया जा सकता है।

वर्तमान समय में Test Tube Baby
की जो प्रथा है उसमें भी तो दूसरे
पुरुष की शक्ति को दूसरी स्त्री के
गर्भ में रखा जाता है। यह भी तो
नियोग प्रथा का ही आधुनिक रूप
है।

इसलिए ऋषि दयानंद को गलत बताना उचित नहीं है।


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