🌻🌻ओ३म्🌻🌻
भूपेश आर्य
🌷प्राचीन मन्त्री और आजकल के मन्त्रियों में अंतर🌷
भारतवर्ष के मन्त्री कैसे होते थी, इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हमें ‘मुद्रा-राक्षस’ नाटक में प्राप्त होता है।आइए,सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रधानमन्त्री आचार्य चाणक्य की कुटी के दर्शन कीजिए–
उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां,
वटुभिरुपह्रतानां बर्हिषां स्तूपमेतत् ।
शरणमपि समिद्धिः शुष्यमाणभिराभिः,
विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ।।
एक ओर गोबर के उपलों को तोड़ने के लिए पत्थर का टुकड़ा पड़ा हुआ है,दूसरी और शिष्यों द्वारा लाई हुई कुशाओं का ढेर लगा हुआ है।पुरानी दीवार की छत पर जलाने के लिए लकड़ियाँ सुखाई गयी हैं,जिनसे छत का सिरा झुक गया है।
सारे संसार के इतिहास को देख लीजिए,मिलेगा कहीं ऐसा निर्लोभी ब्राह्मण?
यह तो हुआ प्राचीन प्रधानमन्त्री का चित्रण।अब तनिक इसकी तुलना आज के मन्त्रियों से कीजिए।
क्या ठाठ-बाट हैं आज के मन्त्रियों के देखिये–
दिशि दिशि बहुकारा वाहकै सर्वयुक्ताः
क्व हि रक्षकवर्गश्च मालासिंहा क्वचिच्च ।
क्वचिदपि कुक्कुटाण्डं मांसपात्रं क्वचिच्च,
सकल-सचिवगेहे वारुणी-धूम्रपानम् ।।
चारों और ड्राइवरों से युक्त अनेक कारें खड़ी हुई हैं।कहीं रक्षकसमूह (Body Guards) खड़े हुए हैं तो कहीं मालासिन्हा (अभिनेत्रियाँ) घेरे खड़ी हैं।कहीं मुर्गी के अण्ड़े हैं तो कहीं मांस-पात्र पड़े हुए हैं।सभी मन्त्रियों के घरों में धूम्रपान और शराब के दौर चलते हैं।
जिस देश के मन्त्री इस प्रकार के भोग-विलास-प्रिय हों वह देश रसातल को नहीं जायेगा तो और कहाँ जायेगा!
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