Wednesday, January 13, 2016

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य ईश्वर का स्वरुप:- यदि ईश्वर साकार है तो दिखना चाहिए,परन्तु दिखता नहीं? यदि...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

ईश्वर का स्वरुप:-
यदि ईश्वर साकार है तो दिखना चाहिए,परन्तु दिखता नहीं?
यदि चीटी के समान शरीर है तो सूर्य,भूमि,चन्द्रादि लोक को धारण नहीं कर सकता और यदि पर्वत के समान शरीर है तो चीटी आदि छोटे जन्तुओं के सिर में आंख जैसी सूक्ष्म वस्तु की रचना नहीं कर सकता।
यदि एक ही समय में ईश्वर निराकार और साकार दोनों प्रकार का है तो दो विरोधी बातें ईश्वर में नहीं हो सकती ?क्योंकि-
नैकस्मिन्न सम्भवात् (वेदान्त २/२/३३)
विप्रतिषेधाच्च (वेदान्त २/२/४५)
अर्थात एक ही वस्तु में एक साथ दो विरोधी धर्म नहीं यह सकते।जैसे निराकार और साकार।
निराकार और साकार दोनों का परस्पर में विरोध होने से निराकार ईश्वर साकार नहीं है सकता।

अत: ईश्वर निराकार है और तीनों कालों में निराकार ही रहता है।क्योंकि वेदादि शास्त्रों में ईश्वर को निराकार निर्विकार,कूटस्थ(न बदलने वाला) एकरस कहा है।

राम,क्रष्ण,परशुराम,बुद्ध आदि ये भी मनुष्य (जीव) ही थे।क्योंकि इनमें राग,द्वेष,क्षुधा,त्रषा,भय,शोक,दु:ख,सुख,जन्म,मरण आदि सभी बातें थी।

प्रमाण-इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दु:ख ज्ञानान्यत्मनोलिंगमिति।
(न्याय दर्शन अ. १/आ. १/सूत्र १०)
प्राणापान निमेषोन्मेष मनोगतीन्द्रियान्तर विकारा: ।
सुखदु:खे द्वेष प्रयत्नाश्यात्मनो लिंगानि।(वैशेषिक दर्शन अ. ३/आ. २/ सूक्त ४)

अर्थ-जिसमें इच्छा (पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा),द्वेष,प्रयत्न(पुरुषार्थ बल),सुख,दु:ख,विवेक (ज्ञान) हो उसे जीव कहते हैं।
प्राण(श्वास को भीतर से बाहर निकालना,अपान(वायु को बाहर से भीतर लेना),निमेश(आंख का भींचना),उन्मेश(आंख का खोलना,मन(निश्चय,स्मरण और अहंकार करना),गति(चलना),इन्द्रिय(सब इन्द्रियों को चलाना),अन्त:विकार(भूख,प्यास,त्रषा,हर्ष,शोकादि) जिसमें हो उसे जीव कहते हैं।
परशुराम,राम,क्रष्ण,बुद्ध आदि में ये सभी बातें थी।अत: वे सभी मनुष्य(जीव) थे।

श्रीराम ने अपने आपको मनुष्य ही माना और कहा है।सीता जी से कहते हैं कि-या त्वम् विरहिता नीता चल चित्तेन रक्षसा दैव सम्पादितो दोषो मानुषेण मया जीत: ५ ।
यत्कर्तव्यम् मनुष्येण धर्षणा प्रतिमार्जिता।
तत्क्रतम् रावणम् हत्वा मयेदं मानकांक्षिणा ।। १३
बाल्मिकिय रामायण युद्धकांड सर्ग ११५ अन्य में-११२/५/१३ प्र. ९०८/९०९ प्रष्ट,रामायण मूल गुटिका निर्णय सागर प्रेस१९२०

अर्थात् जो तू चलायमान चित्त से राक्षस रावण से हर ली गयी थी।यह देवक्रत दोष था।जो मुझ मनुष्य ने जीत लिया।
शत्रु द्वारा किये गये अपमान को मिटाने के लिए मनुष्य को जो कुछ करना चाहिए वह मैने मान चाहते हुए रावण को मारकर किया।

आथात्मानम् मानुषम मन्येरामं दशरथात्मजम्। १३ ।।
बाल्मिकिय रामायण युद्धसर्ग ११७ अन्य में सर्ग ११४-११ प्र. ९११

अर्थात् मैं अपने आपको दशरथ का पुत्र-मनुष्य-राम मानता हूं।

दूसरा प्रमाण-१.य: सर्वज्ञ सर्वविद् (मुंडकोपनिषद १/१/९)
२.स हि सर्ववित् सर्वाकर्त्ता (सांख्य दर्शन ३/५६)
३.तत्र निरतिशय सर्वज्ञ बीजम(योगदर्शन १/२५)

अर्थात् अज्ञान,भ्रम,भ्रान्ति,अल्पज्ञता,भूल आदि ये सभी मनुष्य(जीव) में ही होती हैं।

देखिये !श्रीराम में भ्रान्ति,अज्ञान आदि तथा साथ में ये भी देखिये कि श्रीराम सीता के विरह में किस प्रकार विलाप करते वन में फिरते थे।
राम,लक्ष्मण से कहते हैं-
मन्ये लक्ष्मण वैदेहि राक्षसे: कामरुपिभि:।
भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति ।।
(बाल्मिकिय रामायण आरण्य काण्ड सर्ग ६४ श्लोक ४२)
अर्थात् हे लक्ष्मण! मैं समझता हूं कि इच्छानुकूल रुपधारण करने वाले राक्षसों ने सीता काट काट कर बांट ली या खा ली होगी । ४२ ।

देवी भागवत में-राम में अज्ञान,भ्रम,भ्रान्ति-

१.सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्ति: कुतो गता ।
यद्यमृगविज्ञानम न ज्ञातं हरिणाकिल ।। ३९ ।
अर्थात् सर्वज्ञता और प्रभु शक्ति कहां गयी थी ? कि वह राम स्वर्ण के मृग के विषय में कुछ नहीं जान सके । ३९ ।
रावण ने जब पूर्व जानकी का हरण किया तब राम कुछ नहीं जान सके।वन में अज्ञानी के समान ढूंढते फिरे थे। १२ ।।

न ज्ञातो स्वसुतौ तेन रामेण च कुशलवौ।
मुनिना कथितौ तु तस्य पुत्रौ महाबलौ ।। १९ ।

अर्थात वन में लव कुश नामक जो उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए उनको वह(राम) नहीं जान सके।फिर महर्षि बाल्मिकि के कहने पर वह जान सके।

पूर्व मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्य संस्क्रत क्रतानि।
तत्रायमद्दापततो विपाको दु:खेन दु:खमयदहम विशामि ।।(बाल्मिकिय रामायण आरण्य कांड सर्ग ६३ श्लोक ४)
अर्थात् निश्चय ही मैने अनेक बार मन चाहे पाप किये हैं।
उन्हीं का फल आज मुझे प्राप्त हुआ है जिससे कि मैं एक दु:ख से दूसरे दु:ख को प्राप्त होता हूं। ४ ।


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