🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻
भूपेश आर्य
🌻आस्तिकता🌻
प्राणायाम,ब्रह्मचर्य और तप एवं वेदाभ्यास,सदाचार,आदि मृत्यु पर विजय दिलाने वाले ‘अमृत’ प्राप्ति के अमोल साधन अवश्य है,किन्तु मृत्यु पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए एक अन्य अचूक उपाय का आश्रय ग्रहण करना पड़ता है।वह है-आस्तिकता-उस दिव्य सत्ता पर परम विश्वास तथा दृढ़ आस्था और अनुराग।
मृत्यु के कष्टों से पीड़ित जीव की पुकार सदा इस मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की रही है।भक्त की कामना है–
मृत्योर्माsमृतं गमय ।
मृत्यु बन्धन को हटा अमरत्व हे भगवान दो।
प्रभो! यह मृत्यु मुझे बहुत परेशान कर रही है।मैं उससे ड़र गया हूं,यह मुझे बहुत पीड़ित कर रही है।प्रभू! जीवन में कार्यों को सुचारु-रुप में करने की अभी मैं योजना भी न बना पाता कि यह मार्ग में बाधक बनकर आ खड़ी होती है।अन्त में इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि तुम्हीं हो जो इससे सदा सर्वदा के लिए मुक्ति दिला सकते हो।मैं जानता हूं कि मेरे आराध्य केवल एक तुम हो,कोई दूसरा नहीं है।
जो तुम्हारे अनन्यभाव को प्राप्त नहीं होता वह-
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति यो नानेव पश्यति ।
वह मृत्युग्रस्त ही है जिसमें तुम्हारे प्रति अनन्यभाव नहीं है।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाsति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेsयनाय ।।-(यजुर्वेद ३१/१८)
अर्थ:-अन्धकार से विहीन,आदित्यरुप उस महान प्रभु को मैंने जान लिया है,उसके दर्शनों से कृतार्थ हो गया हूं मैं।उसे जानकर मृत्यु को मैंने लांघ लिया है।हे अमृतस्वरुप ! तुमसे मुझे अमरता प्राप्त हुई है।मृत्यु से बचने का 'अमृत’ प्राप्ति का इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।
समाधियोग से चित्त के अविद्यादि मल नष्ट होने पर आत्मस्थ होने से परमात्मा के योग का जो आनन्द उपलब्ध हुआ है वह वाणी द्वारा वर्णन नह़ी किया जा सकता।वह तो अन्तःकरण द्वारा अनुभव किया जा सकता है।
यजुर्वेद में कहा है:-
यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः कस्मैदेवायहविषा विधेम ।
ऋषि दयानन्द इसका अभिप्राय सपष्ट करते हुए कहते हैं-
“जिस (ब्रह्म) का आश्रय ही अमृत अर्थात् मोक्ष-सुखदायक है और जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुःख का हेतु है,हम लोग उस सुखस्वरुप,सकल ज्ञान के देने हारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए आत्मा और अन्तःकरण से भक्ति अर्थात् उसकी आज्ञापालन करने में तत्पर रहें।”
अथर्ववेद की एक ऋचा में इस रहस्य को बड़े स्पष्ट और सुन्दर रुप में कहा गया है:-
सर्वौ व तत्र जीवति गौरश्वः पुरुषः पशुः।
यत्रैदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम् ।।-(अथर्ववेद ८/२/२५)
जहां जीवन की परिधि ब्रह्म को बना लिया जाता है अर्थात् जीवन में चारों और-
ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः।
ब्रह्म ऊपर है,नीचे है,आगे है,पीछे है,मध्य में है,सब और है-जहां ऐसी अनुभूति होने लगती है उन घरों में गौ,घोड़ा,पशु और मनुष्य किसी को भी मृत्यु अपने वश में नहीं करती।
कितना बड़ा आश्वासन है यह !कितने विश्वास से ये बात कही गयी है उनके लिए जो वेदवचन पर अमित श्रद्धा रखकर मृत्यु के इस दुःख को उस ब्रह्म-सरोवर में डुबकी लगाकर दूर कर सकें।
योगवासिष्ठ में कहा है-
एकस्मिन्निर्मले येन पदे परमपायने।
संश्रिता चितविश्रान्तिस्तं मृत्युर्न जिघांसति ।।-(योगवासिष्ठ ६/१/२३/११)
अर्थ:-जिसका मन निर्मल ,परमपावन एक ब्रह्म में स्थिर होकर शान्त हो गया है उसे मृत्यु कभी नहीं मार सकती।
उस परमपिता परमात्मा की गोद ही ऐसी है जहाँ बैठकर मृत्यु क्या,अन्य सभी प्रकार के भय भी शान्त हो जाते हैं।
तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्।
तेषां शान्तिः शाश्वतं नेतरेषाम्।।
उन्हें शाश्वत सुख मिलता है,परम शान्ति होती है जो उसकी गोद में बैठते हैं,अन्य को नहीं।
श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा है-
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवाभियन्ति।-(श्वेताश्व० ३/१०)
जो उस ब्रह्म को जान लेते हैं वे अमृत हो जाते हैं किन्तु जो ऐसा नहीं करते वें बार बार जन्म-मरण के दुःख को प्राप्त करते हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् (३/१) में एक कथा आती है।विदेह देश के राजा वैदेह जनक ने एक बार 'बहुदक्षिणा यज्ञ’ रचाया,जिसमें देश देश के अनेक विद्वानों और ऋषि महर्षियों को आमत्रित किया गया।राजा जनक की यह इच्छा हुई कि यह जाने कि एकत्र हुए इन सब विद्वानों में सर्वातिशय 'अनूचान’ (प्रवचनकर्त्ता) विद्वान कौन है?उसने सोने के मढ़े हुए सींगों वाली एक हजार सुन्दर गौएँ मँगवाई और घोषणा की कि 'आप सब विद्वानों में जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ विद्वान हो वह इन एक सहस्र गौवों को हांक ले जाए।’ राजा जनक की इस घोषणा को सुनकर भी किसी का साहस उन गौवों को ले जानें का नहीं हुआ।सबको मौन देखकर और इस घोषणा को विद्वान् ब्राह्मणों का अपमान मानकर ब्रह्मज्ञानी ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य ब्रह्मचारी सामश्रवा को उन गौवों को अपने आश्रम में हाँक ले जाने की आज्ञा दी।
ऋषि याज्ञवल्क्य की इस धृष्टता से क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित अनेक ऋषियों ने याज्ञवल्क्य पर प्रश्नों की बौछार लगा दी।उन्हीं में सर्वप्रथम राजा जनक के होता अश्वल पूछते हैं-
याज्ञवल्क्येति होवाच-यदिदं सर्वं मृत्युनाssप्तं, सर्वं मृत्युनाभिपन्नं,केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति।।-(बृहदारण्यक० ३/१/३)
हे याज्ञवल्क्य ! यह बताओ कि यदि यह समस्त संसार मृत्यु से व्याप्त है-मृत्यु के वश में है,तो वह साधन क्या है जिससे यजमान इस मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है?
याज्ञवल्क्येति होवाच-यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं,का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमिति?-(बृहदारण्यक० ३/२/१०)
हे याज्ञवल्क्य ! संसार में हमें दिखायी देता है कि जो कुछ भी है वह सब मृत्यु का अन्न है अर्थात् मृत्यु उन्हें एक -एक कर खाये जा रही है।क्या ऐसा भी कोई देवता है जिसका मृत्यु अन्न बन सके?
ऋषि याज्ञवल्क्य इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि-
अग्निर्वै मृत्युः सोsपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति।-(बृहदा० ३/२/१०)
हे मुनियो ! मृत्यु अग्निरुप है(सर्वभक्षक है),किन्तु उस अग्निरुप मृत्यु की भी मृत्यु शीतल जलों से हो जाती है।जो इस रहस्य को जान लेता है वह मृत्यु को भी जीत लेता है।
मृत्यु के वास्तविक स्वरुप की यदि हम तुलना करना चाहें तो कह सकते हैं कि मृत्यु अग्निरुप है।दोनों के स्वरुप और विषेशताओं में बहुत समानता है।मृत्यु भी अग्नि की भाँति सर्वभक्षक,दाहक,भस्मक,ज्वालक और विनाशक है,किन्तु इस अग्नि की भी मृत्यु का उपाय लोकसिद्ध है।वह है-शीतल जल।
ठीक इसी प्रकार मृत्युरुपी अग्नि को यदि हम शान्त करना चाहते हैं-यदि हम मृत्यु की मृत्यु के अभिलाषी हैं तो शान्त,शीतल,आह्लादक ब्रह्मानन्द-जल में डुबकी लगानी पड़ेगी।तब यह मृत्यु या मृत्यु-जन्य दुःख की आग वैसे ही शान्त हो जाती है जैसे जलों से आग शान्त हो जाती है।
इसलिए संसार में ईश्वर के सच्चे भक्तों को मौत नहीं जीत सकी है,अपितु मौत को उन्होंने जीत लिया है।
यजुर्वेद में कहा है-
यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।-(यजुर्वेद २५/१३)
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