Friday, January 1, 2016

🌻🌷ओ३म्🌷🌻 भूपेश आर्य 🌻शंका-समाधान🌻 प्रश्न:-जब व्यक्ति मरने के निकट हो तो दीवा-बत्ती आदि कार्य करना...

🌻🌷ओ३म्🌷🌻

भूपेश आर्य

🌻शंका-समाधान🌻

प्रश्न:-जब व्यक्ति मरने के निकट हो तो दीवा-बत्ती आदि कार्य करना चाहिये अथवा नहीं?

उत्तर:-इनका करना उचित नहीं,क्योंकि शास्त्रों में कही पर भी ऐसा करने का वर्णन नहीं आता।मरणासन्न व्यक्ति के निकलते हुए जीव पर इन कार्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अतः यह सब कृत्य त्याज्य हैं।जब कोई व्यक्ति मृत्यु के समीप हो तो ‘ओम्’ नाम अथवा गायत्री मन्त्र का जाप करना चाहिये।सभी शान्तचित्त होकर बैठें।शोरगुल न करें।धीरज रक्खे।

प्रश्न:-शव-दाह में क्या औचित्य है?कब्र में गाड़ना,पानी में ड़ालना आदि उचित क्यों नहीं?

उत्तर:-वेद के अनुसार शव का दाह-संस्कार करना चाहिये।यह लकड़ियों की चिता बनाकर वेदमन्त्रों से विधिपूर्वक सम्पन्न होता है।

मुसलमान,ईसाई एवं यहूदी लोग शव को दफनाते हैं।विभिन्न स्थानों पर कई हिन्दू भी दफनाते हैं या जल में प्रवाहित कर देते हैं।पारसी लोग शव पशुओं को खिला देते हैं।मिश्र में शव को मसाला लगाकर सुरक्षित रखने की प्रथा थी,जिसे ’ ममी ’ कहते हैं।

वस्तुतः दफनाने से भूमि दूषित होती है।साथ ही धीरे धीरे भूमि कम होती चली जाती है।यूरोप और इस्लामी देशों में यह एक बड़ी समस्या खड़ी होती जा रही है।मुर्दे को दफनाने के लिए बड़े महंगे दामों पर भूमि खरीदनी पड़ती है।इससे सारा देश कब्रिस्तान बनने का खतरा बन जाता है।

जल में प्रवाह करने से जल दूषित हो जाता है।
यदि मृतक में कोई भयंकर रोग हो तो वह पानी में मिलकर अन्य प्राणियों में फैल सकता है।

यदि शव को पशु,पक्षियों के खाने के लिए डाल दिया जाये,तो भी बाकी बचे हुए मांस व हड्डियों की दुर्गन्ध वायु को दूषित करती है और रोग फैलने का कारण बनती है।

इसके विपरित शव को जलाने से भूमि की समस्या नहीं उठती।एक शमशान भूमि में चार-पांच वेदियां ही पर्याप्त होती हैं।जलाते समय वेदी में हवन सामग्री,घी आदि सुगन्धित पदार्थ ड़ाले जाते हैं जिससे शव जलाते समय दुर्गन्ध भी कम हो जाती है।रोग फैलने का ड़र नहीं रहता।
सभी बीमारियां अग्नि में जलकर भस्म हो जाती है।
जो थोड़ी-बहुत दुर्गन्ध होती भी है वह अग्नि के संयोग से हल्की होकर ऊपर उड़ जाती है और दो-ढाई घण्टे में सब कुछ समाप्त हो जाता है।

🌻शव दाह के लाभ🌻

(१) मृत देह को जलाने से भूमि बहुत कम खर्च होती है।कब्रों में स्थान स्थान पर बहुत सी भूमि घिर जआती है।

(2) कब्रिस्तान के कारण बहुत से रोग वायुमण्ड़ल को दूषित कर देते हैं।जिससे समाज में रोग फैलने का ड़र रहता है।

(3) जो जल कब्रिस्तान के पास से होकर जाता है,वह रोग का कारण बन जाता है,जलाने से ऐसा नहीं होता।

(4) कुछ पशु मृत शरीर को उखाड़कर खा जाते हैं और रोगी अथवा सड़े शरीर को खाने से वे रोगी बनकर मनुष्यों में भई रोग फैलाते हैं।जलाने से यह बुराई नहीं होती।

(5) लाखों बीघा जमीन संसार में कब्रिस्तानों के कारण रुकी पड़ी है।जलाने से वही खेती तथा मकान बनाने के काम आयेगी।जीवित लोगों के लिए तो जमीन थोड़ी पड़ रही है और मुर्दों ने तमाम घेर रक्खी है।

(6) बहुत-से पुजारी,मुल्ला,मौलवी,पादरी आदि का पेशा यही है कि कब्रों ,दरगाहों,मजारों का चढ़ावा खाएँ। यदि मुर्दे जलाये जायेंगे तो वे किसी लाभदायक काम पर लगकर समाज के लिए उपयोगी व्यक्ति बनेंगे।

(7) दरगाहों की समाधि-पूजा,कब्रों की पूजा,पीर-औलिया और मुर्दों की पूजा-ये अनेक प्रकार के पाखण्ड़ मुर्दों को जलाने से अपने आप समाप्त हो जायेंगे।

(8) इन मजारों की पूजा करने,चढ़ावा चढ़ाने,और आने-जाने में जो करोड़ों रूपये व्यर्थ के व्यय होते हैं,वे बच जायेंगे।

(9) सैंकड़ों दरगाहें,मकबरे,समाधियाँ ऐसी हैं जो लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से बनी हैं।यदि मुर्दों को जला दिया जाये तो यह करोड़ों रुपया बचकर शिक्षा,स्वास्थय आदि उपयोगी कार्यों पर खर्च किया जा सकता है।

(10) अनेक तान्त्रिक मुर्दों को उखाड़कर सिद्धियाँ करते हैं,उनकी दुर्गति बना देते हैं।शवदाह से ऐसी दुर्गति बन्द हो जायेगी।कुछ समाधियों,तकियों और कुटियाओं पर चरस,गाँजा,अफीम और शराब पी जाती है।चढ़ावे को दुर्व्यसनों में व्यय किया जाता है।शवदाह से ये सब दुराचार,अनाचार,भ्रष्टाचार आदि कुकर्म अपने आप बन्द हो जायेंगे।

अतः स्वास्थय रक्षा,भूमि की कमी,धन की बचत और सदाचार के विचार से मुर्दों को जलाना ही अधिक श्रेयस्कर है।

मरने के बाद शरीर के इन पांच तत्वों को सूक्ष्म करके जल्दी से जल्दी अपने अपने मूल में पहुंचा देना ही श्रेष्ठ है,यही वैदिक पद्धति का प्रयोजन है।मृत शरीर को जल्दी से जल्दी अदृश्य मूलभूत तत्वों के रुप में परिणत करने का एकमात्र साधन भेदन में समर्थ अग्नि है।अन्य सब साधन समय लेते हैं।

प्रश्न:-क्या अस्थियों का विसर्जन गंगादि तीर्थों में करना उचित नहीं?

उत्तर:-नदी,तालाब आदि के किनारे शवदाह करना और उसकी भस्मी आदि जल में फेंक देना जल को अपवित्र करना है।'शिवस्मृति कहती है:-

अस्थिमूत्रपुरीषाणि नखकेशांस्तथैव च।
प्रक्षिपेद् यः सरितस्तोये भृशं ताड्यो भूभुजा ।।
अर्थात् हड्डी,मूत्र,मल,नख,केश आदि को जो नदी के जल में ड़ालता है,राजा उसे दण्ड़ दे।

अतः गंगा आदि किसी नदी के किनारे शव को स्वर्ग-प्राप्ति की धारणा से ले जाना और दाह करके उसकी अस्थियों को नदी में ड़ालना सर्वथा त्याज्य है।

प्रश्न:-कर्म-कर्ता द्वारा शव के कपाल (सिर) को बाँस आदि से फुड़वाने की प्रथा है।इस कपाल क्रिया से प्रेतात्मा पापों से मुक्त हो जाती है।क्या यह कथन मिथ्या है?

उत्तर:-हाँ,पूर्णरुपेण मिथ्या है।क्योंकि जीवात्मा तो पहले निकल गया।अब उसका हड्डियों या कपाल क्रिया से क्या सम्बन्ध रहा?अतः यह मानना मूर्खता है।

वस्तुतः सिर का भाग कठोर होने से बहुत देर में जलता है।अतः वेदी पर शव रखते समय मुँह में घी पिघलाकर ड़ाल देना चाहिये जिससे कपाल भी पूरी तरह साथ में ही जल जायेगा।

प्रश्न:-अन्तिम शोक दिवस पर शय्या-दानादि करना क्या उचित नहीं?

उत्तर:-नहीं,क्योंकि वेद की स्पष्ट घोषणा है कि शल की भस्मी होने के उपरान्त प्रेतात्मा के प्रति कुछ भी कर्तव्य कर्म शेष नहीं रहता।अतः शय्या दानादि का मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं।मुक्ति तो सत्कर्मों से होती है।


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