🌷🌻🌷ओ३म्🌷🌻🌷
भूपेश आर्य
🌷ईश्वर का स्वरुप🌷
पुराणों में जहाँ मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद का निरुपण है,वहाँ ऐसे स्थल भी हैं जहाँ ईश्वर को स्पष्ट शब्दों में निराकार,सर्वव्यापक और अजन्मा बताया है,जिससे मूर्तिपूजा एवं अवतारवाद की आधारशिला ही हिल जाती है और कहीं कहीं प्राचीन वेदिक सिद्धान्तों की झलक दिख पड़ती है।पुराणों के ऐसे ही कुछ श्लोक नीचे देते हैं:-
निर्गुणस्य मुने रुपं न भवेद् दृष्टिगोचरम् ।
दृश्यं च नश्वरं यस्मादरुपं दृश्यते कथम् ।।-(दे०भाग० ३/७)
(ब्रह्मा बोले) हे मुने ! निर्गुण का रुप दृष्टिगोचर नहीं होता।कारण यह है कि दृश्य तो नश्वर है।अरुप का दर्शन कैसे हो सकता है?
एको व्यापीसमः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः ।
जन्म-वृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतोsव्ययः ।।
परंज्ञानमयोsसदि्भर्नामजात्यादिभिर्विभुः ।
न योगवान्न युक्तोsभून्नैव पार्थिव चोक्ष्यते ।।-(विष्णु पु० २/६४)
जन्म से रहित आत्मा एक,व्यापक,सम,शुद्ध,निर्गुण और प्रकृति से परे है।
जन्म-वृद्धि आदि से रहित,सर्वव्यापी और अव्यय है।।
हे राजन !वह परं ज्ञानमय है,असत् नाम और जाति से उस सर्वव्यापक का योग न कभी हुआ है,न है,और न होगा।।
विष्णु पुराण में विष्णु शब्द की व्याख्या भी ‘सर्वव्यापक’ के अर्थ में की गयी है-
यस्माद्विष्टमिदं विश्वं तस्य शक्त्या महात्मनः।
तस्मात्स प्रोच्यते विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात् ।।-(वि०पु० ३/१)
यह सम्पूर्ण विश्व उस परमात्मा की ही शक्ति से व्याप्त है।अतः वह विष्णु कहलाता है,क्योंकि 'विश’ धातु का अर्थ प्रवेश करना है।
न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य विद्यो वयं सर्वमयस्यधातुः ।
न च स्वरुपं न परं स्वभावं न चैव सारं परमेश्वरस्य ।।
कलामुहूर्त्तादिमयश्च कालो न यद्विभूतेः परिणामहेतूः ।
अजन्मानाश्यस्य सदैकमूर्तेरनामरुपस्य सनातनस्य ।।-(वि०पु० अंश ४,अ० १)
जिस अजन्मा,सर्वमय,विधाता,परमेश्वर का आदि,मध्य,अंत,स्वरुप,स्वभाव और सार हम नहीं पाते।।
कलामुहूर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूति के परिणाम का कारण नहीं हो सकता,जिसका जन्म और मरण नहीं होता,जो सनातन और सर्वदा एकरुप है तथा जो नाम-रुप से रहित है।।
न तत्रात्मा स्वयंज्योतिर्यो व्यक्ताव्यक्तयोः परः ।
आकाश इव चाधारो ध्रुवोsनन्तोपमस्ततः ।।-(श्रीमद्भा०,स्कन्द १२,अ०५)
ज्योतिस्वरुप परमात्मा व्यक्ताव्यक्त पदार्थों से भी सूक्ष्म है।वह आकाश की भांति सर्वाधार ,निर्विकार,अन्तहीन और उपमारहित हैँ।
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