Wednesday, April 29, 2015

😶 “ भक्ति महान् ” 🌞  ओ३म् कदु प्रचेतसे महे वचो देवाय शस्यते । तदिद्धयस्य वर्धनम् ॥ साम०...

😶 “ भक्ति महान् ” 🌞

 ओ३म् कदु प्रचेतसे महे वचो देवाय शस्यते । तदिद्धयस्य वर्धनम् ॥
साम० पू० ३ । १ । ४ । २

शब्दार्थ:– महान् बड़े ज्ञानी इष्टदेव परमेश्वर के लिए कुछ भी थोडा सा भी वचन - स्तुतिरूप में कहा जाए वह ही निश्चय से इस वक्ता का बढानेवाला है ।।

विनय:– प्रभु की थोड़ी -सी भी भक्ति महान् फल देनेवाले होती है । हम लोग समझा करते है कि थोड़े-से संध्या-भजन से, एक आध मन्त्र द्वारा उसका स्मरण कर लेने से हमारा क्या लाभ होगा, या एक दिन यह भजन छोड़ देने से हमारी क्या हानि होगी, पर यह सत्य नही है । हमारी उपासना चाहे कितनी स्वल्प और तुच्छ हो, पर वह उपास्यदेव तो महान् है । ज्ञान और शक्ति में वह हमसे इतना महान् है कि हम कभी भी उसके योग्य उसकी पूरी भक्ति नही कर सकते और उसके सामने हम इतने तुच्छ है कि वह यदि चाहे तो अपने जरा- से दान से हमे क्षण में भरपूर कर सकता है ।

वैदिक धर्म की
………………जय

 वैदिक विनय से 


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