💐।। वेदामृतम् ।। 💐
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💥विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी ।
वैश्वानरं ब्रिभती भूमिरग्निमिंद्रऋषभा द्रविणे नो दधातु ।।
- (अथर्व.भूमि सूक्त-12/6)
🍀पदार्थ- (विश्वम्भरा) सब का भरणपोषण करने वाली अथवा सब को अपने ऊपर धारण करने वाली (वसुधानी) सब प्रकार के ऐश्वर्य को अपने में धारण करनेवाली (प्रतिष्ठा) सब का आधार, सब को आश्रय और प्रतिष्ठा देने वाली (हिरण्यवक्षा:) सुवर्ण को अथवा हितकारी और रमणीय पदार्थो को अपने वक्ष:स्थल में रखने वाली (जगत:) सब जगत् को (निवेशनी) अपने में बसाने वाली अथवा कल्याण में प्रविष्ट कराने वाली (वैश्वानरम्) सब लोगों के हितकारी (अग्निम्)अग्नि को (बिभ्रती) अपने में रखने वाली (इंद्र ऋषभा) इंद्र अर्थात् चुना हुआ सम्राट है अधिपति जिसका ऐसी (भूमि:) वह हमारी मातृभूमि (नः) हमें (द्रविणे) बल और धन में (दधातु) धारण करे - इनका प्रदान करे ।
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💐सुभाषितम् ।।💐
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💥अक्षुध्या अतृष्या स्त ।
- अथर्व.7/60/4
- (कोई भी भूखा प्यासा न रहे )
💥अश्मा भवतु ते तनु: ।
-अथर्व. 2/13/4
- (शरीर पत्थर की तरह दृढ हो )
💥अस्माकेन वृजनेना जयम ।
-ऋग्.10/42/10
-(अपने पुरुषार्थ से विजयी हों )
💥ओजश्च तेजश्च सहश्च बलं च ।
- अथर्व.12/5/7
-(ओज, तेज, साहस और बल मिले)
💥उच्च तिष्ठ महते सौभगाय ।
- अथर्व.2/6/2
-(महान् सौभाग्य के लिए उठो और बढ़ो)
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