Thursday, September 15, 2016

ओ३म् *🌷मारा हुआ धर्म कहीं तुम्हें न मार दें !🌷* जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह...

ओ३म्

*🌷मारा हुआ धर्म कहीं तुम्हें न मार दें !🌷*

जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।

धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे’ से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना।

तैत्तिरीयोपनिषद् के ऋषि के अनुसार ―
*धर्मं चर !*―(तै० प्रथमा वल्ली, ११ अनुवाक)

अर्थात् तू धर्म का आचरण कर !
इसमें धर्म का आचरण करने की बात कही गई है, धर्म पर तर्क-वितर्क और वाद-विवाद करने की बात नहीं कही गई ।

निर्व्यसनता नैतिकता को चमकाती है।आध्यात्मिकता सोने पर सुहागे का काम करती है।नैतिकता+निर्व्यसनता+आध्यात्मिकता का समन्वय ही वास्तव में मनुष्य को मनुष्य बनाता है।

धर्म मनुष्य में शिवत्व की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।

*मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा*

वैदिक साहित्य में धर्म की बहुत महिमा बताई गई है।मनु महाराज ने लिखा है―

*नामुत्र हि सहायार्थं पितामाता च तिष्ठतः ।*
*न पुत्रदारं न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ।।*
―(मनु० ४/२३९)
*अर्थात्―*परलोक में माता, पिता, पुत्र, पत्नि और गोती (एक ही वंश का) मनुष्य की कोई सहायता नहीं करते।वहाँ पर केवल धर्म ही मनुष्य की सहायता करता है।


*एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते ।*
*एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ।।*
―(मनु० ४/२४०)
*अर्थ―*जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है।अकेला ही पुण्य भोगता है और अकेला ही पाप भोगता है।


*एक एव सुह्रद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।*
*शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ।।*
―(मनु० ८/१७)
*अर्थ―*धर्म ही एक मित्र है जो मरने पर भी आत्मा के साथ जाता है; अन्य सब पदार्थ शरीर के नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाते हैं।


*मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।*
*विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ।।*
―(मनु० ४/२४१)
*अर्थ―*सम्बन्धी मृतक के शरीर को लकड़ी और ढेले के समान भूमि पर फेंककर विमुख होकर चले जाते हैं, केवल धर्म ही आत्मा के साथ जाता है।


*धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्विषम् ।*
*परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम् ।।*
―(मनु० ४/२४३)
*अर्थ―*जो पुरुष धर्म ही को प्रधान समझता है, जिसका धर्म के अनुष्ठान से पाप दूर हो गया है, उसे प्रकाशस्वरुप और आकाश जिसका शरीरवत् है, उस परमदर्शनीय परमात्मा को धर्म ही शीघ्र प्राप्त कराता है।


धर्म के आचरण पर मनु महाराज ने बहुत बल दिया है―
*अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम् ।*
*हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते ।।*
―(मनु० ४/१७०)
*अर्थ―*जो अधर्मी, अनृतभाषी, अपवित्र व अनुचित रीत्योपार्जक तथा हिंसक है, वह इस लोक में सुख नहीं पाता।


*न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।*
*अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन्विपर्ययम् ।।*
―(मनु० ४/१७१)
*अर्थ―*धर्माचरण में कष्ट झेलकर भी अधर्म की इच्छा न करे, क्योंकि अधार्मिकों की धन-सम्पत्ति शीघ्र ही नष्ट होती देखी जाती है।


*नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।*
*शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ।।*
―(मनु० ४/१७२)
*अर्थ―*संसार में अधर्म शीघ्र ही फल नहीं देता, जैसे पृथिवी बीज बोने पर तुरन्त फल नहीं देती।वह अधर्म धीरे-धीरे कर्त्ता की जड़ों तक को काट देता है।


*अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।*
*ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।*
―(मनु० ४/१७४)
*अर्थ―*अधर्मी प्रथम तो अधर्म के कारण उन्नत होता है और कल्याण-ही-कल्याण पाता है, तदन्नतर शत्रु-विजयी होता है और समूल नष्ट हो जाता है।


*धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।*
*तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।।*
―(मनु० ८/१५)
*अर्थ―*मारा हुआ धर्म मनुष्य का नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए, ऐसा न हो कि कहीं मारा हुआ धर्म हमें ही मार दे !


*वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।*
*वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ।।*
―(मनु० ८/१६)
*अर्थ―*ऐश्वर्यवान् धर्म सुखों की वर्षा करने वाला होता है।जो कोई उसका लोप करता है, देव उसे नीच कहते हैं, इसलिए मनुष्य को धर्म का लोप नहीं करना चाहिए।


*चला लक्ष्मीश्चला प्राणाश्चलं जीवितयौवनम् ।*
*चलाचले हि संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।*

*अर्थ―*धन, प्राण, जीवन और यौवन―ये सब चलायमान हैं। इस चलायमान संसार में केवल एक धर्म ही निश्चल है।


प्रश्न उठता है कि जिस धर्म की इतनी महिमा कही गई है, वह धर्म क्या है ? इस सन्दर्भ में मनु महाराज का श्लोक ध्यान देने योग्य है―

*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।*
*धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।*
―(मनु० ६/९२)
*अर्थ―*धीरज, हानि पहुँचाने वाले से प्रतिकार न लेना, मन को विषयों से रोकना, चोरी न करना, मन को राग-द्वेष से परे रखना, इन्द्रियों को बुरे कामों से बचाना, मादक द्रव्य का सेवन न करके बुद्धि को पवित्र रखना, ज्ञान की प्राप्ति, सत्य बोलना और क्रोध न करना―ये धर्म के दस लक्षण हैं।


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*शमीम -* भाईजान बकरीद आने वाली है और आपको हमारे घर पर होने वाली दावत में शरीक होना ही पड़ेगा कोई...

*शमीम -* भाईजान बकरीद आने वाली है और आपको हमारे घर पर होने वाली दावत में शरीक होना ही पड़ेगा कोई बहाना नहीं चलेगा।

*सुनील -* वो सब तो ठीक है मियां पर यह तो बताओ कि बकरीद मनाते क्यों हैं.?

*शमीम -* भाईजान बहुत पहले एक हजरत ईब्राहिम हुए थे जिनका अल्लाह पर ईमान बहुत पुख्ता था और जिन्होंने अल्लाह के कहने पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ यानि अपने बेटे की कुर्बानी दी थी और अल्लाह ने खुश होके उनके बेटे को फिर ज़िंदा कर दिया था। तो उसी की याद में हम भी अपनी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी देते हैं।

*सुनील -* अच्छा मतलब आप भीअपने बेटे या किसी और करीबी की कुर्बानी देते हो इस दिन.?

*शमीम -* लाहौल विला कुव्वत कैसी बातें करते हो भाईजान बेटे की कुर्बानी कैसे दे दें हम.? हम तो किसी जानवर की कुर्बानी देते हैं इस दिन।

*सुनील -* क्यों समस्या क्या है इसमें.? अगर आपका ईमान पुख्ता है तो अल्लाह आपके बेटे को फिर ज़िंदा कर देगा।

*शमीम -* अरे ऐसा कोई होता है भाईजान।

*सुनील -* क्यों आपका ईमान पुख्ता नहीं है क्या?

*शमीम -* अरे नहीं भाईजान हमारा ईमान तो एकदम पुख्ता है।

*सुनील -* तो फिर क्या अल्लाह के इंसाफ पर शुबहा है कि वो बाद में मुकर जाएगा और बेटे को ज़िंदा नहीं करेगा.?

*शमीम -* तौबा तौबा हम अल्लाह पर शुबहा कैसे कर सकते हैं.?

*सुनील -* अल्लाह पर भी भरोसा है। ईमान भी पुख्ता है। फिर बेटे की कुर्बानी क्यों नहीं देते.? या फिर आपको सबसे प्यारा वो जानवर है जिसकी कुर्बानी देते हो.?

*शमीम -* नहीं नहीं भाईजान हमें सबसे प्यारा हमारा बेटा ही है। भला बकरीद से कुछ दिन पहले बाजार से खरीदा कोई जानवर कैसे हमें हमारे बेटे से ज्यादा प्यारा हो जाएगा आप ही बताओ.?

*सुनील -* तो मतलब आप अल्लाह से भी फ़रेब कर रहे हो। पैसे देकर खरीदे जानवर को औलाद से भी प्यारा बताकर अल्लाह को उसकी कुर्बानी दे रहे हो। यह तो बड़ी शर्म की बात है ।

*शमीम -* छोड़ें जनाब यह आपकी समझ में नहीं आएगा क्योंकि आप काफ़िर हो। चलते हैं हमारी नमाज़ का वक्त हो गया।

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अभी तक लोगों ने हिन्दू धर्म की मान्यताओं को लेकर मजाक बनाने वाले मेसेज तो बहुत ही मजे लेकर पढ़े और फॉरवर्ड भी किये हैं। अब इस मेसेज को भी फॉरवर्ड करें॥
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स्वामी दयानंद और हिन्दू समाज स्वामी दयानन्द पर कुछ अज्ञानी लोग यह कहकर आक्षेप लगा देते हैं कि...

स्वामी दयानंद और हिन्दू समाज
स्वामी दयानन्द पर कुछ अज्ञानी लोग यह कहकर आक्षेप लगा
देते हैं कि स्वामीजी ने हिन्दू समाज को संकीर्ण बना दिया।
स्वामी जी पर यह आक्षेप निराधार है क्योंकि हिन्दू समाज
तो पहले से ही इतना संकीर्ण हो चुका था कि उसमें और अधिक
संकीर्णता लाने का स्थान ही नहीं रहा था। सनातन धर्म के
प्रसिद्ध पंडित नेकीराम शर्मा ने तेज अख़बार 17 फरवरी 1926
को इस आशय की कुछ ऐसे स्वीकार किया था- ‘जो धर्म कभी
समस्त संसार का अद्वितीय और असीम धर्म था, आज वह
सिकुड़ते सिकुड़ते कितने छोटे घेरे में परिमित कर दिया गया है।Ó
इसके विपरीत स्वामी दयानंद ने हिन्दू समाज की संकीर्णता
को दूर करने का जीवन भर प्रयास किया जो वेदों के ज्ञान को
न जानने से और अन्धविश्वास और अज्ञान को मानने से हिन्दू
समाज में समाहित हो गई थी। स्वामी जी ने किस प्रकार
भागीरथ प्रयास कर हिन्दू समाज में नवजाग्रति लाने का
प्रयास किया, आईये, इस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालें।
1- हिन्दू समाज ने शूद्रों को शिक्षा देने और वेद का सन्देश
सुनाने का भी कड़ा निषेध कर दिया था। आधुनिक भारत में
स्वामी दयानंद ही प्रथम ऐसे उपदेशक हैं जिन्होंने शूद्रों को न
केवल शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार दिलवाया, अपितु
द्विजों के समान वेद को भी पढऩे का अधिकार दिला कर
हिन्दू समाज की संकीर्णता को दूर किया।
2- हिन्दू समाज शूद्रों के समान स्त्री जाति को भी शिक्षा
से विमुख रखता था और उन्हें केवल गृह कार्यए संतान उत्पत्ति और
चूल्हे चोके तक सीमित रखता था। स्वामी दयानंद ने न केवल
प्राचीन विदुषीया जैसे गार्गी और मैत्रयी आदि का उदाहरण
देकर नारी जाति को शिक्षा का अधिकार दिलवाया अपितु
उन्हें मातृ शक्ति के रूप में उचित सम्मान भी दिलवाया जिससे
हिन्दू समाज की संकीर्णता दूर हुई।
3- हिन्दूसमाज में बाल विवाह, वृद्ध विवाह, बहु विवाह और
मिथ्या जाति-पांति के छोटे घेरे में विवाह करने की प्रथा थी।
स्वामी दयानंद ने ब्रह्मचर्यपूर्वक लड़का-लड़की का गुण-कर्म
अनुसार, विस्तृत मानव समाज में सर्व विवाह और एक पति पत्नी
व्रत का विधान करके हिन्दू समाज की संकीर्णता को दूर
किया।
4- हिन्दू समाज में निर्दोष और अबोध बालविधवाओं को जन्म
भर वैध्य के महा कष्ट प्रद जीवन में जबरदस्ती रखा जाता था।
स्वामी दयानंद के विधवा विवाह की शास्त्र और युक्ति के
अनुसार सिद्ध करके इस वंश नाशक कुप्रथा को जड़ से उखाड़
दिया
जिससे हिन्दू समाज की संकीर्णता दूर हुई।
5-हिन्दू समाज में जन्म मूलक या अनुवांशिक उच्चता के
वृथाभिमान से वंशानुगत वर्ण-व्यवस्था मानी जाने लगी थी।
स्वामी दयानंद ने मनुष्य मात्र को गुण-कर्म के अनुकूल वर्ण
प्राप्ति का अधिकारी सिद्ध किया, जिससे हिन्दू समाज
की संकीर्णता दूर हुई।
6 हिन्दू समाज में संगठन के विरोधीए मिथ्या जाती.पाती और
छुआछुत के बंधन इतने दृड़ और भयानक हो चुके थे ए जिन पर चलकर
हिन्दू जाति अपने ही धर्म को मानने वालो हिन्दू भाइयों से
पशु से भी बूरा व्यवहार करती हुई दिन.प्रतिदिन मिटटी जा
रही थीए स्वामी दयानंद ने झूठी जाति-पाति और छुआ-छूत के
मानसिक रोग को वैदिक ज्ञान की औषधि से दूर करके उन्हें
संगठित होने की शिक्षा दी जिससे हिन्दू समाज की
संकीर्णता दूर हुई।
7- हिन्दू समाज ने भूल से वैदिक सार्वभौम धर्म का द्वार वैदिक
धर्म से पतित हुए मनुष्यों तथा अहिंदुओं के लिए एकदम बंद करके
अपने को तथा अपने धर्म को एक छोटे घेरे में सीमित कर दिया
था। स्वामी दयानंद ने देश सम्प्रदाय और वंश के बिना भेद भाव
के प्रत्येक मनुष्य को उसका अधिकारी बतलाकर और सर्व
साधारण को उसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण देकर हिन्दू
समाज की संकीर्णता को दूर किया।
8- हिन्दू समाज ने ज्ञान शून्य व्यर्थ कृपा कलापों और
विश्वासों को ही धर्म समझा जाता था और अपने गुरुओं की
कृपा से ही मुक्ति का मिलना मानकर अपने आपको विवशता
और दासता के जीवन में रखा जाता था। स्वामी दयानंद ने
मनुष्य मात्र के विचार और आचार की जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की
घोषणा करके सदाचार से आत्मज्ञान प्राप्ति के द्वारा मोक्ष
का मिलना बतलाकर दासता के संकुचित जीवन से हिन्दू समाज
को छुड़वाया।
9- हिन्दू समाज में वेद विरुद्ध यज्ञों और कल्पित देवताओं के नाम
पर पशु.बलिएमाँस.भक्षण और मद्य आदि काए धर्म समझकर
उपयोग होने लग गया था। स्वामी दयानंद ने वैदिक विधि का
प्रचार करके प्राणी मात्र से अहिंसा पूर्वक वर्तने और स्वास्थ्य
वह बुद्धि के नाशक नशो के भयानक दोषों को दूर करने का
प्रयास किया जिससे हिन्दू समाज की संकीर्णता दूर हुई।
10- हिन्दू समाज में एक ईश्वर के स्थान पर अवतारए गुरुए पीर व
पैगम्बर आदि की अनीश्वर तथा अनेक ईश्वर पूजा के रूप में मनुष्य
पूजा का प्रचार हो गया था। स्वामी दयानंद ने अवतार आदि
उनकी मर्यादा के भीतर और अनेक ईश्वर के स्थान पर एक सच्चे
सर्वव्यापक परमात्मा की सच्ची पूजा करनी सिखलाई जिससे
हिन्दू समाज की संकीर्णता दूर हुई।
11- हिन्दू समाज में पारस्परिक घृणा फैलाने वाली छुआ छुत के
कारन एक साथ बैठ कर न खानाए एक दूसरे के हाथ का न खाना
आदि का झमेला आरंभ हो गया था। स्वामी दयानंद चारों
वर्णों को सुद्ध विधि से बने हुए भोजन के एक साथ बैठकर खाने
का उपदेश देकर इस भ्रम की मिटाया जिससे हिन्दू समाज की
संकीर्णता दूर हुई।
सारांश यह हैं कि जो हिन्दूपन अपने आधुनिक मार्गदर्शकों की
संकीर्णता और अदूरदर्शिता से आत्मावलम्बन, आत्मरक्षा,
सामाजिक संगठन, स्वतंत्रता, देश भक्ति और स्वराज्य आदि
मानुषिक और जातीय श्रेष्ठ गुणों की अनुभूति खोकर मुर्दा के
समान हो चुका था, वह स्वामी दयानंद की जीवन प्रद शिक्षा
से फि र से जीवित हो चुका है।
क्या यही संकीर्णता हैं, जिसे स्वामी दयानंद ने हिन्दू समाज में
पैदा कर दिया हैं, तब तो हमें ऐसी संकीर्णता पर अभिमान है।
ओ३म् नमस्ते मित्रो


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Wednesday, September 14, 2016

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तस्य भूमिषु विनियोगः...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तस्य भूमिषु विनियोगः ||~योगदर्शन~विभूतिपाद~सूत्र~६~~~~~~~~~~~~~~पद्यार्थ~~~~~~~~~~~~~~~~~~दृढ होवे संयम की भूमि स्थूल से फिर सूक्ष्म बढ़ें| इसी तरह अभ्यास बढ़ाकर, विमल स्वर्ग सीढ़ी पर चढ़ें|| 👏


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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तज्जयात् प्रज्ञालोकः ||~~योगदर्शन~विभूति...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तज्जयात् प्रज्ञालोकः ||~~योगदर्शन~विभूति पाद~सूत्र~५~~~~~~~~~~~पद्यार्थ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~विमल विजय संयम होने पर, प्रज्ञा का होता उत्कर्ष| ज्यों ज्यों संयम हो जाता दृढ, विकसित प्रज्ञा मन हो हर्ष| आओ प्रभु उपासक होकर, मेधा बुद्धि प्राप्त करें| उसके न्याय धर्म पर चलकर, चरणों में नित शीश धरें||👏


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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरुप शून्यमिव समाधिः...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरुप शून्यमिव समाधिः ||~~~योगदर्शन~विभूतिपाद~सूत्र~३~~~~~~~~~पद्यार्थ~~~~~~ध्यान का ध्यान नहीं रहता है, ज्ञेय (ध्येय)ध्यान में रहता है| समाधि स्वरूप को, ध्यान से भिन्न यह, सूत्र तीसरा कहता है| समाधि का पूर्ण स्वरूप जानकर, योग के साधन अपनावें, विमल विवेक वैराग्य की सीढ़ी, चढ़ मंजिल को पा जावें||👏


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हर व्यक्ति के जीवन में अपने इष्ट जनों से मिलन व वियोग दोनों घटनायें घटित होती हैं दोनों में सम रहना...

हर व्यक्ति के जीवन में अपने इष्ट जनों से मिलन व वियोग दोनों घटनायें घटित होती हैं दोनों में सम रहना चाहिए न हर्ष न शोक यही तो योग का सार है हर काम करते हुए ईश्वर का स्मरण बना रहे निष्कामता बनी रहे राग द्वेष रहित होकर सबके प्रति दया करूणा प्रेम सहयोग व परोपकार की भावना हो तथा ईश्वर ही दिनचर्या में प्रमुख हो ईश्वर की ओर बढ़ना बढाना ही जीवन का उद्देश्य हो तो आनंद ही आनंद मिलता रहेगा


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[9/14, 07:35] Swami Santanad: हर व्यक्ति के जीवन में अपने इष्ट जनों से मिलन व वियोग दोनों घटनायें...

[9/14, 07:35] Swami Santanad: हर व्यक्ति के जीवन में अपने इष्ट जनों से मिलन व वियोग दोनों घटनायें घटित होती हैं दोनों में सम रहना चाहिए न हर्ष न शोक यही तो योग का सार है हर काम करते हुए ईश्वर का स्मरण बना रहे निष्कामता बनी रहे राग द्वेष रहित होकर सबके प्रति दया करूणा प्रेम सहयोग व परोपकार की भावना हो तथा ईश्वर ही दिनचर्या में प्रमुख हो ईश्वर की ओर बढ़ना बढाना ही जीवन का उद्देश्य हो तो आनंद ही आनंद मिलता रहेगा
[9/14, 08:16] Swami Santanad: 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺त्रयमेकत्र संयमः ||~~योगदर्शन~विभूति पाद~सूत्र~४~~~~~~~~~~~पद्यार्थ~~~~~~~~~~योग शास्त्र का अपना दर्शन, संयम को परिभाषित करता| धारणा, ध्यान, समाधि त्रैत को, एक समय में एक विषय में करने कहता| आओ हम सब ईश विषय में, संयम का अभ्यास करें| तीनों की हो विमल कुशलता, प्रज्ञा हेतु प्रकाश भरें||👏


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*हर दिन पावन* 14 सितम्बर/बलिदान-दिवस लाला जयदयाल का बलिदान 1857 में जहाँ एक ओर स्वतन्त्रता के...

*हर दिन पावन*
14 सितम्बर/बलिदान-दिवस

लाला जयदयाल का बलिदान

1857 में जहाँ एक ओर स्वतन्त्रता के दीवाने सिर हाथ पर लिये घूम रहे थे, वहीं कुछ लोग अंग्रेजों की चमचागीरी और भारत माता से गद्दारी को ही अपना धर्म मानते थे। कोटा (राजस्थान) के शासक महाराव अंग्रेजों के समर्थक थे। पूरे देश में क्रान्ति की चिनगारियाँ 10 मई के बाद फैल गयीं थी; पर कोटा में यह आग अक्तूबर में भड़की।

महाराव ने एक ओर तो देशप्रेमियों को बहकाया कि वे स्वयं कोटा से अंग्रेजों को भगा देंगे, तो दूसरी ओर नीमच छावनी में मेजर बर्टन को समाचार भेज कर सेना बुलवा ली। अंग्रेजों के आने का समाचार जब कोटा के सैनिकों को मिला, तो वे भड़क उठे। उन्होंने एक गुप्त बैठक की और विद्रोह के लिए लाला हरदयाल को सेनापति घोषित कर दिया।

लाला हरदयाल महाराव की सेना में अधिकारी थे, जबकि उनके बड़े भाई लाला जयदयाल दरबार में वकील थे। जब देशभक्त सैनिकों की तैयारी पूरी हो गयी, तो उन्होंने अविलम्ब संघर्ष प्रारम्भ कर दिया। 16 अक्तूबर को कोटा पर क्रान्तिवीरों का कब्जा हो गया। लाला हरदयाल गम्भीर रूप से घायल हुए। महाराव को गिरफ्तार कर लिया गया और मेजर बर्टन के दो बेटे मारे गये। महाराव ने फिर चाल चली और सैनिकों को विश्वास दिलाया कि वे सदा उनके साथ रहेंगे। इसी के साथ उन्होंने मेजर बर्टन और अन्य अंग्रेज परिवारों को भी सुरक्षित नीमच छावनी भिजवा दिया।

छह माह तक कोटा में लाला जयदयाल ने सत्ता का संचालन भली प्रकार किया; पर महाराव भी चुप नहीं थे। उन्होंने कुछ सैनिकों को अपनी ओर मिला लिया, जिनमें लाला जयदयाल का रिश्तेदार वीरभान भी था। निकट सम्बन्धी होने के कारण जयदयाल जी उस पर बहुत विश्वास करते थे।

इसी बीच महाराव के निमन्त्रण पर मार्च 1858 में अंग्रेज सैनिकों ने कोटा को घेर लिया। देशभक्त सेना का नेतृत्व लाला जयदयाल, तो अंग्रेज सेना का नेतृत्व जनरल राबर्टसन के हाथ में था। इस संघर्ष में लाला हरदयाल को वीरगति प्राप्त हुई। बाहर से अंग्रेज तो अन्दर से महाराव के भाड़े के सैनिक तोड़फोड़ कर रहे थे। जब लाला जयदयाल को लगा कि अब बाजी हाथ से निकल रही है, तो वे अपने विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी आ गये।

तब तक सम्पूर्ण देश में 1857 की क्रान्ति का नक्शा बदल चुका था। अनुशासनहीनता और अति उत्साह के कारण योजना समय से पहले फूट गयी और अन्ततः विफल हो गयी। लाला जयदयाल अपने सैनिकों के साथ बीकानेर आ गये। यहाँ उन्होंने सबको विदा कर दिया और स्वयं संन्यासी होकर जीने का निर्णय लिया।

देशद्रोही वीरभान इस समय भी उनके साथ लगा हुआ था। उसके व्यवहार से कभी लाला जी को शंका नहीं हुई। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने वाले को दस हजार रु. इनाम की घोषणा कर रखी थी।
वीरभान हर सूचना महाराव तक पहुँचा रहा था। उसने लाला जी को जयपुर चलने का सुझाव दिया। 15 अपै्रल, 1858 को जब लाला जी बैराठ गाँव में थे, तो उन्हें पकड़ लिया गया। अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और फिर 14 सितम्बर, 1858 को उन्हें कोटा के रिजेन्सी हाउस में फाँसी दे दी गयी।

इस प्रकार मातृभूमि की बलिवेदी पर दोनों भाइयों ने अपने शीश अर्पित कर दिये। गद्दार वीरभान को शासन ने दस हजार रुपये के साथ कोटा रियासत के अन्दर एक जागीर भी दी।
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*आज* हिंदी है हम : भारत के माथे की बिंदी, हिन्दी *संस्कृत तथा हिन्दी की उपेक्षा राष्ट्रघातक...

*आज*
हिंदी है हम : भारत के माथे की बिंदी, हिन्दी

*संस्कृत तथा हिन्दी की उपेक्षा राष्ट्रघातक है*
हिन्दी को अपने ही घर में संघर्ष करना पड़ रहा है कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इसको राजनीतिक मुद्दा बना दिया है और वे बिलकुल नहीं चाहते हैं कि पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश की जनता भाषायी दृष्टि से एकता के सूत्र में बंधे तथा भारत देश की हिन्दी भाषा को राजकीयभाषा, राजभाषा से बढ़कर राष्ट्रभाषा बनाया जा सके जो देश और देश की जनता का गौरव बन सके। यह भी एक दिलचस्प बात है कि जनता से वोट तो मांगे जाते हैं हिन्दी भाषा या अन्य भारतीय भाषाओं में लेकिन सरकार बनाने के बाद सत्तापक्ष शासन देश की भाषा में न करके अंग्रेजी भाषा की तरफदारी करते हैं जो अन्याय है। इसी प्रकार हिन्दी भाषा या अन्य भारतीय भाषाओं के कारण फिल्मी अभिनेताओं को सफलता व प्रसिद्घि मिलती है लेकिन वे इंटरव्यू अंग्रेजी भाषा में देते हैं, इससे वे क्या सिद्घ करना चाहते हैं? यदि इनको अंग्रेजी भाषा से इतना लगाव है तो उसी भाषा में फिल्म बनाएं फिर देखिए उनकी सफलता व प्रसिद्घि का ग्राफ क्या होता है यह तो वही कहावत चरितार्थ होती है कि खाएं हिन्दी की और गावें अंग्रेजी की। ठीक ऐसे ही देश के कुछ खिलाड़ी भी करते हैं। इन सभी को तो अपना साक्षात्कार हिन्दी भाषा में देने में गौरव महसूस करना चाहिए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान में 13 सितंबर, 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए तीन प्रमुख बातें कही थीं-

*1. किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता है।
2. कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती है।
3. भारत के हित में, भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो आत्मां को पहचाने, जिसे आत्म विश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिन्दी अपनानी चाहिए*

वर्षों बाद शासन ने ली सुध
तत्पश्चात संविधान ने 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी भाषा को संघ की राजभाषा (लिपि-देवनागरी एवं अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय) के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए भारत देश में प्रतिवर्ष सितंबर महीने की 14 तारीख को ‘हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है और विभिन्न शासकीय, अशासकीय कार्यालयांे, शिक्षा संस्थाओं इत्यादि में विविध संगोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। परंतु दु:ख इस बात का है कि ये सभी आयोजन केवल औपचारिकता मात्र बनते जा रहे हैं और जनता की गाढ़ी कमाई इस पर खर्च की जा रही है जो जनता के कल्यांण पर खर्च की जा सकती थी।

*हमें शुद्घ रूप से भारतीय होना चाहिए
हिन्दी भाषा के पक्ष में कई विद्वानों जैसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, रवीन्द्रनाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, स्वामी विवेकानंद इत्यादि ने अपने-अपने मत दिए हैं। फिर ऐसे कौन-से कारण हैं कि जिनकी वजह से आज राजभाषा हिन्दी की यह स्थिति हुई, इस पर चर्चा करने से पहले हम इस बात पर प्रकाश डालना चाहते हैं कि

आज किस प्रकार एक सोची-समझी रणनीति के तहत भारत देश में हिन्दी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति षड्यंत्र रचा जा रहा है। यदि हम विश्लेषण करें तो पाएंगे कि भारत देश में हिन्दी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ाई कराने वाले विद्यालयों की संख्या में कमी आई है जबकि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कराने वाले विद्यालयों की संख्या में इजाफा हुआ है ऐसा क्यों?

ध्यान होगा कि जब अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा का भारत में सबसे पहले समर्थन किया था तो अंग्रेजी पढ़ने वालों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। आज भी प्रत्येक सरकारी नौकरी में अंग्रेजी विषय का अनिवार्य प्रश्नपत्र होता है जिसमें उत्तीर्ण होना आवश्यक है लेकिन हिन्दी विषय का अनिवार्य प्रश्नपत्र क्यों नहीं होता? सरकार की नीतियों के कारण एवं उच्चपदस्थ अधिकारियों पर सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के कार्यान्वयन को लेकर सरकार का अंकुश न होने के कारण ऐसा घटित हो रहा है। सरकार की नीतियों के कारण ही दिन-प्रतिदिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कराने वाले विद्यालयों की संख्या में इजाफा हो रहा है। मेरा मानना है कि यदि किसी भी नौकरी के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान आवश्यक है तो उस पर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने का बोझ क्यों डाला जाता है जबकि उसे हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ाई कराते हुए अंग्रेजी भाषा या अन्य किसी अंतरराष्ट्रीय भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा सकता था। विद्यार्थियों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जानी चाहिए जबकि ऐसा बिलकुल नहीं हो रहा है और षड्यंत्र के तहत उन पर अंग्रेजी माध्यम जबरदस्ती थोपा जा रहा है जिससे विद्यार्थियों का आधा समय अंग्रेजी समझने में चला जाता है और उन्हें विषय को समझने में बहुत कम समय मिल पाता है।

*अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा अब केवल रटने वाली शिक्षा हो गई है। आज भी भारत देश के कई विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से प्रदान की जाती है और स्वतंत्रता के इतने वषोंर् के बाद भी सरकार देश की जनता के लिए उच्च शिक्षा हिन्दी भाषा एवं अन्य भारतीय भाषाओं में मुहैया नहीं करा पाई है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।*

*भाषा पर हावी दासता के चिन्ह*
अंग्रेजी भाषा को चालाकी से रोजगार से जोड़ दिया गया है इसलिए अंग्रेजी का कद घटने के बजाए बढ़ता जा रहा है हमलोग कितने हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाड़े मनाकर भी हिन्दी भाषा को उचित स्थान नहीं दिलवा सकते हैं। यदि हिन्दी भाषा को रोजगार से जोड़ दिया जाए तो शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो इसे पढ़ना नहीं चाहेगा।

*सांस्कृतिक सम्बंधों का सेतु बनी हिन्दी*
हमारा मानना है कि जब देश की जनता ने चुनकर संसद में भेजा है तो देश के लिए बनाई जाने वाली नीतियां-योजनाएं में हिन्दी भाषा में बनाई जाएं और बाद में अंग्रेजी में अनुवाद करवाया जाए अथवा अंग्रेजी में अनुवाद कराने की कोई जरूरत नहीं है। शुरुआत में थोड़ी दिक्कत होगी बाद में सब ठीक हो जाएगा। मेरा मानना है कि यदि रक्षा मंत्रालय का सारा कामकाज हिन्दी भाषा में किया जाए तो सोने पर सुहागा होगा क्योंकि हमारे देश के अधिकारी एवं सैनिक हिन्दी भाषा को आसानी से समझ सकेंगे और गोपनीयता बनी रहेगी जबकि दूसरे देशों के अधिकारियों एवं सैनिकों के लिए हिन्दी भाषा एक कूट भाषा होगी। आजकल मीडिया द्वारा हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों के भरपूर प्रयोग का प्रचलन जोरों पर है जिससे हिन्दी का काफी नुकसान हो रहा है और जो व्यक्ति हिन्दी भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करता है उसे योग्य माना जाता है जबकि दूसरी तरफ यदि कोई अंग्रेजी भाषा में हिन्दी के शब्दों को प्रयोग करता है तो उसे गंवार समझा जाता है ऐसा दोहरा मापदंड क्यों? यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि यदि अंग्रेजी ही विद्वता का मापदंड होता तो अमरीका, ब्रिटेन आदि के सभी नागरिक विद्वान होते और वहां अन्यान्य देशों के प्रतिभाशाली व्यक्तियों की मांग बिलकुल नहीं होती। यह सत्य है कि सारी सृजनात्मकता व्यक्ति की मातृभाषा में ही हो सकती है तो फिर हम सभी अंग्रेजी के पीछे क्यों पड़े हैं?

हिन्दी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था-

*निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान कै मिटै न हिय को शूल*

और अंत में, भाषा अपनी और अपना देश, यही है गौरव का संदेश। - आनंद कुमार सोनी
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव (राजभाषा) हैं) 
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🕉🙏 नमस्ते जी 🙏🕉 🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🙏🕉 दिनांक – 14 सितंबर 2016 दिन – बुधवार तिथि –...

🕉🙏 नमस्ते जी 🙏🕉
🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🙏🕉

दिनांक – 14 सितंबर 2016
दिन – बुधवार
तिथि – द्वादशी / त्रयोदशी
नक्षत्र –श्रवण
पक्ष – शुक्ल
माह –भाद्रपद
ऋतु – शरद
सूर्य –दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 117
कलयुगाब्द –5118
विक्रम संवत् –2073
शक संवत् –1938
दयानंदाब्द –192

🌷 संसार में प्रमुख सुख सात माने गये है।
🌷 पहला सुख निरोगी काया का होना ।
🌷 दुसरा सुख पर्याप्त आय का होना।
🌷 तीसरा सुख मधुरभाषिणी पतिव्रता पत्नी का होना ।
🌷 चौथा सुख आज्ञाकारी बुद्धिमान पुत्र का होना।
🌷पांचवॉं सुख अच्छी विद्या का ज्ञान होना।
🌷 छटा सुख अच्छे आवास का होना ।
🌷 और सातवॉं सुख अच्छे लोगों का साथ मिलना।
ये सभी सातो सुख शुभ कर्म करने वाले परोपकारी को ही मिलते है।

🌷🙏🌷🙏🌷 सुदिनम - सुप्रभातम 🌷🙏🌷🙏🌷


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आचार्य श्रीराम आर्य जी, कुरान समीक्षा : चाहे जितनी औरतें रखो छूट है चाहे जितनी औरतें रखो छूट है अगर...

आचार्य श्रीराम आर्य जी, कुरान समीक्षा : चाहे जितनी औरतें रखो छूट है चाहे जितनी औरतें रखो छूट है अगर देह में ताकत हो, कमर तगड़ी हो तो चाहे जितनी औरतों से रोज भोग करते रहो, इसकी छूट देने से खुदा ने व्यभिचार को प्रोत्साहन दिया है। यदि ताकत न होगी तो ज्यादा औरतों को कोई क्यों फांसेगा? इस आयत को कुरान में लिखने से खुदा का क्या मंशा था? देखिये कुरान में कहा गया है कि- व इन् खिफतुम् अल्ला तुक्ंसितू……..।। (कुरान मजीद पारा ४ सूरा निसा रूकू १ आयत ३) अगर तुमको इस बात का डर हो कि बेसहारा लड़कियों में इन्साफ कायम न रख सकोगे तो अपनी इच्छा के अनुकूल दो-दो और तीन-तीन या चार-चार औरतों से निगाह कर लो, लेकिन अगर तुमको इस बात का शक हो कि बराबरी न कर सकोगे तो एक ही बीबी करना या जो तुम्हारे कब्जे में हो उस पर सन्तोष करना। यह तदवीर मुनासिब है। समीक्षा इसमें साफ छूट दी गई है कि यदि मर्द में औरतों के साथ हर बात में एक जैसा बर्ताव करने की ताकत हो तो चाहे जितनी औरतें अय्याशी के लिए पास रख सकता है।। SHARE THIS:


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Tuesday, September 13, 2016

🚩🚩🚩🚩🚩 #ब्राह्मण#क्षत्रिय#वैश्य और#शूद्र# 💥सनातन हिंदू धर्म के चौथे स्तम्भ यानी शुद्र जाति के कुछ...

🚩🚩🚩🚩🚩
#ब्राह्मण#क्षत्रिय#वैश्य और#शूद्र#

💥सनातन हिंदू धर्म के चौथे स्तम्भ यानी शुद्र जाति के कुछ संगठन और लोग आजकल बाकी तीनो स्तम्भों पर आरोप लगाते है की शुद्र को दबाया गया कुचला गया कुछ हद तक सही है ये लेकिन ये कहाँ तक उचित है की अगर आप पर जुल्म हुवे तो उसे गा गा कर दुनिया को सुनाये और उसी जाति ने जब आपको अपने सरआखों पर बिठाया तो उसका नाम भी ना लें ???

💥क्षत्रिय कुल वधु मीरा के गुरु एक शुद्र जाती के संत रैदास थे …!

💥भगवान् राम के पिता दशरथ के मंत्री सुमंत शुद्र थे …???

💥महर्षि वाल्मीकि जिन्होंने कालजयी ग्रन्थ रामयण की रचना की वो शुद्र ही थे …???

💥अयोध्या में 1990 में राममंदिर की शिला रखने वाले कामेश्वर शुद्र थे …???

💥वाराणसी में शंकराचार्य ने डोम के घर खाना खाया था …???

💥विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में पूजा का अधिकार शबर यानी शुद्र को ही है …???

💥महाभारत में जिस मत्रिमंडल का वर्णन है जिसमे 54 सदस्य है, उनमे 4 ब्राह्मण 18 क्षत्रिय ,21 वैश्य और 3 शुद्र और 1 सूत के लिए आरक्षित था।”क्या आप इसे ब्राह्मणवादी प्रधान संस्कृति कहेंगे ???

💥हिन्दू धर्म जातियां हमेशा कर्म आधारित रही है जैसे।

💥लोहे का काम करने वाला लोहार।

💥सोने का काम करने वाला सोनार।

💥और चमड़े का काम करने वाला चमार।

💥क्षत्रिय यानी क्षत यानी चोट से रक्षा करने वाला क्षत्रिय माना जाता था।

💥”हाँ मुर्दा छूने वाला डोम दाग देने वाला, रजस्वला स्त्री और घृणित कार्य करने वालों को अछूत माना जाता था।

💥आदिवासी शब्द 1931 में सबसे पहले ब्रिटिशर खिस्तीयों के द्वारा उपयोग किया गया आदिवासियों का धर्म परिवर्तन तथा भारत की धार्मिक एकता को तोड़ने के लिए।

💥वैसे ही दलित शब्द 1970 में पहली बात प्रयोग किया गया।

💥राजनितिक स्वार्थ के लिए कांशीराम जी ने बहुजन शब्द का इस्तमाल 1984 में पहली बार किया।

💥जिस आदिवासी, दलित और बहुजन शब्द का इस्तमाल शूद्रों से वोट लेने के लिए किया गया वो शब्द भारतीय संविधान में आपको कहीं नहीं मिलेगा।

💥”बाबा साहेब आंबेडकर खुद शूद्रों को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते थे और कहते थे की शुद्र राजा शूद्रक की वंशज हैं और जो लोग वर्तमान जातिप्रथा के लिए मनु स्मृति को दोस देते हैं उन्हें पता होना चाहिए की मनु समृति सतयुग के लिए बनी थी। कलयुग के लिए परासर स्मृति है। वैसे ही जैसे द्वापर के लिए शंख और त्रेता युग के लिए गौतम स्मृति का निर्माण किया गया था।

💥भारत में जाती प्रथा केवल नेताओं और राजनीतिक पार्टियों ने पैदा किया अंग्रेजों के लिखे देश विरोधी ईतिहास का आधार लेकर और जिन #ब्राह्मणों को लोग आज गाली देते हैं उनकी जानकारी के लिए बता दूँ की #ब्राहमण कोई जाती नहीं बल्कि गुण का नाम है। ब्राह्मण राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक हैं।

💥चाणक्य ने कुटिया को अपना निवास स्थान चुना।

💥सुदामा जैसे ब्राह्मण मधु को इक्कठा कर अपना जीवन यापन करते थे।

💥द्रोणाचार्य ईतने गरीब थे कि अपने पुत्र को सतुवा घोल कर पिलाए पर कभी अपने जीवन में गोदान नहीं माँगा। जबकि उस समय दूध की नदियाँ बहती थी

💥द्रोणाचार्य अर्जुन को चकर्व्युह भेदने का रहस्य जमीन पे रेखा चित्र बनाकर समझा रहे थे तभी उनका पुत्र अस्वस्थामा वहां आ गया, द्रोणाचार्य ने तुरंत उस रेखाचित्र को मिटा दिया की कहीं उनका पुत्र वो विद्या ना सिख ले…! ऐसे ब्राह्मण थे द्रोणाचार्य

💥क्या यही ब्राह्मणवाद है जिसे आज कुछ राजनीतिक और आदिवासी चिंतक कोसते हैं…???

💥इस्लामी, अंग्रेज, मार्क्सवादी, कम्युनिस्ट, साम्यवादी वगैरह जो भी आया भारतीयों को बर्बाद कर गया। कारण यह है की बीना सच को जानें हमें सबपे विश्वास किया। हमने कभी नहीं सोचा हमारे देश की संस्कृति, धर्म और आर्थिक स्थिति क्यों सबसे महान थी। बस यही हमारी गलती है और आज भी हम जात पात, धर्म में बंट चुके है और महान भारत की महान संस्कृति को भूल चुके है या बिना सच को जाने उस महान भारतीय संस्कृति का विरोध करते है।

💥समझ में नहीं आता हम भारतीय ही है या भारत के दुश्मन…???
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
गर्व से कहो हम हिंदु हैं सौभाग्य हैं
ॐ जय भारतभूमि
🙏�जय हिंद🙏


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देशबन्धश्चित्तस्य धारणा||~योग दर्शन~ विभूति पाद~सूत्र~1~~~~~~~~~~~~पद्यानुवाद~~🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺देश...

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा||~योग दर्शन~ विभूति पाद~सूत्र~1~~~~~~~~~~~~पद्यानुवाद~~🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺देश विशेष में चित्त बाँधना, कहलाती है यही धारणा | मन को एकदम स्थिर करके,, नाक, नाभि, उर, मस्तक धरना| आओ बनकर विमल सुमन हम, धारणा का अभ्यास बढ़ाएं| उत्तम साधक बनने हेतु, योग की डोर पकड़ चढ़ जाएँ||👏


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नवरात्रि का त्यौहार और अर्थ-बोध चिरातीत से भारत के लोग आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक...

नवरात्रि का त्यौहार और अर्थ-बोध

चिरातीत से भारत के लोग आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि का त्यौहार भक्ति भावना और उत्साह से मनाते चले जाते हैं. इस त्यौहार के प्रारंभ में ही लोग ‘कलश’ की स्थापना करते हैं और अखंड दीप जगाते हैं जो लगातार नव दिंन और रात जागता रहता है. वे इन दिनों कन्या-पूजन करते, नियम पालन करते, जागरण तथा व्रत-उपवास करते तथा दुर्गा, काली, सरस्वती आदि का पूजन करते हैं.
प्रश्न उठता है कि 'आदि शक्ति’ का क्या स्वरूप है, सरस्वती, दुर्गा आदि का क्या वास्तविक परिचय है और अतीत काल में कन्याओं ने क्या महान कार्य किया था जिसकी स्मृति में आज तक नवरात्रि में उनका पूजन होता है?

नवरात्रि से संबंधित तीन प्रसंग
इस विषय में जानकारी के लिए नवरात्रि से संबंधित तीन मुख्य प्रसंग, जिनको कथा रूप में भक्त- जन सविस्तार सुना करते हैं, सहायक सिद्ध हो सकते हैं. उनमें से एक आख्यान में तो यह कहा गया है कि पिछली चतुरयुगी के अन्तिम चरण में जब विश्व विनाश निकट था, तब मधु और कैटभ नामक असुरों ने देवी-देवताओं को अपना बंदी बनाया हुआ था और तब श्री नारायण भी मोह निद्रा में सोए हुए थे. तब ब्रह्मा जी के द्वारा आदि कन्या प्रगट हुई. उसने नारायण को जगाया और उन्होने मधु तथा कैटभ का नाश कर देवी-देवताओं को मुक्त कराया. दूसरे आख्यान में कहा गया है कि 'महिषासुर’ नामक असुर ने स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं को पराजित किया हुआ था. त्रिदेव की शक्ति से एक कन्या के रूप में जो 'आदि शक्ति’ प्रगट हुई, वह दिव्य अस्त्रों-शास्त्रों से सुससज्जित थी, त्रिनेत्र थी और अष्ट भुजाओं वाली थी. उसने महिषासुर का वध किया और देवी-देवताओं को मुक्त कराया. तीसरे प्रसंग में कहा गया है की सूर्य के वंश में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर पैदा हुए, उनके प्रधान कार्यकर्ता का नाम रक्तबिंदु था, सेनापति का नाम धूम्रलोचन था और उसके दो मुख्य सहायकों का नाम चन्ड और मुण्ड था. शिव की शक्ति से 'आदि कुमारी’ प्रगट हुई और उसके विकराल रूप से काली प्रगट हुई. उसने चन्ड -मुण्ड का विनाश किया और फिर कालिका ने अपनी योगिनी शक्ति द्वारा धूम्रलोचन और रक्तबिंदु का भी विनाश किया. आख्यान में बताया गया है कि रक्त बिंदु की यह विशेषता थी कि यदि उसके रक्त का एक भी बिंदु गिर जाता तो उस बीज से एक और असुर पैदा हो जाता था. आदिशक्ति ने रक्त बिंदु का इस तरह विनाश किया कि उसका वक् भी बिंदु अथवा बीज नहीं रहा.

शब्दार्थ या भावार्थ
अब देखा जाए तो वास्तव में तो इन आख्यानों में रूपक अलंकार के द्वारा विश्व के एक बहुत ही महत्वपूर्ण वृतांत का वर्णन किया गया है. परंतु लोग प्रायः इसका शब्दार्थ ही ले लेते हैं जिससे वे सत्य-बोध से वंचित रह जाते हैं. वास्तव में किसी एक या किन्हीं दो असुरों द्वारा सभी देवी-देवताओं के परास्त होने की बात शब्दार्थ में तो किसी के गले के नीचे उतरना भी मुश्किल है. हाँ, भावार्थ में यह वृतांत बहुत महत्वपूर्ण है. वास्तव में 'मधु’ और कैटभ’ 'मीठे’ और 'विकराल’ अर्थ के वाचक होने से 'राग’ और द्वेष’ के प्रतीक हैं और 'असुर’ शब्द 'आसुरी लक्षणों’ या मनोविकारों’ का बोधक है. 'काम’, 'मोह’ और लोभ’ - 'मधु’ नामक 'असुर’ हैं और 'क्रोध’ तथा 'अहंकार’, 'कैटभ’ हैं. इसी प्रकार 'महिष’ शब्द का अर्थ 'भैंस’ हैं. भैंस 'मंद बुद्धि’, 'अविवेक’ तथा तमोगुण का प्रतीक है. तभी तो एक प्रश्नोक्ति भी है - “अक्ल बड़ी कि भैंस?” 'धूम्रलोचन का अर्थ है धुएँ वाली आँखें. अतः यह ईर्ष्या और बुरी दृष्टि का वाचक है. शुंभ और निशुंभ हिंसा और द्वेष आदि के वाचक हैं.

वास्तविक भाव
अतः तीनों आख्यानों का वास्तविक भाव यह है कि पिछली चतुरयुगी के अंत में जब विनाश काल निकट था और सृष्टि पर अज्ञान तथा तमोगुण रूपी रात्रि छाई हुई थी, तब राग (मधु) और द्वेष (कैटभ) ने (शुंभ और निशुंभ) उन सभी नर-नारियों को जो कि सतयुग में दिव्यता संपन्न होने से देवी-देवता थे परंतु धीरे-धीरे अपवित्रता की ओर अग्रसर होते आए थे, अपना बंदी बना रखा था. यहाँ तक की सतयुग के आरंभ में जो देव-शिरोमणि 'श्री नारायण’ थे, अब वे भी जन्म-जन्मान्तर के बाद मोह-निद्रा में विलीन थे. ऐसी धर्म-ग्लानि के समय परमपिता शिव ने त्रिदेव के द्वारा भारत की कन्याओं को ग्यान, योग तथा दिव्य गुण रूप शक्ति से सुसज्जित किया. यह ज्ञान ही उनका तीसरा नेत्र था और अंतर्मुखा, सहनशीलता आदि दिव्य शक्तियाँ ही उनकी अष्ट भुजाएँ थी. इन्हीं शक्तियों के कारण वे 'आदि शक्ति’ अथवा 'शिव शक्ति’ कहलाईं. इन आदि कुमारियों अथवा शक्तियों ने भारत के नर-नारियों को जो कि सतयुग में देवी-देवता थे, जगाया और उन्हें उत्साहित करके आसुरी प्रवृतियों का नाश किया - ऐसा की उनका बीज, अंश या बिंदु भी नहीं रहने दिया कि जिससे संसार में फिर आसुरियता पनप सके. उन द्वारा ज्ञान दिए जाने की यादगार के रूप में आज नवरात्रियों के प्रारंभ में 'कलश’ की स्थापना की जाती है. उन द्वारा जगाए जाने की स्मृति में आज भक्तजन जागरण करते हैं तथा योग द्वारा आत्मिक प्रकाश किए जाने के कारण ही वे अखंड दीप जगाते हैं. उन कन्याओं के महान कर्तव्य के कारण ही वे हर वर्ष इन दिनों कन्या-पूजन करते हैं और सरस्वती, दुर्गा, आदि से प्रार्थना करते है कि “हे अम्बे, हे माँ, मेरी ज्योति जगा दो, और मुझे ऐसी शक्ति प्रादान करो की मेरे अंतर का अंधकार मिट जाए.”

आत्मा का दीपक जगाओ
परंतु जन-जन को यह मालूम नहीं है कि अब पुनः कलियुग के अंत का समय चल रहा है और पुनः आसुरियता तथा भ्रष्टाचार का बोलबाला है तब परमपिता शिव पुनः कन्याओं को ज्ञान शक्ति देकर पुनः कार्य करा रहे हैं और इसलिए हम सभी का कर्तव्य है की हम केवल जयघोष या कर्मकांड में ही न लगे रहें बल्कि अपने मन में बैठे महिषासुर, मधु-कैटभ, रक्त बिंदु या धूम्रलोचन का नाश कर दें. वास्तव में ज्ञान द्वारा आत्म-ज्योति जागना ही सच्चा दीप जगाकर सही रूप में नवरात्रि मनाना है. यही नारायण द्वारा मोह-निद्रा को छोड़ना तथा मधु-कैटभ को मारना या (आध्यात्मिक) शक्ति द्वारा महिषासुर किंवा धूम्र लोचन और रक्त बीज आदि का संहार करना है.


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ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर...

ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं।
पढिए वह चौंकाने वाला सच…
ओशो उवाच…
जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत आने के लिए उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे.
ईसा मसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं. यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है.
पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बार-बार कहते हैं- “ अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।” यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है।उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं. ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था.जीसस कहते हैं कि “ अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था।” कौन हैं ये पुराने पैगंबर?“ वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- ” कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? “ यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि ” मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं।’’ पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं, और ईसा मसीह कहते हैं, “ मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है।” यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं !
सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है. यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी।पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था.
तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए. कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, “ जोशुआ”- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। ‘जीसस’


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*करे ये घरेलू कुछ उपाय :-* * हल्‍दी लीवर के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करने के लिए अत्‍यंत उपयोगी होती...

*करे ये घरेलू कुछ उपाय :-*

* हल्‍दी लीवर के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करने के लिए अत्‍यंत उपयोगी होती है। इसमें एंटीसेप्टिक गुण मौजूद होते है और एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करती है। हल्दी की रोगनिरोधन क्षमता हैपेटाइटिस बी व सी का कारण बनने वाले वायरस को बढ़ने से रोकती है। इसलिए हल्‍दी को अपने खाने में शामिल करें या रात को सोने से पहले एक गिलास दूध में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर पिएं

* सेब का सिरका, लीवर में मौजूद विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। भोजन से पहले सेब के सिरके को पीने से शरीर की चर्बी घटती है। सेब के सिरके को आप कई तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं- एक गिलास पानी में एक चम्मच सेब का सिरका मिलाएं, या इस मिश्रण में एक चम्मच शहद मिलाएं। इस म‍िश्रण को दिन में दो से तीन बार लें।

* आंवला विटामिन सी के सबसे संपन्न स्रोतों में से एक है और इसका सेवन लीवर की कार्यशीलता को बनाये रखने में मदद करता है। अध्ययनों ने साबित किया है कि आंवला में लीवर को सुरक्षित रखने वाले सभी तत्व मौजूद हैं। लीवर के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए आपको दिन में 4-5 कच्चे आंवले खाने चाहिए.

* पपीता लीवर की बीमारियों के लिए सबसे सुरक्षित प्राकृतिक उपचार में से एक है, विशेष रूप से लीवर सिरोसिस के लिए। हर रोज दो चम्मच पपीता के रस में आधा चम्मच नींबू का रस मिलाकर पिएं। इस बीमारी से पूरी तरह निजात पाने के लिए इस मिश्रण का सेवन तीन से चार सप्ताहों के लिए करें.

* सिंहपर्णी जड़ की चाय लीवर के स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने वाले उपचारों में से एक है। अधिक लाभ पाने के लिए इस चाय को दिन में दो बार पिएं। आप चाहें तो जड़ को पानी में उबाल कर, पानी को छान कर पी सकते हैं। सिंहपर्णी की जड़ का पाउडर बड़ी आसानी से मिल जाएगा।

* लीवर की बीमारियों के इलाज के लिए मुलेठी का इस्‍तेमाल कई आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता है। इसके इस्‍तेमाल के लिए मुलेठी की जड़ का पाउडर बनाकर इसे उबलते पानी में डालें। फिर ठंड़ा होने पर छान लें। इस चाय रुपी पानी को दिन में एक या दो बार पिएं।

* फीटकोंस्टीटूएंट्स की उपस्थिति के कारण, अलसी के बीज हार्मोंन को ब्‍लड में घूमने से रोकता है और लीवर के तनाव को कम करता है। टोस्‍ट पर, सलाद में या अनाज के साथ अलसी के बीज को पीसकर इस्‍तेमाल करने से लिवर के रोगों को दूर रखने में मदद करता है

* एवोकैडो और अखरोट को अपने आहार में शामिल कर आप लीवर की बीमारियों के आक्रमण से बच सकते हैं। एवोकैडो और अखरोट में मौजूद ग्लुटथायन, लिवर में जमा विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर इसकी सफाई करता है।

* पालक और गाजर का रस का मिश्रण लीवर सिरोसिस के लिए काफी लाभदायक घरेलू उपाय है। पालक का रस और गाजर के रस को बराबर भाग में मिलाकर पिएं। लीवर की मरम्मत के लिए इस प्राकृतिक रस को रोजाना कम से कम एक बार जरूर पिएं

* सेब और पत्तेदार सब्जियों में मौजूद पेक्टिन पाचन तंत्र में उपस्थित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल कर लीवर की रक्षा करता है। इसके अलावा, हरी सब्जियां पित्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं।

* एक पौधा और है जो अपने आप उग आता है , जिसकी पत्तियां आंवले जैसी होती है. इन्ही पत्तियों के नीचे की ओर छोटे छोटे फुल आते है जो बाद में छोटे छोटे आंवलों में बदल जाते है . इसे भुई आंवला कहते है. इस पौधे को भूमि आंवला या भू- धात्री भी कहा जाता है .यह पौधा लीवर के लिए बहुत उपयोगी है.इसका सम्पूर्ण भाग , जड़ समेत इस्तेमाल किया जा सकता है.तथा कई बाज़ीगर भुई आंवला के पत्ते चबाकर लोहे के ब्लेड तक को चबा जाते हैं . ये यकृत ( लीवर ) की यह सबसे अधिक प्रमाणिक औषधि है . लीवर बढ़ गया है या या उसमे सूजन है तो यह पौधा उसे बिलकुल ठीक कर देगा . बिलीरुबिन बढ़ गया है , पीलिया हो गया है तो इसके पूरे पढ़े को जड़ों समेत उखाडकर , उसका काढ़ा सुबह शाम लें . सूखे हुए पंचांग का 3 ग्राम का काढ़ा सवेरे शाम लेने से बढ़ा हुआ बाईलीरुबिन ठीक होगा और पीलिया की बीमारी से मुक्ति मिलेगी


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*🌺सिर में रूसी(Danduff)*🌺 परिचय: रूसी सिर में मरी हुई त्वचा के कण होते हैं, जो नई त्वचा के आने से...

*🌺सिर में रूसी(Danduff)*🌺

परिचय: रूसी सिर में मरी हुई त्वचा के कण होते हैं, जो नई त्वचा के आने से हटते रहते हैं। इन्हीं कणों को रूसी कहते हैं। यह रोग स्त्री और पुरुष दोनों में ही पाया जाता है। ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता कि उनके बालों में होने वाली रूसी तैलीय है या रूखी। रूखी रूसी के कण बहुत ही छोटे होते हैं, जो सिर की त्वचा से चिपके या बालों में फैले रहते हैं। ऐसी रूसी में बहुत खुजली होती है। जबकि तैलीय रूसी छोटे कणों के साथ सीबम से मिली होती है। कई बार रूसी ज्यादा हो जाने से बालों का गिरना भी शुरू हो जाता है।

रूसी बालों की सबसे बड़ी दुश्मन है। इसके कारण बाल अपना आकर्षण खो देते हैं। इस रोग के कारण सिर पर खुश्की होकर सफेद-सफेद रूसी बालों में हो जाती है। जब बालों में ब्रश या कंघा करते हैं या बालों को रगड़ते हैं तो यह बालों से निकलकर बाहर गिरने लगती है। यह खोपड़ी पर दाने या पपड़ी के रूप में भी निकल सकती है। यदि इन्हें बालों से बाहर न निकाला जाए तो यह वहां के रोमकूपों को बंद कर देती है। अगर बालों को साफ न रखा जाए तो उनमें रूसी पैदा हो सकती है और यह फैलने वाली होती है। इसलिए अपने कंघे, ब्रश, साबुन और तौलिए को अलग रखना चाहिए। बालों को सप्ताह में जितनी बार ज्यादा से ज्यादा हो धोना चाहिए।

*रूसी होने का कारण:-*

यह शरीर में दूषित द्रव्य के जमा हो जाने तथा गलत तरीके के खान-पान और दूषित भोजन का सेवन करने के कारण होती है।

सिर की ठीक तरीके से सफाई न करने के कारण भी सिर में रूसी हो सकती है।

जिस व्यक्ति के बालों में रूसी हो उसके द्वारा इस्तेमाल किये गये कंघी, तौलिये, ब्रश आदि दूसरे व्यक्तियों को इस्तेमाल नहीं करने चाहिए नहीं तो दूसरे व्यक्ति के बालों में भी रूसी हो सकती है।

शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता (रोगों से लड़ने की शक्ति) कम होने के कारण तथा भावनात्मक तनाव के कारण भी हो रूसी का रोग हो सकता है।

*बालों से रूसी को खत्म करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-*

पानी में नींबू का रस मिलाकर 1 सप्ताह तक प्रतिदिन बालों की जड़ों में अंगुलियों से अच्छी तरह से मसल लें। फिर थोड़ी देर बाद बालों को धो दें। इससे बालों में से रूसी खत्म हो जाती है।

3 भाग जैतून के तेल में 1 भाग शहद घोल लें। इस मिश्रण को सिर और बालों पर लगाकर सिर पर गर्म तौलिया लपेट लें। इसके बाद सिर को अच्छी तरह से धोने से बालों की रूसी खत्म हो जाती है।

नारियल के तेल में चार प्रतिशत कपूर मिलाकर रख लें। फिर अपने बालों को अच्छी तरह से धोकर बालों को सुखा लें। इसके बाद इस तेल को बालों में लगाकर सिर की अच्छी तरह से मालिश करें। इससे रूसी खत्म हो जाती है।

आंवला, शिकाकाई तथा रीठा को एक साथ पानी में भिगोकर उस पानी से सिर को धोयें। इस क्रिया को 2-3 दिन तक करने से बालों में से रूसी खत्म हो जाती है।

रोजाना जैतून के गुनगुने तेल से सिर की मालिश करें। फिर गर्म पानी में तौलिया भिगोकर अच्छी तरह से निचोड़कर पूरे सिर में बांध लें। इससे तेल और भाप बालों की जड़ों तक पहुंच जाता है। 3 घंटे के बाद गुनगुने पानी से बालों को अच्छी तरह से धोने से बालों मे से सारा शैंपू निकल जाता है।

दही या मट्ठे से सिर धोने से भी लाभ होता है।

सरसों के तेल में नींबू मिलाकर या सिरके में बहुत सारा पानी मिलाकर बालों की जड़ों में लगाकर लगभग 2 घंटे के बाद सिर को धोएं। इससे बालों में से रूसी कम हो जाती है।

बालों में रूसी होने पर प्रतिदिन सुबह के समय में अपने सिर की सूखी मालिश करने से बालों में से रूसी खत्म हो जाती है।

दही में थोड़े से सरसो के तेल को मिलाकर प्रतिदिन इस दही को सिर पर कुछ समय के लिए लगाकर फिर बालों को अच्छी तरह से धोने से रूसी खत्म हो जाती है।
रोजाना आधे घंटे तक सिर पर दही की मालिश करके सिर को धोने से रूसी खत्म हो जाती है।

मेथी के बीजों को रात के समय में पानी में भिगोने के लिए रख दें। सुबह के समय में इसे पीसकर लेप बनाकर सिर पर लगाएं और आधे घंटे के बाद सिर को धो लें।
बालों को ब्रश, शैंपू और कंघी से साफ-सुथरा रखें। संतुलित तथा सही से पचने वाला भोजन लें। पूरे सप्ताह में 2 बार गर्म तेल से सिर की मालिश करनी चाहिए।

रोजाना रोजमेरी के काढ़े से सिर की मालिश करने से लाभ मिलता है।
गर्म पानी में 1 नींबू का रस मिलाकर बालों में लगाकर फिर सिर को धोने से रूसी में लाभ होता है। बालों को धोने से पहले सिर की त्वचा में तेल की मालिश के बाद गर्म या ठंडे पानी में भीगा हुआ तौलिया लपेट लें। इससे त्वचा के रोम-छिद्र खुल जाते हैं, खून का बहाव तेज होता है और रूसी भी दूर होती है।

सुबह के समय में जब धूप निकल जाए तब कम से कम आधे घंटे तक सूर्य का प्रकाश अपने सिर पर लगने दें। इसके बाद मुलतानी मिट्टी का लेप बनाकर सिर पर लगा लें और कुछ देर बाद सिर को धो लें इससे रूसी खत्म हो जाती है।

1 अंडे की सफेदी और 1 नींबू के रस को मिलाकर सिर पर आधे घंटे के लिए लगाएं। फिर इसे सादे पानी से धो लें। अंत में सिरका सादे पानी में मिलाकर बालों को धोने से लाभ मिलता है।

सूर्यतप्त नीले तेल की मालिश सिर पर कुछ दिनों तक करने से रूसी खत्म हो जाती है।

शरीर में से दूषित द्रव्यों को बाहर करने के लिए व्यक्ति को सप्ताह में एक बार उपवास रखना चाहिए तथा पत्ता गोभी का रस, पालक का रस, अन्ननास का रस सेवन करना चाहिए। एक सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद सामान्य भोजन करना चाहिए और भोजन में फल, अंकुरित दालें तथा सलाद अधिक लेने चाहिए।

चाय, मिर्च-मसालेदार, कॉफी, रिफाइंड वाले पदार्थ तथा मैदा से बनी चीजों का सेवन न करें। पेट को साफ करने के लिए एनिमा क्रिया की आवश्यकता पड़े तो यह क्रिया जरूर करनी चाहिए।


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*🌺सिर में जुएँ(Head Lice*🌺 परिचय: इस रोग के हो जाने पर रोगी के सिर में अनेक जुएं हो जाती हैं। सिर...

*🌺सिर में जुएँ(Head Lice*🌺

परिचय: इस रोग के हो जाने पर रोगी के सिर में अनेक जुएं हो जाती हैं। सिर में जुएं होने के कारण व्यक्ति को और भी कई रोग हो जाते हैं इसलिए सिर की जुओं को खत्म करना बहुत जरूरी है।
सिर की जुओं को खत्म करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

सिर की जुओं को खत्म करने के लिए सिर में अच्छी तरह सफाई रखनी चाहिए। इसके बाद 1 भाग लाल बोतल के सूर्यतप्त जल और 2 भाग हरी बोतल के सूर्यतप्त तेल को आपस में मिलाकर, इस तेल से सिर की मालिश करनी चाहिए। इसके बाद 25 ग्राम हल्की नीली बोतल का सूर्यतप्त जल लेकर प्रतिदिन 6 बार बालों पर लगाना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से सिर की जुएं समाप्त हो जाती हैं।

जानकारी- सिर की जुओं को खत्म करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने पेट को साफ रखना चाहिए और सदैव सादा भोजन खाना चाहिए।


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*🌺अपच(बदहजमी) Indigestion🌺* परिचय:- अपच रोग आमाशय या आंतों के ठीक से काम न करने के कारण होता है। इस...

*🌺अपच(बदहजमी) Indigestion🌺*

परिचय:-
अपच रोग आमाशय या आंतों के ठीक से काम न करने के कारण होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को खाया-पिया भोजन पचता नहीं है तथा उसे खट्टी डकारे आने लगती है। अपच रोग साधारण हो या बहुत अधिक यह आमाशय और आंतों की बहुत सारी बीमारियों के होने का कारण बनता है। आमाशय और आंतों की बहुत सारी बीमारियों से बचने के लिए रोगी व्यक्ति को अपच रोग का जल्दी से उपचार कराना चाहिए, नहीं तो यह बीमारी और भी रोगों को जन्म दे सकती है जैसे- जी मिचलाना, डकारें आना, उल्टी आना, हृदय में जलन, पेट में दर्द तथा मरोड़, अम्ल, मुंह में घाव होना, मसूढ़ों से खून आना आदि। यदि यह रोग बहुत अधिक हो जाता है तो रोगी को डायरिया या कब्ज जैसे रोग भी हो सकते हैं।
यदि इस रोग के होने का कारण पता लग जाए तो बीमारी के लक्षणों का उपचार हो सकता है। यदि इस रोग के होने का कारण पता न लगे तो भी इस रोग का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से हो सकता है। इस रोग के होने का सीधा संबन्ध हमारे भोजन करने के तरीके तथा भोजन संबन्धी आदतों से होता है। यदि हम अपने भोजन करने के तरीके तथा भोजन संबन्धी आदतों में सुधार करते हैं तो यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

*अपच रोग होने का लक्षण :-*

अपच रोग से पीड़ित रोगी को भूख नहीं लगती है तथा उसके मुंह से बिना पचा भोजन बाहर आने लगता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी-खट्टी डकारे आने लगती हैं तथा उसका जी मिचलाने लगता है और उसका कुछ भी खाने का मन नहीं करता है।
रोगी व्यक्ति के गले तथा हृदय में जलन होने लगती है और उसकी सांसों से बदबू आने लगती है तथा पेट में गैस बनने लगती है।
इस रोग से पीड़ित रोगी अगर थोड़ा सा भी खाना खा लेता है तो उसका पेट भारी होने लगता है तथा पेट और छाती में दर्द होने लगता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी उल्टियां भी होने लगती है और उसकी जीभ पर मैल जम जाता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को कब्ज भी होने लगती है तथा जब इस रोग की अवस्था अधिक गंभीर हो जाती है तो उसे डायरिया जैसे रोग जाते हैं।
इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को और भी कई प्रकार के रोग हो जाते हैं जो इस प्रकार हैं- आंतों में सूजन, जिगर की बीमारियां, एपेन्डिसाइटिस, बड़ी आंतों में सूजन, आंतों में घाव तथा गुर्दे की बीमारियां आदि।


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*अपच रोग होने का कारण :-* प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार अपच रोग उस व्यक्ति को हो जाता है जो अपनी भूख...

*अपच रोग होने का कारण :-*

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार अपच रोग उस व्यक्ति को हो जाता है जो अपनी भूख से अधिक भोजन करता है, जल्दी-जल्दी भोजन करता है तथा खाना ठीक से चबाकर नहीं खाता है।
अपच रोग कई प्रकार के गरिष्ठ (भारी तथा दूषित भोजन), तैलीय भोजन, बासी तथा सड़े-गले खाद्य पदार्थों का भोजन में उपयोग करने के कारण होता है।
अपच रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो भोजन करने के तुरंत बाद काम में लग जाते हैं।
भय, चिंता, ईर्ष्या, क्रोध, तनाव से ग्रस्त व्यक्तियों को यह रोग जल्दी हो जाता है।
भोजन के साथ-साथ पानी पीना, चाय का अधिक सेवन करना, कॉफी, साफ्ट ड्रिंक तथा शराब आदि का अधिक सेवन करने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।
अधिक धूम्रपान करने, सही समय पर भोजन न करने तथा काम न करने के कारण भी अपच रोग हो सकता है।
बार-बार बिना भूख लगे ही खाना खाने के कारण भी यह रोग हो जाता है।
ठीक समय पर खाना न खाने अथार्त खाने खाने का कोई निश्चित समय न होने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।
गलत तरीके से खान-पान तथा जल्दी-जल्दी खाना खाने तथा तनाव में खाना खाने के कारण भी यह रोग हो जाता है।
भोजन करते समय कोई मानसिक परेशानी तथा भावनात्मक रूप से परेशान रहने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।
कब्ज बनने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
अत्यधिक सिगरेट पीने के कारण भी यह रोग हो जाता है।
जब शरीर में भोजन को जल्दी पचाने वाले एन्जाइम में कमी हो जाती है तो भी यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।

*अपच रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-*

1. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी के अपच रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इसके होने के कारणों को दूर करना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी को 1 से 3 दिनों तक रसाहार (नारियल पानी, संतरा, अनन्नास, अनार, नींबू पानी और कई प्रकार के फलों का रस) पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद कुछ दिनों तक रोगी को फलों का सेवन करना चाहिए तथा इसके बाद सामान्य भोजन का सेवन करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।

2. रोगी व्यक्ति को मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य, मिठाइयों, चीनी, मैदा आदि का भोजन में उपयोग नहीं करना चाहिए तभी अपच रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।

3. इस रोग से पीड़ित रोगी को बार-बार भोजन नहीं करना चाहिए बल्कि भोजन करने का समय बनाना चाहिए और उसी के अनुसार भोजन करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को भोजन उतना ही करना चाहिए जितना कि उसकी भूख हो। भूख से अधिक भोजन कभी भी नहीं करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को भोजन कर लेने के बाद सोंफ खानी चाहिए और तुरंत पेशाब करना चाहिए और इसके बाद वज्रासन पर बैठ जाना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

4. रोगी व्यक्ति को अपनी पाचनशक्ति को बढ़ाने के लिए तुलसी के पत्तों या पुदीने के पत्ते पीसकर पानी में घोलकर पीना चाहिए।

5. रोगी व्यक्ति के रोग को ठीक करने के लिए पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान कराना चाहिए। फिर रोगी को कुंजल क्रिया तथा जलनेति क्रिया करानी चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

6. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसनों का उपयोग किया जा सकता है और ये आसन इस प्रकार हैं-

अर्धमत्स्येन्द्रासन,
उत्तानपादासन,
सुप्त पवनमुक्तासन
योगमुद्रासन,
सर्वांगासन
चक्रासन,
वज्रासन,
शवासन,
भुजंगासन

इन सभी यौगिक क्रियाओं को करने से रोगी का अपच रोग ठीक हो जाता है तथा इसके अलावा योग मुद्रा, कपालभाति, लोम अनुलोम, उज्जायी प्राणायाम करने से भी रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

1. अपच रोग से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

2. रोगी व्यक्ति को अपना उपचार कराने से पहले वसायुक्त खाद्य पदार्थ, कॉफी, चाय, शराब, धूम्रपान तथा उच्च प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को सेवन नहीं करना चाहिए।

3. इस रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट पर गर्म तथा ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए। इसके फलस्वरूप पेट में दर्द तथा गैस बनना बंद हो जाती है तथा यह रोग ठीक हो जाता है।

4. अपच रोग को ठीक करने के लिए गैस्ट्रो-हैपेटिक लपेट का इस्तेमाल करना चाहिए जिसके फलस्वरूप दर्द से आराम मिलता है और इस रोग से रोगी को आराम मिलता है।

5. पेट के अवयवों में रक्त संचार को सुधारने के लिए मिट्टी लपेट का उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रक्त संचार में सुधार हो जाता है और इस रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।

6. अपच रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कम से कम 40 से 60 मिनट तक पेट पर ठंडा लपेट करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत आराम मिलता है और रोग ठीक हो जाता है।

7. इस रोग से पीड़ित रोगी को पेट के बल लेटना चाहिए तथा पवनमुक्तासन का अभ्यास करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।

8. इस रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले नींबू के रस में पानी को मिलाकर दिन में कम से कम 3-4 बार पीना चाहिए तथा कम से कम 3 दिन तक उपवास रखना चाहिए और कटिस्नान करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को अपने पेट को साफ करने के लिए पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाए।


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*🌺भूख बढ़ाने के असरदार उपाय*🌺 मारे शरीर की अग्नि खाये गये भोजन को पचाने का काम करती हैयदि यह...

*🌺भूख बढ़ाने के असरदार उपाय*🌺

मारे शरीर की अग्नि खाये गये भोजन को पचाने का काम करती हैयदि यह अग्निकिसी कारण से मंद पड़ जाये तो भोजन ठीक तरह से नही पचता हैभोजन के ठीक सेनही पचने के कारण शरीर में कितने ही रोग पैदा हो जाते हैअनियमित खानपानसे वायु पित्त और कफ़ दूषित हो जाते हैजिसकी वजह से भूख लगनी बंद हो जातीहैऔर अजीर्ण अपच वायु विकार तथा पित्त आदि की शिकायतें आने लगती हैभूखलगनी बंद हो जाती हैशरीर टूटने लगता हैस्वाद बिगड जाता है..
पेट में भारीपन महसूस होने लगता है पेट खराब होने सेदिमाग खराब रहना चालू हो जाता हैअथवा समझ लीजिये कि शरीर का पूरा का पूरातंत्र ही खराब हो जाता हैइसके लिये मंन्दाग्नि से हमेशा बचना चाहिये औरतकलीफ़ होने पर इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिये।

भूख नही लगने पर आधा माशा फ़ूला हुआ सुहागा एक कप गुनगुने पानी में दो तीन बार लेने से भूख खुल जाती है।

काला नमक चाटने से गैस खारिज होती हैऔर भूख बढती हैयह नमक पेट को भी साफ़ करता है।

हरड का चूर्ण सौंठ और गुड के साथ अथवा सेंधे नमक के साथ सेवन करने से मंदाग्नि ठीक होती है।

सेंधा नमकहींग अजवायन और त्रिफ़ला का समभाग लेकर कूट पीस कर चूर्णबना लेंइस चूर्ण के बराबर पुराना गुड लेकर सारे चूर्ण के अन्दर मिलादेंऔर छोटी छोटी गोलियां बना लेंरोजाना ताजे पानी से एक या दो गोली लेनाचालू कर देयह गोलियां खाना खाने के बाद ली जाती हैइससे खाना पचेगा भी औरभूख भी बढेगी।

हरड को नीब की निबोलियों के साथ लेने से भूख बढती हैऔर शरीर के चर्म रोगों का भी नाश होता है।

हरड गुड और सौंठ का चूर्ण बनाकर उसे थोडा थोडा मट्ठे के साथ रोजाना लेने से भूख खुल जाती है।

छाछ के रोजाना लेने से मंदाग्नि खत्म हो जाती है।

सोंठ का चूर्ण घी में मिलाकर चाटने से और गरम जल खूब पीने से भूख खूब लगती है।

रोज भोजन करने से पहले छिली हुई अदरक को सेंधा नमक लगाकर खाने से भूख बढती है।

लाल मिर्च को नीबू के रस में चालीस दिन तक खरल करके दो दो रत्ती की गोलियां बना लेंरोज एक गोली खाने से भूख बढती है।

गेंहूं के चोकर में सेंधा नमक और अजवायन मिलाकर रोटी बनवायी जायेइससे भूख बहुत बढती है।

मोठ की दाल मंदाग्नि और बुखार की नाशक है।
डेढ ग्राम सांभर नमक रोज सुबह फ़ांककर पानी पीलेंमंदाग्नि का नामोनिशान मिट जायेगा।

पके टमाटर की फ़ांके चूंसते रहने से भूख खुल जाती है।

दो छुहारों का गूदा निकाल कर तीन सौ ग्राम दूध में पका लेंछुहारोंका सत निकलने पर दूध को पी लेंइससे खाना भी पचता हैऔर भूख भी लगती है।

जीरा सोंठ अजवायन छोटी पीपल और काली मिर्च समभाग में लेंउसमे थोडीसी हींग मिला लेंफ़िर इन सबको खूब बारीक पीस कर चूर्ण बना लेंइस चूर्ण काएक चम्मच भाग छाछ मे मिलाकर रोजाना पीना चालू करेंदो सप्ताह तक लेने सेकैसी भी कब्जियत में फ़ायदा देगा।

भोजन के आधा घंटा पूर्व चुकन्दर गाजर टमाटर पत्ता गोभी पालक तथा अन्यहरी साग सब्जियां व फ़लीदार सब्जियों के मिश्रण का रस पीने से भूख बढतीहै।

सेब का सेवन करने से भूख भी बढती है और खून भी साफ़ होता है।

अजवायन चालीस ग्राम सेंधा नमक दस ग्राम दोनो को कूट पीस कर एक साफ़बोतल में रखलेंइसमे दो ग्राम चूर्ण रोजाना सवेरे फ़ांक कर ऊपर से पानी पीलेंइससे भूख भी बढेगी और वात वाली बीमारियां भी समाप्त होंगी।

एक पाव सौंफ़ पानी में भिगो देंफ़िर इस पानी में चौगुनी मिश्री मिलाकर पका लेंइस शरबत को चाटने से भूख बढती है।

पकी हुई मीठी इमली के पत्ते सेंधा नमक या काला नमक काली मिर्च और हींग का काढा बनाकर पीने से मंदाग्नि ठीक हो जाती है।

जायफ़ल का एक ग्राम चूर्ण शहद के साथ चाटने से जठराग्नि प्रबल होकर मंदाग्नि दूर होती है।

सोंफ़ सोंठ और मिश्री सभी को समान भाग लेकर ताजे पानी से रोजाना लेना चाहिये इससे पाचन शक्ति प्रबल होती है।
जवाखार और सोंठ का चूर्ण गरम पानी से लेने से मंदाग्नि दूर होती है।

लीची को भोजन से पहले लेने से पाचन शक्ति और भूख में बढोत्तरी होती है।
अनार भी क्षुधा वर्धक होता हैइसका सेवन करने से भूख बढती है।

नीबू का रस रोजाना पानी में मिलाकर पीने से भूख बढती है।

आधा गिलास अनन्नास का रस भोजन से पहले पीने से भूख बढती है।

तरबूज के बीज की गिरी खाने से भूख बढती है..

बील का फ़ल या जूस भी भूख बढाने वाला होता है।

इमली की पत्ती की चटनी बनाकर खाने से भूख भी बढती हैऔर खाना भी हजम होता है।

सिरका सोंठ काला नमक भुना सुहागा और फ़ूला हींग समभाग मे लेकर मिला लेंरोजाना खाने के बाद भूख बढती है।

सूखा पुदीना बडी इलायची सोंठ सौंफ़ गुलाब के फ़ूल धनिया सफ़ेद जीराअनारदाना आलूबुखारा और हरड समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लेंमंदाग्निअवश्य दूर हो जायेगी।

एक ग्राम लाल मिर्च को अदरक और नीबू के रस में खरल कर लेंफ़िर इसकीकाली मिर्च के बराबर की गोलिया बना लेंयह गोली चूसने से भूख बढती है।


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*🌺भूख ना लगना(मंदाग्नी) Dyspepsia*🌺 परिचय: हमारे द्वारा किया जाने वाला भोजन जब आमाशय में जाता है तो...

*🌺भूख ना लगना(मंदाग्नी) Dyspepsia*🌺

परिचय: हमारे द्वारा किया जाने वाला भोजन जब आमाशय में जाता है तो वह वहां जाकर आमाशय की अग्नि द्वारा ही पकता है। भोजन को जो अन्दर पचाकर रस बनाता है उसे जठराग्नि कहते हैं। शरीर में भोजन इसी के द्वारा पचता है परन्तु जब जठराग्नि कमजोर हो जाती है और भोजन को पचाने में असमर्थ हो जाती है तो व्यक्ति के अन्दर भूख का नाश हो जाता है अर्थात व्यक्ति को भूख नहीं लगती और शरीर में खून की कमी हो जाती है। इससे रोगी में सिर का दर्द, सिर का भारी होना तथा खून की कमी होने जैसे रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इस रोग के कारण शरीर सूख जाता है तथा चेहरे पर उदासी व चमक में कमी आ जाती है।

कारण- इस रोग के उत्पन्न होने के अनेक कारण होते हैं। इस रोग को उत्पन्न होने का कारण अधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन करना, अनियमित भोजन करना, कोई कार्य न करना, भोजन करने के बाद बैठना, कब्ज बनाने वाले भोजन का सेवन करना आदि है। कभी-कभी यह रोग अधिक वीर्य रस्खलन के कारण भी हो जाता है।

जल चिकित्सा द्वारा रोग का उपचार- मन्दाग्नि को दूर करने के लिए 1 दिन का उपवास रखना चाहिए। आंतों को साफ करना चाहिए और फिर उपवास करना चाहिए। इस रोग को दूर करने के लिए वीर्य की रक्षा करें।


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काम के हैं ये हेल्थ टिप्स अगर आपके बाल ड्राई हैं, तो हफ्ते में एक बार बालों पर गर्म तेल की मसाज व...

काम के हैं ये हेल्थ टिप्स

अगर आपके बाल ड्राई हैं, तो हफ्ते में एक बार बालों पर गर्म तेल की मसाज व भाप दें। गर्म तेल बालों को ड्राई होने से रोकेगा और उन्हें मुलायम बनाएगा। 

मेहंदी को कलर आने तक ही बालों पर लगाकर रखें और फिर तुरंत धो दें। मेहंदी जितनी देर बालों में लगी रहती है, उतनी देर बालों की नमी सोखती है। 

ड्राई बालों पर ब्राशिंग स्कैल्प पर दबाकर करने से तैलीय ग्रंथियां सक्रिय होती है, जिससे बालों की ड्राईनेस कम होती है। 

गाजर के जूस में शहद व नमक डालकर पीने से आंखों की कम हुई रोशनी लौट आती है। 

किडनी स्टोन से दूर रहने के लिए नियमित तौर पर तरबूज ड्रिंक का सेवन करें। 

चुकंदर में आयर्न की मात्रा अधिक होती है। इसके नियमित सेवन से चेहरे पर ग्लो आता है। 

दिल के रोगियों के लिए करेला ड्रिंक बेहद फायदेमंद है। यह ब्लड को स्वच्छ बनाए रखता है।


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#Poor_Hindus केरल की वामपंथी सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पेश किया है, जिसके बाद केरल के सभी...

#Poor_Hindus

केरल की वामपंथी सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पेश किया है, जिसके बाद केरल के सभी मंदिरों में जो भी नियुक्तियाँ होंगी वह PSC (Public Service Commission) की परीक्षा के जरिये होंगी…

मंदिरों की संपत्ति और प्रशासनिक नियंत्रण को पूरी तरह अपने हाथ में रखने की दिशा में यह एक और कदम है… इससे पहले पिछली काँग्रेस सरकार ने मंदिरों के रखरखाव और प्रबंधन करने वाले “देवस्वाम बोर्ड” की शक्तियों को कम करने हेतु एक विधेयक लाया था… यानी कदम-दर-कदम पद्मनाभ, गुरुवायूर, त्रावणकोर सहित केरल के लगभग 3000 से अधिक मंदिर, उनका प्रबंधन, रखरखाव और उनकी संपत्ति पूरी तरह से सरकारों के अधीन हो जाएगी…

जैसा कि सभी जानते हैं, सरकार का नियंत्रण केवल और केवल मंदिरों पर ही होता है, मस्जिदों अथवा चर्च पर नहीं. मंदिरों की दानपेटी से पैसा लेकर दूसरे कामों में लगाया जाता है, ट्रस्टी बोर्ड में कई बार “गैर-हिन्दू” भरे जाते हैं… जबकि मस्जिदों और चर्च को सरकारी अनुदान सहित बिना किसी सरकारी दखलंदाजी के मौज करने की पूरी छूट है….

(नोट :- प्रत्येक राजनैतिक दल अपने वोट बैंक को खुश करने अथवा विरोधी वोट बैंक को हताश करने के लिए कदम उठाने में लगा हुआ है…- सिवाय भाजपा के… क्योंकि भाजपा को यह मुगालता हो गया है कि उसे जो 31% वोट मिला है, वह “केवल विकास” के लिए मिला है…)

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(P)Secularuim !!! - My Foot…


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साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जब जन्मभूमि...

साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे
निपुण थी इसे
चिमटाधारी साधुओं
की सेना भी कहते थे । जब
जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के
साथ चिमटाधारी साधुओं
की सेना की सेना मिल
गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर
जाबाज़
खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध
किया ।
चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से
मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस
प्रकार चबूतरे पर
स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़
खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत
क्रोधित
हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य
सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार
सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ
अयोध्या की ओर
भेजा और साथ मे ये आदेश
दिया की अबकी बार
जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है ,यह समय सन्
1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के
गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के
माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह
सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर
अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह
जहां आजकल
गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे
सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास
एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु
एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।इन वीरों कें सुनियोजित
हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद
हसन
अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब
हिंदुओं की इस
प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद
4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने
की हिम्मत
नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मे
एक बार फिर
श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस
भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग
10 हजार से
ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर
दी नागरिकों तक
को नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल
हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प
कूप नाम
का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं
की लाशें मुगलों ने उसमे
फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर
उसे घेर दिया।
आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के
नाम से प्रसिद्ध है,और
जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।
शाही सेना ने
जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह
चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर
अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस
गड्ढे पर
ही श्री रामनवमी के दिन
भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और
जल चढाती रहती थी. नबाब
सहादत अली के समय 1763
ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के
राजा गुरुदत्त
सिंह और पिपरपुर के
राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच
आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं
की लाशें
अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर
मे कर्नल हंट
लिखता है की
“ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और
मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने
की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान
होने के नाते उसने
काफिरों को जमीन नहीं सौंपी।
“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ
62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे
मकरही के राजा के
नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए
हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें
बड़ी संख्या में हिन्दू
मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर
नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं
की शक्ति क्षीण होने
लगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं
और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम
मे भीती,हंसवर,,मकर
ही,खजुरहट,दीयरा
अमेठी के
राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई
हिन्दू
सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं
की सेना आ
मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के
चिथड़े उड गये और उसे
रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।
मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल
शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर
लिया और
हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में
हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नावाब
वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने
जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद
गजेटियर में कनिंघम ने लिखा
“इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ
।दो दिन
और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के
मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर
कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़
ने कब्रें तोड़
फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने
लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर
अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ ने
मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई
हानि नहीं पहुचाई।
अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।
इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये
अयोध्या का सबसे
बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।
हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब
द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस
बनाया । चबूतरे पर तीन फीट
ऊँची खस की टाट से एक
छोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमे
पुनः रामलला की स्थापना की गयी।
कुछ
जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार
नहीं हुई और
कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल
गयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुर
शाह जफर के समय
में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर
अली के साथ
जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन
1858 को कुबेर टीला स्थित एक
इमली के पेड़ मे
दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया ।
जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं
रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित
हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस
आखिरी निशानी को भी मिटा दिया…
इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के
कारण
रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल
हो गया … अन्तिम बलिदान …
३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के
लालची मुलायम सिंह यादव के
द्वारा खड़ी की गईं अनेक
बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और
विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन
२ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव
ने
कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें
सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन
की आहुतियां दीं।
सरकार ने
मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट
रामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१
को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन
मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने
इस्तीफा दिया।
लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु
अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के
सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक
मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया। परन्तु हिन्दू
समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवं
नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े
आराध्य
भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं।
जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने
अपना रक्त पानी की तरह बहाया। आज
वही हिन्दू
बेशर्मी से इसे "एक विवादित स्थल” कहता है।
सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज
भी जन्मभूमि पर
अपना दावा नहीं छोड़ा है।
वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर
नहीं बनने देना चाहते
हैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें
नीचा दिखाया जा सके।
जिस कौम ने अपने
ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते
हैं
हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तक
किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के
उद्धार के लिए
आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन
नहीं किया और सरकार
पर दबाव नहीं बनाया आज भी वे
बाबरी-विध्वंस
की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते
हैं। और
मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम
जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण
उलझा हुआ
है।
ये लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्म
नहीं आयी वो कृपया अपने घरों में राम
का नाम
ना लें…अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनके मरने के बाद
कोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं।
विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल के कार्यकर्ता एक दिन श्रीराम
जन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे।
चाहे अभी और कितना ही बलिदान
क्यों ना देना पड़े।
कृपया आगे फॉरवर्ड करे
आपका बहुत आभारी रहूँगा


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मूल कर्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-2 Like Post: Tweet इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय...

मूल कर्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-2

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इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय ‘समान संकल्प’ है। सारे राष्ट्रवासियों का एक संकल्प हो जाना बहुत बड़ी बात है। जिस परिवार का भी 'एक संकल्प’ हो जाता है उसके विषय में भी देखा जाता है कि वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता है। इसलिए एक शिव संकल्प से भर जाना सारे राष्ट्रवासियों का परम कत्र्तव्य है, जब देश पराधीन हो रहा था तो उस समय सारे राष्ट्र में 'एक संकल्प’ का ही तो अभाव था। जब वह 'एक संकल्प’ इस बात को लेकर बनने लगा कि अब अंग्रेजों को भारत से भगाना ही है तो अंग्रेजों को भारत छोडऩा ही पड़ गया। इसलिए एक 'शिव संकल्प’ से बँध जाना भी सभी राष्ट्रवासियों का परम कत्र्तव्य है।


4. चौथा वेद मन्त्र है :-

समानी प्रथा सहवोअन्नभाग समाने योक्त्रे सहवो युनज्मि।

समयञ्चो अग्निं सपर्यतारा नाभिमिवा मित:।

(यजु. 3-30-6)


“हे मनुष्यो! तुम्हारे जल पीने का स्थान एक हो और तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ-साथ हो। मैं तुम सबको एक ही जुए में साथ-साथ जोड़ता हूँ। तुम सब मिलाकर ईश्वर की पूजा करो, जैसे पहिए के आरे केन्द्र स्थान में जुड़े रहते हैं, वैसे ही तुम भी अपने समाज में एक दूसरे के साथ मिलकर रहो।”


इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय हमारे द्वारा देश में 'सामाजिक समरसता’ की स्थापना करना है। वेद का सभी राष्ट्रवासियों से आग्रह है कि वो देश में सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए अपने-अपने स्थान पर सक्रिय हों। बिना सामाजिक समरसता के कोई भी राष्ट्र उन्नति नही कर सकता। आज हमारी अवन्नति का कारण सामाजिक विषमताऐं हैं। सामाजिक समरसता का देश में नितान्त अभाव है। लोग अपने-अपने स्तर के अनुसार अलग-अलग कॉलोनियां बसाते जा रहे हैं। उनमें एक ही स्तर के लोग रहेंगे। दूसरों के लिए वहां प्रवेश तक निषिद्घ है। खाने-पीने और रहने-सहने के स्थान अलग-अलग हैं। इसलिए 'सामाजिक समरसता’ हमारे लिए मृग मरीचिका बन गयी है। वेद कहता है कि सामाजिक समरसता की स्थापना कर समाज में आत्मीय भाव का विकास करो। इसे अपना जीवन व्रत बना लो।


5. पाँचवां वेद मन्त्र है :-

सहृदयं सामनस्यम् विद्वेषं कृणोमि व:।

अन्यो अन्यभाभिह्र्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या।।

(अथर्व. 3-30-1)


“हे मनुष्यो! तुम लोग हृदय के भाव प्रेमपूर्ण, मन में शुभ विचार और परस्पर निर्वैरता अपने मन में स्थिर करो। तुममें से हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से प्रेमपूर्ण बर्ताव करे जिस प्रकार कि नवजात बछड़े से उसकी गौ माता प्यार करती है।”

'नि:स्वार्थ प्रेमपूर्ण व्यवहार’ इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। वेद का आदेश है कि उत्तम राष्ट्र सृजन के लिए परस्पर प्रेमपूर्ण व्यवहार को अपने राष्ट्रीय चरित्र का एक आवश्यक अंग बना लो। इस प्रकार के व्यवहार से समस्त राष्ट्रवासी आपस में निर्वैरता और अहिंसा भाव से भर जायेंगे। गाँधीजी देश में लोकप्रिय इसलिए हुए कि उन्होंने नि:स्वार्थ प्रेम, अहिंसा और बन्धुत्व की बातें कीं। यह अलग बात है कि गाँधीजी की इन बातों को देश के एक वर्ग ने नही माना और गाँधी जी लोकप्रिय होकर अपने उद्देश्य में भी असफ ल सिद्घ हुए। क्योंकि एक वर्ग का संकल्प घृणा के आधार पर राष्ट्र का विभाजन कराना बन गया। गाँधीजी किसी एक वर्ग की इस घृणा को प्रेम में परिवत्र्तित नहीं कर पाये। इसलिए राष्ट्र का विभाजन हो गया। ये मंत्र हमें यह बताता है कि सभी राष्ट्रवासियों को परस्पर प्रेमपूर्ण बत्र्ताव करना चाहिए अन्यथा घृणा पाँव पसार लेगी और उसका परिणाम होगा विभाजन और केवल विभाजन।

(लेखक की पुस्तक 'वेद महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान’ से)

Tags:    वेद   राष्ट्र संगठन   


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एक दूसरे के सैन्य अड्डों का प्रयोग कर सकेंगें अमेरिका और भारत, हुआ करार… - चीन के पर कतरने की...

एक दूसरे के सैन्य अड्डों का प्रयोग कर सकेंगें अमेरिका और भारत, हुआ करार…
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चीन के पर कतरने की रणनीति पर एक कदम और आगे बढे अमेरिका और भारत….
अभी कल ही बलूचिस्तान पर पाकिस्तानी सुर में रेंका था ड्रेगन…. पाक चीन काडिडोर में अडबंगा लगाने पर भारत को परिणाम भुगतने की धमकी दी थी….
और आज उसे मुहतोड़ जबाब मिल गया…
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चीन अब भी यह समझ नहीं पाया है कि भारत से कांग्रेसी कुशासन समाप्त हो चुका है….और नरेंद्र मोदी भारत की बागडोर संभाले हुए हैं….जिनकी आदत है कि… *वो मारते कम ..घसीटते ज्यादा हैं*…
😀😀😀😀😂😎


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★ सरकार से प्रश्न ??????? अगर 3 बार मुख्य मंत्री बनने के बाद अभी भी मायावती जी दलित हैं और 66 साल...

★ सरकार से प्रश्न ???????

अगर 3 बार मुख्य मंत्री बनने के बाद अभी भी मायावती जी दलित हैं और 66 साल तक आरक्षण का लाभ लेकर भी वह समाज दलित है तो जरूर #आरक्षण की वर्तमान प्रणाली में दोष है ।

सैकडों IAS , IPS , PCS और लाखों श्रेष्ठ उम्मीदवार के अधिकार हडपने के बाद भी दलित , अब तक दलित हैं ।

कई मंत्री, सैकड़ों विधायक व सांसद होने के बाद भी अब तक दलित दलित हैं … तो समस्या मानसिकता में है ।

क्या आपने कभी सोचा कि जिस आरक्षण व्यवस्था का प्रावधान आज़ादी के बाद भारत सरकार ने किया था , उस वर्ष यदि किसी 18 वर्ष के व्यक्ति ने यदि आरक्षण का लाभ लिया होगा तो 2017 में उसकी पांचवीं पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेने जा रही है।

क्या आपको लगता है कि बाबू जगजीवन राम जो कि इंदिरागांधी के काल में केंद्रीय मंत्री रहे उनके परिवार की मीरा कुमार या किसी अन्य को आरक्षण दिया जाना चाहिए ????

पी एल पूनिया जो कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रह चुके हैं उनके परिवार के किसी सदस्य को आरक्षण की दरकार है????

वर्ष 1902 में शाहू जी महाराज ने अपनी रियासत में पहला आरक्षण का प्रावधान किया था। 1908 एवं 1909 में अंग्रेजी हुकूमत ने “मिंटो मार्ले ” कानून बना कर भारत में आरक्षण की व्यवस्था लागु की थी।

लेकिन वर्ष 2015 में यानि की 106 साल बाद भी अगर समस्या का निदान नहीं हो पाया है तो ज़रूर सिस्टम में कोई कमी है।

1950 से ही पब्लिक रिप्रजेंटेशन एक्ट के द्वारा हर पांच साल में आरक्षित वर्ग से लगभग 131 सांसद लोकसभा में पहुंचते है, क्या आपको लगता है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली में कोई गरीब चुनाव लड़ सकता है ????

बसपा जो की आरक्षण का पुरज़ोर समर्थन करती है एक एक विधायक से टिकट आवंटन के लिए मीडिया मे छपीं खबरों के अनुसार करोड़ों रुपये लेती है,क्या इन लोगों को वाकई आरक्षण की ज़रुरत है????

सरकारें निशुल्क किताबें बाँट रहीं हैं , सरकारी विद्यालयों में फीस न के बराबर है, इंजिनीरिंग तक की पढाई में वजीफे बांटे जा रहे हैं और इन सबके बादआरक्षण और फिर पदोनन्ति के लिए आरक्षण पर आरक्षण।

हर कदम पर सरकारें समाज में विद्वेष पैदा करके इसे विभक्त किये जा रही हैं।

क्या सरकारें जितना पैसा इन साधनों पर खर्चकर रही हैं , उसमे यदि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा पूर्णताः निशुल्क करके अनिवार्य कर दें । विशेषकर उनके लिए जो वर्तमान में आरक्षित वर्ग है और जिसके परिवार ने अभी तक आरक्षण का लाभ नहीं लिया है तथाउनके लिए उत्कृष्ट किस्म की कोचिंग खोल दें या वर्तमान कोचिंग चलाने वालों को ऐसे विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए सब्सिडी दे दे ।

निःशुल्क पढाई और कोचिंग आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के सभी अभ्यर्थियों को दी जाये ।

क्या यह समाधान नहीं हो सकता ????? तत्पश्चात विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भी निशुल्क कर दें और अंत में योग्यता के आधार पर चयन करें तो कहीं से बहुत बोझ नहीं बढ़ेगा और जातिवाद को बढ़ावा भी नहीं मिलेगा ।

परन्तु समाज में फैलता हुआ यह विद्वेष का ज़हर कहीं तो रुकेगा।

समाज , वर्ग और जाति इस आधार पर देश बँट रहा है और देश का विकाश बाधित हो रहा है । इसके लिए दोषी कौन ??? सरकार या कोई और ???

#आरक्षण के लेने और देने के नाम देश के हजारों करोड़ की संपत्ति बर्बाद हो रहा है । इसका दोषी कौन ??? सरकार या कोई और ????

#आरक्षण के कारण GENERAL CATEGORY पर सभी तरह से दवाब बढ़ता जा रहा है ।

सरकार की #आरक्षण नीति के कारण देश में GENERAL CATEGORY में एकता बढ़ती जा रही है जो आगे चलकर #दलित और #मुसलमान के बाद यह वर्ग का वोट बैंक की कीमत बढ़ जायेगी ।

अगर सरकार इसी तरह #आरक्षण पर #आरक्षण , बढती रही तो 21वीं सदी का भारत तीन वर्गों में बटा मिलेगा ।

1 – मुसलमान

2 – दलित और

3 – GENERAL CATEGORY

इस तरह देश को बाँटने में सिर्फ और सिर्फ सरकार दोषी है ।

#न्यायपालिका से अनुरोध है कि सरकार की #आरक्षण नीति की समीक्षा करें वर्ना देश की एकता और अखंडता को खतरा बढ़ गया है ।

जय हिंद जय भारत । वंदेमातरम


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Beautiful story बहुत पहले आप ने एक चिड़िया की कहानी सुनी होगी… जिसका एक दाना पेड़ के कंदरे...

Beautiful story
बहुत पहले आप ने एक चिड़िया की कहानी सुनी होगी…

जिसका एक दाना पेड़ के कंदरे में कहीं फंस गया था…

चिड़िया ने पेड़ से बहुत अनुरोध किया उस दाने को दे देने के लिए लेकिन पेड़ उस छोटी सी चिड़िया की बात भला कहां सुनने वाला था…

हार कर चिड़िया बढ़ई के पास गई और उसने उससे अनुरोध किया कि तुम उस पेड़ को काट दो, क्योंकि वो उसका दाना नहीं दे रहा…

भला एक दाने के लिए बढ़ई पेड़ कहां काटने वाला था…

फिर चिड़िया राजा के पास गई और उसने राजा से कहा कि तुम बढ़ई को सजा दो क्योंकि बढ़ई पेड़ नहीं काट रहा और पेड़ दाना नहीं दे रहा…

राजा ने उस नन्हीं चिड़िया को डांट कर भगा दिया कि कहां एक दाने के लिए वो उस तक पहुंच गई है।
चिड़िया हार नहीं मानने वाली थी…

वो महावत के पास गई कि अगली बार राजा जब हाथी की पीठ पर बैठेगा तो तुम उसे गिरा देना, क्योंकि राजा बढ़ई को सजा नहीं देता…
बढ़ई पेड़ नहीं काटता…
पेड़ उसका दाना नहीं देता…
महावत ने भी चिड़िया को डपट कर भगा दिया…

चिड़िया फिर हाथी के पास गई और उसने अपने अनुरोध को दुहराया कि अगली बार जब महावत तुम्हारी पीठ पर बैठे तो तुम उसे गिरा देना क्योंकि वो राजा को गिराने को तैयार नहीं…

राजा बढ़ई को सजा देने को तैयार नहीं…
बढ़ई पेड़ काटने को तैयार नहीं…
पेड़ दाना देने को राजी नहीं।
हाथी बिगड़ गया…
उसने कहा, ऐ छोटी चिड़िया..
तू इतनी सी बात के लिए मुझे महावत और राजा को गिराने की बात सोच भी कैसे रही है?

चिड़िया आखिर में चींटी के पास गई और वही अनुरोध दोहराकर कहा कि तुम हाथी की सूंढ़ में घुस जाओ…
चींटी ने चिड़िया से कहा, “चल भाग यहां से…बड़ी आई हाथी की सूंढ़ में घुसने को बोलने वाली।

अब तक अनुरोध की मुद्रा में रही चिड़िया ने रौद्र रूप धारण कर लिया…उसने कहा कि "मैं चाहे पेड़, बढ़ई, राजा, महावत, और हाथी का कुछ न बिगाड़ पाऊं…पर तुझे तो अपनी चोंच में डाल कर खा ही सकती हूँ…

*चींटी डर गई…भाग कर वो हाथी के पास गई…हाथी भागता हुआ महावत के पास पहुंचा…महावत राजा के पास कि हुजूर चिड़िया का काम कर दीजिए नहीं तो मैं आपको गिरा दूंगा….राजा ने फौरन बढ़ई को बुलाया…उससे कहा कि पेड़ काट दो नहीं तो सजा दूंगा…बढ़ई पेड़ के पास पहुंचा…बढ़ई को देखते ही पेड़ बिलबिला उठा कि मुझे मत काटो…मैं चिड़िया को दाना लौटा दूंगा…*

आपको अपनी ताकत को पहचानना होगा…आपको पहचानना होगा कि भले आप छोटी सी चिड़िया की तरह होंगे, लेकिन ताकत की कड़ियां कहीं न कहीं आपसे होकर गुजरती होंगी… हर सेर को सवा सेर मिल सकता है, बशर्ते आप अपनी लड़ाई से घबराएं नहीं…आप अगर किसी काम के पीछे पड़ जाएंगे तो वो काम होकर रहेगा… *यकीन कीजिए…हर ताकत के आगे एक और ताकत होती है और अंत में सबसे ताकतवर आप होते हैं…* हिम्मत, लगन और पक्का इरादा ही हमारी ताकत की बुनियाद है..!! 💐💐🙏🏻 बड़े सपनो को पाने वाले हर व्यक्ति को *सफलता* और *असफलता* के कई पड़ावों से गुजरना पड़ता है

*पहले लोग मजाक उड़ाएंगे*
*फिर लोग साथ छोड़ेंगे*
*फिर विरोध करेंगे*

रख *हौंसला* वो मंज़र भी आयेगा,प्यासे के पास चलकर समंदर भी आयेगा..! *थक कर* ना बैठ, ऐ मंजिल के *मुसाफ़िर*
मंजिल भी मिलेगी और जीने का मजा भी आयेगा।


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प्रोफ़ेसर की सीख प्रोफ़ेसर साहब बड़े दिनों बाद आज शाम को घर लौटते वक़्त अपने दोस्त से मिलने उसकी दुकान...

प्रोफ़ेसर की सीख

प्रोफ़ेसर साहब बड़े दिनों बाद आज शाम को घर लौटते वक़्त अपने दोस्त से मिलने उसकी दुकान पर गए।

इतने दिनों बाद मिल रहे दोस्तों का उत्साह देखने लायक था…दोनों ने एक दुसरे को गले लगाया और बैठ कर गप्पें मारने लगे।

चाय-वाय पीने के कुछ देर बाद प्रोफ़ेसर बोले, “यार एक बात बता, पहले मैं जब भी आता था तो तेरी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी और हम बड़ी मुश्किल से बात कर पाते थे। लेकिन आज बस इक्का-दुक्का ग्राहक ही दिख रहे हैं और तेरा स्टाफ भी पहले से कम हो गया है…”

दोस्त मजाकिया लहजे में बोला, “अरे कुछ नहीं, हम इस मार्केट के पुराने खिलाड़ी हैं…आज धंधा ढीला है…कल फिर जोर पकड़ लेगा!”

इस पर प्रोफ़ेसर साहब कुछ गंभीर होते हुए बोले, “देख भाई, चीजों को इतना हलके में मत ले…मैं देख रहा हूँ कि इसी रोड पर कपड़े की तीन-चार और दुकाने खुल गयी हैं, कम्पटीशन बहुत बढ़ गया है…और ऊपर से…”

प्रोफ़ेसर साहब अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही, दोस्त उनकी बात काटते हुए बोला, “अरे ये दुकाने आती-जाती रहती हैं, इनसे कुछ फरक नहीं पड़ता।”

प्रोफ़ेसर साहब कॉलेज टाइम से ही अपने दोस्त को जानते थे और वो समझ गए कि ऐसे समझाने पर वो उनकी बात नहीं समझेगा।

इसके बाद उन्होंने अगले रविवार, बंदी के दिन; दोस्त को चाय पे बुलाया।

दोस्त, तय समय पर उनके घर पहुँच गया।

कुछ गपशप के बाद प्रोफ़ेसर साहब उसे अपने घर में बनी एक प्राइवेट लैब में ले गए और बोले, “देख यार! आज मैं तुझे एक बड़ा ही इंटरस्टिंग एक्सपेरिमेंट दिखता हूँ..”

प्रोफ़ेसर साहब ने एक जार में गरम पानी लिया और उसमे एक मेंढक डाल दिया। पानी से सम्पर्क में आते ही मेंढक खतरा भांप गया और कूद कर बाहर भाग गया।

इसके बाद प्रोफ़ेसर साहब ने जार से गरम पानी फेंक कर उसमे ठंडा पानी भर दिया, और एक बार फिर मेंढक को उसमे डाल दिया। इस बार मेंढक आराम से उसमे तैरने लगा।

तभी प्रोफ़ेसर साहब ने एक अजीब सा काम किया, उन्होंने जार उठा कर एक गैस बर्नर पर रख दिया और बड़ी ही धीमी आंच पर पानी गरम करने लगे।

कुछ ही देर में पानी गरम होने लगा। मेंढक को ये बात कुछ अजीब लगी पर उसने खुद को इस तापमान के हिसाब से एडजस्ट कर लिया…इस बीच बर्नर जलता रहा और पानी और भी गरम होता गया….पर हर बार मेढक पानी के टेम्परेचर के हिसाब से खुद को एडजस्ट कर लेता और आराम से पड़ा रहता….लेकिन उसकी भी सहने की एक क्षमता थी! जब पानी काफी गरम हो गया और खौलने को आया तब मेंढक को अपनी जान पर मंडराते खतरे का आभास हुआ…और उसने पूरी ताकत से बाहर छलांग लगाने की कोशिष की….पर बार-बार खुद को बदलते तापमान में ढालने में उसकी काफी उर्जा लग चुकी थी और अब खुद को बचाने के लिए न ही उसके पास शक्ति थी और न ही समय…देखते-देखते पानी उबलने लगा और मेंढक की मौत हो गयी।

एक्सपेरिमेंट देखने के बाद दोस्त बोला-

यार तूने तो मेंढक की जान ही ले ली…खैर, ये सब तू मुझे क्यों दिखा रहा है?

प्रोफ़ेसर बोले, “ मेंढक की जान मैंने नहीं ली…उसने खुद अपनी जान ली है। अगर वो बिगड़ते हुए माहौल में बार-बार खुद को एडजस्ट नहीं करता बल्कि उससे बचने का कुछ उपाय सोचता तो वो आसानी से अपनी जान बचा सकता था। और ये सब मैं तुझे इसलिए दिखा रहा हूँ क्योंकि कहीं न कहीं तू भी इस मेढक की तरह बिहेव कर रहा है।

तेरा अच्छा-ख़ासा बिजनेस है पर तू चेंज हो रही मार्केट कंडीशनस की तरफ ध्यान नहीं दे रहा, और बस ये सोच कर एडजस्ट करता जा रहा है कि आगे सब अपने आप ठीक हो जाएगा…पर याद रख अगर तू आज ही हो रहे बदलाव के ऐकौर्डिंग खुद को नहीं चेंज करेगा तो हो सकता है इस मेंढक की तरह कल को संभलने के लिए तेरे पास ना एनर्जी हो और ना ही समय!”

प्रोफ़ेसर की सीख ने दोस्त की आँखें खोल दीं, उसने प्रोफ़ेसर साहब को गले लगा लिया और वादा किया कि एक बार फिर वो मार्केट लीडर बन कर दिखायेगा।

दोस्तों, प्रोफ़ेसर साहब के उस दोस्त की तरह बहुत से लोग अपने आस-पास हो रहे बदलाव की तरफ ध्यान नहीं देते। लोग जिन skills के कारण job लिए चुने जाते हैं बस उसी पर अटके रहते हैं खुद को update नहीं करते…और जब company में layoffs होते हैं तो उन्हें ही सबसे पहले निकाला जाता है…लोग जिस ढर्रे पर 10 साल पहले business कर रहे होते हैं बस उसी को पकड़कर बैठे रहते हैं और देखते-देखते नए players सारा market capture कर लेते हैं!

यदि आप भी खुद को ऐसे लोगों से relate कर पा रहे हैं तो संभल जाइए और इस कहानी से सीख लेते हुए proactive बनिए और आस-पास हो रहे बदलावों के प्रति सतर्क रहिये, ताकि बदलाव की बड़ी से बड़ी आंधी भी आपकी जड़ों की हिला न पाएं!


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ईद उल जुहा विशेष कुरबानी या हत्या की ट्रेनिंग या joy of slaughter! मुसलमान कई त्यौहार मानते हैं ....

ईद उल जुहा विशेष

कुरबानी या हत्या
की ट्रेनिंग या joy of slaughter!


मुसलमान कई त्यौहार मानते हैं . जिनमें “ईदुज्जुहा "प्रसिद्ध
और प्रिय त्योहर माना जाता है . भारत में इसे
"बकरीद ” भी कहते हैं
.अरबी में ईदुज्जुहा का अर्थ बलिदान
( Sacrifice ) नहीं बल्कि “ पशुवध का आनंद
”( Joy of slaughter ) हैं.क्योंकि इसमें लाखों जानवरों का
क़त्ल होता है .मुसलमानों का दावा है कि यह त्यौहार
नबी इब्राहीम की अल्लाह
के प्रति निष्ठा, भक्ति और उनके लडके इस्माइल की
कुर्बानी को याद करने के लिए मनाया जाता है .और
मुहम्मद साहब उसी इस्माइल के वंशज थे .चूँकि
इब्राहीम की कथा इस्लाम से पहले
की है और इब्राहीम के बारे में जो
सही जानकारी बाइबिल , कुरान और
हदीसों से मिलती वह इस प्रकार है .
1-इब्राहीम का परिचय
इब्राहीम ﺇﺑﺮﺍﻫﻴﻢ का काल लगभग 2000 साल ई
० पू से 1500 ई० पूर्व माना जाता है . इसके पिता का नाम
मुसलमान “ आजर ﺁﺫﺭ ” और यहूदी “तेराह
Terah”( תָּרַח )बताते है .इब्राहीम “ ऊर ”
शहर में पैदा हुआ था . जो हारान प्रान्त में था . वहां से
इब्राहीम कनान प्रान्त में जाकर बस गया था .और
उसके साथ उसकी बहिन ( पत्नी ) और
भतीजा लूत भी आगये थे .इब्राहिम को
एक गुलाम लड़की “ हाजरा ” मिली
थी . जिस से उसने इस्माइल नामक लड़का पैदा किया
था .जिसे मुहम्मद का पूर्वज माना जाता है .
इब्राहीम और सारह से जो लड़का हुआ था उसका
नाम “इसहाक ” था .मुसलमान इनको नबी मानते हैं
.यहूदी इसे अबराहाम( אַבְרָהָם ) कहते हैं .
जिसका अर्थ है जातियों का बाप .मुसलमान इब्राहीम
को एक ,सदाचारी ,सत्यनिष्ठ ,और अल्लाह का परम
भक्त नबी कहते हैं .लेकिन वास्तविकता यह है कि,
1-इब्राहीम का देशत्याग
जब इब्राहीम अपने हारान देश को छोड़ कर कनान
जाने लगा ,तो उसके साथ , लूत ,साराह अपनी सम्पति
भी ले गया और वहीँ बस गया “ बाईबिल
.उत्पत्ति 12 :3 से 5
2-इब्राहीम झूठा और स्वार्थी था
अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने बताया , इब्राहीम झूठ
बोलते थे .उनके प्रसिद्ध तीन झूठ इस प्रकार हैं
,एक मैं बीमार हूँ , दूसरा मैंने मूर्तियाँ
नहीं तोड़ी . यह दोनो झूठ अल्लाह के
लिए बोले थे . और तीसरा झूठ सराह के बारे में था ,
कि यह मेरी बहिन है .
” ﺣَﺪَّﺛَﻨَﺎ ﻣُﺤَﻤَّﺪُ ﺑْﻦُ ﻣَﺤْﺒُﻮﺏٍ، ﺣَﺪَّﺛَﻨَﺎ ﺣَﻤَّﺎﺩُ ﺑْﻦُ ﺯَﻳْﺪٍ، ﻋَﻦْ
ﺃَﻳُّﻮﺏَ، ﻋَﻦْ ﻣُﺤَﻤَّﺪٍ، ﻋَﻦْ ﺃَﺑِﻲ ﻫُﺮَﻳْﺮَﺓَ ـ ﺭﺿﻰ ﺍﻟﻠﻪ ﻋﻨﻪ ـ
ﻗَﺎﻝَ ﻟَﻢْ ﻳَﻜْﺬِﺏْ ﺇِﺑْﺮَﺍﻫِﻴﻢُ ـ ﻋَﻠَﻴْﻪِ ﺍﻟﺴَّﻼَﻡُ ـ ﺇِﻻَّ ﺛَﻼَﺙَ ﻛَﺬَﺑَﺎﺕٍ
ﺛِﻨْﺘَﻴْﻦِ ﻣِﻨْﻬُﻦَّ ﻓِﻲ ﺫَﺍﺕِ ﺍﻟﻠَّﻪِ ﻋَﺰَّ ﻭَﺟَﻞَّ، ﻗَﻮْﻟُﻬُﻬَﺎﺟَﺮَ ﻓَﺄَﺗَﺘْﻪُ،
ﻭَﻫُﻮَ ﻗَﺎﺋِﻢٌ ﻳُﺼَﻠِّﻲ ، “
Sahih Al- Bukhari, Vol.4, Bk 55-Hadith No 578,
Translation by Dr. Muhsan Khan
इब्राहीम के तीन झूठ यह हैं ,
1-जब इब्राहीम ने चुपचाप देवताओं की
मूर्तियाँ तोड़ दी ,और लोगों ने पूछा बताओ क्या यह
काम तुमने किया है .तो इब्राहीम बोला मैंने
नहीं यह तो सबसे बड़े देवता का काम है "सूरा -
अम्बिया 21 :62 से 63
2-जब लोगों ने इब्राहीम के पूछा कि तुम्हारा अल्लाह
यानी दुनिया के स्वामी के बारे में क्या विचार
है ,इब्राहीम आकाश के तारों को देखता रहा , और
बोला मैं तो बीमार हूँ "सूरा -अस सफ्फात 37 :87 से
89
3-इब्राहीम ने साराह के बारे में कहा बेशक यह
मेरी बहिन है , और मेरे बाप की
बेटी है ,लेकिन मेरी सगी माँ
की बेटी नहीं है .इसलिए
अब यह मेरी पत्नी बन
गयी है ” बाइबिल .उत्पत्ति 20 :13
3-इब्राहीम पर लानत
जो भी अपनी बहिन के साथ सहवास
करे उस पर लानत , चाहे वह उसकी
सगी बहिन हो या सौतेली .तो सब ऐसे
व्यक्ति पर लानत करें और कहें आमीन ’
बाइबिल .व्यवस्था 27 :22
तुम पर हराम हैं , तुम्हारी बहिनें “ सूरा -निसा
4 :23
4-इब्राहीम का पापी परिवार
इब्राहीम के काबिले में लड़कों के साथ कुकर्म करने
का रिवाज था और उसका भतीजा लूत भी
ऐसा था . इस कुकर्म को लूत के नाम से "लावातत” कहा जाता है
.इनकी लीला दखिये ,
एक दिन कुछ सुन्दर लडके लूत से मिलने आये ,तो उन्हें देख
कर लोग आगये .इस से लूत चिंतित हो गया .और उन लोगों को
रोकना कठिन होने लगा .क्योंकि वहां के लोग लड़कों के साथ
कुकर्म “ Sodomy” करते थे . लूत ने उन लोगों से कहा इन
लड़कों को छोडो यह मेरी बेटियां हैं यह इस काम के
लिए अधिक उपयोगी हैं .लेकिन लोग बोले तू जानता है
कि हमें क्या पसंद है “सूरा -हूद 11 :77 और 78
जिस तरह इब्राहीम ने अपनी बहिन से
सहवास किया था उसका भतीजा लूत भी
महा पापी था .यह बाइबिल बताती है .
"एक रात लूत की लड़कियों ने तय किया कि आज हम
अपने पिता को खूब शराब पिलायेंगे .और उसके साथ सहवास करेंगे
.पहले एक लड़की बाप के साथ सोयी ,
फिर बारी बारी से सभी बाप के
साथ सोयीं .इस तरह सभी अपने बाप से
गर्भवती हुयीं "बाईबिल -उत्पत्ति
19 :30 से 36
5-इब्राहीम की रखैल हाजरा
इब्राहीम सदाचारी नहीं था
,यह जानकर शैतान ने एक लड़की हाजरा
इब्राहीम के पास भेज दी थी
.इस से इब्राहीम ने सहवास किया था .
अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा है , शैतान ने ही
हाजरा को इब्राहीम के पास इसलिए भेजा था कि वह
उसे दासी के रूप में स्वीकार कर लें .और
जब वह इब्राहीम के पास गयी तो
इब्राहीम बोला . अल्लाह ने मुझे एक
लड़की दासी भेज दी है .
” ﻭﻗﺎﻝ: ’ ﻟﻘﺪ ﺑﻌﺚ ﺍﻟﻠﻪ ﻟﻲ ﺍﻟﺸﻴﻄﺎﻥ . ﺍﺻﻄﺤﺎﺑﻬﺎ ﺇﻟﻰ
ﺇﺑﺮﺍﻫﻴﻢ ﻭﻫﺎﺟﺮ ﺗﻌﻄﻲ ﻟﻬﺎ .“ ﺟﺎﺀ ﺫﻟﻚ ﻋﺎﺩﺕ ﻹﺑﺮﺍﻫﻴﻢ
ﻭﻗﺎﻝ: ” ﺍﻟﻠﻪ ﺃﻋﻄﺎﻧﺎ ﻓﺘﺎﺓ ﺍﻟﺮﻗﻴﻖ ﻟﻠﺨﺪﻣﺔ “
Sahih al-Bukhari, Volume 3, Book 34, Number
420
6-इस्माइल की झूठी पैदायश
चूँकि उस समय काफी बूढ़ा हो चूका था , और
उसकी पत्नी सारह बाँझ थी
,इसलिए इब्राहीम और हाजरा ने मिलकर एक साजिश
रची और कहीं से एक ताजा बच्चा लोगों
को दिखा दिया , कि यह बच्चा हाजरा ने पैदा किया है .और इब्राहिम
ने उस बच्चे का नाम इस्माइल रखा था .
एक दिन इब्राहीम तड़के भोर में उठा ,और अँधेरे में
हाजरा को तैयार किया .और उसे एक बच्चा दिया .फिर हाजरा ने उस
बच्चे को झाड़ियों में छुपा दिया .और हाजरा इस तरह से चिल्लाने
लगी जैसे बच्चा जनने की
पीड़ा हो रही हो .और जब बच्चे के रोने
की आवाज लोगों ने सुनी तो लोगों ने समझा
हाजरा ने बच्चे को जन्म दिया है "बाइबिल .उत्पत्ति 21 :14 से
17
7-अरब हराम की औलाद हैं
अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा कि पहले तो हाजरा सारह के
पास गयी .फिर इब्राहीम के पास
चली गयी .उस समय
इब्राहीम काम कर रहे थे .उन्होंने सारह से इशारे से
पूछा कि यह किस लिए आयी है . साराह ने कहा यह
तुम्हारी दासी है .और सेवा
करेगी .अबू हुरैरा ने कहा इस बातको सुनते
ही रसूल ने मौजूद सभी श्रोताओं से कहा
, सुन लो सभी अरब उसी हाजरा
की संतानें हो ”
“ ﺛﻢ ﺍﻟﻘﻰ ﺭﺟﺎﻝ ﻫﺎﺟﺮ ﻛﺨﺎﺩﻣﺔ ﺑﻨﺖ ﻟﺴﺎﺭﺓ. ﺟﺎﺀ ﺳﺎﺭﺓ
ﺍﻟﻈﻬﺮ ‏(ﻹﺑﺮﺍﻫﻴﻢ ‏) ، ﻓﻲ ﺣﻴﻦ ﻛﺎﻥ ﻳﺼﻠﻲ. ﺇﺑﺮﺍﻫﻴﻢ ﻭﻫﻮ
ﻳﺸﻴﺮ ﺑﻴﺪﻩ، ﺳﺄﻝ : ” ﻣﺎ ﺍﻟﺬﻱ ﺣﺪﺙ؟ “ ﺃﺟﺎﺑﺖ، ” ﻭﺍﻟﻠﻪ
ﻣﺪﻟﻞ ﺍﻟﻤﺆﺍﻣﺮﺓ ﺍﻟﺸﺮﻳﺮﺓ ﻟﻠﻜﺎﻓﺮ ‏( ﺃﻭ ﺷﺨﺺ ﻏﻴﺮ
ﺃﺧﻼﻗﻲ ‏) ﻭﺃﻋﻄﺎﻧﻲ ﻫﺎﺟﺮ ﻟﻠﺨﺪﻣﺔ “. ‏(ﺃﺑﻮ ﻫﺮﻳﺮﺓ ﺛﻢ
ﺧﺎﻃﺐ ﻣﺴﺘﻤﻌﻴﻪ ﻗﺎﺋﻼ: ” ﻫﺬﺍ ‏( ﺣﺠﺮ ‏) ﻛﺎﻥ ﺃﻣﻚ ﻳﺎ ﺑﻨﻲ
ﻣﺎ ﻫﻮ ﺑﻴﻦ ﺳﻤﺎ ‏(ﺃﻱ ﺍﻟﻌﺮﺏ، ﻣﻦ ﻧﺴﻞ ﺇﺳﻤﺎﻋﻴﻞ، ﺍﺑﻦ
ﻫﺎﺟﺮ ).“
Bukhari-Volume 4-Book 55: Prophets-Hadith
578
Eng Reference : Sahih al-Bukhari 3358
चूँकि मुहम्मद साहब खुद को भी
इब्राहीम के नाजायज ,पुत्र और शैतान द्वारा
भेजी गई औरत हाजरा के लडके इस्माइल का वंशज
मानते थे .और खुद को इब्राहीम कि तरह रसूल
साबित करना चाहते थे .इसलिए उन्होंने इसके लिए
इब्राहीम द्वारा की इस्माइल
की क़ुरबानी की
कहानी का सहारा लिया .
8-क़ुरबानी का सपना
इब्राहीम के पूर्वज अंधविश्वासी थे और
सपने की बातों को सही समझ लेते थे
.बाइबिल और कुरान में ऐसे कई उदहारण मिलते हैं ,जैसे
"यूसुफ ने पिता से कहा कि रात को मैंने एक सपना देखा कि ग्यारह
तारे .सूरज और चाँद मुझे सिजदा कर रहे हैं , यह उन कर पिता
ने कहा तुम इस सपने की बात अपने भाइयों से
नहीं कहना .ऐसा न हो वह कोई साजिश रचें ” सूरा-
यूसुफ 12 :4 -5
ऐसा ही सपना इब्राहीम ने देखा ,और
सच मान बैठा ,कुरान में लिखा है
जब इब्राहीम का लड़का चलने फिरने योग्य था , तो
इब्राहीम ने उस से कहा बेटा मैंने सपने में देखा कि
जसे मैं तुझे जिबह कर रहा हूँ ,बोल तेरा क्या विचार है “
सूरा -अस सफ्फात 37 :102
(अरबी में "इन्नी उज्बिहुक ﺍﻧّﻲ
ﺍُﺫﺑﺤﻚ ” तेरी गर्दन पर छुरी फिरा
रहा हूँ )
9-अल्लाह ने क़ुरबानी रोकी
जब इब्राहीम ने अपने बेटे का गला काटने के लिए
छुरी हाथ में उठायी ,तो एक फ़रिश्ता
पुकारा ,हे इब्राहीम तुम लडके की तरफ
हाथ नहीं बढ़ाना .हमें यकीं हो गया कि तू
ईश्वर से डरता है .बाइबिल -उत्पत्ति 22 :10 से 12
हमने कहा हे इब्राहीम तूने तो सपने को सच कर
दिया .यह तो मेरी परीक्षा थी
.और फिर हमने एक महान क़ुरबानी कर
दी “सूरा 37 :105 से 107
( नोट - इन आयतों में कहीं पर किसी
जानवर का उल्लेख नहीं है ,और न मैंढे का नाम
है)
10- गाय की कुर्बानी
जब अल्लाह ने मूसा से कहा कि एक गाय को जिबह करो ,तो लोग
बोले क्या तू हमें अपमानित कर रहा है .लेकिन जब लोग मूसा के
कहने पर गाय जिबह कर रहे थे तब भी उनके दिल
काँप रहे थे . सूरा -बकरा 2 :67 और 71
गाय की क़ुरबानी ( ह्त्या ) का एक
वीडियो देखिये
http://www.youtube.com/watch?
v=rgrB9X_mINU&feature=related
(नोट -इस आयत की तफ़सीर में लिखा है
,उस समय मिस्र में किब्ती ( Coptic ) लोग रहते
थे जो गाय की पूजा करते थे .इसी लिए
अल्लाह ने उनकी आस्था पर प्रहार करने और
उनका दिल दुखाने के लिए गाय की कुर्बानी
का हुक्म दिया था .जिसे रसूल ने भी
सही मान लिया था .
(हिन्दी कुरान .पेज 137 टिप्पणी
संख्या 24 मक्तबा अल हसनात रामपुर )
इन सभी प्रमाणों से सिद्ध होता है ,कि 1 .
इब्राहीम को झूठ बोलने की आदत
थी .और सगी बहिन से शादी
करके महापाप किया था , और बाइबिल के मुताबिक यह काम लानत
के योग्य है .2 .यातो इब्राहीम ने सपने में लड़के
की क़ुरबानी की
होगी या शैतान के द्वारा भेजी हाजरा के
फर्जी पुत्र की क़ुरबानी
की होगी .3 .इस झूठी
कहानी को सही मान कर जानवरों का
क़त्ल करना उचित नहीं है .4 .अल्लाह
इब्राहीम और लूत जैसे पापियों को ही
रसूल बनाता है .5 .सारे अरब के लोग इसलिए अपराधी
होते हैं क्योंकि वह इब्राहीम के उस नाजायज लडके
इस्माइल वंशज हैं ,जिसे शैतान ने भेजा था .6 .क्या
इब्राहीम के बाद मुसलमानों में ऐसा
एकभी अल्लाह भक्त पैदा हुआ , जो अपने लडके
को कुर्बान कर देता .यहूदी और ईसाई
भी इब्राहीम को मानते हैं लेकिन
कुर्बानी का त्यौहार नहीं मनाते.
महम्मद साहब ने ईदुज्जुहा की परंपरा मुसलमानों को
ह्त्या की ट्रेनिग देने के लिए की
थी !
No-200/71
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abraham.htm


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कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे। पोरस जैसे शूर-वीर को नमन सिकंदर करते थे॥ चौदह वर्षों तक...

कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।
पोरस जैसे शूर-वीर को नमन सिकंदर करते थे॥

चौदह वर्षों तक खूंखारी वन में जिसका धाम था।
राक्षसों का वध करने वाला शाकाहारी राम था॥

चाहते तो खा सकते थे वो मांस पशु के ढेरो में।
लेकिन उनको प्यार मिला शबरी के जूठे बेरो में॥

चक्र सुदर्शन धारी थे हर दुर्जन पर भारी थे।
वैदिक धर्म पालन करने वाले कृष्ण शाकाहारी थे॥

शाकाहार के मन्त्र को महाराणा ने मन में ध्याया था।
जंगल जाकर प्रताप ने घास की रोटी को खाया था॥

सपने जिसने देखे थे वैदिक धर्म के प्रचार के।
दयानंद जैसे महामानव थे वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर देखो अपने गौरवमयी इतिहास को।
क्यों तुमने अपना लिया ईसा मूसा के खाने खास को ?

दया की आँखे खोल कर देखो निरीह पशु के करुण क्रंदन को।
इंसानों का जिस्म बना है शाकाहारी भोजन को॥

अंग लाश के खा जाए क्या फ़िर भी वो इंसान है?
पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं जब उंगली अपनी जलती है।
सोचो उस तड़पन की हद जब जिस्म पे आरी चलती है॥

बेबसता तुम पशु की देखो बचने के आसार नही।
जीते जी तन काटा जाए उस पीडा का पार नही॥

खाने से पहले बिरयानी चीख जीव की सुन लेते।
करुणा के वश होकर तुम भी गिरी गिरनार को चुन लेते॥

मांसाहार त्यागो … शाकाहारी बनो !


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