Tuesday, June 27, 2017

“जरा सी चूक हुयी और आप गये” रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था कि एक...

“जरा सी चूक हुयी और आप गये”

रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान
बन्द ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया ..
,
उसके मुॅंह में एक थैली थी, जिसमें सामान की
लिस्ट और पैसे थे ..
,
दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस
थैली में भर दिया …
,
कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया
,
दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे
पीछे गया ये देखने की इतने समझदार
कुत्ते का मालिक कौन है …
,
कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा, थोडी देर बाद
एक बस आई जिसमें
चढ गया ..
,
कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे
कर दी, उस के गले के बेल्ट में पैसे और
उसका पता भी था
,
कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के
बेल्ट मे रख दिया
,
अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे
चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर
को इशारा कर दिया
और बस के रुकते ही उतरकर चल दिया ..
,
दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था …
,
कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरोंसे
२-३ बार खटखटाया …
,
अन्दर से उसका मालिक आया और लाठी से
उसकी पिटाई कर दी ..
,
दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा .. ??
,
मालिक बोला .. “साले ने मेरी नींद खराब कर दी,
✒चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था गधा”
,
,
जीवन की भी यही सच्चाई है ..
,
आपसे लोगों की अपेक्षाओं का
कोई अन्त नहीं है ..
,
जहाँ आप चूके वहीं पर लोग बुराई निकाल लेते हैं और पिछली सारी अच्छाईयों को भूल जाते हैं ..
,
इसलिए अपने कर्म करते चलो, लोग
आपसे कभी संतुष्ट नहीं होएँगे।।


from Tumblr http://ift.tt/2tiCMLW
via IFTTT

Monday, June 26, 2017

जीवन की सात मर्यादाएँ जीवन की सात मर्याएँ “सप्त मर्यादाः...

जीवन की सात मर्यादाएँ

जीवन की सात मर्याएँ “सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यंहुरोSगात् । आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ ।।” (अथर्ववेदः–५.१.६) शब्दार्थः—-कवयः-ऋषियों ने सप्त—सात,मर्यादाः—मर्यादाएँ अर्थात् सीमाएँ, ततक्षुः—बनाई है, तासाम्–उनमें से, एकाम्—एक को, इद्–भी, अभ्यगात्—को प्राप्त होता है, वह, अंहुरः-पापी होता है, स्कम्भः—स्कम्भरूप परमात्मा, उपमस्य—उपमीभूत, आयोः—मनुष्य के, नीडे—हृदयरूपी घोंसलें में,पथाम्—मार्गों की, विसर्गे—समाप्ति पर और , धरुणेषु—धारक वस्तुओं में, तस्थौ–स्थित है । भावार्थः- (क) मनुष्य के जीवन के लिए वेद ने ७ मर्यादाएँ निश्चित की है । जिनका वर्णन यास्कमुनि ने निरुक्त में किया हैः— (१.) स्तेय–चोरी, (२.) तल्पारोहणम्–व्यभिचार (३.) ब्रह्महत्या—नास्तिकता, (४.) भ्रूणहत्या—गर्भघात (५.) सुरापान—शराब पीना (६.) दुष्टस्य कर्मणः—पुनः पुनः सेव । दुष्ट कर्म का बार-बार सेवन करना । (७.) पातकेSनृतोद्यम्—पाप करने के बाद उसे छिपाने के लिए झूठ बोलना । मर्यादा कहते हैं, सीमा को । कर्त्तव्य-शास्त्र की ये सात मर्यादाएँ (सीमाएँ) हैं । कर्त्तव्य-शास्त्र इन सीमाओं के अन्दर रहता है । इन सीमाओं का अतिक्रम न करना सत्कर्त्तव्य का कर्म है । (ख) इन मर्यादाओं में से एक का भी जो उल्लंघन करता है, वह पापी होता है । (ग) जो इन सातों मर्यादाओं में रहता है, वह परमात्मा का अधिक सदृश बन जाता है । परमात्मा में और उसमें परस्पर उपमानोपमेय भाव हो जाता है । (घ) परमात्मा की स्कम्भरूप अर्थात् भुवनप्रासाद का स्तम्भरूप है, वह उपमीभूत मनुष्य के हृदय-नीड में रहता है । इसी हृदय-मन्दिर में वह मर्यादाबद्ध मनुष्य परमात्मा का भजन और उसका प्रत्यक्ष कर सकता है । मनुष्य के हृदय में ही परमात्मा का भान क्यों होता है, इसके उत्तर के लिए ही मन्त्र में “उपमस्य” यह पद दिया है । जीवात्मा की उपमा परमात्मा से और परमात्मा की जीवात्मा से है । ये दोनों ही अप्राकृतिक है , प्रकृति से विलक्षण है । इसीलिए वेद तथा उपनिषदों में प्रकृति-वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों से जीवात्मा और परमात्मा को रूपित किया गया है । रूपक का अभिप्राय यही है कि जीवात्मा और परमात्मा परस्पर सदृश हैं और प्रकृति से विलक्षण हैं । तभी तो जीवात्मा और परमात्मा में परस्पर सादृश्य अर्थात् उपमानोपमेय भाव है । जब साधारण जीवात्मा जो कि मनुष्य की देह है, परमात्मा के साथ सादृश्य रखता है, तब मनुष्य का वह आत्मा तो, जिसने कि सात मर्यादाओं में रहकर अपने आपको पवित्र कर लिया है, अवश्य ही परमात्मा का उपमीभूत होना चाहिए । (ङ) परमात्मा पथों की समाप्ति पर है । सभी धर्मग्रन्थों का केन्द्र-स्थान वेद है । इसी केन्द्र से धर्म के भिन्न-भिन्न पथ निकले हैं । इन सब पथों का विसर्ग अर्थात् समाप्ति वेद पर होती है । इसी समाप्ति पर परमात्मा के सत्यस्वरूप का ज्ञान सब धर्मग्रन्थों के केन्द्रीभूत वेदों द्वारा ही सम्भव है । “पथां विसर्गे” का एक और अभिप्राय भी सम्भव है । वेदों में जगत् और ब्रह्म में व्याप्यव्यापकता दिखलाई है । जगत् व्याप्य और ब्रह्म व्यापक है । ब्रह्म में जगत् व्यापक नहीं है । अपितु सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म के एकदेश में विद्यमान रहता है । इसी आशय को अधिक स्पष्ट करने के लिए वेदों में ब्रह्म और जगत् दैशिक सत्ता का दृष्टान्त नीड और वृक्ष से दिया जाता है । उनमें ब्रह्म को वृक्ष और जगत् को नीड बताया है । नीड कहते हैं घोंसले को । घोंसला वृक्ष के एक देश पर आश्रित रहता है और वृक्ष घोंसले से बहुत बडा होता है । इसी प्रकार परमात्माी रूपी वृक्ष इस जगत् रूपी नीड का आश्रय है और जगत् बहुत बडा है । ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र , तारादिकों के समुदायों को ही जगत् कहते हैं । ये ग्रह, नक्षत्रादि अपने-अपने नियत पथों पर घूम रहे हैं ।इनमें से कोई भी विपथगामी नहीं होता । अतः जहाँ जहाँ जगत् की सत्ता है, वहाँ वहाँ हम पथों की सत्ता की कल्पना भी कर सकते हैं । परन्तु जहाँ जगत् की अन्तिम सीमा है, जिस से परे जगत् की सत्ता नहीं, वहाँ पृथिव्यादि के घूमने का कोई पथ भी नहीं, यह स्पष्ट है । वह स्थान “पथां विसर्गे” है । वहाँ पथों का विसर्ग अर्थात् समाप्ति हो जाती है । उससे आगे कोई पथ नहीं । परन्तु परमात्मा वहाँ भी विद्यमान है । अतः परमात्मा की स्थिति “पथां विसर्गे” पर भी है । (च) वह स्कम्भ रूप परमात्मा धारक पदार्थों में भी स्थित है । स्कम्भ का अर्थ है—धारण करने वाला, थामने वाला । परमात्मा के स्कम्भरूप का वर्णन अथर्ववेद (१०.७) में बहुत उत्तम शब्दों में किया है । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र , तारा, वायु, , पृथिवी आदि पदार्थ संसार में धारक रूप से प्रसिद्ध है । ये सब प्राणी जगत् के तथा परस्पर के धारण करने वाले हैं । परमात्मा इन धारकों का भी धारक है । वह इन धारकों में भी स्कम्भरूप (धारकरूप) से स्थित है , अर्थात् संसार का मूलाधार या मूलधारक परमात्मा ही है । अतः भक्ति, उपासना और मनन इसी महान् शक्ति का करना चाहिए । चूंकि यह सर्वोच्च है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वाधार है ।


from Tumblr http://ift.tt/2sVDXPc
via IFTTT

*ओ३म्* *🌷उद्गीथ ओंकार का ही नाम है🌷* ‘ओ३म्’ यह अक्षर ही 'उद्गीथ’ है।...

*ओ३म्*

*🌷उद्गीथ ओंकार का ही नाम है🌷*

‘ओ३म्’ यह अक्षर ही 'उद्गीथ’ है। 'ओ३म्’ इसकी ही उपासना करें, इसका ही गान करें। 'ओ३म्’ यह अक्षर और इसका दीर्घ स्वर से उच्चारण ही अमृत है, इसी से अभय पद प्राप्त होता है। वह उपासक जो ओंकारोपासना को इस प्रकार जान लेता है और दीर्घ–स्वर से अक्षर–'ओ३म्’ की उपासना करता है, वह भी इस अक्षर–स्वर में जो अमृत तथा अभय है, प्रविष्ट होकर अमर हो जाता है। उपनिषदों ने ओंकार का उच्च–स्वर से उच्चारण कर उसमें लीन होने को अमृत पद तथा अभय पद प्राप्ति के लिए सबसे अधिक बल दिया है।


from Tumblr http://ift.tt/2s8RiGA
via IFTTT

Saturday, June 24, 2017

मनुष्य सामाजिक प्राणी है अकेला नहीं जी सकता । करोड़ों व्यक्तियों का सहयोग लेकर आपको सब सुविधाएं...

मनुष्य सामाजिक प्राणी है अकेला नहीं जी सकता । करोड़ों व्यक्तियों का सहयोग लेकर आपको सब सुविधाएं प्राप्त होती हैं । यदि करोड़ों व्यक्ति आपके सुख के लिए आपकी सुविधाओं के लिए दिन रात मेहनत करते हैं , तो आपका भी कुछ कर्तव्य बनता है यदि आपको ईश्वर ने कुछ अधिक संपत्ति दी है तो उन गरीब असहाय विकलांगों के लिए भी कुछ दान आदि देना चाहिए । वैदिक धर्म प्रचार में भी कुछ दान देना चाहिए । ईश्वर की कृपा से आपको यह संपत्ति प्राप्त हुई है। उसका कुछ भाग ईश्वर की आज्ञा पालन में भी देना चाहिए।


from Tumblr http://ift.tt/2u27m9x
via IFTTT

स्वस्तिवाचनम् - ऋग्वेद- मण्डल७/सूक्त३५/मन्त्र१५ ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता...

स्वस्तिवाचनम् - ऋग्वेद- मण्डल७/सूक्त३५/मन्त्र१५

ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञा:।
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।८।

अर्थ ~ हे परमात्मा ! पूज्य विद्वान, यज्ञ करने वाले, विचारशील का संग करने वाले, सत्य के जानने वाले और ब्रह्मवेत्ता ज्ञानीजन उत्तम विद्या और शिक्षा के उपदेश से हम लोगों को निरन्तर उन्नति देवें। वे विद्वान विद्यादि के दान जैसे अनेक उपायों के द्वारा सर्वदा हमारी रक्षा करें।


from Tumblr http://ift.tt/2t4L0a8
via IFTTT

अधिकांश लोग अपने कल को अच्छा बनाने की चिंता में रहते हैं । चिंतन करना अच्छी बात है पर चिंता करना...

अधिकांश लोग अपने कल को अच्छा बनाने की चिंता में रहते हैं । चिंतन करना अच्छी बात है पर चिंता करना अच्छा नहीं है । चिंता ना करें चिंतन अवश्य करें । यदि कल को अच्छा बनाने के लिए आज आप मेहनत करते हैं तो जब कल का दिन आएगा तब तो कम से कम अच्छी तरह से जिएं। कल फिर आप अगले कल की चिंता करेंगे, तो ठीक से किस दिन जिएंगे ? वह आज कब आएगा जब आप खुशी से जिएंगे ! इसलिए मेहनत भी करें और खुशी से भी जिएँ। दोनों काम साथ साथ चलाएं।


from Tumblr http://ift.tt/2t8FN26
via IFTTT

Friday, June 23, 2017

*😡क्रोध के दो मिनट😡* एक युवक ने विवाह के दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार करने की इच्छा पिता से कही...

*😡क्रोध के दो मिनट😡*
एक युवक ने विवाह के दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार करने की इच्छा पिता से कही ।
पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती पत्नी को माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार करने चला गया ।
परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया और वह धनी सेठ बन गया । सत्रह वर्ष धन कमाने में बीत गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई ।
पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था ।
सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है ।
मैं यहाँ ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है
सेठ ने सोचा ‘इस देश में मैने बहुत धन कमाया है,
और यह मेरी कर्मभूमि है,
इसका मान रखना चाहिए !’
उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई । उस व्यक्ति ने कहा-
मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है । सेठ को सौदा तो महंगा लग रहा था.. लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 स्वर्ण मुद्राएं दे दी ।
व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया-
👍🏻कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनटरूककर सोच लेना ।👍🏻
कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय सेठ अपने नगर को पहुँचा ।उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूँ तो क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे
पत्नी के पास पहुँच कर उसे आश्चर्य उपहार दूँ ।
घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशाराकरके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया तो वहाँ का नजारा देखकर उसके पांवों के
नीचे की जमीन खिसक गई ।
उसकी पत्नी के पास एक
युवक सोया हुआ था ।
अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि
मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा औरये यहां अन्य पुरुष के साथ है ।दोनों को जिन्दा नही छोड़ूगाँ ।क्रोध में तलवार निकाल ली । वार करने ही जा रहा था कि
उसे 500 स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त ज्ञान सूत्रयाद आया-
कि कोई भी कार्य करने से
पहले दो मिनट सोच लेना ।
सोचने के लिए रूका ।
तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई । बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई ।
जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह ख़ुश हो गई और बोली- आपके बिना जीवन सूना सूना था । इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकालेयह मैं ही जानती हूँ ।
पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग ।तेरे पिता आए हैं
युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणामकरने झुका माथे की पगड़ी गिर गई । उसके लम्बे बाल बिखर गए । सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है ।
पिता के बिना इसके मान को कोई आंच न आए इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान ही
पालन पोषण और संस्कार दिए हैं
यह सुनकर सेठ की आँखों से
अश्रुधारा बह निकली ।
पत्नी और बेटी को गले लगाकर
सोचने लगा कि यदि
आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता
तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता ।मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता ।

ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे महंगा लग रहा था लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 स्वर्ण मुद्राएं बहुत कम हैं ।
'ज्ञान तो अनमोल है ’

इस कहानी का सार यह है कि
जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर
सुख की बरसात कर सकते हैं ।
वे हैं - *'क्रोध के दो मिनट *
नमस्ते जी


from Tumblr http://ift.tt/2tEKgXb
via IFTTT

"गंदे वस्त्र, गंदे दांत, अत्यधिक भोजन करने वाला ,कठोर वाक्य बोलने वाला,, सूर्योदय और सुर्यास्त में..."

“गंदे वस्त्र, गंदे दांत, अत्यधिक भोजन करने वाला ,कठोर वाक्य बोलने वाला,, सूर्योदय और सुर्यास्त में सोने वाला यदि स्वयं भगवान् विष्णु भी हो तो आद्या भगवती लक्ष्मी उसका भी त्याग कर देती है। ।।”
from Tumblr http://ift.tt/2tC3o86
via IFTTT

पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था । बेटा इतना मेधावी था नहीं कि PMT क्लियर कर लेता । इसलिए दलालों...

पिता बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था । बेटा इतना मेधावी था नहीं कि PMT क्लियर कर लेता । इसलिए दलालों से MBBS की सीट खरीदने का उपक्रम हुआ । जमीन जायदाद जेवर गिरवी रख के 35 लाख दलालों को दिए ।
वहाँ धोखा हो गया । फिर किसी रूसी देश में लड़के का एडमीशन कराया गया ।
वहाँ भी चल नहीं पाया । फेल होने लगा । depression में रहने लगा ।
रक्षाबंधन पे घर आया और यहाँ फांसी लगा ली ।
20 दिन बाद माँ बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा के आत्महत्या कर ली ।
अपने mediocre बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा और आत्मश्लाघा ने पूरा परिवार लील लिया । माँ बाप अपने सपने , अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों से पूरी करना चाहते हैं …….. 25 साल शिक्षा में काम करते हुए मैंने देखा कि कुछ माँ बाप अपने बच्चों को topper बनाने के लिए इतना ज़्यादा अनर्गल दबाव डालते हैं कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुक जाता है । आधुनिक स्कूली शिक्षा बच्चे की evaluation और grading ऐसे करती है जैसे सेब के बाग़ में सेब की की जाती है ।
पूरे देश के करोड़ों बच्चों को एक ही syllabus पढ़ाया जा रहा है ।
जंगल में सभी पशुओं को एकत्र कर सबका इम्तहान लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की क्षमता देख के ranking निकाली जा रही है । ये शिक्षा व्यवस्था ये भूल जाती है कि इस प्रश्नपत्र में तो बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो जाएगा और बन्दर first आ जाएगा ।
अब पूरे जंगल में ये बात फ़ैल गयी कि कामयाब वो जो झट से कूद के पेड़ पे चढ़ जाए ।
बाकी सबका जीवन व्यर्थ है ।
सो उन सब जानवरों ने , जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पे न चढ़ पाए , उनके लिए कोचिंग institute खुल गए । यहाँ पर बच्चे को पेड़ पे चढ़ना सिखाया जाता है ।
और चल पड़े हाथी , जिराफ , शेर और सांड़ , भैंसे , समंदर की सब मछलियाँ चल पड़ीं अपने बच्चों के साथ , coaching institute की ओर …….. हमारा बिटवा भी पेड़ पे चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा ।
हाथी के घर लड़का हुआ ……. तो उसने उसे गोद में ले के कहा ……. हमरी जिनगी का एक्के मक़सद है ……. हमार बिटवा पेड़ पे चढ़ेगा ।
और जब बिटवा पेड़ पे न चढ़ पाया , तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली ।
अपने बच्चे को पहचानिए । वो क्या है , ये जानिये । हाथी है कि शेर चीता लकडबग्घा , जिराफ ऊँट है कि मछली , या फिर हंस , मोर या कोयल ……… क्या पता वो चींटी ही हो …….. और यदि चींटी है आपका बच्चा , तो हताश निराश न हों ……. चींटी धरती का सबसे परिश्रमी जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज़्यादा वज़न उठा सकता है ।
इसलिए उसे चींटी समझ धिक्कारिये मत ।

🌹जय श्री कृष्ण🙏🙏


from Tumblr http://ift.tt/2t2snV6
via IFTTT

प्रश्न) मुक्ति किसको कहते हैं? (उत्तर) ‘मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः’ जिस में छूट...

प्रश्न) मुक्ति किसको कहते हैं?
(उत्तर) ‘मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः’ जिस में छूट जाना हो उस का नाम मुक्ति है।
(प्रश्न) किस से छूट जाना?
(उत्तर) जिस से छूटने की इच्छा सब जीव करते हैं?
(प्रश्न) किस से छूटने की इच्छा करते हैं?
(उत्तर) जिस से छूटना चाहते हैं?
(प्रश्न) किस से छूटना चाहते हैं।
(उत्तर) दुःख से।
(प्रश्न) छूट कर किस को प्राप्त होते और कहां रहते हैं?
(उत्तर) सुख को प्राप्त होते और ब्रह्म में रहते हैं।
(प्रश्न) मुक्ति और बन्ध किन-किन बातों से होता है?
(उत्तर) परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसङ्ग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि करने पूर्वोक्त प्रकार से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने सब से उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करे वह सब पक्षपातरहित न्यायधर्मानुसार ही करे। इत्यादि साधनों से मुक्ति और इन से विपरीत ईश्वराज्ञाभङ्ग करने आदि काम से बन्ध होता है।
(प्रश्न) मुक्ति में जीव का लय होता है वा विद्यमान रहता है।
(उत्तर) विद्यमान रहता है।
(प्रश्न) कहां रहता है?
(उत्तर) ब्रह्म में।
(प्रश्न) ब्रह्म कहां है और वह मुक्त जीव एक ठिकाने रहता है वा स्वेच्छाचारी होकर सर्वत्र विचरता है?
(उत्तर) जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है उसी में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उस को कहीं रुकावट नहीं विज्ञान, आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है।

साभार -सत्यार्थप्रकाश


from Tumblr http://ift.tt/2tWxpPk
via IFTTT

इतिहास की गलत जानकारी :- आम कहना हैं की सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की। खालसा पन्थ की स्थापना के समय...

इतिहास की गलत जानकारी :-

आम कहना हैं की सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की। खालसा पन्थ की स्थापना के समय ब्राह्मण,हिन्दू खत्री आगे आये थे। हर हिन्दू ने अपने परिवार का बड़ा बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक और जहां मराठे लड़ रहे थे वहीं दूसरी और राजपूतों और ब्राह्मणों ने मुगलों की नाक में दम किया हुआ था। जब पहली खालसा फ़ौज बनी तब उसका नेतृत्व एक ब्राह्मण भाई प्राग दास जी के हाथ में था। उसके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्भाली। सती दास जी,मति दास जी,दयाल दास जी जैसे वीर शहीद ब्राह्मण खालसा फ़ौज के सेनानायक थे। इन्होंने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपनी जान दी। गुरु गोबिंद जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले पण्डित कृपा दत्त जी भी एक ब्राह्मण थे, उनसे बड़ा योद्धा कभी पंजाब के इतिहास में नही देखा गया। जब 40 मुक्ते मैदान छोड़ कर भागे तब एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास जी उर्फ़ बन्दा बहादुर जी और उसका 14 साल के बेटे अजय भारद्वाज ने गुरु जी के परिवार की रक्षा के लिए सरहिंद में लड़े। चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में उनकी इतिहासिक विजय हुई। 1906 में खालसा पन्थ सिख धर्म बना। अकाली लहर चला कर उसे हिन्दू धर्म से कुछ लोगों ने अलग कर दिया। इतिहास से छेड़छाड़ हुई पर सच्चाई कभी बदल नही सकती।

सभी ब्राह्मणों से अनुरोध है इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और महान ब्राह्मण योद्धाओं जिनका इतिहास बिकाऊ वामपंथी इतिहासकारों ने मिटा दिया वो सबके सामने आये।


from Tumblr http://ift.tt/2rZ2WDV
via IFTTT

आओ मित्रों ! भजन का आनन्द लेवे । इतनी शक्ति हमें दे न दाता मनका विश्वास कमज़ोर हो ना हम चलें नेक...

आओ मित्रों ! भजन का आनन्द लेवे ।

इतनी शक्ति हमें दे न दाता
मनका विश्वास कमज़ोर हो ना
हम चलें नेक रास्ते पे हमसे
भूलकर भी कोई भूल हो ना…

हर तरफ़ ज़ुल्म है बेबसी है
सहमा-सहमा-सा हर आदमी है
पाप का बोझ बढ़ता ही जाये
जाने कैसे ये धरती थमी है
बोझ ममता का तू ये उठा ले
तेरी रचना का ये अन्त हो ना…
हम चले…

दूर अज्ञान के हो अन्धेरे
तू हमें ज्ञान की रौशनी दे
हर बुराई से बचके रहें हम
जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे
बैर हो ना किसीका किसीसे
भावना मन में बदले की हो ना…
हम चले…

हम न सोचें हमें क्या मिला है
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण
फूल खुशियों के बाटें सभी को
सबका जीवन ही बन जाये मधुबन
अपनी करुणा को जब तू बहा दे
करदे पावन हर इक मन का कोना…
हम चले…

हम अन्धेरे में हैं रौशनी दे,
खो ना दे खुद को ही दुश्मनी से,
हम सज़ा पाये अपने किये की,
मौत भी हो तो सह ले खुशी से,
कल जो गुज़रा है फिरसे ना गुज़रे,
आनेवाला वो कल ऐसा हो ना…

हम चले नेक रास्ते पे हमसे,
भुलकर भी कोई भूल हो ना…
इतनी शक्ति हमें दे ना दाता,
मनका विश्वास कमज़ोर हो ना…


from Tumblr http://ift.tt/2sxVoqx
via IFTTT

🌷💚 ओउम् नमस्ते जी 🌷💚 🌷💚 आपका दिन शुभ हो 🌷💚 दिनांक – 23 जून 2017 दिन – शुक्रवार तिथि...

🌷💚 ओउम् नमस्ते जी 🌷💚
🌷💚 आपका दिन शुभ हो 🌷💚

दिनांक – 23 जून 2017
दिन – शुक्रवार
तिथि – चतुर्दशी
नक्षत्र– रोहिणी
पक्ष– कृष्ण
माह – आषाढ़
ऋतु – वर्षा
सूर्य – दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 118
कलयुगाब्द – 5119
विक्रम संवत् – 2074
शक संवत् – 1939
दयानंदाब्द – 194

🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂

🌷 जिस व्यवसाय में आय कम और खर्च ज्यादा हो या जिसमें आय बढ़ाने के लिए बेईमानी करना पडे उस व्यवसाय को छोड़ देना ही उचित है क्योंकि बेईमानी से प्राप्त कि गई आय का पैसा दुःख और विपत्ति लाने वाला सिद्ध होता है जिसका पता बाद में चलता है तत्काल नही नही चलता इसलिए ख्याल में नही आता ।धन हम अपने जीवन निर्वाह के लिए , अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और पारिवारिक विकास के लिए कमाते है ताकि परिवार अभावों से पीड़ित और दुखी न रहे ।यदि धन प्राप्त करके भी दुख दूर न हो तो ऐसे धन से क्या लाभ ?

🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃

🌹 *ओ३म् नमस्ते जी* 🌹
🙏🏻

*🌷मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा ।*
*हठश्चैव विषादश्च परोक्तं नैव मन्यते ।।*

🌷मूर्ख मनुष्य के पाँच चिन्ह होते हैं यथा-(१) अभिमानी होना,(२) कटु-कठोर बोलना,गाली प्रदान करना,(३) हठी,अड़ियल होना,(४) दुःखी होना और (५) दूसरे की कही हुई बात को न मानना।

🌹 *शुभ प्रभात जी* 🌹
।। *ओ३म्* ।।
🙏🏻

🌷💚🌷💚 ओउम् 🌷💚🌷💚 सुदिनम् 🌷💚🍁


from Tumblr http://ift.tt/2s33XWL
via IFTTT

जैसे शरीर में मुख होता है जिसके तेजवान , ओजपूर्ण होने से शरीर की शोभा बढ़ती है जहाँ ज्ञानेन्द्रिया...

जैसे शरीर में मुख होता है जिसके तेजवान , ओजपूर्ण होने से शरीर की शोभा बढ़ती है जहाँ ज्ञानेन्द्रिया होती है सर्दी में सबकुछ ढकते है पर कोई मुख का ढक्कन नही माँगता , वैसे ही समाज में ब्राम्हण होना चाहिए व्रती , ब्रम्हचारी ,तेजवान , प्रत्येक दशा में ज्ञानार्जन कर ज्ञानर्पण करने वाला ।

जैसे शरीर में भुजाये होती है जिसके मजबूत होने से विपक्षी भय खाता है चाहे मुख पर वार हो या पैर में काटा लगे भुजाएं रक्षार्थ आती है वैसे ही समाज में बलशाली महारथी क्षत्रिय होने चाहिए ।

जैसे शरीर में उदर( पेट ) होता है जिसकी पाचन शक्ति से मुख हो या भुजाएं या पैर सबमे शक्ति आती है जो पौष्टिकता को बिना भेदभाव् किये सारे शरीर में बाटता है , ऐसे होने चाहिए समाज में दानवीर वैश्य ।

जैसे शरीर में पैर होते है जिनकी मजबूती से शरीर को मजबूत संतुलन मिलता है जिसके तेज से शरीर तेजगामी होता है जिसके बिना उदर हो या भुजाएं या मुख स्थान तक परिवर्तित नही कर सकते है ऐसे होने चाहिए समाज में तेजवान , वेगवान शुद्र ।

जिस प्रकार मुख , उदर , भुजाओं , पैरों के महान सामंजस्य से सुंदर शरीर का निर्माण व् सञ्चालन होता है वैसे ही ब्राम्हण , क्षत्रिय , वैश्य व् शुद्र के महान सामंजस्य से सुंदर समाज का निर्माण होना चाहिए ।
विशेष ध्यान रहे अंगों ( वर्ण ) की पहचान उसका कार्य है ।

यही है वैदिक वर्ण व्यवस्था यही है आर्यसमाज की कामना ।


from Tumblr http://ift.tt/2rYvUUz
via IFTTT

ईश्वर के ध्यान-समाधि से प्राप्त होने वाली उपलब्धियां- १. नित्य आनंद की प्राप्ति होना- जो कभी...

ईश्वर के ध्यान-समाधि से प्राप्त होने वाली उपलब्धियां-
१. नित्य आनंद की प्राप्ति होना- जो कभी उत्पन्न, नाश, वृद्धि, ह्रास को प्राप्त नहीं होता.
२. ईश्वर की सत्य विद्या मिलना.
३. बल
४. सत्याचरण
५. अविद्या, अधर्माचरण, दुखों का विनाश.
- पूज्य स्वामी जी के प्रवचन में से (२२-६-२०१६).


from Tumblr http://ift.tt/2rYIGCt
via IFTTT

Thursday, June 22, 2017

श्रीकृष्ण जैसा योगी ना रै रावण सा अभिमान नहीं कितणा ए घमंड करे जा तू मन मैं नारद जीतणा ज्ञान...

श्रीकृष्ण जैसा योगी ना रै
रावण सा अभिमान नहीं
कितणा ए घमंड करे जा तू मन मैं नारद जीतणा ज्ञान नहीं
दयानंद सा रै इस दुनिया मैं वेदों का विद्वान नहीं
चाहे लाख त्यजुरी भरी रहो पर कर्ण जिसा धनवान नहीं
दुर्योधन जीसी ना नही रै
हरिश्चंद्र सी हां कोन्या
वेद शास्त्र ढूंढ लिए पर ओ३म् बराबर ना कोन्या
हेर श्रवण जैसा पूत जगत मैं कौशल्या सी मां कोन्या।


from Tumblr http://ift.tt/2rVHa3P
via IFTTT

What is God? Who is He and Where does He stay? Answer: God is an Eternal, Conscious, Formless and...

What is God? Who is He and Where does He stay?
Answer: God is an Eternal, Conscious, Formless and all-pervading entity who is the efficient cause of the Universe and the support of all. The Benevolent Supreme is Self-Existence + All-Intelligence + All Blissful + Infinite personified and Holy, Apprehend, Independent by nature. He is Almighty of all hence Omnipotent. He is Limitless. Countless creations and souls reside in God and God Himself resides in all these things. There is no place left vacant in this Universe where there is non-existence of the Supreme Soul–“Ishaa Vaasyamidam Sarvam” (Yajurveda 40/1) means God resides in this whole Universe.
“Aa Varivarti Bhuvaneshvantah” (Rigveda 1-164-31) He is called God whose attributes, actions, nature and oritological essences are nothing but truth. He is one, without a second. God is Omniscient (All knowledgeable), Omnipresent and Eternal means He is without a beginning or end. By His nature He is Imperishable, Gynostic, Blissful, Pure, Just, Merciful, Unborn, Unchangeable, Incomparable
He who is Generator, Organizer and Destroyer of the Universe is called “GOD”.
He who is away from Ignorance - Happiness - Unhappiness - Desires - Undesired and mixed actions is called God.
God is Benevolent, and Fearless. His activities include the creation, preservation, and destruction of the marvelous structure of the Universe and the dispensation of reward or punishment commensurate with the virtuous or vicious deeds of all living beings.
Most of the great philosophers have maintained that there exist some sort of absolute, whether it is called God or by any other name.,best name as described by God Himself is AUM.
Remember, three things are eternal- God,Souls and matter.Even being Omnipotent God cannot create Souls and matter.God create the universe by various combination of tiny particles of matter for the use of Souls.As every company provide a manual mentioning various instructions regarding use of their product similarly God reveals a manual in the minds of four best persons in the beginning of universe mentioning varios instructions regarding use of His valuable gifts like air,water,light,food etc. This manual is known as Vedas.It is paramount duty of all human beings to read Vedas and act accordingly. The book Light of Truth ( Satyarthparkash)by Rishi Dayanand contains the extract of Vedas.

- Dr Mumukshu Arya ( Consultant Physician and Cardiologist )


from Tumblr http://ift.tt/2sFjxJX
via IFTTT

ब्राह्मण कौन ? यास्क मुनि के अनुसार- जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः। वेद पाठात् भवेत्...

ब्राह्मण कौन ?

यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः।
वेद पाठात् भवेत् विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।

अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।

-महर्षि मनु के अनुसार
विधाता शासिता वक्ता मो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥

अर्थात-शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता, वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं”
(मनु; 11-35)

-महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार
“जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण

नहीं हे उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो”
(सन्दर्भ ग्रन्थ – महाभारत)

-महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ के अनुसार
“जो निष्कारण (कुछ भी मिले एसी आसक्ति का त्याग कर के).

-वेदों के अध्ययन में व्यस्त हे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय हे वही ब्राह्मण हे.”
(सन्दर्भ ग्रन्थ – शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल १०, पराशर स्मृति)

-भगवद गीता में श्री कृष्ण के अनुसार “शम, दम, करुणा, प्रेम, शील (चारित्र्यवान), निस्पृही जेसे गुणों का स्वामी ही ब्राह्मण हे” और
“चातुर्वर्ण्य माय सृष्टं गुण कर्म विभागशः”
(भ.गी. ४-१३)

इसमे गुण कर्म ही क्यों कहा भगवान ने जन्म क्यों नहीं कहा?

-जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार
“ब्राह्मण वही हे जो “पुंस्त्व” से युक्त हे. जो “मुमुक्षु” हे. जिसका मुख्य ध्येय वैदिक विचारों का संवर्धन हे. जो सरल हे. जो नीतिवान हे, वेदों पर प्रेम रखता हे, जो तेजस्वी हे, ज्ञानी हे, जिसका मुख्य व्यवसाय वेदो का अध्ययन और अध्यापन कार्य हे, वेदों/उपनिषदों/दर्शन शास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण हे”
(सन्दर्भ ग्रन्थ – शंकराचार्य विरचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सार संग्रह,आत्मा-अनात्मा विवेक)

किन्तु जितना सत्य यह हे की केवल जन्म से ब्राह्मण होना संभव नहीं हे. कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है यह भी उतना ही सत्य हे.
इसके कई प्रमाण वेदों और ग्रंथो में मिलते हे जेसे…..

(1) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे| परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की| ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है|

(2) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीनचरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये|
ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया |
(ऐतरेय ब्राह्मण२.१९)

(3) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |

(4) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र होगए थे,
प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया |
(विष्णु पुराण ४.१.१४)

(5) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए|
पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया |
(विष्णु पुराण ४.१.१३)

(6) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(7) आगे उन्हीं के वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए|
(विष्णु पुराण ४.२.२)

(8) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(9) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(10) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मणहुए |
(विष्णु पुराण ४.३.५)

(11) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया |
(विष्णु पुराण ४.८.१) वायु,

विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्यके उदाहरण हैं |

(12) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |

(13) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |

(14) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |

(15) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |

(16) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया |
विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |

(17) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |

मित्रों, ब्राह्मण की यह कल्पना व्यावहारिक हे के नहीं यह अलग विषय हे किन्तु भारतीय सनातन संस्कृति के हमारे पूर्वजो व ऋषियो ने ब्राह्मण की जो व्याख्या दी हे उसमे काल के अनुसार परिवर्तन करना हमारी मूर्खता मात्र होगी.

वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हों या ना हों लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं हे. अतः आओ हम हमारे कर्म और संस्कार तरफ वापस बढे.


from Tumblr http://ift.tt/2rYXhsD
via IFTTT

Wednesday, June 21, 2017

सूर्य नमस्कार एवं मुसलमानों की भ्रान्ति 21 जून को योग दिवस के अवसर पर सूर्य नमस्कार करने का अनेक...

सूर्य नमस्कार एवं मुसलमानों की भ्रान्ति

21 जून को योग दिवस के अवसर पर सूर्य नमस्कार करने का अनेक मुस्लिम संगठनों ने यह कहकर विरोध किया हैं कि इस्लाम में केवल एक अल्लाह की इबादत करने का आदेश है जबकि हिन्दू समाज में तो सूर्य, पेड़, जल, नदी, पर्वत आदि सभी की पूजा का विधान हैं। इसलिए एक मुस्लमान के लिए सूर्य नमस्कार करना नापाक है।
यह स्पष्टीकरण सुनकर मुझे आर्यसमाज के प्रसिद्द भजनोपदेशक स्वर्गीय पृथ्वी सिंह बेधड़क का एक भजन स्मरण हो आया जिसमें एक मुस्लिम लड़की एक आर्य लड़की से इस्लाम ग्रहण करना का प्रलोभन यह कहकर देती हैं कि इस्लाम में एक अल्लाह की इबादत करने का बताया गया है तो आर्य लड़की उसे प्रतिउत्तर देती है कि हमारे वेद तो आपके इस्लाम से करोड़ो वर्ष पुराने हैं एवं उसमें विशुद्ध एकेश्वरवाद अर्थात केवल एक ईश्वर की उपासना का प्रावधान बताया गया हैं जबकि मुसलमानों को यह भ्रान्ति हैं कि वे केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं क्यूंकि उनके तो कलमे में भी एक अल्लाह के अलावा रसूल भी शामिल है, नबी, फरिश्ते, शैतान,जिन्न आदि भी हैं। अर्थात इस्लाम विशुद्ध एकेश्वरवाद नहीं है। विशुद्ध एकेश्वरवाद तो केवल वेदों में वर्णित हैं।

स्वामी दयानंद द्वारा बताये गए ईश्वर और देवता के अंतर को मुसलमान लोग समझ जाते तो यह शंका नहीं होती।

ईश्वर को परिभाषित करते हुए स्वामी दयानंद लिखते है कि जिसको ब्रह्मा, परमात्मादि नामों से कहते हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षण युक्त है जिसके गुण, कर्म, स्वाभाव पवित्र हैं जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनंत, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता , सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त परमेश्वर हैं उसी को मानता हूँ।

देव शब्द को परिभाषित करते हुए स्वामी दयानंद लिखते है कि उन्हीं विद्वानों, माता-पिता, आचार्य, अतिथि, न्यायकारी राजा और धर्मात्मा जन, पतिव्रता स्त्री, स्त्रीव्रत पति का सत्कार करना देवपूजा कहलाती है।

वेदों में तो पूजा के योग्य केवल एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, भगवान को ही बताया गया है। देव शब्द का प्रयोग सत्यविद्या का प्रकाश करनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए भी होता हैं क्यूंकि वे ज्ञान का दान करते हैं और वस्तुओं के यथार्थ स्वरुप को प्रकाशित करते हैं।

स्वामी दयानंद देव शब्द पर विचार करते हुए ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदविषयविचार अध्याय 4 में लिखते हैं की दान देने से ‘देव’ नाम पड़ता हैं और दान कहते हैं अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना। 'दीपन’ कहते हैं प्रकाश करने को, 'द्योतन’ कहते हैं सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है की जिसने जगत को सब पदार्थ दे रखे है तथा विद्वान मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों के देनेवाले होने से देव कहाते है। दीपन अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्यादि लोकों का नाम भी देव हैं। तथा माता-पिता, आचार्य और अतिथि भी पालन, विद्या और सत्योपदेशादी के करने से देव कहाते हैं। वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करनेवाला हैं, सो ही ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव हैं, अन्य कोई नहीं। कठोपनिषद 5/15 का भी प्रमाण हैं की सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इस सबका प्रकाश करनेवाला एक वही है क्यूंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य आदि सब जगत प्रकाशित हो रहा हैं। इसमें यह जानना चाहिये की ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करनेवाला नहीं हैं , इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव हैं।

अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र वसु, रूद्र, आदित्य, इंद्र,सत्यनिष्ठ विद्वान,वीर क्षत्रिय, सच्चे ब्राह्मण, सत्यनिष्ठ वैश्य, कर्तव्यपरायण शूद्र से लेकर माता-पिता, आचार्य और अतिथि तक सभी मनुष्यों के लिए कल्याणकारी हैं इसलिए सम्मान के योग्य हैं।

जिस प्रकार से माता-पिता, आचार्य आदि सभी खिदमत करने वाले मगर उनका सम्मान हर मुसलमान करता हैं कोई उन्हें यह नहीं कहता कि हम सेवक का नमन क्यों करे उसी प्रकार से सूर्य, वायु, अग्नि,पृथ्वी, पवन आदि भी मनुष्य कि सेवा करते हैं इसलिए सम्मान के योग्य हैं।

सूर्य नमस्कार और वन्दे मातरम सम्मान देने के समान है न कि पूजा करना है।

सम्मान करना एवं पूजा करने में भेद को समझने से इस शंका का समाधान सरलता से हो जाता है जिसका श्रेय स्वामी दयानंद को जाता है।

डॉ विवेक आर्य


from Tumblr http://ift.tt/2tOFzJD
via IFTTT

*महर्षि पतञ्जलि ने योग को ‘चित्त की वृत्तियों के निरोध’ के रूप में परिभाषित किया है।...

*महर्षि पतञ्जलि ने योग को ‘चित्त की वृत्तियों के निरोध’ के रूप में
परिभाषित किया है। योगसूत्र में उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक,
मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार
से बताया है। अष्टांग, आठ अंगों वाले, योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला
मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों
का अभ्यास एक साथ किया जाता है। योग के ये आठ अंग हैं:

*'यम’ : पांच सामाजिक नैतिकता

*अहिंसा – शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना

*सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना

*अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना

*ब्रह्मचर्य – दो अर्थ हैं:

* चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
* सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना

*अपरिग्रह – आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की
इच्छा नहीं करना

*'नियम’: पाच व्यक्तिगत नैतिकता
*शौच – शरीर और मन की शुद्धि

*संतोष – संतुष्ट और प्रसन्न रहना

*तप – स्वयं से अनुशाषित रहना

*स्वाध्याय – आत्मचिंतन करना

*इश्वर-प्रणिधान – इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा

*'आसन’: योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण

*'प्राणायाम’: श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण

*'प्रत्याहार’: इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना

*'धारणा’: एकाग्रचित्त होना

*'ध्यान’: निरंतर ध्यान

*'समाधि’: आत्मा से जुड़ना: शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था


from Tumblr http://ift.tt/2rUJWS5
via IFTTT