Friday, July 13, 2018

*🔥ओ३म्🔥**“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति...

*🔥ओ३म्🔥*


*“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥”* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-१२ ॥


*पदार्थ—* _(सः) वह इन्द्र=जीवात्मा (तस्मिन्, एव) उसी अर्थात् जहां ब्रह्म यक्षरूप में प्रकट हुआ और अन्तर्धान हुआ, (आकाशे) हृदयाकाश में (हैमवतीम्) हिरण्यमयी दिव्यप्रज्ञावाली अथवा सन्ताप को नष्ट करने वाले शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न (बहुशोभमानाम्) (उमाम्) ब्रह्मविद्यारूपी (स्त्रियम्) स्त्री के समीप (आजगाम) प्राप्त हुआ और (ताम्) उससे (ह) दुःखी सा होकर (उवाच) बोला कि (एतत्) यह (यक्षम्) यक्ष (किम्, इति) कौन है ?_

*भावार्थ—* इन्द्र (जीवात्मा) को यक्ष (ब्रह्म) के अन्तर्धान होने पर बहुत दुःख हुआ कि वह यक्ष को जानने के लिए आया था किन्तु जानने का ही अवसर नहीं मिला । तत्पश्चात् जीवात्मा ने योगाङ्गों का अनुष्ठान करते हुए अन्तःकरण को शुद्ध किया और ब्रह्मविद्या को प्राप्त किया । यही इन्द्र की उमा=ब्रह्मविद्या से यक्ष को जानने की प्रार्थना है। यहां ‘उमा’ कोई स्त्रीविशेष नहीं है अपितु ‘उमा ब्रह्मविद्या’ (तैत्तिरीयोप० १।४८) इस प्रमाण से ब्रह्मविद्या का नाम ही ‘उमा’ है । ‘उमा’ अर्थ ही *—‘उम्=परमात्मानं माति प्रमापयति’* अर्थात् जो परब्रह्म का ज्ञान कराती है ।

जब जीव योगसाधना करके दिव्य प्रज्ञा प्राप्त करता है, तब ब्रह्मविद्या से मिलन=ब्रह्म-प्राप्ति होती है और यक्ष (ब्रह्म) को जान पाता है । योग की दिव्यविभूतियां प्राप्त करना ही ब्रह्मविद्या (उमा) के दिव्य आभूषण हैं । इस उमा (ब्रह्मविद्या) से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, इस विषय में उपनिषदों में अन्यत्र भी कहा है— *“दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्म- दर्शिभिः ॥”*(कठोप०) अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान सूक्ष्मबुद्धि से होता है । यह सूक्ष्मबुद्धि ब्रह्मज्ञान से ही होती है । ब्रह्म की प्राप्ति कहां होती है ? इस प्रश्न का भी यहां स्पष्ट समाधान किया है । ब्रह्म को खोजने के लिए बाह्य जगत् की कोई आवश्यकता नहीं होती । ब्रह्म को तो हृदय रूप आकाश में प्राप्त किया जाता है, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (प्रपा० ८ । मं० १) में स्पष्टरूप से कहा है—


*“अथ यदिमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तरा- काशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥”* इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं—

*“कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है । दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है ।”* (ऋ० भू० उपासनाविषय)


इस खण्ड में वर्णित आख्यायिका के विषय में महर्षि दयानन्द कहते हैं— *“केनोपनिषद् में एक यक्ष की वार्त्ता है । यक्ष ने अग्नि के सम्मुख तृण डाला और अग्नि से कहा कि इस तिनके को तू जला दे । अग्नि से वह तिनका न जल सका, फिर वायु से कहा कि तू इस तिनके को उड़ा ले जा, वायु से भी वह तिनका न उड़ सका । ऐसा कहकर जो हैमवती नामक ब्रह्मविद्या है, उसका माहात्म्य दर्शाया है ।”* (पूना प्रवचन ७४ पृ०)


इस तृतीय खण्ड में आलङ्कारिक आख्यायिका के द्वारा ब्रह्म की महत्ता, अग्नि आदि समस्त देवों की ब्रह्म की शक्ति से ही शक्तिसम्पन्नता, ब्रह्म का अविद्याग्रस्त से छिप जाना और विद्वान् व शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को ब्रह्मज्ञान होना इत्यादि विषयों का वर्णन किया गया है ।

*💥शम्💥*

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