Thursday, March 29, 2018

*“ वैदिक नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च, 2018)” की आप सभी को...

*“ वैदिक नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च, 2018)” की आप सभी को अग्रिम शुभकामनाएँ।*

इसी दिन ‪1960853119‬ वर्ष पूर्व इस पृथिवी के तिब्बत - हिमालय क्षेत्र में युवावस्था में मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, इस कारण यह मानव उत्पत्ति संवत् है।

मनुष्योत्पत्ति के दिन ही अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चार महर्षियों ने ब्रह्माण्ड में अनेक प्रकार के  Vibrations के रूप में व्याप्त वैदिक ऋचाओं (मंत्रों) को अपने योग बल से ग्रहण करके सृष्टि के रचयिता निराकार सर्वज्ञ ब्रह्म रूप चेतन तत्व की प्रेरणा से उनका अर्थ भी जाना, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में सृष्टि में विख्यात हुआ। इन्हीं चार ऋषियों ने महर्षि ब्रह्मा (आद्य) को सर्वप्रथम चारों वेदों का ज्ञान दिया। इस कारण यह वेद संवत् भी है।

यह संवत् संसार के सभी धार्मिक पवित्र मानवों के लिए है-



*चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व :*


*1.:-इसी दिन आज से तथा सृष्टि संवत 1,96,08,53,119 वर्ष पुर्व सूर्योदय के साथ ईश्वर ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।


*2:-प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार इसी दिन वेद-वेदांग-विज्ञान के महान् ज्ञाता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने आततायी महाबली रावण का वध किया। ध्यातव्य है कि श्रीराम व रावण का अन्तिम युद्ध चैत्र की अमावस्या को प्रारम्भ हुआ और दो दिन चला। प्रचलित दशहरे (विजयादशमी) का रावण वध से कोई सम्बन्ध नहीं है।

महाभारत के अनुसार इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर की अधर्म की प्रतिमूर्ति दुर्योधन पर विजय हुई। दुर्योधन की मृत्यु के समय योगेश्वर महामानव भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा था- ‘प्राप्तं कलियुगं विद्धि’, इस कारण यह दिन किसी भी युग का प्रारम्भिक दिन भी होने से युग संवत् भी है। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ था इसलिए यह युधिष्ठिर संवत है ।


3:-समस्त भारतीयों के लिए यह दिन इस कारण महनीय है क्योंकि इसी भारत भूमि पर मनुष्य, वेद, भगवान् श्रीराम, धर्मराज युधिष्ठिर सभी उत्पन्न हुए तथा इसी का सम्बन्ध सम्राट् विक्रमादित्य से भी है, जिनके नाम से इस दिन को विक्रम संवत् का प्रारम्भ भी मानते हैं। यह 2075 वां वि.सं. है।  सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।


*4:-विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।


5:-143 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना।*आर्य समाज वेद प्रचार का महान कार्य करने वाला संगठन है।


*वैदिक नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :*


*1.* वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।


*2.* फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।


*वैदिक नववर्ष कैसे मनाएँ :*


*1.* हम परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ दें।


*2.* आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।


*3 .* इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों में हवन यज्ञ करे और वेद आदि शास्त्रो के स्वधयाय का संकल्प ले।


*4.* *घरों एवं धार्मिक स्थलों में हवन यज्ञ के प्रोग्राम का आयोजन जरूर करें ।*


*5.* इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।


*आप सभी से विनम्र निवेदन है कि “वैदिक नववर्ष” हर्षोउल्लास के साथ मनाने के लिए “ज्यादा से ज्यादा सज्जनों को प्रेरित” करें।*

धन्यवाद


🚩नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं🚩


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कोई पशु पक्षी प्राणी कुत्ता सूअर हाथी भेड़िया शेर आदि पढ़ लिख कर के डॉक्टर नहीं बनता, इंजीनियर नहीं...

कोई पशु पक्षी प्राणी कुत्ता सूअर हाथी भेड़िया शेर आदि पढ़ लिख कर के डॉक्टर नहीं बनता, इंजीनियर नहीं बनता, वकील नहीं बनता, वैज्ञानिक नहीं बनता ।

यह सब प्राणी जैसे जन्मे थे जीवन भर वैसे ही रहते हैं । उनको जीवन जीने के लिए जितना ज्ञान आवश्यक है उतना ईश्वर इन को जन्म से ही सिखा कर भेजता है ।

इसलिए इनके ना कोई स्कूल होते हैं ना अध्यापक।

कहीं-कहीं मनुष्य , कुत्ते अधिक प्राणियों को थोड़ी बहुत ट्रेनिंग दे देते हैं जिससे वे चोरों को पकड़वाने में सहायता करते हैं । परंतु ऐसे प्राणियों की प्रगति भी बहुत सीमित होती है बहुत अधिक नहीं ।

परंतु मनुष्य एक ऐसा प्राणी है , जो जन्म से तो बहुत कम जानता है, पिछले जन्म से थोड़े ही संस्कार लेकर आता है, फिर भी यदि इस जन्म में उसे अच्छी शिक्षा अच्छे अध्यापक अच्छा विद्यालय अच्छी सुविधाएं मिल जाएं, तो वह बहुत उन्नति कर सकता है । अपने लिए भी समाज के लिए देश के लिए सबके लिए । बहुत से लोग अनेक क्षेत्रों में उन्नति करते भी हैं । इसलिए हमको अपने मनुष्य जीवन का मूल्य समझते हुए जीवन में पर्याप्त उन्नति करनी चाहिए । वास्तविक उन्नति का तात्पर्य दुखों से छूटना और ईश्वरीय आनंद की प्राप्ति करना है।- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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मनुष्य का यह मनोविज्ञान है कि वह आँख से देखकर 80% बातें सीखता है और कान से सुनकर 20%. तो आपको अपने...

मनुष्य का यह मनोविज्ञान है कि वह आँख से देखकर 80% बातें सीखता है और कान से सुनकर 20%.

तो आपको अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करते हुए, आपके बच्चे आंख से देखते हैं । और वे उसमें से 80% बातें सीखते जाते हैं , कि हमारे माता पिता , हमारे दादा दादी के साथ क्या व्यवहार करते हैं?

यही घटना कुछ वर्षों के बाद आपके साथ होने वाली है । अर्थात जो आपने अपने माता-पिता के साथ किया , अच्छा या बुरा, जो भी । वही अब आपके बच्चे , आपके बुढ़ापे में आपके साथ करेंगे। क्योंकि उन्होंने आपको अपनी आंख से देखकर सीखा है, जो आपने अपने बडों के साथ किया ।

इसलिए यदि आप अपना बुढ़ापा सुरक्षित करना चाहते हैं , सुखदायक बनाना चाहते हैं , तो अच्छा यही होगा , कि अपने माता-पिता की ठीक प्रकार से सेवा करें । तब आपके बच्चे भी आपके बुढ़ापे में आपकी सेवा कर देंगे ।

अन्यथा जो स्थिति आप आज देख रहे हैं , उसे सब जानते हैं , उसकी व्याख्या करना की आवश्यकता नहीं है। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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व्यक्ति 5 इंद्रियों से सुख भोगता है । आज तो चारों ओर ऐसा ही वातावरण बना हुआ है। लोगों को धर्म कर्म...

व्यक्ति 5 इंद्रियों से सुख भोगता है । आज तो चारों ओर ऐसा ही वातावरण बना हुआ है।

लोगों को धर्म कर्म में सेवा परोपकार में ईश्वर में मोक्ष प्राप्ति आदि में कोई खास रुचि नहीं है । इंद्रियों के रूप, रस, गन्ध आदि विषयों का सुख लेने में खूब रुचि है ।

और उनमें से एक मुख्य विषय रस है, जो रसना इंद्रिय से खाने पीने आदि से सुख मिलता है।

यह बहुत आसानी से मिल जाता है , और इसका सुख लेने में प्रायः लोग बुरा भी नहीं मानते । इसलिए बेखटके लोग खाने पीने का सुख लेते रहते हैं।

फिर चाहे परिणाम, कुछ भी क्यों न हो। रोगी हों, चाहे दीर्घरोगी हों, बस रसना आदि इंद्रियों से रस आदि विषयों का सुख जरूर लेना है। मन, इंद्रियों पर संयम तो है नहीं, और कोई माता पिता आदि सिखाते भी नहीं। क्योंकि उनका स्वयं का संयम नहीं है।

तो वेदादि शास्त्र कहते हैं, *भोजन को दवाई के समान खाना चाहिए , अन्यथा भविष्य में दवाइयां भोजन के समान खानी पड़ेंगी* अर्थात भोजन का सुख न लेवें, बल्कि स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भोजन करें। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिस पर झूठे आरोप ना लगाए जाते हों। और तो और , ईश्वर में एक भी...

संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिस पर झूठे आरोप ना लगाए जाते हों। और तो और , ईश्वर में एक भी दोष नहीं है एक भी कमी नहीं है वह कभी किसी पर अन्याय नहीं करता, दयालु है उपकारी है और बिना कुछ फीस लिए सबका न्याय करता है बदले में कुछ चाहता भी नहीं है , फिर भी ऐसे सर्वगुणसंपन्न सर्वशक्तिमान ईश्वर को भी लोग नहीं छोड़ते । अपनी अविद्या और स्वार्थ के कारण ईश्वर पर भी भरपेट दोष लगाते हैं , झूठे आरोप लगाते हैं। फिर आप और हम तो क्या चीज हैं, ? हम तो सर्वशक्तिमान नहीं हैं, सर्वगुण संपन्न नहीं हैं , जाने अनजाने हम से तो कभी कहीं गलतियां हो भी सकती हैं । ऐसी स्थिति में यदि कोई आप हम पर आरोप लगाए , तो क्या आश्चर्य की बात है ? कुछ नहीं ।

इसलिए लोग यदि आप पर झूठे आरोप लगाए निंदा चुगली करें तो घबराना नहीं , चिंता नहीं करना, और अपने मन को शांत रखना । इसके लिए 2 सूत्र हैं । पहला , *कोई बात नहीं* . दूसरा, *ईश्वर न्याय करेगा* .

अपने मन को शांत रखने के लिए ये 2 सूत्र अपने मन में बोलिए और मस्त रहिए । यह संसार ऐसे ही चलता है ऐसे ही चलेगा। इसकी परवाह न करें। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Wednesday, October 11, 2017

 हिन्दू सत्य सनातन धर्म की - अद्भुत पूजा पद्धति जो पूर्णतया वेदानुकूल है,अनुकरणीय है, ध्यान मुद्रा...

 हिन्दू सत्य सनातन धर्म की - अद्भुत पूजा पद्धति जो पूर्णतया वेदानुकूल है,अनुकरणीय है, ध्यान मुद्रा में बैठ कर निम्न वेदमंत्रों का अर्थ सहित चिन्तन करें, ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करें-*

*अथ वैदिक सन्ध्या*-


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं वाक्‌ वाक्‌। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्‌। ओं नाभिः।

ओं हृदयम्‌। ओं कण्ठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्‌। ओं करतलकरपृष्ठे॥

(इन्द्रिय स्पर्श करें)


ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कण्ठे।

ओं महः पुनातु हृदये । ओं जनः पुनातु नाभ्याम्‌। ओं तपः पुनातु पादयोः।

ओं सत्यम्‌ पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥

(जल से मार्जन करें)


ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्‌॥

(प्राणायाम करें)


ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥


समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥


सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥

-ऋग्‌. १०.१९०.१-३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं उदीची दिक्सोमोेऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥

-अथर्व.३.२७.१-६


ओम्‌ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्तऽउत्तरम्‌।

देवं देवत्रा सूर्य्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्‌॥

-यजु. ३५.१४


उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।

दृशे विश्वाय सूर्य्यम्‌॥

-यजु. ३३.३१


चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।

आप्रा द्यावापृथिवीऽअन्तरिक्षम्‌

सूर्यऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥

-यजु. ७.४२


तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्‌।

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं

शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं

भूयश्च शरदः शतात्‌॥

-यजु. ३६.२४


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा

धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥


ओं नमः शम्भवाय च मयोभवाय च

नमः शंकराय च मयस्कराय च

नमः शिवाय च शिवतराय च॥

-यजु. १४.४१


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सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्योंमहर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी...

सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्यों


महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश रचकर धार्मिक जगत में एक क्रांति कर दी . यह ग्रन्थ वैचारिक क्रान्ति का एक शंखनाद है . इस ग्रन्थ का जन साधारण पर और विचारशील दोनों प्रकार के लोगों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा . हिन्दी भाषा में प्रकाशित होनेवाले किसी दुसरे ग्रन्थ का एक शताब्दी से भी कम समय में इतना प्रसार नहीं हुआ जितना की इस ग्रन्थ का अर्धशताब्दी में प्रचार प्रसार हुआ . हिन्दी में छपा कोई अन्य ग्रन्थ एक शताब्दी के भीतर देश व विदेश की इतनी भाषाओँ में अनुदित नहीं हुआ जितनी भाषाओँ में इसका अनुवाद हो गया है. हिन्दी में तो कवियों ने इसका पद्यानुवाद भी कर दिया .


सार्वभौमिक नित्य सत्य : इस ग्रन्थ का लेखक ईश्वर जीव प्रकृति इन तीन पदार्थों को अनादि मानता है .ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव भी अनादि व नित्य हैं . सृष्टि नियमों को भी ग्रन्थ करता अनादि व नित्य तथा सार्वभौमिक मानता हिया . विज्ञान का भी यही मत है की सृष्टि नियम Laws of Nature अटल अटूट सार्वभौमिक हैं . इन नियमों का नियंता परमात्मा है . परमात्मा की सृष्टी नियम न तो बदलते हैं न टूटते हैं न घटते हिएँ न बढते हैं और न ही घिसते हैं इसलिए चमत्कार की बातें करना एक अन्धविश्वास है . किसी भी मत का व्यक्ति चमत्कार में आस्था रखता है तो यह अन्धविश्वास है.


सबसे पहला ग्रन्थ विश्व में इस युत में चमत्कारों को चुनौती देने वाला सबसे पहला ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश है. जिस मनीषी ने चमत्कारों को तर्क तुला पर तोलकर मत पंथों को अपनों व परायों को झाक्खोरा विश्व का वह पहला विचारक महर्षि दयानन्द सरस्वती है. सत्यार्थ प्रकाश के प्रणेता तत्ववेत्ता ऋषि दयानन्द को न तो पुराणों के चमत्कार मान्य हैं और न ही बाइबल व कुरान के . हनुमान के सूर्य को मुख में ले लिया यह भी सत्य नहीं है और हजरत ईसा ने रोगियों को चंगा कर दिया , मृतकों को जीवित कर दिया तथा हजरत मुहम्मद साहेब ने चाँद के दो टुकडे कर दिए – ये भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है . हजरत मुसा हों अथवा इब्राहीम सृष्टि नियम तोड़ने में कोई भी सक्षम नहीं हो सकता . दयानन्द जी के इस घोष का कड़ा विरोध हुआ . आर्य विद्वानों ने इस विषय मरण सैकड़ों शाश्त्रार्थ किये. पंडित लेखराम जी आर्य पथिक को इसी कारण बलिदान तक देना पड़ा . ख्वाजा हसन निजामी को सन १९२५ में एक आर्य विचारक प्रो हासानन्द ने चमत्कार दिखाने की चुनौती दी और कहा की में आपसे बढकर जादूगरी से चमत्कार दिखाऊंगा . ख्वाजा साहेब को आगे बढकर चमत्कार दिखाने का साहस ही नहीं हुआ . (दृष्टव्य : दैनिक तेज उर्दू दिनांक ३०.१०.१९२५ पृष्ठ ५ ) सत्य साईं बाबा भी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की चुनौती को स्वीकार करके कोई चमत्कार न दिखा सका.


अब तो विरोधी भी मन रहे हैं : ईश्वर की कृपा हुयी . ऋषी की पुण्य प्रताप व अनेक बलिदानों की फलस्वरूप अब विरोधी भी सत्यार्थ प्रकाश के प्रभाव को स्वीकार करके इस अन्धविश्वास से मुक्ति पा रहे हैं . हाँ ऐसे लोगों की अब भी कमी नहीं है जो सत्यार्थ प्रकाश से प्रकाश भी पा रहे हैं और इसे कोष भी रहे हैं . गुड का स्वाद भी लेते हैं और गन्ने को गालीयाँ भी देते हैं . पुराण बाइबिल व कुरान के ऐसे प्रसंगों की व्याख्याएं ही बदल गयीं हैं . अब रोगियों को चंगा करने का अर्थ मानसिक और आध्यात्मिक रोगों को दूर करना हो गया है . मृतकों को जिलाने का अर्थ नैतिक मृत्यु से बचाना किया जाने लगा है . यह व्याख्या कैसे सूझी? इन धर्म ग्रंथों के भाष्य व तफ्सीरें बदल गयीं हैं .


सत्य असत्य की कसौटी : आज से साथ वर्ष पहले तक धर्म की सच्चाई की कसौटी चमत्कारों को माना जाता था . आज है कोई जो कुमारी मरियम से ईसा की उत्पत्ति को इसाई मत की सचाई का प्रबल प्रमाण मानता हो ? कौन है जो पुराणों की असंभव बातों को संभव व सत्य मानता हो ? कौन है जो बुराक पर सवार होकर पैगम्बर मुहम्मद की आसमानी यात्रा को सत्य मानता हो ? मुसलमानों के नेता सर सैयद अहमद खां ने बड़ी निर्भीकता से इन गप्पों को झुठलाया है ( दृष्टव्य “ हयाते जावेद लेखक मौलाना हाली – पानीपत ). यह सब सत्यार्थ प्रकाश का ही प्रभाव है .


लोगों का ध्यान नहीं गया :सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय जनमानस में मातृभूमि का प्यार जगाया . जन्म भूमि व पूर्वजों के प्रति आस्था पैदा की . जातीय स्वाभिमान को पैदा किया . एकादश समुल्लास की अनुभुमिका ने भारतीयों की हीन भावना को भगाया. सत्यार्थ प्रकाश की इसी अनुभुमिका का प्रभाव था की गर्ज -२ कर आर्य लोग गाया करते थे :


कभी हम बुलन्द इकबाल थे तुम्हें याद हो कि न याद हो


हर फेन में रखते कमाल थे तुम्हें याद हो य न याद हो .


सत्यार्थ प्रकाश ने देशवासियों को स्वराज्य का मंत्र दिया . इनके अतिरिक्त सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित कुछ वाक्यों व विचारों की मौलिकता व महत्व्य को विचारकों ने जाना व माना परन्तु उनका व्यापक प्रचार नहीं किया गया .इन्हें हम संक्षेप में यहाँ देते हैं :


ऋषी दयानन्द आधुनिक विश्व के प्रथम विचारक हैं जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में सबके लिए अनिवार्य व निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का सिद्धांत रखा . उनके एक प्रमुख शिष्य स्वामी दर्शनानंद जी ने भारत में सबसे पहले निःशुल्क शिक्षा प्रणाली का प्रयोग किया .ऋषी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कृषक व श्रमिक आदि राजाओं के राजा हैं . कृषकों व श्रमिकों का समाज में सम्मान का स्थान है . इस युग में ऐसी घोषणा करने वाले पहले धर्म गुरु ऋषी दयानन्द ही थेऋषी ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में लिखा है की यदि कोई गोरा किसी काले को मार देता है तो भी पक्षपात करते हुए न्यायालय उसे दोषमुक्त करके छोड़ देता है . इसाई मत की समीक्षा करते हुए ऐसा लिखा गया है . यह महर्षि की निर्भीकता व सत्य वादिता एवं प्रखर देशभक्ति का एक प्रमाण है . बीसवीं शताब्दी में आरंभिक वर्षों में मद्रास कोलकाता व रावलपिंडी आदि नगरों में ऐसे घटनाएं घटती रहती थें . मरने वालों के लिए कोई बोलता ही नहीं था .प्रथम विश्व युद्ध तक गांधी जी भी अंग्रेज जाति की न्याय प्रियता में अडिग आस्था रखते हुए अंग्रेजी न्याय पालिका का गुणगान करते थे

महर्षि दयानन्द प्रथम भारतीय महापुरुष हैं जिन्होंने विदेशी शाषकों की न्याय पालिका का खुलकर अपमान किया . ऋषी ने विदेशियों की लूट खसोट व देश की कंगाली पर तो इस ग्रन्थ में कई बार खून के आंसू बहाये हैं

सत्यार्थ प्रकाश के तेरहवें समुल्लास में ही इसाई मत की समीक्षा करते हुए लिखा है कि तभी तो ये इसाई लोग दूसरों के धन पर ऐसे टूटते हैं जैसे प्यासा जल पर व भूखा अन्न पर . ऐसी निर्भीकता का हमारे देश के आधुनिक इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता


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ओ३म् ओ३म् ओ३म् सभी को सादर वैदिक नमस्ते जी जब हम मूर्ति पूजा का ख़ंडन करते हैँ तो लोग ये तर्क करते...

ओ३म् ओ३म् ओ३म्
सभी को सादर वैदिक नमस्ते जी
जब हम मूर्ति पूजा का ख़ंडन करते हैँ तो लोग ये तर्क करते हैं—-
वे कहते है की अगर आप अपने पिता की तस्वीर पर नहीं थूक सकते तो फिर मूर्ति का तिरस्कार क्यों करते है ।
उत्तर : हम मूर्ति का तिरस्कार नहीं वरन मूर्ति को ईश्वर मान उसको पूजने का विरोध करते हैं।हम पिता की तस्वीर अपने घर में लगाते है क्योंकि वह हमारे प्रिय हैँ हमारे आदर्श हैँ ,हमारे पूर्वज हैँ ।किन्तु उस तस्वीर को पिता समझ कर पिता की तरह व्यवहार नही करते। तस्वीर से धन नही मांगते ,सहायतानही मांगते ।क्योकि यह जानते है कि यह पिता की तस्वीर है पिता नहीं ,पिता की तरह चेतन नही है , यह जड़ है, ना सुनती है , ना देखती है ओर ना प्रतिक्रिया करती है।सबसे बड़ी बात , अगर पिता जीवित है तो सिर्फ उस चेतन पिता से चर्चा करके ही कुछ प्राप्त किया जा सकता , उनकी जड़ तस्वीर या मूर्ति से नही। अगर हमारे जीवित पिता हमे अपनी तस्वीर से बात करते देंखे तो वे हमें मूढ़ समझेंगे, बुद्धिहीन समझेंगे ओर क्रोध भी करेंगे ।क्या यही गलती हम उस चेतन ईश्वर के सम्बन्ध में नही कर रहे है??वह परमपिता परमात्मा जीवित है , चेतन है , हमारे ह्र्दय में है , फिर भी हम उसकी जगह मूर्तियों से मांगते है, जो जड़ है , हम जड़ वस्तुओं से बात करते है ईश्वर समझ कर । क्या ईश्वर यह देखकर प्रसन्न होगा??ईश्वर का कोई रूप रंग आकर नहीं होता फिर एक मनुष्य जैसी आकृति ईश्वर का प्रतिक कैसे आभासित करवासकती है??और चलो करवा भी दिया तो फिर मूर्ति में जरा भी टूट होते ही फेंक क्यों देते हो , फिर उसका भगवान् मर गया ?? गायब हो गया??क्यों नहीं सड़को पर पड़ी टूटी फूटी मूर्तियो को भी उठा लाते हो ??सच तो ये है तुम लोग मूर्तियो में ईश्वर का प्रतिक नहीं देखते बल्कि मूर्ति को ही भगवान् माने बैठे हो , वो भी एक ख़ास समय और स्तिथि में जब उसमे कोई मुर्ख पाखंडी पंडा आकर प्राण ना फूँक देतभी और जब तक वह खंडित ना हो जाए तब तक ।इससे आगे पीछे की स्तिथियों में वे ही मूर्तियां सड़को पर पड़ी रहती है।
2 : दूसरा तर्क है मूर्ति में भी भगवान है क्योकि वह कण कण में है तो मूर्ति को ही क्यों नहीं पूजते?
उत्तर : ईश्वर तो कण कण में है परंतु मूर्ति उसने नहीं बनाई , मूर्ति तो मनुष्य ने बनाई , ईश्वर ने बनाया फूल तो बताओ कौन बड़ा मूर्ति या फूल , तुम छोटी वस्तु पर बड़ी वस्तु चढ़ाते हो ।वह ईश्वर सर्वव्यापक है और तुम उसे एक छोटी सी मूर्ति में सिमित कर देते हो ।जब किसी से मिलना होता है तो उस स्थान पर हमारा ओर जिससे मिलना हो उसकी एक साथ उपस्तिथि आवश्यक है ।उदाहरण के लिए , अगर मुझे अपने मोदी जी से मिलना हो तो या तो दिल्ली जाना पड़ेगा या मोदी जी को मुजफ्फरनगर आना पड़ेगा ।इसी प्रकार अगर ईश्वर का साक्षत्कार करना है तो ईश्वर ओर हमे एक स्थान पर उपस्थित होना पड़ेगा ।हम से आशय हमारा शरीर नही बल्कि हमारी आत्मा से है।अर्थात वह स्थान बताइये जहां हमारी आत्मा ओर ईश्वर एक साथ उपस्थित हो।ईश्वर तो सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है, आपके शरीर के भीतर भी है।अब आप कहाँ कहाँ है ??क्या आप मूर्ति के भीतर है ??क्या आप संसार की किसी भी वस्तु के भीतर है??आप सिर्फ अपने शरीर के भीतर है , यही वह स्थान है जहां आपका ईश्वर से साक्षात्कार सम्भव है , अन्यथा कही नही।यह मेरे विचार नही अपितु वेद वाणी है जो तर्क की कसौटी पर भी खरी उतरती है।वेद अंतिम प्रमाणवेद निंदक नास्तिकों अस्तिचिंतन करे, ओर ईश्वर को अपने भीतर खोजे ओर उसका तरीका भी वेदो में ही है जिसे महृषि पतंजलि ने अष्टांग योग के नाम से प्रचारित किया है।
3: तीसरा तर्क एकाग्रता के लिए मूर्ति जरुरी है, उत्तर : मूर्ति पर एकाग्रता किस लिए बढ़ा रहे हो , क्या मूर्ति भगवान् है , नहीं मूर्ति भगवान नहीं । मूर्ति को एकाग्रचित होकर भगवान् समझने से भी वह भगवान् नहीं बनेगी , मूर्ति ही रहेगी ।और किसी दिन टूट गयी 20 साल की एकाग्रता को ठेष पहुचेगी किन्तु आप फिर भी आप बिना मूर्ति के उपासना नही करेंगे बल्कि दूसरी मूर्ति खरीद लाओगे।सभी मूर्तिपूजक ये दावा करते है कि एक दिन मूर्तिपूजा करते करते एकाग्रता इतनी अधिक हो जाएगी किमूर्ति छूट जाएगी और ध्यान निराकार पर लग जायेगा।यह झुठ है क्योंकि निराकार पर ध्यान तभी लगेगा जब निराकार उपासना विधि आर्थत अष्टांग योग का प्रयास करोगे।इसीलिए एक 10 साल का बालक मूर्तिपूजा करते करते 80 साल का हो जाता है किंतु मूर्तिपूजा नहीछोड़ताअष्टाङ्ग योग विधि अपना कर कोई भी व्यक्ति एकाग्रता भी बढ़ा सकता है और निराकार ईश्वर का ध्यान भी कर सकता है ।


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हवन का महत्वफ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः...

हवन का महत्व

फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

(२) टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

(३) हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही. उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया की ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा की सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बॅक्टेरिया का स्तर ९४ % कम हो गया। यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ की इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है।

रिपोर्ट में लिखा �


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Sunday, September 24, 2017

। ओ३म् ।। श्राद्ध - तर्पण विषयक शङ्का समाधान शङ्का - वेद के कुछ मन्त्रों में मरे हुए पितरों का...

। ओ३म् ।।
श्राद्ध - तर्पण विषयक शङ्का समाधान
शङ्का - वेद के कुछ मन्त्रों में मरे हुए पितरों का तर्पण-श्राद्ध की प्रतीती है , “ये अग्निदग्धा अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते” इत्यादि मन्त्र , जिनका बहुत स्पष्ट होने से अर्थ बदला भी नहीं जा सकता , क्योंकि “दह भस्मीकरणे” धातु रूप ही दग्ध होता है अर्थात् ‘जो पितर अग्नि से जले व अग्नि से न जले हों, ऐसे पितरों को हविष्य खाने के अर्थ में बुलाता हूं ।’
समाधान - शङ्का में प्रस्तुत मन्त्र विचारने योग्य है कि अग्नि से पितरों का जलना कैसे हो सकता है ? पितर नाम यदि शरीर का रखो , तो यह बात घट सकती है कि अग्नि से जले पितर, परन्तु जो शरीर अग्नि से जला दिया गया , वह उसी समय भस्म गया , अब उसको श्राद्ध में बुलाना वा उसके लिये श्राद्ध का फल पहुंचाना , दोनों बातों में असम्भव दोष घट रहा है - पुनरपि यदि पितर नाम जीवात्मा का मानो, जिसका बुलाना मान भी लिया जाये परन्तु वह अग्नि से नहीं जलाया गया, क्योंकि शरीर के जलने से पहले ही वह निकल गया और उसके निकल जाने से ही शरीर जलाया गया । तो उन जीवात्माओं के साथ अग्निदग्ध विशेषण लग ही नहीं सकता । यदि पुनः कोई कहे कि चेतन शरीर पितर है तो मन्त्र के अनुसार वह तो जलाया ही नहीं गया । इस प्रकार इस मन्त्र द्वारा किसी भी रीति से मृतकों के श्राद्ध पक्ष का अर्थ नहीं बन रहा है - इसी प्रकार जीवात्मा को किसी का पितर , पुत्र आदि नहीं कह सकते - दृष्टव्य - नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः ।। श्वेताशवतरोपनिषद् ।।
शङ्का - अथर्ववेद में स्पष्ट ही मरे हुए पितरों का तर्पण लिखा है - ये च जीवा ये च मृता ये जाता ये च यज्ञियाः - मन्त्र कहता है 'जो मरे , जीते , प्रकट हुए और यज्ञ सम्बन्धी पितर हैं , उन सबके लिये सहतयुक्त जल की धारा प्राप्त हो ।
समाधान - अथर्ववेद के इस मन्त्र में भी तर्पण का विधान नहीं है । अर्थात् जो कोई लोग इस (ये जीवा ..) मन्त्र से मृत पद को देखकर मरों का तर्पण निकालते हैं , उनको “जीवाः” पद से जीवितों का भी तर्पण निकालना चाहिये । यदि कोई कहे कि जीवा पद मृत शब्द का विशेषण है , तो उसके मत में समुच्चय अर्थ के लिये पढ़ा 'चकार’ निरर्थक हो जायेगा अर्थात् समुच्चार्थ पढ़े 'चकार’ से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मृता और जीवा दोनों भिन्न पद हैं । और सर्वनामवाची यत् शब्द के चार प्रयोग मन्त्र पूर्वाध में ही पढ़े हैं । उनसे भी सबका पृथक् होना सूचित होता है । कथन कोई कुछ भी करे , किन्तु उक्त अथर्ववेद के मन्त्र का अर्थ मरे हुए पितरों के तर्पण पक्ष में यथावत् कोई नहीं घटा सकता है । इस कारण इस मन्त्र से मरों के तर्पण का नाम भी नहीं निकलता , किन्तु संसार का उपकार करने वाली एक प्रकार की विद्या इससे निकलती है , इस मन्त्र का संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत किया जाता है -
पदार्थ - *ये जीवाः* - जो किसी प्रकार कष्ट के साथ अन्न जलादि को पाकर प्राण धारण करते *च* - और *ये मृताः* - जो शीघ्र प्रकट हुए थोड़ी अवस्था के पशु पक्षी आदि के बच्चे वा अंकुररूप वृक्षादि *च* - और *ये याज्ञयाः* - यज्ञ कर्म में उपयुक्त होने वाले ओषधि, वनस्पति वा अन्नादि हैं *तेभ्यः* - उनके अच्छे प्रकार होने के लिये *घृतस्य* - जल की *व्युन्दती* - शीतलता गुण पहुंचने वाली *मधुधारा* - खारीपन आदि दोष रहति ऐसी *कुल्या* - कृत्रिम बनावटी नदी - नहर *एतु* - प्राप्त हों , जिससे जगत् में सब चराचर प्राणियों की रक्षा हो ।।
भावार्थ - जिस - जिस मरु आदि देश में जल नहीं मिलता वा बड़े कष्ट से मिलता है , उन - उन प्रदेशों में सुगमता से सर्वदोष रहित मीठा जल प्राप्त होने के लिये देशहितैषी धनाढ्य वा प्रजापालन में तत्पर राजपुरुषों को नवीन नदी - नहर निकालनी चाहिये , क्योंकि जल से ही सब चराचर की उत्पत्ति होना और स्थति रहना सम्भव है ।।
।। ओ३म् ।।


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Saturday, September 23, 2017

महाराजा हरि सिंह को विलेन की तरह पेश करने वाले नव इतिहासकारों को यह देश माफ नहीं कर सकता है। जम्मू...

महाराजा हरि सिंह को विलेन की तरह पेश करने वाले नव इतिहासकारों को यह देश माफ नहीं कर सकता है।
जम्मू काश्मीर रियासत के आखिरी हिन्दू राजा के बारे में जो गलतफहमियाँ फैलायी गई हैं , उसके अनुसार हरि सिंह ने राज्य का विलय कराने में देरी की थी ,
या फिर …उस वक्त विलय कराने पर मजबूर हुए जब पाकिस्तानी कबाईलियों का अटैक हुआ था ,
या फिर… वे विलय चाहते ही नहीं थे , राज्य को स्वतंत्र देश बनाना चाहते थे।
काश! कि महाराजा ने अपनी बायोग्राफी लिखवाई होती तो आज कई चेहरे बेनकाब हुए होते।
विलय के बाद उन्हें उस राज्य से निर्वासित होने के लिए मजबूर किया गया था , जिस राज्य से के लोगों के हृदय में अपने लोकप्रिय राजा के प्रति अगाध श्रद्धा थी ।
हिन्दू , बौद्ध और यहाँ तक कि गिलगीत बल्तिस्तान के मुस्लिमों में भी उनके प्रति आदर और प्रेम का भाव था और वे सभी भारत के साथ आने को बिना शर्त और सहर्ष तैयार थे।
बस कोई तैयार नहीं था तो वो था एक कट्टर मुस्लिम और सिर्फ काश्मीर घाटी तक सीमित रहने वाला एक नेता शेख अब्दुल्ला …. वो भारत से जम्मू कश्मीर रियासत को एक अलग स्वायतशासी राज्य बनाने वाले कानूनों की माँग कर रहा था … ऐसे कानून जो भारत के साथ दिखने के बावजूद भी राज्य को भारत से अलग रखे।
महाराजा की छवि को धूमिल करने में माउंटबेटन , शेख अब्दुल्ला और नेहरू की तिकड़ी के षडयंत्रों का बड़ा हाथ रहा था।
रही सही कसर उनके नालायक कुपुत्र कर्ण सिंह ने पूरा किया था ।
नेहरू के विचारों से सम्मोहित कर्ण सिंह को अपना पिता दुश्मन की तरह तथा नेहरू की मुस्लिम शेख-परस्त नीतियाँ राज्य के लिए हितकारी लग रही थीं ।
माउंटबेटन तो खैर विदेशी था जिसकी सत्ता खत्म हो चुकी थी …आखिरी वक्त तक वो दबाव बनाता रहा कि महाराजा हर हाल में राज्य का विलय पाकिस्तान के साथ कर लें । सभी रियासतों को यह छूट थी कि वे दोनों में से किसी देश के साथ जा सकते हैं।
क्योंकि ऐसा होने पर एंग्लो-अमेरिकन गुट को साम्यवादी रूस और चीन तक पहुँच बना कर वैश्विक रणनीति तय करने में सहुलियत होती .. और वजह था, राज्य की सीमा का उन दोनों देशों के साथ लगना।
माउंटबेटन ने महाराजा के रियासत के तात्कालिन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक की अंग्रेज बीबी को पटा लिया था । अब उसकी सहायता से वह महाराजा पर दबाव डालने के लिए रामचंद्र काक को उकसाता रहा … वह उकसाया भी , रामचंद्र काक जिन्ना के संपर्क में भी था और महाराजा पर दबाव भी बनाता रहा … लेकिन आखिर में पटेल की सलाह पर महाराजा ने उस गद्दार प्रधानमंत्री को उसकी हैसियत दिखा दी … यानी कि उसे हटा दिए।
नेहरू दबाव बनाते रहे थेे कि भले ही विलय में देर हो … या पाकिस्तानी कबाईली सेना घाटी पर कब्जा कर ले , परंतु रियासत की सत्ता हर हाल में शेख को मिलनी चाहिए ….लेकिन महाराजा इसके सख्त खिलाफ थे।
नेहरू तो यहाँ तक ताल ठोके थे कि यदि पूरी घाटी को पाकिस्तान क्यों ना दखल कर ले , शेख को सत्ता मिल जाने के बाद हम घाटी को भारतीय सेना की मदद से खाली करवा लेंगे इतनी ताकत है हमारे में।
लेकिन वे क्या कर पाये थे यह तो सारा देश जानता है , आज पीओके पाक के कब्जे में है।
शेख अब्दुल्ला की मुस्लिम परस्त पार्टी यह दबाव बनाती रही कि महाराजा पहले घाटी छोड़े … क्विट काश्मीर का नारा सालों पहले से बुलंद किए हुए थे शेख अब्दुल्ला।
इस प्रकार तीनों महाराजा पर दबाव बनाते रहे….
परंतु महाराजा को इन तीनों लफंदरों की शर्तें मंजूर नहीं थी।
यहाँ ध्यान दें , शेख को सिर्फ़ काश्मीर घाटी से ही मतलब था..यानी कि जम्मू , लद्दाख और गिलगित बल्तिस्तान से कोई लेना देना नहीं था … वैसे भी शेख सिर्फ घाटी तक ही सीमित था पर नेहरू उसे पूरे रियासत की सत्ता सौपना चाहते थे।
आखिरकार देश की आजादी के ढाई महीनों बाद महाराजा ने उसी विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए जो विलय पत्र शेष सभी रियासतों के लिए था।
बिना किसी शर्त के हस्ताक्षर किए थे महाराजा ने … पर हाँ , एक लााइन जरूर लिखे थे कि रियासत की सत्ता मुस्लिम परस्त शेख अब्दुल्ला को यदि ना मिले तो उन्हें आत्मिक खुशी होगी।
अठारह वर्षों तक राज्य से निर्वासित होकर मुंबई को अपना ठिकाना बनाने वाले राष्ट्र भक्त महाराजा की अंतिम साँसें एक हाॅस्पिटल के बेड पर जिस वक्त निकल रही थी, बस चंद स्टाफ उनके पास खड़े थे .. अपनी मातृभूमि जम्मू कश्मीर की धरती पर दोबारा कदम रखने और उसकी रज को माथे से लगा पाने की लालसा धरी की धरी रह गई ।
मृत्यु से पहले महाराजा ने अपने परिजनों से एक वचन लिया था कि उनके पार्थिव शरीर को उनका पुत्र कर्ण सिंह हाथ भी ना लगाए … और उनकी अस्थियों को जम्मू की तवी नदी में प्रवाहित की जाए।
1925 में रियासत की सत्ता संभालने वाले एक लोकप्रिय राजा और 1930 के गोलमेज सम्मेलन में अँगरेजों को आँखें दिखाने वाले देशभक्त महाराजा की छवि अब उन गद्दारों और वामपंथी इतिहासकारों की मोहताज नहीं रही।
सत्य परेशान हो सकता है पर परास्त नहीं।
आज 23 सितंबर है ,,,,,,
महाराजा हरि सिंह का जन्म दिन है ,… देशभक्त डुग्गरों की धरती पर पैदा हुए ऐसे महाराजा को मैं शत-शत नमन करता हूँ।


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☆नीम के महत्व को समझो☆ भारत देश में नीम एक बहुत बड़ी औषधि है, जिसे कई हजारों सालों से उपयोग किया जा...

☆नीम के महत्व को समझो☆
भारत देश में नीम एक बहुत बड़ी औषधि है, जिसे कई हजारों सालों से उपयोग किया जा रहा है| आज के समय में बहुत सी अंग्रेजी दवाइयां नीम की पत्ती व उसके पेड़ से बनती है| नीम के पेड़ की हर एक चीज फायदेमंद होती है, बहुत सी बड़ी बड़ी बीमारियों का इलाज इससे किया जाता है| भारत देश में नीम का पेड़ घर में होना शुभ माना जाता है, लोग अपने घर में इसे लगाते है ताकी इसके फायदे उठा सके| भारत से नीम के पत्तों का निर्यात 34 देशों में किया जाता है|
नीम का स्वाद कड़वा होता है, लेकिन ये जितनी कड़वी होती है, उतनी ही फायदे मंद होती है| आइये मैं आज आपको नीम के गुण और उसके लाभ से अवगत कराती हूँ, जिसे आप आसानी से घर में उपयोग कर बहुत बीमारियों को दूर कर सकते है|
नीम के उपयोग
दवा के रूप में
नीम की पत्ती लेप्रोसी , आँख की बीमारी , नकसीर , पेट के कीड़े , पाचन , भूख में कमी , त्वचा के रोग , दिल
और खून की नसों की बीमारी , बुखार , डायबिटीज , मसूड़े , लिवर आदि परेशानी दूर करने में काम आती हैं।
नीम की टहनी मलेरिया में , पेट या आंतों के अल्सर , स्किन डिजीज , दांत और मसूड़ों की परेशानी आदि में काम आती है।
नीम की दातुन का उपयोग आज भी कई लोग करते है। यह दातुन बाजार में भी मिलती है। इससे दांत में प्लाक जमना
कम होता है तथा मसूड़ों में सूजन या खून आना , मुंह से बदबू आना आदि से बचाव होता है।
नीम के फूल Neem ke fool पित्त कम करने में , कफ मिटाने में तथा पेट के कीड़े मिटाने में काम आते हैं।
नीम का फल जिसे निमोड़ि Nimodi या निम्बोड़ि Nimbodi कहते हैं बवासीर , पेट के कीड़े , नकसीर , पेशाब की तकलीफ , कफ , घाव , डायबिटीज , आँखों की परेशानी आदि में काम आता है। नीम का तेल Neem ka tel बालों के लिए , लिवर की ताकत के लिए , खून साफ करने के लिए , तथा खून में शक्कर की मात्रा कम करने के लिए काम में लिया जाता है।
कीटनाशक के रूप में
नीम की पत्तियों को अलमारी में रखा जाता है ताकि कपड़े कीटों से बचे रहें। इन्हे गेहूं या चावल आदि भरने से पहले ड्रम या पीपे आदि में नीचे बिछाया जाता है ताकि उनमे कीड़े ना पड़ें। नीम की पत्तियां जलाकर मच्छरों को दूर किया जाता है। नीम की पत्ती का खाद बनता है , जिसका उपयोग करने से फसल कई प्रकार की बीमारियों से बच सकती हैं। घर में गमलों में लगाए जाने वाले पौधे पर पानी में नीम का तेल डालकर छिड़काव करने से पौधे पर लगे कीट नष्ट हो जाते हैं। निम्बोड़ी के बीज को पीस कर पाउडर बनाया जाता है फिर इसे पानी में रात भर भिगोते हैं। इस पानी को फसल पर छिड़कने से यह कीटों से बचाव करता है। यह कीड़ों को सीधे ही नहीं मारता लेकिन इसके छिड़कने से कीड़ो का पत्ती खाना , पत्तियों पर अंडे देना आदि बंद हो जाता है। इस तरह से फसल ख़राब होने से बच जाती है। नीम कीटों का अंडे से बाहर निकलना भी रोकता है। नीम का तेल दीमक के उपचार में भी काम करता है।
खाने पीने में
नीम के फूल का उपयोग दक्षिण भारत में मनाये जाने वाले त्यौहार ‘ उगादी ‘ के समय किया जाता है। नीम के फूल और गुड़ खाकर ‘उगादी’ त्यौहार मनाया जाता है। दक्षिण भारत में कर्नाटक में नीम के ताजा फूल से कढ़ी बनाई जाती है। ताजा फूल ना हों तो सूखे फूल काम में लिए जाते हैं। तमिलनाडु में इमली से बनाई जाने वाली रसम में इसे डाला जाता है।
बंगाल में नीम की कोमल पत्ती और बैंगन की सब्जी बनाई जाती है। इसे चावल के साथ खाया जाता है।
महाराष्ट्र में गुडी पड़वा यानि नववर्ष की शुरुआत , थोड़ी मात्रा में नीम की पत्ती या उसके रस का सेवन करके की जाती है। इससे मौसम के बदलाव के कारण होने वाली परेशानी तथा पित्त विकार से बचाव होता है।
नीम की पत्ती कड़वी होने के कारण पित्त शांत करने वाली मानी जाती है। चैत्र महीने में कोमल नीम की पत्ती का सेवन करना लाभप्रद होता है। अक्सर चैत्र महीने में जानकार लोग नीम की कोमल पत्ती तोड़कर खाते दिखाई देते है।
नीम के फायदे
वाइरस का संक्रमण
वाइरस के कारण होने वाले चिकन पॉक्स , स्माल पॉक्स यानि चेचक या बोदरी जैसी बीमारियों को फैलने से रोकने में नीम का उपयोग किया जाता रहा है। नीम की पत्ती को पीस कर लगाने से त्वचा पर दूसरी जगह वाइरस नहीं फैलता। यह हर्पीज़ जैसे हानिकारक वाइरस को भी मिटा सकता है। चिकन पॉक्स होने पर नीम की पत्तियां पानी में उबाल कर इस पानी से नहाना बहुत लाभदायक होता है। इससे त्वचा को आराम मिलता है और यह संक्रमण अन्य स्थान पर नहीं फैलता।
त्वचा के रोगों में नीम की पत्ती पानी में उबाल कर इस पानी से नहाने से बहुत लाभ होता है। इससे त्वचा की खुजली या जलन आदि में भी आराम मिलता है। यह पानी पीने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं और आंतों की कार्यविधि सुधरती है।
हृदय की देखभाल
नीम की पत्ती पानी में उबाल कर यह पानी पीने से नसों में लचीलापन आता है इससे हृदय पर दबाव कम होता है। यह हृदय की धड़कन नियमित करने में सहायक होता है और इस प्रकार उच्च रक्तचाप को कंट्रोल करता है।
बालों के लिए
नीम की पत्ती डाल कर उबाला हुआ पानी से सिर धोने से डैंड्रफ ठीक होती है। बाल गिरना कम हो जाते हैं।
आँखों के लिए
ताजा नीम की पत्तियाँ पानी में उबाल कर इस पानी के ठंडा होने पर आँख धोने से कंजंक्टिवाइटिस तथा आँख लाल होना , आँख में जलन आदि में लाभ होता है।
मलेरिया
नीम की पत्तियां का उपयोग मलेरिया बुखार को रोकने में कारगर पाया गया है। नीम की पत्तियां मच्छर को पनपने से रोकती हैं।
जोड़ों का दर्द
नीम का तेल लगाने से मांसपेशियों तथा जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।
कीड़े का काटना
नीम की पत्ती पीस कर लगाने से कीड़े के काटने के कारण होने वाली सूजन और जलन में आराम मिलता है।
स्किन
नीम की पत्ती त्वचा की सुंदरता बढ़ाने में मददगार हो सकती है। नीम की पिसी हुई पत्ती और हल्दी मिलाकर लगाने से मुँहासे , फुंसी , ऐक्ने आदि ठीक होते हैं। स्किन का हर प्रकार का इन्फेक्शन मिटता है। त्वचा कोमल होती है। नीम की पत्ती डालकर उबाला हुआ पानी स्किन टोनर की तरह काम करता है। इसके उपयोग से मुँहासे , स्कार , ब्लेक हेड आदि मिटते है और रंग निखरता है। इसका फेस पैक भी बनाया जा सकता है। इसके लिए थोड़े से पानी में कुछ नीम की पत्ती और संतरे के छिलके उबाल लें। छान कर पानी ठंडा कर लें। इसमें मुल्तानी मिट्टी , दही , शहद और दूध मिलाकर स्मूथ पेस्ट बना लें। इसे चेहरे पर लगाकर सूखने दें फिर धो लें। इससे चेहरे पर कांति आ जाती है और फोड़े फुंसी , ब्लेक हेड , व्हाइट हेड आदि मिट जाते हैं।
गले का संक्रमण
नीम के पानी के गरारे करने से गला ठीक होता है। नीम की कोमल पत्तियां खाने से सर्दी ,जुकाम, फ्लू ,वाइरल बुखार आदि में आराम आता है।
नीम के उपयोग में सावधानी
नीम एक औषधि है। किसी भी औषधि को लेने के कुछ नियम परहेज आदि होते है अन्यथा औषधि नुकसानदेह भी हो सकती है। नीम के उपयोग में भी सावधानी आवश्यक है। अतः इन बातों का ध्यान जरूर रखें।
बच्चों के लिए नीम का तेल या पत्ती का उपयोग नुकसान देह हो सकता है। छोटे बच्चों के लिए नीम विषैला साबित हो सकता है। इससे उल्टी , दस्त , चक्कर आना , बेहोशी आदि लक्षण प्रकट हो सकते हैं। छोटे बच्चों को नीम की पत्ती या तेल आदि मुंह के द्वारा नहीं दिया जाना चाहिए।लम्बे समय तक नीम के तेल का उपयोग हानिकारक होता है। इससे किडनी और लीवर को नुकसान हो सकता हैगर्भावस्था में तथा स्तनपान कराने वाली माँ को नीम की पत्ती नहीं खानी चाहिए। नीम का सेवन गर्भपात का कारण बन सकता है। डायबिटीज की दवा चल रही हो तो नीम का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। नीम भी रक्त में शुगर की मात्रा को कम करता है।यदि बच्चा चाहते हों तो नीम का उपयोग नहीं करना चाहिए। यह शुक्राणु को कमजोर कर सकता है। गर्भधारण कैसे हो जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।यदि किसी प्रकार अंग प्रत्यारोपण का ऑपरेशन करवाया हो तो नीम का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे दवा का असर कम होने की संभावना होती है।किसी भी प्रकार के ऑपरेशन के आस पास के दिनों में नीम का प्रयोग नहीं करना चाहिए।इम्यून सिस्टम से सम्बंधित दवा चल रही हो तो नीम के कारण दवा का असर कम हो सकता है , अतः सावधान रहेंयदि कोई ऐसी दवा चल रही हो जिसमे लिथियम हो तो नीम का उपयोग नुकसानदेह हो सकता है अतः चिकित्स्क की सलाह जरूर लें।
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*हिन्दुओ के जीवन मे सब काम मानने से हो जाते है* 1: एक पंडत ने , तीन बार ऐसा कहकर *ॐ प्राण आगच्छतु*...

*हिन्दुओ के जीवन मे सब काम मानने से हो जाते है*
1: एक पंडत ने , तीन बार ऐसा कहकर *ॐ प्राण आगच्छतु* मूर्ति में प्राण फूँक दिए ।
हमने कहा पंडत जी यह मूर्ति चेतन प्राणवान लोगो की तरह व्यवहार क्यो नही करती ??
पंडत ने कहा कि *मान् लो* इसमें प्राण आ गए है
2: मेरी माता तस्वीर को भोग लगाती है , अगले दिन तस्वीर साफ करती है क्योकि भोजन ज्यो का त्यों लगा हुआ है,
हमने कहा कि माता तस्वीर ने कुछ नही खाया , माता ने कहा कि *मान लो* खा लिया
3: एक मित्र मिट्टी के ढ़ेले पर लाल धागा बांध कर गणेश जी की पूजा करते है, हमने कहा गणेश जी कहां है , उन्होंने कहा कि *मान लो* यही गणेश है।
4: एक धार्मिक व्यक्ति कौवों को भोजन कराता है पितर मान कर, हमने कहा ये कौवा किसी ओर पड़ोसी का पितर भी तो हो सकता है, उन्होंने कहा कि *मान लो* यही हमारा है।
5: हमारे मोहल्ले के लोगो ने रात भर माता का जागरण किया, सुबह हमने कहा कि क्या माता जाग गयी ? उन्होंने कहा कि *मान लो* जाग गयी
6: पड़ोस के एक घर मे एक महिला को दौरे पड़ गए वो नाचने लगी, हमने कहा इसे अस्पताल ले चलो, लोगो ने कहा माता आयी है इस पर , हमने कहा माता आई होती तो नाचती क्यो? दुष्टो का संहार करती । लोगो ने कहा *मान लो* आयी है
इसी *मान लो* ने हिन्दुओ का सबसे अधिक विनाश किया है
कट्टर हिन्दू कहते है देश खतरे में है, धर्म खतरे में है, गौमाता खतरे में है, मैं कहता हूं कि
मान लो ये हिन्दू राष्ट्र बन गया है
मान लो ये सब मुल्ले सनातनी बन गए है
मान क्यो नही लेते की घर घर मे गाय सुरिक्षित है
*क्या मानने से काम चल जाएगा*
धर्म रक्षा का काम ईश्वर देवी देवताओं के जिम्मे होता तो तिल भर भी धर्म की हानि कभी ना हुई होती।
*खोल लो आंखे* धर्मरक्षा व राष्ट्ररक्षा तुम्हारी जिम्मेदारी है।
असत्य , अंधविश्वास ओर *मान लो* के सहारे स्वराज्य सम्भव नही
*हिन्दुओ श्रद्धा वही होती है जो सत्य पर आधारित हो*
*“वेत्ति यथावत् तत्त्वपदार्थस्वरुपं यया सा विद्या।”*
जिससे पदार्थों का यथार्थ स्वरुप बोध होवे, वह विद्या है।
*मान लो* पर अविद्या, अंधश्रद्धा पाखण्ड झूठ , अंधविश्वास खड़ा होता है।
आओ अविद्या से विद्या की ओर
आओ अंधकार से प्रकाश की ओर
आओ अंधश्रद्धा से श्रद्धा की ओर
आओ गुलामी से स्वराज्य की ओर


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*R.O. का लगातार सेवन बनेगा मौत का कारण*:–चिलचिलाती गर्मी में कुछ मिले या ना मिले पर शरीर को...

*R.O. का लगातार सेवन बनेगा मौत का कारण*:–
चिलचिलाती गर्मी में कुछ मिले या ना मिले पर शरीर को पानी ज़रूर मिलना चाहिए। अगर पानी RO का हो तो, क्या बात है ! परंतु *क्या वास्तव में हम आर. ओ. के पानी को शुद्ध पानी मान सकते हैं* ?
*जवाब आता है बिल्कुल नहीं। और यह जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) की तरफ से दिया गया है।*
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि इसके लगातार सेवन से हृदय संबंधी विकार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में ऐंठन, सर दर्द आदि दुष्प्रभाव पाए गए हैं। यह कई शोधों के बाद पता चला है कि इसकी वजह से *कैल्शियम और मैग्नीशियम पानी से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं* जो कि शारीरिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
RO के पानी के लगातार इस्तेमाल से शरीर मे विटामिन *B-12* की कमी भी होने लगती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर 500 टीडीएस तक सहन करने की क्षमता रखता है परंतु RO में 18 से 25 टीडीएस तक पानी की शुद्धता होती है जो कि नुकसानदायक है। इसके *विकल्प में क्लोरीन को रखा जा सकता है जिसमें लागत भी कम होती है एवं पानी के आवश्यक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं*। जिससे मानव का शारीरिक विकास अवरूद्ध नहीं होता।
जहां एक तरफ एशिया और यूरोप के कई देश RO पर प्रतिबंध लगा चुके हैं वहीं भारत में RO की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। और कई विदेशी कंपनियों ने यहां पर अपना बड़ा बाजार बना लिया है। स्वास्थय के प्रति जागरूक रहना और जागरूक करना ज़रूरी हैं। अब शुद्ध पानी के लिए नए अविष्कारों की ज़रूरत है।
याद रखें की लम्बे समय तक RO का पानी, लगातार पीने से, शरीर कमजोर और बीमारियों का घर बन जाता है। अत: प्राकृतिक (खनिज युक्त) पानी परंपरागत तरीकों से साफ कर के पीना, हितकर है


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Tuesday, June 27, 2017

“जरा सी चूक हुयी और आप गये” रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था कि एक...

“जरा सी चूक हुयी और आप गये”

रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान
बन्द ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया ..
,
उसके मुॅंह में एक थैली थी, जिसमें सामान की
लिस्ट और पैसे थे ..
,
दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस
थैली में भर दिया …
,
कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया
,
दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे
पीछे गया ये देखने की इतने समझदार
कुत्ते का मालिक कौन है …
,
कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा, थोडी देर बाद
एक बस आई जिसमें
चढ गया ..
,
कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे
कर दी, उस के गले के बेल्ट में पैसे और
उसका पता भी था
,
कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के
बेल्ट मे रख दिया
,
अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे
चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर
को इशारा कर दिया
और बस के रुकते ही उतरकर चल दिया ..
,
दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था …
,
कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरोंसे
२-३ बार खटखटाया …
,
अन्दर से उसका मालिक आया और लाठी से
उसकी पिटाई कर दी ..
,
दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा .. ??
,
मालिक बोला .. “साले ने मेरी नींद खराब कर दी,
✒चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था गधा”
,
,
जीवन की भी यही सच्चाई है ..
,
आपसे लोगों की अपेक्षाओं का
कोई अन्त नहीं है ..
,
जहाँ आप चूके वहीं पर लोग बुराई निकाल लेते हैं और पिछली सारी अच्छाईयों को भूल जाते हैं ..
,
इसलिए अपने कर्म करते चलो, लोग
आपसे कभी संतुष्ट नहीं होएँगे।।


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Monday, June 26, 2017

जीवन की सात मर्यादाएँ जीवन की सात मर्याएँ “सप्त मर्यादाः...

जीवन की सात मर्यादाएँ

जीवन की सात मर्याएँ “सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यंहुरोSगात् । आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ ।।” (अथर्ववेदः–५.१.६) शब्दार्थः—-कवयः-ऋषियों ने सप्त—सात,मर्यादाः—मर्यादाएँ अर्थात् सीमाएँ, ततक्षुः—बनाई है, तासाम्–उनमें से, एकाम्—एक को, इद्–भी, अभ्यगात्—को प्राप्त होता है, वह, अंहुरः-पापी होता है, स्कम्भः—स्कम्भरूप परमात्मा, उपमस्य—उपमीभूत, आयोः—मनुष्य के, नीडे—हृदयरूपी घोंसलें में,पथाम्—मार्गों की, विसर्गे—समाप्ति पर और , धरुणेषु—धारक वस्तुओं में, तस्थौ–स्थित है । भावार्थः- (क) मनुष्य के जीवन के लिए वेद ने ७ मर्यादाएँ निश्चित की है । जिनका वर्णन यास्कमुनि ने निरुक्त में किया हैः— (१.) स्तेय–चोरी, (२.) तल्पारोहणम्–व्यभिचार (३.) ब्रह्महत्या—नास्तिकता, (४.) भ्रूणहत्या—गर्भघात (५.) सुरापान—शराब पीना (६.) दुष्टस्य कर्मणः—पुनः पुनः सेव । दुष्ट कर्म का बार-बार सेवन करना । (७.) पातकेSनृतोद्यम्—पाप करने के बाद उसे छिपाने के लिए झूठ बोलना । मर्यादा कहते हैं, सीमा को । कर्त्तव्य-शास्त्र की ये सात मर्यादाएँ (सीमाएँ) हैं । कर्त्तव्य-शास्त्र इन सीमाओं के अन्दर रहता है । इन सीमाओं का अतिक्रम न करना सत्कर्त्तव्य का कर्म है । (ख) इन मर्यादाओं में से एक का भी जो उल्लंघन करता है, वह पापी होता है । (ग) जो इन सातों मर्यादाओं में रहता है, वह परमात्मा का अधिक सदृश बन जाता है । परमात्मा में और उसमें परस्पर उपमानोपमेय भाव हो जाता है । (घ) परमात्मा की स्कम्भरूप अर्थात् भुवनप्रासाद का स्तम्भरूप है, वह उपमीभूत मनुष्य के हृदय-नीड में रहता है । इसी हृदय-मन्दिर में वह मर्यादाबद्ध मनुष्य परमात्मा का भजन और उसका प्रत्यक्ष कर सकता है । मनुष्य के हृदय में ही परमात्मा का भान क्यों होता है, इसके उत्तर के लिए ही मन्त्र में “उपमस्य” यह पद दिया है । जीवात्मा की उपमा परमात्मा से और परमात्मा की जीवात्मा से है । ये दोनों ही अप्राकृतिक है , प्रकृति से विलक्षण है । इसीलिए वेद तथा उपनिषदों में प्रकृति-वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों से जीवात्मा और परमात्मा को रूपित किया गया है । रूपक का अभिप्राय यही है कि जीवात्मा और परमात्मा परस्पर सदृश हैं और प्रकृति से विलक्षण हैं । तभी तो जीवात्मा और परमात्मा में परस्पर सादृश्य अर्थात् उपमानोपमेय भाव है । जब साधारण जीवात्मा जो कि मनुष्य की देह है, परमात्मा के साथ सादृश्य रखता है, तब मनुष्य का वह आत्मा तो, जिसने कि सात मर्यादाओं में रहकर अपने आपको पवित्र कर लिया है, अवश्य ही परमात्मा का उपमीभूत होना चाहिए । (ङ) परमात्मा पथों की समाप्ति पर है । सभी धर्मग्रन्थों का केन्द्र-स्थान वेद है । इसी केन्द्र से धर्म के भिन्न-भिन्न पथ निकले हैं । इन सब पथों का विसर्ग अर्थात् समाप्ति वेद पर होती है । इसी समाप्ति पर परमात्मा के सत्यस्वरूप का ज्ञान सब धर्मग्रन्थों के केन्द्रीभूत वेदों द्वारा ही सम्भव है । “पथां विसर्गे” का एक और अभिप्राय भी सम्भव है । वेदों में जगत् और ब्रह्म में व्याप्यव्यापकता दिखलाई है । जगत् व्याप्य और ब्रह्म व्यापक है । ब्रह्म में जगत् व्यापक नहीं है । अपितु सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म के एकदेश में विद्यमान रहता है । इसी आशय को अधिक स्पष्ट करने के लिए वेदों में ब्रह्म और जगत् दैशिक सत्ता का दृष्टान्त नीड और वृक्ष से दिया जाता है । उनमें ब्रह्म को वृक्ष और जगत् को नीड बताया है । नीड कहते हैं घोंसले को । घोंसला वृक्ष के एक देश पर आश्रित रहता है और वृक्ष घोंसले से बहुत बडा होता है । इसी प्रकार परमात्माी रूपी वृक्ष इस जगत् रूपी नीड का आश्रय है और जगत् बहुत बडा है । ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र , तारादिकों के समुदायों को ही जगत् कहते हैं । ये ग्रह, नक्षत्रादि अपने-अपने नियत पथों पर घूम रहे हैं ।इनमें से कोई भी विपथगामी नहीं होता । अतः जहाँ जहाँ जगत् की सत्ता है, वहाँ वहाँ हम पथों की सत्ता की कल्पना भी कर सकते हैं । परन्तु जहाँ जगत् की अन्तिम सीमा है, जिस से परे जगत् की सत्ता नहीं, वहाँ पृथिव्यादि के घूमने का कोई पथ भी नहीं, यह स्पष्ट है । वह स्थान “पथां विसर्गे” है । वहाँ पथों का विसर्ग अर्थात् समाप्ति हो जाती है । उससे आगे कोई पथ नहीं । परन्तु परमात्मा वहाँ भी विद्यमान है । अतः परमात्मा की स्थिति “पथां विसर्गे” पर भी है । (च) वह स्कम्भ रूप परमात्मा धारक पदार्थों में भी स्थित है । स्कम्भ का अर्थ है—धारण करने वाला, थामने वाला । परमात्मा के स्कम्भरूप का वर्णन अथर्ववेद (१०.७) में बहुत उत्तम शब्दों में किया है । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र , तारा, वायु, , पृथिवी आदि पदार्थ संसार में धारक रूप से प्रसिद्ध है । ये सब प्राणी जगत् के तथा परस्पर के धारण करने वाले हैं । परमात्मा इन धारकों का भी धारक है । वह इन धारकों में भी स्कम्भरूप (धारकरूप) से स्थित है , अर्थात् संसार का मूलाधार या मूलधारक परमात्मा ही है । अतः भक्ति, उपासना और मनन इसी महान् शक्ति का करना चाहिए । चूंकि यह सर्वोच्च है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वाधार है ।


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*ओ३म्* *🌷उद्गीथ ओंकार का ही नाम है🌷* ‘ओ३म्’ यह अक्षर ही 'उद्गीथ’ है।...

*ओ३म्*

*🌷उद्गीथ ओंकार का ही नाम है🌷*

‘ओ३म्’ यह अक्षर ही 'उद्गीथ’ है। 'ओ३म्’ इसकी ही उपासना करें, इसका ही गान करें। 'ओ३म्’ यह अक्षर और इसका दीर्घ स्वर से उच्चारण ही अमृत है, इसी से अभय पद प्राप्त होता है। वह उपासक जो ओंकारोपासना को इस प्रकार जान लेता है और दीर्घ–स्वर से अक्षर–'ओ३म्’ की उपासना करता है, वह भी इस अक्षर–स्वर में जो अमृत तथा अभय है, प्रविष्ट होकर अमर हो जाता है। उपनिषदों ने ओंकार का उच्च–स्वर से उच्चारण कर उसमें लीन होने को अमृत पद तथा अभय पद प्राप्ति के लिए सबसे अधिक बल दिया है।


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Saturday, June 24, 2017

मनुष्य सामाजिक प्राणी है अकेला नहीं जी सकता । करोड़ों व्यक्तियों का सहयोग लेकर आपको सब सुविधाएं...

मनुष्य सामाजिक प्राणी है अकेला नहीं जी सकता । करोड़ों व्यक्तियों का सहयोग लेकर आपको सब सुविधाएं प्राप्त होती हैं । यदि करोड़ों व्यक्ति आपके सुख के लिए आपकी सुविधाओं के लिए दिन रात मेहनत करते हैं , तो आपका भी कुछ कर्तव्य बनता है यदि आपको ईश्वर ने कुछ अधिक संपत्ति दी है तो उन गरीब असहाय विकलांगों के लिए भी कुछ दान आदि देना चाहिए । वैदिक धर्म प्रचार में भी कुछ दान देना चाहिए । ईश्वर की कृपा से आपको यह संपत्ति प्राप्त हुई है। उसका कुछ भाग ईश्वर की आज्ञा पालन में भी देना चाहिए।


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स्वस्तिवाचनम् - ऋग्वेद- मण्डल७/सूक्त३५/मन्त्र१५ ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता...

स्वस्तिवाचनम् - ऋग्वेद- मण्डल७/सूक्त३५/मन्त्र१५

ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञा:।
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।८।

अर्थ ~ हे परमात्मा ! पूज्य विद्वान, यज्ञ करने वाले, विचारशील का संग करने वाले, सत्य के जानने वाले और ब्रह्मवेत्ता ज्ञानीजन उत्तम विद्या और शिक्षा के उपदेश से हम लोगों को निरन्तर उन्नति देवें। वे विद्वान विद्यादि के दान जैसे अनेक उपायों के द्वारा सर्वदा हमारी रक्षा करें।


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अधिकांश लोग अपने कल को अच्छा बनाने की चिंता में रहते हैं । चिंतन करना अच्छी बात है पर चिंता करना...

अधिकांश लोग अपने कल को अच्छा बनाने की चिंता में रहते हैं । चिंतन करना अच्छी बात है पर चिंता करना अच्छा नहीं है । चिंता ना करें चिंतन अवश्य करें । यदि कल को अच्छा बनाने के लिए आज आप मेहनत करते हैं तो जब कल का दिन आएगा तब तो कम से कम अच्छी तरह से जिएं। कल फिर आप अगले कल की चिंता करेंगे, तो ठीक से किस दिन जिएंगे ? वह आज कब आएगा जब आप खुशी से जिएंगे ! इसलिए मेहनत भी करें और खुशी से भी जिएँ। दोनों काम साथ साथ चलाएं।


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