👉 गतांक से आगे
🌹 प्रेम ही परमेश्वर है 🌹
परमात्मा का प्रेम पूर्ण है, पवित्र है
🔵 स्वामी का सेवक से, राजा का प्रजा से, पिता का पुत्र से, जो सम्बन्ध होता है, उसमें अस्वाभाविकता नहीं होती। अत: वहाँ व्यवहार भी निष्कपट होता है। पुत्र में पिता का ही प्राण संचरित होता है अत: वहाँ कोई बनावटीपन नहीं होता। परमात्मा और मनुष्य का प्रेम भी वैसे ही आधारभूत और छल रहित होता है। इसी में ही उसकी प्रतिष्ठा और उसका आनन्द है।
🔵 ‘केनोपनिषद् में प्रश्र किया गया है कि केन प्राण: प्रथम: प्रेतियुक्त:?’ अर्थात् प्राण को किसके द्वारा प्रेम प्राप्त हुआ है ?? प्रश्र के उत्तर में बताया है जो महाप्राण हैं उनके द्वारा। महाप्राण परमात्मा की स्थिति का संकेत है।
🔵 मनुष्य अपने आप में बहुत छोटा अल्प शक्ति और सामर्थ्य वाला है। पगपग पर उससे गलतियाँ और अशुद्धियाँ होती रहती हैं। पर जब वह अपने आपको उस परम पिता को ही अनन्य भाव से सौंप देता है तो उसकी सारी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं।
🔵 भगवान् के प्रेम के सहारे जिये। भगवान् के प्रेम के आश्रित रहें। उन्हीं के स्मरण, चिन्तन और आदेश पालन को अपने जीवन का धर्म समझें। किसी भी निराशा में भगवान् का प्रेम महान् है। इसी बात को गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है,- “ऐ मनुष्य ! तू सम्पूर्ण धर्मों का परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तेरे सभी पापों का विनाश कर तुझे पवित्र तथा बन्धन मुक्त कर दूँगा।”
🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
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लक्ष्य सिद्धि के लिए धैर्य आवश्यक है
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