Friday, November 6, 2015

🌻🌼🌻🌼🌻ओ३म्🌻🌼🌻🌼🌻 भूपेश आर्य 🌹वर्जनीय व्यवहार 🌹 लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नर:। नित्योच्छिष्ट:...

🌻🌼🌻🌼🌻ओ३म्🌻🌼🌻🌼🌻

भूपेश आर्य

🌹वर्जनीय व्यवहार 🌹

लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नर:।
नित्योच्छिष्ट: संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ।।-महा० अनु० १०४/१५

व्यर्थ ही मिट्टी के ढेले फोडने वाला,तिनके तोडने वाला,दांतों से नाखून चबाने वाला,ऐसे कुलक्षण युक्त कुसंस्कारी मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त नहीं होती।

नान्यस्रियमभिलषेत्नान्यश्रियम् ।~चरक सू० ८/१९

दूसरे की स्त्री और दूसरे के धन का लालच नहीं करना चाहिये।

न वैरं रोचयेत् ।-चरक सू० ८/१९
वैर विरोध में रुचि नहीं लेनी चाहिये।

नान्यरहस्यमागमयेत् ।-चरक सू० ८/१९
दूसरे की गुप्त बातों को जानने का यत्न नहीं करना चाहिये।

न भयमुत्पादयेत् ।-च० सू० ८/१९
किसी को भयभीत नहीं करना चाहिये।

न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसंगरुचि: स्यात् ।-चरक सू० ८/२५
शराब पीने, जुआ खेलने और वेश्यागमन की इच्छा नहीं रखनी चाहिये।

न कञ्चिदवजानीयात् ।-चरक सू० ८/२५
किसी का अपमान नहीं करना चाहिये।

न सिद्धावुत्सेकं गच्छेन्नसिद्धौ दैन्यम् ।- चरक सू० ८/२७
किसी कार्य के सिद्ध होने पर अत्यधिक हर्षित नहीं होना चाहिये और काम के बिगड जाने पर दु:खी नहीं होना चाहिए।

धर्मान्न प्रमदितव्यम् ।- तैत्ति० उप० शी० ११/१
धर्माचरण करने में प्रमाद नहीं करना चाहिये।

यदन्येषां हितं न स्यादात्मन: कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत्कुर्यात् कथञ्चन ।।- महा० शा० १२४/६७

अपना जो भी कर्म या पुरुषार्थ दूसरों के लिए हितकर न हो अथवा जिस काम को करके समाज में लज्जित होना पडे, वह काम कभी नहीं करना चाहिये।

शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह ।-मनु० ४/१३९
किसी के साथ निरर्थक वैर विरोध अथवा लडाई झगडा नहीं करना चाहिये।

न बलस्थोय्हमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ।-महा० शा० १३३/१९

‘मैं बलवान् हूं,मैं ऊंचे अधिकार पर स्थित हूं,मेरा कोई क्या बिगाड सकता है’, ऐसा समझकर किसी के प्रति अन्याय और अत्याचार नहीं करना चाहिये।

परेषां यदसूयेत न तत्कुर्यात्स्वयं नर: ।-महा० शा० २९०/२४
मनुष्य को दूसरों की जो बातें अप्रिय एवं अनुचित लगें, उन्हें स्वयं भी नहीं करना चाहिये।

न सीदन्नपि धर्मेण मनोय्धर्मे निवेशयेत् ।-मनु० ४/१७१
धर्माचरण से कष्ट पाने पर भी मन को अधर्म में नहीं लगाना चाहिये।

नारुन्तुद: स्यादार्तोअपि न परद्रोहकर्मधी:।
ययाअस्योद्विजते वाचा नाअलोक्यां तामुदीरयेत् ।।
-मनु० २/१६१

स्वयं दु:खी होते हुए भी किसी दूसरे को दु:ख न दे।
मर्मभेदी वचन न बोले,दूसरे का अपकार करने का विचार न करे।आचरण और बुद्धि किसी के द्वारा भी दूसरों से द्रोह न करे।जिस वाणी को सुनकर उद्विग्न हो उठें, ऐसी लोकविरोधिनी वाणी न बोले।

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