Wednesday, November 18, 2015

🌻🌷🌻🌷🌻🌷ओ३म्🌻🌷🌻 भूपेश आर्य 🌷 प्रभु का आदेश व कार्य 🌷 अहमेव स्वयमिदं वदामि। जुष्टं देवानामुत...

🌻🌷🌻🌷🌻🌷ओ३म्🌻🌷🌻

भूपेश आर्य

🌷 प्रभु का आदेश व कार्य 🌷

अहमेव स्वयमिदं वदामि। जुष्टं देवानामुत मानुषाणाम् ।
यं कामये तन्तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणंतमृषिं तं सुमेधाम् ।। (अथर्व० ४/३०/३)

देवों और मनुष्यों के ग्रहण करने योग्य इस उपदेश को मैं स्वयं कहता हूं कि जिस जिस को मैं क्रमानुसार चाहता हूं उस उस को उग्र बलवान,उसको ब्रह्मा अर्थात् चारों वेदों का ज्ञानवान्,उसको मन्त्र दृष्टा ऋषि,उसको सुमेधा-धारणावती बुद्धि से युक्त करता हूं।

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्मति यः प्राणति य ईं श्रृणो त्युक्तम् ।
अमन्तवो मां त उपक्षियन्ति श्रु धिश्रुत् श्रद्धेयं ते वदामि ।।-(अथर्व० ४/३०/४)

जो कोई अन्न खाता है,जो कोई देखता है।जो कोई प्राण लेता है।जो कोई कहे हुए को सुनता है।मेरे द्वारा ही वह खाता,देखता,प्राण लेता और सुनता है।हे सुनने वाले तेरे लिए श्रद्धा करने योग्य वचन कहता हूं उसे सुन।जो मुझे नहीं मानते,नास्तिक हैं वह नष्ट हो जाते हैं।


सारांश-
(1) मनुष्यों का और देवों का सबका भगवान ही सेवन करने योग्य है,उपासना करने योग्य है।

(2) वह ईश्वर ही अपने अपने कर्मानुसार ,मनुष्य को बलवान,विद्वान,ऋषि और मेधावी बनता है।

(3) जीवों का खाना-पीना,देखना-सुनना,जीवन धारण करना उसी प्रभु के आधीन है।

(4) जो प्रभु की कृपाओं का मनन नहीं करते,चिन्तन नहीं करते,नास्तिक हैं।वह उनका नाश कर देता है।

(5) प्रभु विमुख,वेद विरोधी,ब्राह्मण विद्वेषी और हिंसक का वह नाश कर देता है।

(6) ईश्वरीय वाणी ही श्रद्धा करने योग्य है क्योकि वह सत्य को धारण करने वाली है।

(7) वह ईश्वर,द्यौलोक,पृथ्वीलोक,ओर सर्वत्र व्यापक हो रहा है।

(8) वह सबका सुख,शान्ति और आनन्द प्रदाता है।
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