Monday, November 23, 2015

🌷🌹🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌷🌹🌷🌹 भूपेश आर्य उच्छनुषसः सुदिना अरिप्रा,उरु ज्योतिविविदुर्दीध्यानाः । गव्यं...

🌷🌹🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌷🌹🌷🌹

भूपेश आर्य

उच्छनुषसः सुदिना अरिप्रा,उरु ज्योतिविविदुर्दीध्यानाः ।
गव्यं चिदूर्वमुशिजो,विवर्वुस्तेषामनु प्रदिवः सस्नु रापः ।। ऋ०७/९०/४

अर्थ-प्रकाश का,ज्ञान का विस्तार करने वाले सुन्दर दिनों वाले समय को सुन्दर ढंग से बिताने वाले पापरहित निर्दोष,प्रभु कआ निरन्तर ध्यान करने वाले ,महती ज्योति को प्राप्त करते हैं।सुन्दर कामना वाले विषेश रुप से वरण करते हैं।उनके ज्ञान प्रकाश के अनुकूल जल बहने लगते हैं,शान्ति की धाराएं संसार में बहने लगती हैं।

सारांश-
(१) उषसः उच्छन्-प्रभु भक्त का पहला लक्षण यह है कि वह अविद्या,अज्ञान,अन्धकार का नाश कर ज्ञान तथा प्रकाश का विस्तार करता है।

(२)-सुदिनः-प्रभु भक्त का दूसरा गुण है कि वह कभी समय को व्यर्थ नष्ट नहीं करता,समय का सदुपयोग करता है अथवा निद्रा,निन्दा,कलह,क्लेश आदि में समय व्यतीत नहीं करता।

(३) अरिप्राः-प्रभु भक्त शारिरिक वाचिक,मआनसिक सब प्रकार के पापों तथा व्यसनों से रहित होकर निष्पाप एवं निर्दोष जीवन व्यतीत करता है।

(४) दीध्यानाः-प्रभु भक्त निरन्तर प्रभु के गुणों कआ चिंतन वा धारण करने वाला होता है।उपासना द्वारा यथेष्ठ रुप से उसका ध्यान करता है।

(५) विविदुः-प्रभु भक्त अन्त में उसकी ज्योति को प्राप्त कर लेता है।

(६) उशिजः-प्रभु भक्त सबका हित,कल्याण,भद्र चाहता है।सबके भले में अपना भला,सबकी उन्नति में अपनी उन्नति चाहता है।क्योकि वह स्वभाव से ही सुन्दर,उत्तम और भद्र भावना युक्त होता है।

(७) गव्यं ऊर्जम् विबव्रु-प्रभु भक्त इन्द्रियों को अपने वश में रखता है।स्वयं कभी उनके वश में नहीं होता,अतः इन्द्रियों के विशाल और महान बल को प्राप्त कर लेता है।

(८) वह स्वयं शान्त होता है और संसार में शान्ति की धाराओं को बहाने वाला होता है।शान्ति का धारक व प्रसारक होता है।
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