👉गतांक से आगे
🌹 प्रेम ही परमेश्वर है 🌹
🌞 ईश-प्रेम से परिपूर्ण और मधुर कुछ नहीं
🔵 मुझे मालूम नहीं प्रभु ! तुमसे मैं बिछुड़ा क्यों ? क्या इसमें भी कुछ रहस्य है ? मैं अपनी इच्छा से संसार में आया या तुम्हीं मुझे अकेला छोड़कर मेरे सयानेपन पर, मेरी अतुकान्त भूलों पर हँसने और उसका चिर आनन्द लेने के लिए पर्दे में छुपे हो। किन्तु हे प्रभु ! अब यह खेल खेलने की शक्ति मुझमें नहीं रही। मैंने संसार के माया रूप को जबसे पहचान लिया है, तब से एक तुम्हारा ही प्रेम उमड़ रहा है। भीतर भी तुम्हारा प्रेम जाग रहा है और सृष्टि के कण-कण में भी तुम्हारा प्रेम प्रतिभासित हो रहा है। हे प्रभु ! यह कैसी पीड़ा है जो तुम्हें आँखों से अलग भी नहीं होने देना चाहती और तुममें मिलने, समा जाने का अवसर भी नहीं देती। अपनी तृणवत् सत्ता से थके हुए जीव को विश्राम दो, अपनी मधुर गोद में ले लो, अपने प्राणों में छिपा लो, जिससे भय, लज्जा और विषाद के सम्पूर्ण मल आवरण धुल जायें। यह सब तुम्हारे से ही सम्भव है। संसार की ममता में वह सब कहाँ। प्रेम के शाश्वत सिन्धु तुम्हीं इतने निर्मल हो कि संसार का सारा मल तुम्हारे अन्दर आकर धुल जाता है। हे प्रभु ! तुम्हीं इतने प्रकाशवान् हो कि संसार का सारा अंधियार तुम में समा जाता है। तुम निर्बल को भी बलवान् करने वाले, घृणित को भी हृदय से लगा लेने वाले हों। तुम्हारी शरण छोड़कर जीव अन्यत्र जा भी तो नहीं सकता।
🔵 इस प्रकार जब सब ओर परमात्मा का प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देने लगता है, जीव अपनी लघुता की पहचान कर लेता है और कातरभाव से परमात्मा को पुकारता है तो उसके अन्तःकरण की गहराई भी स्थिर नहीं रह सकती। वह अन्तःकरण को मथ डालती है और उसमें से दिव्य ईश्वरीय प्रेम निखरता हुआ चला आता है। प्रेम में ही परमेश्वर है, प्रेम की सत्ता ने चरअचर, स्थावर जंगम सब को क्रियाशील बना रखा है। प्रेम ही सम्पूर्ण पवित्र है। अपवित्रता तो आसक्ति थी, मोह था, ममता थी, वासना थी। जब वही न रहे तो मलिनता कैसी ? जीव मात्र के सौन्दर्य का सागर अन्तःकरण में फूट पड़ता है। जीवन मात्र की चैतन्यता की शक्ति अन्तःकरण में जाग पड़ती है। जब सब अपने, जब सब कुछ अपना तो कहाँ अभाव, कहाँ अशक्ति, कहाँ अज्ञान ? सब ओर मंगल, आनन्द ही आनन्द बिखरा दिखाई देने लगता है।
🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
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आत्मविश्वास की अटूट शक्ति
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