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ओ३म्
*🌷प्रातः जागरण🌷*
हमारी दिनचर्या का आरम्भ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागने से होता है।आयुर्वेद के ग्रन्थों में कहा है-
*ब्राह्मो मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।-(भावप्रकाश १/४)*
अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति को अपनी जीवन-रक्षा के लिए प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए।
महर्षि मनु का आदेश है-
*ब्राह्मो मुहूर्त बुध्येत धर्मार्थों चानुचिन्तयेत्।*
*कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदतत्त्वार्थमेव च।।*-(मनु० ४/९२)
अर्थ:-प्रत्येक व्यक्ति को ब्रह्ममुहूर्त में उठ के धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।शरीर के रोग और उनके कारणों का विचार करना चाहिए।फिर वेद के रहस्यों का भी चिन्तन करना चाहिए।
परन्तु आज युवक प्रातःकाल नहीं उठते।वे कहते हैं ‘मनुस्मृति’ अब आउट-ऑफ-डेट (पुरानी) हो गई है।अब तो टुडे (Today)-स्मृति के अनुसार कार्य करना चाहिए।
*सूर्यातपेऽवबुध्येत बीड़ीं टीं चानुचिन्तयेत् ।*
*दम्भं छलं परद्रोहं कलितत्त्वार्थमेव च ।।*
अर्थात् जब सूर्य पर्याप्त चढ़ जाए,खूब धूप निकल आए तब उठना चाहिए।उठते ही बीड़ी,सिगरेट और टी का चिन्तन करना चाहिए।दूसरों के साथ छल,ईर्ष्या और कुटिलता किस प्रकार करनी चाहिए-कलियुग के इन तत्त्वों का चिन्तन करना चाहिए।
सावधान! यह मार्ग कल्याण का मार्ग नहीं है।इस मार्ग पर चलकर पतन अवश्यम्भावी है।वेद कहता है-
*मैतं पन्थामनुगा भीम एषः ।*-(अथर्व० ८/१/१)
इस मार्ग पर मत चल,यह मार्ग बहुत भयंकर है।
प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठो।चार बजे शय्या अवश्य छोड़ दो।चौबीस घण्टों में ब्रह्ममुहूर्त ही सर्वश्रेष्ठ है।इसे आलस्य और निद्रा में नष्ट न करो।मानव-जीवन बड़े भाग्य से मिलता है।
ब्रह्ममुहूर्त में चन्द्रमा की छटा कुछ अद्भुत और निराली होती है।चन्द्रमा की किरणों में अमृत होता है,इसीलिए तो इसे सुधाकर कहते हैं।प्रातःकाल की वायु में अमृतकण होने के कारण रोग नष्ट हो जाते हैं।स्वास्थय और दीर्घ जीवन के इच्छुक प्रत्येक युवक और युवती को ब्रह्ममुहूर्त में अवश्य ही उठ जाना चाहिए।
शारीरिक स्वास्थय,मन,बुद्धि और आत्मा सभी की दृष्टि से ब्रह्ममुहूर्त में उठना परम-उपयुक्त है।किसी कवि ने क्या खूब कहा है-
*हर रात के पिछले पहरे में,इक दौलत लुटती रहती है।जो सोवत है सो खोवत है,जो जागत है सो पावत है।।*
वेद में कहा है-
*प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति।*-(ऋ० १/१२५/१)
प्रातः उठने वाला रत्नों को धारण करता है।
प्रातःकाल का वर्णन करते हुए श्री थोरो महोदय लिखते हैं-
*The Vedas say, “All intelligences awake with the morning.”*
अर्थात् वेद कहते हैं कि तमाम बुद्धियाँ प्रातःकाल के साथ ही जागरित होती है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में भी कहा है-
*वर्ण कीर्ति मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विन्दति।*
*ब्राह्मोमुहूर्ते संजाग्राच्छ्रियं वा पंकजं यथा।।*-(भै० सार० ९३)
अर्थात् प्रातःकाल उठने से सौन्दर्य,यश,बुद्धि,धन-धान्य,स्वास्थय और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।शरीर कमल कमल के समान खिल जाता है।
*अतः शारीरिक,मानसिक और आत्मिक उन्नति के इच्छुक विद्यार्थियों को ब्रह्ममुहूर्त में अवश्य उठ जाना चाहिए।इस समय कठिन-से-कठिन विषय सरलता से समझ में आ जाता है।प्रातः याद किया हुआ पाठ शीघ्र स्मरण हो जाता है और बहुत समय तक नहीं भूलता।*
*संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं,वे सब ब्रह्ममुहूर्त में उठा करते थे।*
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बधाई हो! भारत ने श्रीहरिकोटा से pslv-c 34 से अंतरिक्ष में भेजे 3 स्वदेशी और 17 विदेशी, यानी कुल 20 सैटेलाईट! उधर पापीस्तान बो,,,सॉरी भौंक रहा है कि हमें एशिया में भारत का दबदबा बर्दाश्त नहीं!
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😥 हां हम जानते हैं पापीस्तान, कि भारत के बढ़ते दबदबे से मारे प्रसवपीड़ा के तेरी कोख फटी जा रही है! पर हम भी तो बेबस हैं! कैसे तेरी चकनाचूर छाती में कंक्रीट भरें! ले, मैं ही कुछ फर्स्ट एड टिप्स बताती हूं, जिससे तत्काल तो तेरे कलेजे के कोयले होने बंद हों! अब क्योंकि तुम सदा से हिंदूधर्म से बड़ी ही कट्टरता से उलटा चलते आए हो तो, मैं भी अब मारे दया के वैसे ही कट्टर नुस्खे सुझाती हूं!
1.हिंदू सदा से मुंह से खाते आए हैं और अन्न खाते आए हैं! तुम कुछ और चीज़ कहीं और से खाना स्टार्ट करो!
2.हमारे तो प्राचीन युग से ही विवाहप्रथा है, तो तुम ब्रह्मचारी रहो! आज से ही अपनी लुगाइयों को अरब सागर में डुबोना स्टार्ट करो!
3.हमारे लंबेचौड़े राजपरिवार होते थे! तुम लोगों ने उसकी नकल में ही बंटाधार किए! बच्चे तो हर 9 महीने में दिए, पर दाने तुम्हारे डेरे-तंबू छाप पूर्वज भी ना पाए थे तो तुम क्या पाते! तो अब एक2 कर के अपने झुंडों को संखिया विष दो!
4.हमारे यहां सदा से प्राकृतिक रूप से अभिसार होता है। तुम जन्नत में ही क्यों, यहां भी गिल्मा/जिगोलोज़ को ही प्राथमिकता दो! एक साथ तुम्हारी जनसंख्या विस्फोट की तो क्या, भारत की भी समस्त समस्याएं समूल सॉल्व! मुए जनमेंगे तो हड़केंगे!
5.हमारे यहां हमारी बहूबेटिया प्राचीन काल से ही प्राकृतिक रूप से बच्चे जनमती आई है! तुम अपनी लुगाईयों को बोलो वो मुंह से बच्चे जनमे!
😱 भारतमाता की सौं, इतने से ही तुम्हारी छाती में ठंडक पड़ जाएगी! भारत को हराने की मेरी सुझाई टैक्निक से घर बैठे अखंड आनंद लूटोगे! यदि मैं जो कभी सुदृढ़ हुई, तो और सुपर नुस्खे तुम पर लागू करने में तुम्हारा अपार सपोर्ट करूंगी! तुम ना भी मानोगे, तब भी! 👍🏽 आखिर तुम अभागे तुम्हारे प्राचीन नियम/प्रथाएं भी पूर्ण ना कर सको, तो हम भारतीयों पर ही तो धिक्कार है भई!
🚩मधु शर्मा©🚩
22.6.2016
३१ ज्येष्ठ 14 जून 16
😶 “ नदी के पार ” 🌞
🔥🔥ओ३म् अश्मन्वती रीयते स ँ रभध्वमुत्तिष्ठत प्र तरता सखाय:।🔥🔥
🍃🍂 अत्रा जहीमो अशिवा ये असन् शिवान् वयमुत्तरेमाभिवाजान् ।। 🍂🍃
ऋ० १० । ५३ । ८ ; यजु:० ३५ । १०; अथर्व० १२ । २ । २६
शब्दार्थ :- पत्थरों,शिलाओंवाली नदी वेग से बह रही हैं ।
हे साथियों,मित्रों !
उठो,मिलकर एक दूसरे को सहारा दो और इस नदी को प्रबलता से तर जाओ ।
आओ, जो हमारे अकल्याणकार संग्रह हैं उन्हें हम यहीं छोड़ दें और कल्याणकारी सुखों,बलों और ज्ञानों को पाने के लिए हम इस नदी के पार हो जाएँ ।
विनय :- भाइयों !
सांसारिकता की नदी बड़े वेग से बह रही हैं । अपने अभीष्ट सुखों को,सच्चे भोगों को,बलों को हम इस नदी के पार पहुंचकर ही पा सकते हैं,पर हमें बहाये लिये जानेवाले विषयों के इस भारी प्रवाह को तर जाना भी आसान कार्य नहीं हैं । यह नदीं बड़ी विकट हैं । इसमें पड़े हुए भोग्य-पदार्थों के बड़े-बड़े और फिसलनेवाले चिकने पत्थर हमारे पैरों को जमने नहीं देते । इधर शिलाओं की ठोकर खाकर कदम-कदम पर गिर पड़ने का डर है,उधर नदीं का वेग हमें बहाये लिए जाता है, परन्तु पार पहुँचे बिना हमें सुख-शान्ति भी नही मिल सकती, अत:
भाइयों !
उठो,मिलकर एक दूसरे को सहारा देते हुए आगे बढ़ो । हिम्मत करके उठ खड़े होओं और दृढ़ता के साथ प्रबल यत्न करते हुए इस नदी के पार उतर जाओ,
मुश्किल ये हो रहा है कि पत्थरों वाली और वेगवती इस नदी के पार उतरना इतना मुश्किल हो रहा हैं भोगेच्छा,कुसंस्कार,अधर्म की वासना तथा पापों के भारी बोझ से हमने अपने आप को बोझिल बना रखा है । इसके कारण हमारा पार उतरना मुश्किल हो रहा है ।
आओ ! साथियों,भाइयों पहले हम अपने बुरे कर्म यहीं छोड़ दे
यदि इस बोझ के साथ हम स्वयं डूब मरना या नदी प्रवाह हो जाना नहीं चाहते तो हमें इन बुराइयों को तो नदी में प्रवाह कर देना चाहिए । इन बुराइयों से छुटकारा पाकर हमें एक दूसरे को सहारा देकर आगे बढना चाहिए ।
हे कल्याण चाहनेवाले !
यह नदी चाहे कितनी विकट हो, पर इसे पार किये बिना कोई हल नहीं कोई चारा नही ।
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे
🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚
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तथागत के 38 मंगल सूत्र
1मूर्खों की संगति ना करना !
2बुद्धिमानों की संगति करना ॥
3 शीलवानो की संगति करना ॥
4 अनुकूल स्थानों में निवास करना ॥
5 कुशल कर्मों का संचय करना ॥
6 कुशल कर्मों में लग जाना ॥
7 अधिकतम ज्ञान का संचय करना ॥
8 तकनीकी विद्या अर्थात शिल्प सीखना ॥
9 व्यवहार कुशल एवं विनम्र होना ॥
10 विवेकवान होना ॥
11 सुंदर वक्ता होना ॥
12 माता पिता की सेवा करना ॥
13 पुत्र स्त्री का पालन पोषण करना
14 अकुशल कर्मों को ना करना ॥
15 बिना किसी अपेक्षाके दान देना ॥
16 धम्म का आचरण करना ॥
17 सगे सम्बंधियों का आदर सत्कार करना ॥
18 कल्याणकारी कार्य करना ॥
19 मन, शरीर तथा वचन से परपीड़क कार्य ना करना ॥
20 नशीली पदार्थों का सेवन ना करना ॥
21 धम्म के कार्यों में तत्पर रहना ॥
22 गौरवशाली व्यक्तित्व बनाए रखना ॥
23 विनम्रता बनाए रखना ॥
24 पूर्ण रूप से संतुष्ट होना अर्थात तृप्त होना ॥
25 कृतज्ञता कायम रखना ॥
26 समय समय पर धम्म चर्चा करना ।।
27 क्षमाशील होना ॥
28 आज्ञाकारी होना ॥
29 भिक्षुओ, शीलवान लोगों का दर्शन करना ॥
30 मन को एकाग्र करना ॥
31 मन को निर्मल करना ॥
32 सतत जागरूकता बनाए रखना ।।
33 पाँच शीलों का पालन करना ॥
34 चार आर्य सत्यों का दर्शन करना ।।
35आर्य अाष्टांगिक मार्ग पर चलना ॥
36 निर्वाण का साक्षात्कार करना ॥
37 लोक धम्म लाभ हानि ,यश अपयश ,सुख दुख ,जय पराजय से विचलित ना होना ॥
38 शोक रहित ,निर्मल एवम निर्भय होना ॥
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स्वामी दयानन्द के उपदेश से जीवन परिवर्तन
पंजाब के जेलम नगर में महर्षि दयानंद के प्रवचन हो रहे थे । एक सज्जन वहां के तहसीलदार को ले आये और ऋषि जी से निवेदन किया की ये अच्छे कवि व संगीतज्ञ तथा मधुर गायक है , महर्षि ने कहा सुनाओ। इन्होने मधुर स्वर में जो संगीतमय गीत गाया तो सारे श्रोता झूमने लगे , महर्षि भी आनंदविभोर हो गए । महर्षि के उपदेश पश्चात एक सज्जन ने कहा - ऋषि जी ये जो संगीतमय गीत गा रहे थे वे बड़े शराबी , वेश्यागामी , जुआरी , रिश्वतखोर है । ऐसे अनेक दोष इनमे है । ऐसे को अपनी सभा में स्थान दिया।
ऋषि मुस्कुराए और कहा - कल आने दो।
दूसरे दिवस आकर फिर सुमधुर कंठ से प्रभूमाहिमा में गीत गाया । सबको बड़ा आनंद आया । महर्षि ने शराब , वेश्यागमन , जुआ , रिश्वत आदि से क्या हानि होती है इसी पर उपदेश दिया । तहसीलदार जी अनुभव करते थे की ये तो मेरे जीवन की डायरी सुना रहे है। सत्संग सम्पन्न हुआ । तहसीलदार जी ने भी आज्ञा मांगी । महर्षि ने कहा - आपका कितना मधुर कंठ है ! कितने सुंदर प्रभुभक्ति के गीत गाते हो । इस नगर में तुम हीरे हो । हो तो हीरे , किन्तु कीचड़ में पड़े हो ।
हृदय उपदेशामृत से निर्मल हो गया था इन वचनों का ऐसा प्रभाव पड़ा की घर पहुंचकर शराब की बोतलें फेंक दी , वेश्याओं को निकाल दिया , जुआरियो को विदा किया ! जीवन पलट गया।
पत्नी को बुलाया और महर्षि के पास पहुंचे । ऋषिराज ! यह हीरा कीचड़ से निकलकर ऋषि चरणों में आ गया है , इसका उद्धार करें । यह कह ऋषि चरणों में गिर पड़े । अविरल अश्रुधारा से महर्षि के पावो का प्रक्षालन कर दिया । सर्व श्रोता भी अश्रुपूरित हो गए । महर्षि ने हृदय से लगा लिया ।
ये तहसीलदार महेता अमीचंद थे जिन्होंने महर्षि की कृपा से सत्संग में आकर अनेक प्रभू महिमा के गीतों की रचना कर प्रचार किया।
मेहता अमीचंद जेहलम (वर्तमान में पाकिस्तान) जिले के पहले आर्य प्रचारक बने।
उदाहरण के लिए -
1. तुम हो प्रभू चाँद मैं हूँ चकोर , तुम हो कमलफूल मैं रस का भौंरा
2. जय जय पिता परम आनंद दाता , जगदादि कारण मुक्तिप्रदाता
3.आओ मिल सब गीत गाओ उस प्रभु के धन्यवाद
या तो अपने आप को बदल लो नहीं तो
जबतक मूर्तिपूजा और जातिवाद रहेगा
ये बंटवारा और धर्म पऱिवर्तन नहीं रूकेगा
महर्षि दयानन्द ने हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाई परन्तु हिन्दुओं को हिन्दी बोलने में शर्म आती है
अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने में गर्व करते है
अंग्रेजी नाम पर फिल्मों पर गर्व करते है
रामायण,महाभारत पढ़ने का समय नहीं हैं
भागवत पुराण के अश्लीलता पूर्ण गीता को गर्व से पढ़के कृष्ण का उपहास उड़ाने में गर्व है
जब हम अपने महापुरूषों का अपमान करेंगे हमारी संतानों की उनपर श्रद्धा नहीं रहेगी
धर्म परिवर्तन होगा ही होगा जब हम निज भाषा, अपनी सांस्कृति का मजाक बनाएंगें तो हमारा पतन सर्वनाश से कोई नहीं बच पाएगा
अगर बचना है ……..
मूर्ति पूजा त्याग करना होगा जातिवाद को खत्म करना होगा
वर्ना संस्कृत और सांस्कृति सब खत्म हो जाएगा
आओ वेद की ओर लौटें
संघ का उद्देश्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है – डॉ. मोहन भागवत जी
नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि संघ किसी प्रतिक्रिया के स्वरूप में काम नहीं करता. संघ का उद्देश्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है, हिन्दुओं में शक्तिशाली संगठन बनना नहीं. सरसंघचालक जी तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग समारोप कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे. रेशिमबाग के मैदान पर आयोजित कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि कोलकाता के साप्ताहिक “वर्तमान” के संपादक रंतिदेव सेनगुप्त जी थे.
डॉ. मोहन जी भागवत ने कहा कि शोषण मुक्त, समतायुक्त समाज का निर्माण करने के लिए संघ काम कर रहा है. संघ के स्वयंसेवकों के व्यवहार एवं निस्वार्थ सामाजिक कार्य के कारण संघ की लोकप्रियता बढ़ रही है. समाज सेवा का काम करने वाले कार्यकर्ताओं में संघ भेद नहीं करता. जो संघ से संबंधित नहीं हैं, लेकिन निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करते हैं, ऐसे समाज सेवकों के सम्पर्क में भी संघ रहता है. आवश्यक हो तो उन्हें सहायता भी देता है. उन्होंने कहा कि इस देश में विविध संप्रदाय एवं रीति रिवाज हैं, लेकिन “हम भारतवासी है” यह भावना समान है — यह सिखाने की आवश्यकता नहीं है! इस देश की संस्कृति हम सब को जोड़ती है, यह प्राकृतिक सत्य है. हमारे संविधान में भी इस भावनात्मक एकता पर बल दिया गया है. हमारी मानसिकता इन्हीं मूल्यों से ओतप्रोत है.
उन्होंने कहा कि देश की एकात्मता का सूत्र इतना मजबूत होते हुये भी इतिहास में अलगाववादी ताकतों के शक्तिशाली होने के कारण देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा गया. इसे हमें भूलना नहीं चाहिये. हम इतिहास से सीख नहीं लेंगे तो देश की एकता एवं स्वतंत्रता के लिये खतरा निर्माण हो सकता है.
रंतिदेव सेनगुप्त जी ने कहा कि इस देश के सामाजिक विकास के लिए देश की संस्कृति, परम्परा एवं धर्म चिंतन पर आधारित, जाति-पाति तथा छुआछूत से परे, एक राष्ट्रवादी संगठन का निर्माण हो, यह स्वामी विवेकानंद का स्वप्न डॉ. हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर पूर्ण किया.
अपने भाषण में किसी संगठन का नाम लिए बिना उन्होंने राष्ट्रविरोधी अभियान चलाने वाली शक्तियों की आलोचना की. उन्होंने कहा भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ने वाले सुभाषचंद्र बोस के लिए अपशब्दों का प्रयोग करने वाली, भारत के टुकड़े कर कश्मीर, केरल, मणिपुर को भारत से तोड़ने की बातें करने वाली शक्तियाँ कभी सफल नही होंगी, लेकिन देशवासियों को इन शक्तियों से सावधान रहकर गुजरात से बंगाल तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक “भारत माता की जय” का घोष करना होगा.
मंच पर महानगर संघचालक राजेश जी लोया, वर्ग के सर्वाधिकारी वन्नीयराजन जी उपस्थित थे. प्रास्ताविक एवं आभार प्रदर्शन वर्ग कार्यवाह हरीश जी कुलकर्णी ने किया. शिक्षा वर्ग में 978 स्वयंसेवक शिक्षार्थियों ने भाग लिया. समारोपीय कार्यक्रम में शिक्षार्थियों ने योगासन तथा व्यायाम-योग प्रात्यैक्षिक प्रस्तुत किया. राष्ट्र सेविका समिति की संचालिका शांताक्का एवं अनेक गणमान्य नागरिक कार्यक्रम में उपस्थित थे.
सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत
काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी
स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’
ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)
प्रथम समुल्लास भाग (१३)
प्रश्न
महाराज इक संशय भारी,
यह शंका मम करो निवारी।
ग्रन्थारम्भ आपने कीना,
प्रथम मंगलाचरण न दीना।
ग्रन्थकार हौं देखे जेते,
मंगलचार लिखें सब तेते।
ग्रन्थ आदि मध्य रु अवसाने,
सब मँह मंगलाचरण लखाने।
उत्तर
मगङलाचरणं शिष्टाचारात् फल दर्शनाच्छुतितश्चेति। - सांख्य दर्शन। अ. ५। सू. १
सांख्य शास्त्र ने ऐसा गाया,
प्रथम सूत्र पंचम अध्याया।
उचित नहीं यह मंगलचारा,
भेड़ चाल सा यह व्यौहारा।
आदि मध्य अरु अन्त स्थाने,
मंगलचार उचित जो माने।
तो उनके जो मध्य ठिकाना,
उन मँह आदि मध्य अवसाना।
उन ठौरन मँह रहे अमंगल,
इन बातों से होय न मंगल।
सुनहु तात हौं तोहे समझाऊँ,
सांख्य शास्त्र का भाव बताऊँ।
सत्य न्याय अरु वेदनुकूला,
पक्षपात को कर निर्मूला।
प्रभु आज्ञा अनुकूलाचारा,
जो आचरहि सो मंगलचारा।
इस विश्व आदि अन्त परयन्ता,
लिखे ग्रंथ साँचा श्री मन्ता।
ऐसा मंगलाचरण कहावे,
जो जन लिखे सो सिद्धि पावे।
तैत्तिरेय ऋषि की यह बानी,
क्या सुन्दर उपयुक्त बखानी।
‘‘यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि’’ - तैत्तिरीयोपनिषत् प्र. ७। अनु. १६
सुनहु कर्म जो धर्मनुसारा,
नित्य करहु उनका व्यवहारा।
कबहुं अन्य करे नहीं काजा,
याते लगे धर्म को लाजा।
आज कल्ह के लिखने हारे,
वेद शास्त्र नहीं पढ़ें बेचारे।
आदौ गुरु गणेश कँह ध्यावहिं,
कोउ शिव राधाकृष्ण मनावहिं।
कोऊ सिमरें दुर्गा हनुमाना,
सरसुति सों चाहें कल्याना।
यह सब वेद शास्त्र विपरीते,
निष्फल सगरे फल ते रीते।
आर्ष ग्रंथ बहु हमने देखे,
ऐसे मंगलचार न पेखे।
‘अथ शब्दानुशासनम्’ अथेत्ययं शब्दोऽधिकारार्थः प्रयुज्यते, इति व्याकरण महाभाष्ये।
‘अथातो धर्मजिज्ञासा’ अथेत्यानन्तर्ये वेदाध्ययनानन्तरम् इति पूर्व मीमांसायाम्।
‘अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः’। अथेति धर्मकथनानन्तरं धर्मलक्षणं विशेषेण व्याख्यास्यामः - वैशेषिक दर्शने।
‘अथ योगानुशासनम्’। अर्थत्ययमधिकारार्थः - योग शास्त्रे।
‘अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृतिरत्यन्तपुरुषार्थः।’ सांसारिकविषयभोगानन्तरं त्रिविधदुःशात्यन्तनिवृत्यर्थः प्रयन्तः कर्त्तव्यः। - सांख्य शास्त्रे
‘अथातोब्रह्मजिज्ञासा’। चतुष्टयसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्म जिज्ञास्यम्। - इदं वेदान्त सूत्रम्।
‘ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत’। - इदं छान्दोग्योपनिषद्वचनम्
‘ओमित्येतदक्षरमिद सर्वं तस्योपव्याख्यानम्’। - इदं च माण्डूक्योपनिषद्वचनम्
यह आरम्भिक पद हैं सारे,
इनते अन्य ग्रंथ हैं न्यारे।
कहीं न देखा मंगलचारा,
यह आधुनिक मूढ़ व्यौहारा।
‘अथ’ अरु ओ३म् शब्द दो आए,
ग्रंथारम्भे मुनिन लगाए।
दोहा
‘ये त्रिषप्ता परियन्ति’, आदौ वाक्य सुहाय।
‘अग्नि’ ‘इट्’ अरु ‘अग्नि’ यह, चारहु वेद लखाय।।
गुरु गणपति आदिक कहुं नाँही,
वेदशास्त्र ग्रंथन के माँही।
‘हरि ओ३म्’ यह वाक्य प्रयोगा,
नहीं आदि में रखने योगा।
यह तांत्रिक पौराणिक रीति,
वेद विरुध यह निपट अनीति।
अथ अरु ओ३म् आदि मँह ध्यावहिं,
जो ध्यावहि निश्चय फल पावहिं।
।। इति श्री आर्य महाकवि जयगोपाल रचिते
सत्यार्थप्रकाशकवितामृते
प्रथमः समुल्लासः समाप्तः।।
⛳श्री गुरु अर्जुन देव जी को शहीदों का सरताज कहा जाता है।
⛳भारतीय दशगुरु परम्परा के पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई. को हुआ। प्रथम सितंबर, 1781 को अठारह वर्ष की आयु में वे गुरु गद्दी पर विराजित हुए। 30 मई, 1606 को उन्होंने धर्म व सत्य की रक्षा के लिए 43 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
⛳श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत के समय दिल्ली में मध्य एशिया के मुगल वंश के का राज जहाँगीर था और उन्हें राजकीय कोप का ही शिकार होना पड़ा। अकबर की संवत 1662 में हुई मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर गद्दी पर बैठा जो बहुत ही कट्टïर विचारों वाला था। अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहांगीरी’ में उसने स्पष्ट लिखा है कि वह गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ रहे प्रभाव से बहुत दुखी था।
⛳इसी दौरान जहांगीर का पुत्र खुसरो बगावत करके आगरा से पंजाब की ओर आ गया। जहांगीर को यह सूचना मिली थी कि गुरु अर्जुन देव जी ने खुसरो की मदद की है इसलिए उसने गुरु जी को गिरफ्तार करने के आदेश जारी कर दिए।
⛳बाबर ने तो श्री गुरु नानक गुरुजी को भी कारागार में रखा था। लेकिन श्री गुरु नानकदेव जी तो पूरे देश में घूम-घूम कर हताश हुई जाति में नई प्राण चेतना फूंक दी।जहांगीर के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर घरबार लूट लिया गया। इसके बाद गुरु जी ने शहीदी प्राप्त की। अनेक कष्ट झेलते हुए गुरु जी शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया।
⛳जहांगीर ने श्री गुरु अर्जुनदेव जी को मरवाने से पहले उन्हें अमानवीय यातानाएं दी। मसलन चार दिन तक भूखा रखा गया। ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरियां में उन्हें तपते रेत पर बिठाया गया। उसके बाद खौलते पानी में रखा गया। परन्तु श्री गुरु अर्जुनदेव जी ने एक बार भी उफ तक नहीं की और इसे परमात्मा का विधन मानकर स्वीकार किया।
⛳गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा’ के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। यासा के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया जहां गुरुजी का पावन शरीर रावी में आलोप हो गया। गुरु अर्जुनदेव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया।
🙏आप विनम्रता के पुंज थे। कभी भी आपने किसी को दुर्वचन नहीं बोले। गुरबाणी में आप फर्माते हैं :
‘तेरा कीता जातो नाही मैनो जोग कीतोई॥
मै निरगुणिआरे को गुण नाही आपे तरस पयोई॥
तरस पइया मिहरामत होई सतगुर साजण मिलया॥
नानक नाम मिलै ता जीवां तनु मनु थीवै हरिया॥’
🙏तपता तवा उनके शीतल स्वभाव के सामने सुखदाईबन गया। तपती रेत ने भी उनकी ज्ञाननिष्ठा भंग न कर पायी। गुरु जी ने प्रत्येक कष्ट हंसते-हंसते झेलकर यही अरदास की-
तेरा कीआ मीठा लागे॥ हरि नामु पदारथ नानक मांगे॥
⛳जहांगीर द्वारा श्री गुरु अर्जुनदेव जी को दिए गए अमानवीय अत्याचार और अन्त में उनकी मृत्यु जहांगीर की इसी योजना का हिस्सा था। श्री गुरु अर्जुनदेव जी जहांगीर की असली योजना के अनुसार ‘इस्लाम के अन्दर’ तो क्या आते, इसलिए उन्होंने विरोचित शहादत के मार्ग का चयन किया।
⛳इधर जहांगीर की आगे की तीसरी पीढ़ी या फिर मुगल वंश के बाबर की छठी पीढ़ी औरंगजेब तक पहुंची। उधर श्री गुरुनानकदेव जी की दसवीं पीढ़ी थी। श्री गुरु गोविन्द सिंह तक पहुंची। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ही श्री नानकदेव की दसवीं पीढ़ी ने मुगलवंश की नींव में डायनामाईट रख दिया और उसके नाश का इतिहास लिख दिया। संसार जानता है कि मुट्ठी भर मरजीवड़े सिंघ रूपी खालसा ने 700 साल पुराने विदेशी वंशजों को मुगल राज सहित सदा के लिए ठंडा कर दिया। 100 वर्ष बाद महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में भारत ने पुनः स्वतंत्राता की सांस ली। शेष तो कल का इतिहास है, लेकिन इस पूरे संघर्षकाल में पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत सदा सर्वदा सूर्य के ताप की तरह प्रखर रहेगी।
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WAHEGURU JI KA KHALSA !!
WAHEGURU JI KI FATEH !!
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*वेद वाणी*🌿🌿🌿🌿
*प्रातः जागने वाला प्रबुद्ध होता है ,उसे सब स्नेह करते है (ऋ० १/६५/५ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हे सोम ! तेरा सखा कभी दुखी नहीं होता (ऋ० १/९१ /८ )*
*अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो ( ऋ० १/९१/२२)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*प्रभु की संगति( उपासना ) से ह्मारी मति कल्याणी हो (ऋ० १/९४/१)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*दूर होकर भी वह बिजली की तरह समीप ही चमकता है ( ऋ० १/९४/७)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*सहनशील पुरुषार्थियो से द्वेषियो को प्रभु दूर कर देता है (ऋ० १/१००/३)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*विश्वनियन्ता इंद्र सदा हमारा ज्ञानदाता-उपदेशक होवे (ऋ० १/१००/१९)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मन्त्र ही सर्वत्र गुरु है (वेद व् विवेक से सब निर्णय लें) (ऋ० १/१४७/४)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*वह ईश्वर एक है ,सचमुच एक है (अथर्व० १३/४/२०)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हम सुने हुए वेदोपदेश के विरुद्ध आचरण न करे (अथर्व० १/१/४)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*दक्षिणा (सपत्रि दान )देने वाले मोक्ष सुख पाते है (ऋ० १/१२५/६)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*महान सौभाग्य के लिए पुरुषार्थ कर ( यजु० २७/२ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*वाणी,धन और शरीर से परोपकार करो (ऋ० २/२/१)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हम वैदिक मार्ग से पृथक न हो (ऋ० १०/५७/१)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मेरे घर में पवित्र कमाई हो (अथर्व० ७/११५/४)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*दुष्कर्म करनेवाले सत्य के मार्ग को नहीं तर सकते ( ऋ० ९/७३/६)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*कंजूस पीछे रह जाते है,दानी आगे बड़ जाता है (ऋ० १०/११७/७)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मित्र की सहायता न करने वाला मित्र नहीं होता (ऋ० १०/११७/४)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हम श्रेष्ठ सामर्थ्य प्राप्त करे (६/४७/१२)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*सत्य का मार्ग बड़ा सुगम है ( ऋ० ८/३१/१३ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*निरपराध की हत्या बडा भयंकर पाप है ( अथर्व० १०/१/२९ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*इस संसार में उदासीन मन से मत रहो ( अथर्व० ८/१/९)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*पापी को दुःख ही मिलता है ( अथर्व० १०/१/५)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*संतान को मर्यादा में रहना सिखाओ ( अथर्व० ६/८१/२ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मै चोरी का माल ना खाऊ (अथर्व० १४/१/५७)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मेरा ह्रदय संताप से रहित हो ( अथर्व० १६/३/६)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मै इन्द्रियों का स्वामी बनूँ ( साम० १८३५ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हम विद्वानों का संग करे ( ऋ० ५/५१/१५ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मै जो कुछ बोलूँ मीठा बोलूँ ( अथर्व० १२/१/५८)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हे शक्तिपुंज प्रभो! हम निडर बने ( ऋ० १/११/२)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*उस परमात्मा की मूर्ति नहीं है (यजु० ३२/३ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हे कर्मशील जीव ! तू ओउम का स्मरण कर (यजु० ४०/१५ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हे सर्वज्ञ प्रभो ! आप मेरे जीवन को पवित्र कीजिए ( यजु० १९/३९ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*जुआ मत खेलो ( ऋ० १०/३४/१३)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*वेदी को सजाओ (ऋ० १/१७०/४)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*कर्म न करने वाला दस्यु है ( ऋ० १०/२२/८)*
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*मनुष्य बनो और दिव्य संतानों को जन्म दो (ऋ० १०/५३/६)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*मनुष्य उस परमात्मा को जानकार ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है ( यजु० ३१/१८)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*अग्नि से अग्नि जलता है ( साम० ८४४ )*
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*समय रूपी घोडा दौड़ रहा है ( अथर्व० १९/५३/१)*
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*हे प्रभो ! मै तुझे कदापि न त्यागूँ ( अथर्व० १३/१/१२ )*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*क्रोध मत करो (अथर्व० ११/२/२०)*
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*बुरा करने वाले का बुरा होता है ( अथर्व १०/१/५)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*हजार हाथो से कमा और सैकड़ो हाथो से दान कर ( अथर्व० ३/२४/५)*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*पुत्र पिता का अनुवर्तन करने वाला हो (अथर्व ३/३०/२)*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
📕 *सत्यार्थ प्रकाश* 📕
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अनुभूमिका (2)
जब आर्यावर्त्तस्थ मनुष्यों में सत्याऽसत्य का यथावत् निर्णय करानेवाली वेदविद्या छूटकर अविद्या फैल के मतमतान्तर खड़े हुए, यही जैन आदि के विद्याविरुद्ध मतप्रचार का निमित्त हुआ। क्योंकि वाल्मीकीय और महाभारतादि में जैनियों का नाममात्र भी नहीं लिखा और जैनियों के ग्रन्थों में वाल्मीकीय और भारत में ‘राम’, कृष्णादि’ की गाथा बड़े विस्तारपूर्वक लिखी हैं! इस से यह सिद्ध होता है कि यह मत इनके पीछे चला क्योंकि जैसा अपने मत को बहुत प्राचीन जैनी लोग लिखते हैं वैसा होता तो वाल्मीकीय आदि ग्रन्थों में उनकी कथा अवश्य होती इसलिए जैनमत इन ग्रन्थों के पीछे चला है।
कोई कहे कि जैनियों के ग्रन्थों में से कथाओं को लेकर वाल्मीकीय आदि ग्रन्थ बने होंगे तो उन से पूछना चाहिए कि वाल्मीकीय आदि में तुम्हारे ग्रन्थों का नाम लेख भी क्यों नहीं? और तुम्हारे ग्रन्थों में क्यों है? क्या पिता के जन्म का दर्शन पुत्र कर सकता है? कभी नहीं। इस से यही सिद्ध होता है कि जैन बौद्ध मत। शैव शाक्तादि मतों के पीछे चला है।
अब इस 12 बारहवें समुल्लास में जो-जो जैनियों के मतविषयक में लिखा गया है सो-सो उनके ग्रन्थों के पते पूवक लिखा है। इस में जैनी लोगों को बुरा न मानना चाहिये क्योंकि जो-जो हम ने इन के मत विषय में लिखा है वह केवल सत्याऽसत्य के निर्णयार्थ है न कि विरोध वा हानि करने के अर्थ। इस लेख को जब जैनी बौद्ध वा अन्य लोग देखेंगे तब सब को सत्याऽसत्य के निर्णय में विचार और लेख करने का समय मिलेगा और बोध भी होगा। जब तक वादी प्रतिवादी होकर प्रीति से वाद वा लेख न किया जाय तब तक सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता।
जब विद्वान् लोगों में सत्याऽसत्य का निश्चय नहीं होता तभी अविद्वानों को महाअन्धकार में पड़कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ मित्रता से वाद वा लेख करना हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो।
और यह बौद्ध जैन मत का विषय विना इन के अन्य मत वालों को अपूर्व लाभ और बोध कराने वाला होगा क्योंकि ये लोग अपने पुस्तकों को किसी अन्य मत वाले को देखने, पढ़ने वा लिखने को भी नहीं देते। बड़े परिश्रम से मेरे और विशेष आर्यसमाज मुम्बई के मन्त्री ‘सेठ सेवकलाल कृष्णदास’ के पुरुषार्थ से ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं। तथा काशीस्थ ‘जैनप्रभाकर’ यन्त्रालय में छपने और मुम्बई में ‘प्रकरणरत्नाकर’ ग्रन्थ के छपने से भी सब लोगों को जैनियों का मत देखना सहज हुआ है।
भला यह किन विद्वानों की बात है कि अपने मत के पुस्तक आप ही देखना और दूसरों को न दिखलाना! इसी से विदित होता है कि इन ग्रन्थों के बनाने वालों को प्रथम ही शंका थी कि इन ग्रन्थों में असम्भव बातें हैं जो दूसरे मत वाले देखेंगे तो खण्डन करेंगे और हमारे मत वाले दूसरों का ग्रन्थ देखेंगे तो इस मत में श्रद्धा न रहेगी। अस्तु जो हो परन्तु बहुत मनुष्य ऐसे हैं जिन को अपने दोष तो नहीं दीखते किन्तु दूसरों के दोष देखने में अति उद्युक्त रहते हैं। यह न्याय की बात नहीं क्योंकि प्रथम अपने दोष देख निकाल के पश्चात् दूसरे के दोषों में दृष्टि देके निकालें! अब इन बौद्ध, जैनियों के मत का विषय सब सज्जनों के सम्मुख धरता हूं। जैसा है वैसा विचारें।
किमधिकलेखेन बुद्धिमद्वर्य्येषु।
*(अनुभूमिका(२):सत्यार्थप्रकश)*
—– *स्वामी दयानन्द सरस्वती*
महर्षि दयानन्द सरस्वती एक ऐसे ब्रह्मास्त्र थे जिन्हे कोई भी पंडित,पादरी,मोलवी, अघंर, ओझा, तान्त्रिक हरा नहीं पाया और न ही उन पर अपना कोई मंत्र तंत्र या किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव छोड़ पाया
*एक ऐसा वेद का ज्ञाता जिसने सम्पूर्ण भारत वर्ष में ही नहीं अपितु पूरी दुनियां में वेद का डंका बजाया था.
* एक ऐसा ईश्वर भक्त, जिसने ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अपना घर त्याग ही कर दिया,
* एक ऐसा महान व्यक्ति जिसने लाखों की संपत्ति को ठोकर मार दी पर सत्य के राह से विचलित नही हुआ
* एक ऐसा दानी जिसने अपने गुरु दक्षिणा मे अपना सम्पूर्ण जीवन ही दान दे दिया…
* एक ऐसा क्रान्तिकारी जिसने सबसे पहले आजादी का बिगुल फूकँ न जाने कितने लोगो के अन्दर क्रान्ति की भावना को पोषित किया…
* एक ऐसा स्वदेश भक्त जिसने सबसे पहले स्वदेशीय राज्य को सर्वोपरी कहाँ और अंग्रेजो के सामने ही उनका राज्य समस्त विश्वसे नष्ट होने की बात कही
* एक ऐसा स्वदेशी रक्षक जिसने सबसे पहले स्वदेशीय राज्य को सर्वोपरी कहा ….
* एक ऐसा गौरक्षक व गौ प्रेमी जिसने सबसे पहले गौ रक्षा हेतू गौरक्षणी सभा बनाई व इसके नियमो का प्रतिपादन किया ..
* एक ऐसा निडर व्यक्ति जिसने निर्भीक होकर समाज की कुप्रथाओ, कुरितीयो पर प्रहार किया
* एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी भी सत्य से समझौता नही किया
* एक ऐसा धर्म धुरंधर जो केवल वेद का ही नही अपितु कुरान, पुराण, बाईबिल, त्रिपिटिक, व अन्य मजहबी व मंत मतान्नतरो वालो के ग्रन्थो का ज्ञान था
* एक ऐसा सत्य का पुजारी का जो अपनी हर बात डंके की चोट पर कहता था* एक ऐसा धर्म धुरन्धर जिसने सभी पाखंडो का खंडन कर सत्य का राह दिखाया….
* एक ऐसा धर्म धुरंधर जिसने इस देश का धर्मान्तरण ( ईसाईयत व ईस्लामीकरण ) होने के केवल रोका ही नही वरन् शुद्धि व घर वापसी द्वारा देश का धर्मान्तरण होने से रोका
मुझे गर्व है
हम उस महापुरुष के अनुयायी है।
हम ऐसे ऋषि के कार्यकर्ता बने
🌺 *और लो, यह गोली किसने मारी?*🌺
अब तो चरित्र का नाश करने के नये-नये साधन निकल आये
हैं।
कोई समय था जब स्वांगी गाँव-गाँव जाकर अश्लील गाने
सुनाकर भद्दे स्वांग बनाकर ग्रामीण युवकों को पथ-भ्रष्ट किया करते थे। ऐसे ही कुछ माने हुए स्वांगी किरठल उज़रप्रदेश में आ गये।
उन्हें कई भद्र पुरुषों ने रोका कि आप यहाँ स्वांग न करें। यहाँ हम नहीं चाहते कि हमारे ग्राम के लड़के बिगड़ जाएँ, परन्तु वे न माने।
कुछ ऐसे वैसे लोग अपने सहयोगी बना लिये। रात्रि को ग्राम के एक ओर स्वांग रखा गया। बहुत लोग आसपास के ग्रामों से भी आये। जब स्वांग जमने लगा तो एकदम एक गोली की आवाज़
आई। भगदड़ मच गई।
स्वांगियों का मुख्य कलाकार वहीं मञ्च पर गोली लगते ही ढेर हो गया। लाख यत्न किया गया कि पता
चल सके कि गोली किसने मारी और कहाँ से किधर से गोली आई है, परन्तु पता नहीं लग सका। ऐसा लगता था कि किसी सधे हुए योद्धा ने यह गोली मारी है।
जानते हैं आप कि यह यौद्धा कौन था? यह रणबांकुरा
आर्य-जगत् का सुप्रसिद्ध सेनानी *पण्डित जगदेवसिंह सिद्धान्ती* था। तब सिद्धान्तीजी किरठल गुरुकुल के आचार्य थे।
आर्यवीरों ने पाप ताप से लोहा लेते हुए साहसिक कार्य किये हैं।
आज तो चरित्र का उपासक यह हमारा देश धन के लोभ में अपना
तप-तेज ही खो चुका है।
(:-प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु)
ओ३म्!
यम, नियम, आसन. प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि - योग के आठ अंग हैं, इनका पालन किये बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता, यह अष्टांग योग केवल योगियों के लिए ही नहीं, अपितु जो भी व्यक्ति पूर्ण सुखी होना चाहता है तथा प्राणिमात्र को सुखी देखना चाहता है, उन सब के लिये अष्टांग योग का पालन अनिवार्य है
चैटिगँ छोडकर इस पोस्ट को जरूर पढेँ वर्ना सारी जिन्दगी चैट ही करते रह जाओग…
1378 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है इरान.
1761 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है अफगानिस्तान.
1947 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है पाकिस्तान.
1971 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम हैँ बांग्लादेश.
1952 से 1990 के बीच भारत का एक राज्य इस्लामिक हो गया - नाम है कशमीर…
और अब उत्तरप्रदेश, आसाम और केरला इस्लामिक राज्य बनने की कगार पर है !
और हम जब भी हिँदुओँ को जगाने की बात करते हैँ, सच्चाई बताते हैँ तो कुछ लोग हमेँ RSS, VHP और SHIV-SENA, BJP वाला कहकर पल्ला झाङ लेते हैँ !
1 मिनट चैटिगँ छोडकर इस पोस्ट को जरूर.
पढेँ
भारत में मुसलमान कौन है
मैसेज का आखिरी हिस्सा ज़रूर पढें तभी पूरा मतलब समझ आयेगा
😡🚩धर्म के नाम पर भारत के टुकड़े किये जिसने -
वों जिन्नाह मुसलमान था |
😡🚩करोडो हिंदुओ का खून बहाया जिसने -
वों हर सुल्तान मुसलमान था ||
😡🚩हिंदुओ से जबरन इस्लाम कबुल करवाया जिसने -
वों अरब मुसलमान था |
😡🚩राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायीं जिसने -
वों बाबर मुसलमान था ||
😡🚩गुरु तेग बहादुर का सर कलम किया जिसने-
वों औरंगजेब मुसलमान था |
😡🚩कश्मीर में पंडितो का नरसंहार किया जिसने -
वों हर आतंकी मुसलमान था ||
😡🚩मुंबई में बम धमाके करवाए जिसने -
वों दाउद मुसलमान था |
😡🚩भारत में घुसे 5 करोड जाहिलो में -
हर बांग्लादेशी मुसलमान था ||
😡🚩बुद्ध महावीर कि मुर्तिया तोड़ी जिसने -
वों हर दंगाई मुसलमान था |
😡🚩भारत के संसद पर हमला किया जिसने-
वों अफजल मुसलमान था ||
😡🚩गोधरा में कारसेवको कों जिन्दा जलाया जिसने -
वों हर जेहादी मुसलमान था |
😡🚩पाकिस्तान, असम से हिंदुओ को खदेड़ा जिसने -
वों हर शख्स मुसलमान था ||
😡🚩26/11 कों हिंदुओ कों गोलियों से भुना जिसने -
वों कसाब मुसलमान था |
😡🚩अमरनाथ यात्रा पर पाबंदी कि मांग कि है जिसने -
वों गिलानी मुसलमान था ||
😡🚩अमरनाथ यात्रियों पे जजिया लगाया है जिसने -
वों मंत्री मुसलमान था |
😡🚩100 करोड हिंदुओ कों काटने कि कसम खायी है जिसने
-
वों ओवैसी भी मुसलमान हे ||
इसमें आगे की पंक्तिया …………………..
>>>>>>>>>
👹जो गाय काट के खाता हैं -
वो हर शख्स मुस्लमान हैं |
👹वो वन्देमातरम नहीं गाता -
वो हर शक्श मुस्लमान हैं ||
👹कश्मीर में भारत मुर्दाबाद बोलता हैं -
वो शक्श मुस्लमान हैं |
👹हैदराबाद में तिरंगा जलाने वाला -
हर शक्श मुस्लमान हैं ||
👹जो लव जिहाद करता हैं -
वो हर शक्श मुस्लमान हैं |
👹जो देश बर्बाद करने की सोचने वाली -
कांग्रेस सरकार का हर हाथ मुसलमान है!!!!
👹जो यह मॅसेज फाॅर्वड नही करता
वो हर शक्श मुसलमान हो ।
👹मुसलमानो को करारा जवाब है हर हिन्दु को शेयर करना चाहिये!!!
😡🚩😠🚩😡आज पता चलेगा कितने हिन्दु एक हो गये है!!!!
🇮🇳🚩vande mantaram🚩🇮🇳
मु - मुलायम
स - सोनिया
ल - लालू
मा - ममता
न - नीतिश
जागो…हिन्दु…..जागो…..
🚩🚩🚩🚩भारत माता की जय 🚩🚩🙏🙏🙏
*🌷गुणों के धनी-श्रीकृष्ण🌷*
*दुर्योधन-*यह मैं अच्छी प्रकार जानता हूं कि तीनों लोकों में इस समय यदि कोई सर्वाधिक पूज्य व्यक्ति है तो वह विशाल-लोचन श्रीकृष्ण हैं।-(महाभारत उद्योगपर्व ८८/५)
*धृतराष्ट्र-*श्रीकृष्ण अपने यौवन में कभी पराजित नहीं हुए।उनमें इतने विशिष्ट गुण हैं कि उनकी परिगणना करना सम्भव नहीं है।-(महा० द्रोणपर्व १८)
*भीष्म पितामह-*श्रीकृष्ण द्विजातीयों में ज्ञानवृद्ध तथा क्षत्रियों में सर्वाधिक बलशाली हैं।पूजा के ये दो ही मुख्य कारण होते हैं जो दोनों श्रीकृष्ण में विद्यमान हैं।वे वेद-वेदांग के अद्वितीय पण्डित तथा बल में सबसे अधिक हैं।दान,दया,बुद्धि,शूरता,शालीनता,चतुराई,नम्रता,तेजस्विता,धैर्य,सन्तोष-इन गुणों में केशव से अधिक और कौन है ?-(महा० सभा० ३८/१८-२०)
*वेदव्यास-*श्रीकृष्ण इस समय मनुष्यों में सबसे बड़े धर्मात्मा,धैर्यवान् तथा विद्वान् हैं।-(महा० उद्योग० अध्याय ८३)
*अर्जुन-*हे मधुसूदन ! आप गुणों के कारण ‘दाशार्ह’ हैं।आपके स्वभाव में क्रोध,मात्सर्य,झूठ,निर्दयता एवं कठोरतादि दोषों का अभाव है।-(महा० वनपर्व० १२/३६)
*युधिष्ठिर-*हे यदुवंशियों में सिंहतुल्य पराक्रमी श्रीकृष्ण ! हमें जो यह पैतृक राज्य फिर प्राप्त हो गया है यह सब आपकी कृपा,अद्भुत राजनीति,अतुलनीय बल,लोकोत्तर बुद्धि-कौशल तथा पराक्रम का फल है।इसलिए हे शत्रुओं का दमन करने वाले कमलनेत्र श्रीकृष्ण ! आपको हम बार-बार नमस्कार करते हैं।-(महा० शान्तिपर्व ४३)
*बंकिमचन्द्र-*उनके(श्रीकृष्ण)-जैसा सर्वगुणान्वित और सर्वपापरहित आदर्श चरित्र और कहीं नहीं है,न किसी देश के इतिहास में और न किसी काल में।-(कृष्णचरित्र)
*चमूपति-*हमारा अर्घ्य उस श्रीकृष्ण को है,जिसने युधिष्ठिर के अश्वमेध में अर्घ्य स्वीकार नहीं किया।साम्राज्य की स्थापना फिर से कर दी,परन्तु उससे निर्लेप,निस्संग रहा है।यही वस्तुतः योगेश्वर श्रीकृष्ण का योग है।-(योगेश्वर कृष्ण,पृष्ठ ३५२)
*स्वामी दयानन्द-*देखो ! श्रीकृष्णजी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है।उनका गुण-कर्म-स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है,जिसमें कोई अधर्म का आचरण श्रीकृष्ण जी ने जन्म से लेकर मरण-पर्यन्त बुरा काम कुछ भी किया हो,ऐसा नहीं लिखा।
*लाला लाजपत राय ने अपने श्रीकृष्णचरित में श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में एक बड़ी विचारणीय बात लिखी है-“संसार में महापुरुषों पर उनके विरोधियों ने अत्याचार किये,परन्तु श्रीकृष्ण एक ऐसे महापुरुष हैं जिन पर उनके भक्तों ने ही बड़े लांछन लगाये हैं।श्रीकृष्णजी भक्तों के अत्याचार के शिकार हुए हैं व हो रहे हैं।"आज श्रीकृष्ण के नाम पर 'बालयोगेश्वर’ 'हरे कृष्ण हरे राम’ सम्प्रदाय,राधावल्लभ मत और न जाने कितने-कितने अवतारों और सम्प्रदायों का जाल बिछा है,जिसमें श्रीकृष्ण को भागवत के आधार पर 'चौरजार-शिखामणि’ और न जाने कितने ही 'विभूषणों’ से अलंकृत करके उनके पावन-चरित्र को दूषित करने का प्रयत्न किया है।कहाँ महाभारत में शिशुपाल-जैसा उनका प्रबल विरोधी,परन्तु वह भी उनके चरित्र के सम्बन्ध में एक भी दोष नहीं लगा सका और कहाँ आज के कृष्णभक्त जिन्होंने कोई भी ऐसा दोष नहीं छोड़ा जिसे कृष्ण के मत्थे न मढ़ा हो! क्या ऐसे 'दोषपूर्ण’ कृष्ण किसी भी जाति,समाज या राष्ट्र के आदर्श हो सकते हैं?*
ॐयोगे योगे तवस्तरम् वाजे वाजे हवामहे सखाय इंद्र मूतये|| हे प्रभु तुमसे वर यह पावें , योगाभ्यासी बन तुझे ध्यावें |वीर और बलवान बनें हम , सुंदर और गुणवान बनें हम| बनें मित्र सब जग हो अपना, रक्षक प्रभु रक्षा जग करना| करें समर्पण तेरा तुझको , विमल बना प्रभु सवको हमको|| ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~👏 हे परम् ऐश्वर्यवान प्रभु देव हमें योगाभ्यासी बलवान गुणवान तथा सुंदर बनाइये जिससे सबका मित्र बन रक्षा करते हुए तुझ जन्म जन्मांतर के महान परम् सखा( सर्व रक्षक ) को प्राप्त कर सकूं ||शुभ संध्या 🌞आओ करें वैदिक संध्या🕉🕉🕉
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏अथर्ववेद दूसरा काण्ड.२७वां प्रपाठक चतुर्थ सुक्त.छठवां मन्त्र~~~~~~~~~~~मन्त्र का पद्य में भाव~~~~~~~~~~~~~ जो गौ माँ को करे प्रताड़ित, कानों को जो देवे कष्ट| सुनकर गौ का रुदन प्रभुजी , छीन कर धन कर देते नष्ट| ऐसी गौ माँ देवी पर, जिसको न तनिक भी लज्जा आत| मानों देवों पर ही पापी, करता है निज का आघात | आओ हम गोपालक बनकर , गौ माता के प्राण बचावें | जो हम सबकी नींव रीढ़ है, सेवा कर निज कर्ज चुकावें|| ~|~~~~~~~~~~~👏हे प्रभु हमें शक्ति और गौभक्ति प्रदान करो जिससे गौ माता की महिमा समझकर उसके प्राणों की रक्षा कर सकें
🛠पंचगव्य उत्पाद बनाने के यंत्र, मशीन, सांचा आदि - -
1. साबुन का सांचा = 550
2. धूप बत्ती की डाइ =350
3. हवन समिधा की डाइ = 650
4. गौअर्क बनाने का पूरा यंत्र (10 ली.- 9000 Rs. Boiler type) ( 5 ली. - 4000 Rs. Vessel type)
5. उपले बनाने का मोल्ड =700
6. नस्य औषधि तैयार करने का सूर्यउर्जा आधारित यंत्र = 2000
सम्पर्क करें - 9718505558
मन सपिॅत, तन सपिॅत और
यह जीवन सपिॅत,
चाहता हूँ मातृ -भू, तुझको
अभी कुछ और भी दू।
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा फिर भी निवेदन,
थाल में लाऊ सजाकर जान को जब,
स्वीकार कर लेना दया कर यह समपॅण,
गान अपिॅत, प्राण अपिॅत,
रक्त का कण-कण सपिॅत।।
आज का सुविचार (13 जून 2016, सोमवार, आषाढ़ शुक्ल ९)
मूर्तिपूजा से हानियां..(1)
साकार में मन स्थिर कभी नहीं हो सकता। क्योंकि उसको मन झट ग्रहण करके उसी के एकेक अवयव में घूमता और दूसरे में दौड़ जाता है। और निराकार परमात्मा के ग्रहण में यावत्सामर्थ्य मन अत्यन्त दौड़ता तो भी अन्त नहीं पाता। निरवयव होने से चंचल भी नहीं रहता, किन्तु उसी के गुण-कर्म-स्वभाव का विचार करता करता आनन्द में मग्न होकर स्थिर हो जाता है। (~महर्षि दयानन्द सरस्वती)
सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत
काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी
स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’
ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)
प्रथम समुल्लास भाग (१२)
द्वैत भाव प्रभु में नहीं आवे,
ताँते वह ‘अद्वैत’ कहावे।
वह कैवल्य रूप एकाकी,
कहूं द्विता दीखे नहीं ताकी।
नाँहीं उसका कोई सजाति,
नाँहीं कोई अन्य विजाति।
सत रज तम गुण जिसमें नाँहीं,
रागादिक नांहीं प्रभु माँहीं।
ताँते निर्गुण प्रभु को कहिये,
निर्गुण प्रभु पूजे सुख लहिये।
सर्वज्ञादिक गुण हैं जेते,
पारब्रह्म में हैं सब तेते।
गुण होने ते सगुण कहावे,
तरे भक्त वाके गुण गावे।
जीव रु जग गुण प्रभु में नाहीं,
एही हेत वे निर्गुण कहाहीं।
सर्वज्ञादिक बहु गुण वाके,
इह विध सगुण रूप भी ताके।
ओत प्रोत व्यापक जग माँही,
वाते रिक्त नहीं कोऊ ठाहीं।
मन के अन्दर मन का स्वामी,
वाकी संज्ञा अन्तरयामी।
होय धर्म सों जासु प्रकासा,
पाप रहित सद्धर्म निवासा।
धर्म करे धर्महिं प्रगटावे,
धर्मराज सो ‘ईश’ कहावे।
‘यमु’ धातु सों यम पद सिद्धि,
दण्ड क्रिया वाकी परसिद्धि।
पाप पुण्य के फल का दाता,
न्याय डोर यम कर मँह धाता।
भज् धातु से है भगवाना,
सुख दाता संपति की खाना।
भजन योग्य स्वामी भगवन्ता,
नवनिधि दाता ईश अनन्ता।
‘मन’ ‘ज्ञाने’ ‘मनु’ पद की रचना,
करहिं ऋषि मुनि शब्द प्रवचना।
ज्ञान शील अरु मानन लायक,
सो ‘मनु’ परमेश्वर सुखदायक।
पूर रहा जड़ चेतन माँही,
कोउ ठौर वा के बिनु नाहीं।
एहि कारण प्रभु ‘पुरुष’ कहावे,
सकल विश्व मँह स्वयं समावे।
‘डुकृ९ा्’ धारण पोषण अर्था,
सबको पालहि सकल समर्था।
‘कल’ संख्याने रचिये ‘काला’,
सबकी गणना करने वाला।
‘शिष्लृ’ सों निर्मित पद ‘शेषा’,
रहे शेष प्रभु नशहि अशेषा।
‘आप्लृ’ व्यातौ ‘आप्त’ बनाया,
पारब्रह्म प्रभु आप्त कहाया।
सत उपदेशक विद्या पूरन,
निश्चल छल को करता चूरन।
जाको केवल धर्मी पावे,
सो परमेश्वर ‘आप्त’ कहावे।
‘शम्’ पूरव मँह ‘डुकृ९ा्’ करणे,
शंकर पोत अवर्णव तरणे।
शंकर प्रभु कल्याण का दाता,
भज शंकर सब जग का नाता।
‘देव’ शब्द के महत् सुपूरव,
महादेव पद रच्यौ अपूरव।
दोहा
पूजहू नर महाँदेव कहँ, सब देवन की देव।
चोर पदारथ पाइगो, करहु जो वाकी सेव।।
चौपाई
‘प्रीञ्’ अर्थ कान्ति अरु तर्पण,
‘प्रिय’ प्रभु के मन करहु समर्पण।
‘प्रिय’ परमेश्वर सब को प्यारा,
धर्मी जन मन रंजन हारा।
‘स्वयं’ पूर्व ‘भू’ ‘सत्ता’ अर्था,
प्रभु स्वयम्भू सकल समर्था।
आपहि आप स्वयम्भू होवे,
वाको बीज नहीं कोऊ बोवे।
जग का कारण स्वयं अकारण,
सब ब्रह्माण्ड करत वह धारण।
‘कु’ धातु ‘कवि’ पद निर्माता,
चतुर्वेद ‘कवि’ ईश विधाता।
सब विद्याओं का उपदेशक,
सकल ज्ञान का है निर्देशक।
‘शिव’ पद ‘शिवु’ धातु कल्याणे,
शिव कल्याणी सब कोई माने।
शिव का जिसने सिमरन कीना,
मोक्ष धाम उसको प्रभु दीना।
नाम शतक हौं किया बखाना,
इन ते भिन्न नाम हैं नाना।
पारब्रह्म के नाम अनन्ता,
तुच्छ जीव पावे नहीं अन्ता।
गुण अनन्त कोउ अन्त न आवे,
कहां कीट सागर थाह पावे।
कर्म स्वभाव भाव हैं नाना,
हैं अनन्त नामी भगवाना।
वेद शास्त्र पढ़िये हो ज्ञाना,
नाम अनन्त किये विख्याना।
जो वेदों के जानन हारे,
जानें वही पदारथ सारे।
ऐसी उत्तम और विराट तथा बारीक़ से बारीक़ काल गणना हमारे सनातन शास्त्रों के अतिरिक्त कहीं नहीं है |
आइये कुछ नया जानें :
क्रति = सैकन्ड का 34000वाँ भाग
1 त्रुति = सैकन्ड का 300वाँ भाग
2 त्रुति = 1 लव
1 लव = 1 क्षण
30 क्षण = 1 विपल
60 विपल = 1 पल
60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट )
2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा)
24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार)
7 दिवस = 1 सप्ताह
4 सप्ताह = 1 माह
2 माह = 1 ऋतु
6 ऋतु = 1 वर्ष
100 वर्ष = 1 शताब्दी
10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी
432 सहस्राब्दी = 1 युग
2 युग = 1 द्वापर युग
3 युग = 1 त्रेता युग
4 युग = सतयुग
1 महायुग = सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग
76 महायुग = मनवन्तर
1000 महायुग = 1 कल्प
1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ)
1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प (देवों का अन्त और जन्म)
1 महाकाल = 730 कल्प
(ब्रह्मा का अन्त और जन्म)
तनिक ध्यान दीजिये।
हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।
ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते |
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है।
जो हमारे देश भारत में बना।
ये हमारा भारत है जिस पर हमको गर्व है।🚩🚩🚩
आज का सुविचार (8 अप्रैल 2016, शुक्रवार, वैशाख शुक्ल प्रतिपदा)
ब्राह्मण पुस्तकों में बहुत से ऋषि-महर्षि और राजा आदि के इतिहास लिखे हैं। और इतिहास जिसका हो उसके जन्म के पश्चात् लिखा जाता है। वह ग्रन्थ भी उसके जन्म के पश्चात् होता है। वेदों में किसी का इतिहास नहीं, किन्तु जिस-जिस शब्द से विद्या का बोध होवे उस-उस शब्द का प्रयोग किया है। किसी विशेष मनुष्य की संज्ञा वा विशेष कथा का प्रसंग वेदों में नहीं है। (~महर्षि दयानन्द सरस्वती)