Saturday, June 10, 2017

क्रान्‍ति‍कारी लेखक सुधीर वि‍द्यार्थी का आलेख- 1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की...

क्रान्‍ति‍कारी लेखक सुधीर वि‍द्यार्थी का आलेख-

1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की वस्तु न बनाया जाये। यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का बिन्‍दु बनने से बहुत पहले भगतसिंह लोक के बीच नायकत्व हासिल कर चुके थे। उन पर सर्वाधिक लोकगीत रचे और गाये गये। मुझे खूब याद पड़ता है कि अपनी किशोरावस्था में गाँवों में मेलों और हाटों में पान की दुकानों पर आइने के दोनों तरफ और ट्रकों के दरवाजों पर भगतसिंह की हैट वाली तथा चन्द्रशेखर आजाद की मूँछ पर हाथ रखे फोटुएं हुआ करती थीं। शुरुआत में जनसंघ के लोगों ने भी उन्हें इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए बम फेंकने वाले एक बहादुर नौजवान, जो हँसते हुए फाँसी का फंदा चूमता है, के रूप में जिन्‍दा बनाये रखा। प्रगतिशीलों के विमर्श में तो वे बहुत देर से आये। जानना यह होगा कि भगतसिंह या आजाद की जगह लोक के मध्य है। वहीं से दूसरा भगतसिंह पैदा होगा, अकादमीशियनों के बीच से नहीं।

2. इस समय को पहचानिए कि जहाँ बिग बी के साथ भोजन करने की नीलामी दस लाख रुपये तक पहुँच रही हो, जिस समाज में मुन्नी बदनाम होती है तो फिल्म हिट हो जाती है यानी बदनाम होने में अब फायदा है सो इसे हम बदनाम युग की संज्ञा दे सकते हैं, कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ पग-पग पर हमें गुलाम होने का अहसास कराया जाता हो और हम गुलाम रहकर खुशी का अनुभव भी कर रहे हों; इसी कॉमनवेल्थ का तो कवि शंकर शैलेंद्र ने अपने मशहूर गीत ‘भगतसिंह से’ में विरोध किया था जिसमें कहा गया था- मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से/ रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से। कामनवेल्थ कुटुंब देश का खींच रहा है मंतर से/प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अंबर से) तो ऐसे निकृष्ट संस्कृति विरोधी और इतिहास विरोधी समय में हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि भगतसिंह को याद करने अर्थ केवल एक समारोह अथवा प्रदर्शनप्रियता में तब्दील होकर न रह जाये। मैं मानता हूँ कि भगतसिंह को सेमिनारों और जेएनयू मार्का विश्‍वविद्यालयी चर्चाओं से बाहर निकाल कर उन्हें जनता के मध्य ले जाने की पहल करने का उपयुक्त समय भी यही है।

3. मेरा निवेदन है कि भगतसिंह को कृपया देवत्व न सौंपें और न उन्हें क्रान्‍ति‍ का आदिपुरुष बनायें। भगतसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे, अपितु उनके व्यक्तित्व में संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास बोल रहा है। सत्तर साल लम्‍बे क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन ने भगतसिंह को पैदा किया। भगत सिंह उस आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने वाले एक व्यक्ति ही थे। वे स्वयं विकास की प्रक्रिया में थे। कल्पना करिए कि यदि भगतसिंह की जेल में लिखीं चार पुस्तकें गायब न हो गई होतीं तब उनके चिंतन और बौद्धिक क्षमताओं का कितना बड़ा आयाम हमारे सम्मुख प्रकट हुआ होता। दूसरे यह कि आगे चलकर भारतीय क्रान्‍ति‍ के मार्ग पर उन्हें और भी बौद्धिक ऊँचाई हासिल करनी थी। पर इस सबको लेकर उनके मन में कोई गर्वोक्ति नहीं थी,बल्कि एक विनीत भाव से उन्होंने स्वयं सुखदेव को संबोधित करते हुए कहा था कि क्या तुम यह समझते हो कि क्रान्‍ति‍ का यह उद्यम मैंने और तुमने किया है। यह तो होना ही था। हम और तुम सिर्फ समय और परिस्थितियों की उपज हैं। हम न होते तो इसे कोई दूसरा करता। और कितना आत्मतोष था उस व्यक्ति के भीतर जिसने बलिदान से पूर्व यह भी कहा कि आज मैं जेल की चहारदीवारी के भीतर बैठकर खेतों, खलिहानों और सड़कों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो लगता है कि मुझे अपनी जिन्‍दगी की कीमत मिल गई। ….और फिर साढ़े तेईस साल की इस छोटी सी जिन्‍दगी का इससे बड़ा मोल हो भी क्या सकता था।

4. आवश्यक तौर पर देखा यह भी जाना चाहिए कि भगतसिंह के साथ पूरी क्रान्‍ति‍कारी पार्टी थी। हम पार्टी और संपूर्ण आंदोलन को क्यों विस्मृत कर जाते हैं। हम यह क्यों नहीं याद रखते कि भगत सिंह के साथ चन्द्रशेखर आजाद का सर्वाधिक क्षमतावान और शौर्यमय नेतृत्व था। क्या भारतीय क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन का मस्तिष्क कहे जाने वाले कामरेड भगवतीचरण वोहरा पार्टी के कम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने बम का दर्शन जैसा तर्कपूर्ण और बौद्धिक प्रत्युत्तर देने वाला पर्चा ही नहीं लिखा, बल्कि नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र आदि उन्होंने लिपिबद्ध किये। हमने विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें दल में अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, को भी हमने भुलाने योग्य मान लिया। यह सच है कि हम विजय दा से भगतसिंह की एक फुललेन्थ की जीवनी की अपेक्षा कर रहे थे जो उनेक जीवित रहते पूरी नहीं हो पाई। पर मेरा यहाँ जोर देकर कहना यह है कि हमने बटुकेश्‍वर दत्त से लेकर सुशीला दीदी, धन्वंतरि, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य मास्टर रुद्रनारायण सिंह आदि सबको भुलाने देने में पूरी तरह निर्लज्जता का परिचय दिया। हमने इनमें से किसी की शताब्दी नहीं मनाई। यह सब स्वतंत्र भारत में जीवित रहे पर हमने इनमें से किसी क्रान्‍ति‍कारी की खैर खबर नहीं ली। क्या पूरी पार्टी और उसके सदस्यों के योगदान और अभियानों को विस्मृत करके अपनी समारोहप्रियताओं के चलते भगतसिंह को हम उस तरह का तो नहीं बना दे रहे हैं- उतना ऊँचा और विशाल, जिसकी तस्वीर को फिर अपने हाथों से छूना मुश्किल हो जाये हमारे लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी आत्ममुग्धताओं में ही डूबे यह सब देख समझ ही न पा रहे हों। इससे भविष्य के क्रान्‍ति‍कारी संग्राम को बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे।

5. भगतसिंह के स्मरण के साथ एक खतरा यह भी है कि पिछले कुछेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि उन्हें पगड़ी पहनाने का षड्यन्त्र बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। पर पंजाब के उस क्रान्‍ति‍कारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो गया कि अब उस पर कोई पगड़ी नहीं पहनाई जा सकती है। हम वैसा भ्रम भले ही थोड़ी देर को अपने भीतर पाल लें। यद्यपि शताब्दी वर्ष पर तो यह खुलेआम बहुत बेशर्मी के साथ संपन्न हुआ। देखा जाये तो हुआ पहले भी था जब मैं पंजाब के मुख्यमंत्री श्री दरबारा सिंह के आमंत्राण पर 1982 में चण्डीगढ़ में उनसे मिलने आया तो देखा कि उनके कार्यालय में भगतसिंह का जो चित्र लगा है उसमें उन्हें पगड़ी पहनाई गई है। अब विडंबना देखिए कि कोई आज उस पगड़ी को केसरिया रंग रहा है तो कोई लाल। इसमें आरएसएस से लेकर हमारे प्रगतिशील मित्र तक किसी तरह पीछे नहीं हैं। एक सर्वथा धर्मनिरपेक्ष क्रान्‍ति‍कारी शहीद को धर्म के खाँचे में फिट किये जाने की कोशिशों से सवधान रहना चाहिए। यहाँ अपनी बात कहने का हमारा अर्थ यह भी है कि सब भगतसिंह को अपने अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहे हैं। कोई कहता हे कि वे जिन्‍दा होते तो नक्सलवादी होते। उनके परिवार के ही एक सदस्य पिछले दिनों उन्हें आस्तिक साबित करने की असफल कोशिशें करते रहे। यह कह कर कि भगतसिंह की जेल नोटबुक में किसी के दो शेर लिखे हुए हैं जिनमें परवरदिगार जैसे शब्द आए हैं जो उनकी आस्तिकता को प्रमाणित करते हैं। सर्वाधिक तर्कहीन ऐसे वक्तव्यों की हमें निंदा ही नहीं, अपितु इसका विरोध करना चाहिए। यादविन्दर जी को भगतसिंह का लिखा ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा आलेख आँखें खोल कर पढ़ लेना चाहिए। मैं यहाँ निसंकोच यह भी बताना चाहता हूँ कि दूसरे राजनीतिक दल भी बहुत निर्लज्ज तरीके से इस शहीद के हाथों में अपनी पार्टी का झण्‍डा पकड़ाने का काम करते रहे जो कामयाब नहीं हुआ। धार्मिक कट्टरता और पुनरुत्थानवाद के इस युग में भगत सिंह की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पैरोकारी की हम सबसे अधिक जरूरत महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे में जब गाँधी और जिन्ना को भी डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्ष बताया जा रहा हो, और भाजपा के अलंबरदार स्वयं को खालिस और दूसरों को छद्म धर्मनिरपेक्ष बताते हों तब वास्तविक धर्मनिरपेक्षता जो नास्तिकता के बिना सम्‍भव नहीं है, उसका झण्‍डा कौन उठाए? यह साफ तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्मसमभाव कतई नहीं है जैसा कि हम बार-बार, अनेक बार प्रचारित करते और कहते हैं। यह हमारा सर्वथा बेईमानी भरा चिंतन है जिसका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। विचार यह भी किया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता आखिर कितनी तरह की? रघुपति राघव राजाराम जपने वाले गाँधी भी धर्म निरपेक्ष थे, मजहब के नाम पर मुस्लिम होमलैंड ले लेने वाले जिन्ना भी धर्मनिरपेक्ष थे और भगतसिंह भी। तब इनमें से कौन सही धर्मनिरपेक्ष है, और धर्मनिरपेक्षता आखिर है क्या बला?

6. इधर भगतसिंह को संसद का पक्षधर साबित करने के भी प्रयत्न हुए और हो रहे हैं। संसद में भगतसिंह का चित्र या मूर्ति लगवाने का क्या अर्थ है। जिस संसदीय चरित्र और उसकी कार्यवाहियों के विरोध में उन्होंने, दल के निर्णय के अनुसार पर्चा और बम फेंका, क्या आज उस संसद और उसके प्रतिनिधियों की चाल-ढाल और आचरण बदल कर लोकोन्मुखी और जनपक्षधर हो गया है। यदि नहीं तो क्यों भगतसिंह पर काम करने वाले उन पर पुस्तकें जारी करवाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री की चिरौरी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। क्या हम वर्तमान संसदीय व्यवस्था के पैरोकार या पक्षधर होकर भगतसिंह को याद कर सकते हैं। आखिर क्यों भगतसिंह की शहादत के 52 वर्षों बाद उनकी बहन अमर कौर को भारत की वर्तमान संसद के चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली पर उँगली उठाते हुए वहाँ घुसकर पर्चे फेंकने पड़े, जिसमें उठाए सवालों पर हमें गौर करना चाहिए। पर इस मुक्त देश में पसरा ठंडापन देखिए कि किसी ने भी 8 अप्रैल 1983 को अमर कौर की आवाज में आवाज मिलाकर एक बार भी इंकलाब जिंदाबाद बुलंद नहीं किया, जबकि यह दर्ज रहेगा कि इसी गुलाम देश ने तब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के स्वर में अपना स्वर बखूबी मिला दिया। जानने योग्य यह भी है कि पिछले दिनों संसद में भगतसिंह की जो प्रतिमा लगी उसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं और वहाँ उनके साथ बम फेंकने वाले उनके अभिन्न बटुकेश्‍वर दत्त नदारद हैं।

7. जरूरी है कि भगतसिंह को याद करने और उनकी पूजा या पूजा के नाटक में हम फर्क करें। आज सारे जनवादी और प्रगतिशील राजनीतिक व सांस्कृतिक सामाजिक संगठन भगतसिंह को याद कर रहे हैं। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी भी। यह चीजों को घालमेल करने की घिनौनी कोशिशें हैं ताकि असली भगतसिंह अपनी पहचान के साथ ही अपना क्रान्‍ति‍कारित्व भी खो बैठें। आखिर क्या कारण है कि भगतसिंह आज तक किसी राजनीतिक पार्टी के नायक नहीं बन पाए। यह सवाल बड़ा है कि आजाद की शहादत के बाद हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ को पुनर्जीवित करने के कितने और कैसे प्रयास हुए और वे कामयाब नहीं हुए तो क्यों? और क्यों आजादी के बाद कोई राजनीतिक दल हिसप्रस का झण्‍डा पकड़ने का साहस नहीं कर सका?

8. विचार यह करिए कि अब भावी इंकलाब का आधार क्या होगा। आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और दूसरे सारे युवा क्रान्‍ति‍कारी अधिकांशतः मध्यवर्ग से आए थे। आज पूँजीवादी व्यवस्था और बाजार के अनापशनाप विस्तार ने मध्यवर्ग को नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है। नई पीढ़ी पूरी तरह कैरियर में डूबी है। उसके सपनों में अब देश और समाज नहीं है। वहाँ नितांत लिजलिजे व्यक्तिगत सपनों की कंटीली झाडि़याँ उग आई हैं। समाज टूट रहा है तो सामाजिक चिंताएं कहाँ जन्मेंगी। निम्न वर्ग जिन्‍दगी जीने की कशमकश में डूबा रह कर दो जून की रोटी मुहैया नहीं कर पा रहा है तो दूसरी ओर उच्च वर्ग क्रान्‍ति‍ क्यों चाहेगा? क्या अपने विरुद्ध? ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है। तब फिर क्रान्‍ति‍ का पौधा कहाँ पनपेगा और उसे कौन खाद-पानी देगा। यह बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाये खड़ा हुआ है और हम हवा में मंचों पर क्रान्‍ति‍ की तलवारें भाँज रहे हैं। हम जो थोड़ा बहुत क्रान्‍ति‍ के नाम पर कुछ करने की गलतफहमियाँ पाल रहे हैं, क्या वह हमारा वास्तविक क्रान्‍ति‍कारी उद्यम है। कौन जानता है हमें। जिनके लिए क्रान्‍ति‍ करने का दावा हम करते रहे हैं, वे भी हमसे सर्वथा अपरिचित हैं। आप जेएनयू के किसी एअरकंडीशंड कमरे में तीसरी मंजिल पर बैठकर तेरह लोग क्रान्‍ति‍ की लफ्फाजी करेंगे तो देश की जनता आपको क्यों पहचानेगी। याद रखिए कि जेएनयू देश नहीं है। पूछिए इस मुल्क के लोगों से छोटे शहरों, कस्बों, देहातों में जाकर अथवा सड़क पर चलते किसी आम आदमी को थोड़ा रोककर इन बौद्धिक विमर्श करने वाले लोगों के बारे में पूछिए तो वह मुँह बिचकाएँगे। वे तो इनमें से किसी को भी जानते बूझते नहीं। तो आप कर लीजिए क्रान्‍ति‍। इस देश की साधारण जनता आपसे परिचित नहीं है। न आप उसके साथ खड़े हैं, न ही वह आपके साथ। ऐसे में क्या आप जनता के बिना क्रान्‍ति‍ करेंगे? लगता है कि इस देश में अब थोड़े से हवा हवाई लोग ही क्रान्‍ति‍ की कार्यवाही को संपन्न करने का ऐतिहासिक दायित्व पूरा कर लेंगे। जनता अब उनके लिए गैरजरूरी चीज बन गई है।

9. आज भाषा का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यह आजादी के सवाल से गहरे तक जुड़ा हुआ है। अपनी भाषा के बिना आप आजादी की कल्पना नहीं कर सकते। पर आज सब ओर गुलामी की भाषा सिर माथे और उसकी बुलंद जयजयकार। भाषा का मामला सिर्फ भाषा का नहीं होता, वह संस्कृति का भी होता है। भगतसिंह ने यों ही भाषा और लिपि की समस्या से रूबरू होते हुए अपनी भाषाओं की वकालत नहीं की थी। क्या हम अंग्रेजी के बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते? भाषा आज सबसे अहम मुद्दा है। हम उस ओर से आँखें न मूंदें और न ही उसे दरकिनार करें। भाषा के बिना राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।

10. अब तीन अन्य गौर करने वाली बातों पर हम अपना पक्ष और चिंताएं प्रकट करेंगे। वह यह कि आज भी ईमानदारी से भगतसिंह को याद करने वालों को वर्तमान सत्ता और व्यवस्था उसी तरह तंग और प्रताडि़त करती है, जिस तरह साम्राज्यवादी हुकूमत किया करती थी। शंकर शैलेंद्र का ‘भगतसिंह से’ गीत गाने पर संस्कृतिकर्मियों पर यह कह कर प्रहार किया जाता है कि यह गीत 1948 में सरकार ने यह कह कर जब्त किया था कि यह लोकप्रिय चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जनता के मन में घृणा पैदा करता है। मैं स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्‍या शंकर शैलेंद्र के इस गीत पर से 1948 के बाद से अभी तक सरकारी पाबंदी हटी है अथवा नहीं। यदि ऐसा हुआ है तो कब? दूसरा यह कि कई वर्ष पहले पाकिस्तान की फौज हुसैनीवाला से भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मारकों को तोड़कर ले गई। हमने क्यों नहीं अब तक उन स्मारकों की वापसी की मांग पाकिस्तान सरकार से की। क्या वह हमारा राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। और तीसरा विन्दु यह है कि कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महोत्सव हुआ था, मेला लगा था। यह तब की बात है जब भगतसिंह पर एक साथ कई-कई फिल्में आई थीं यानी हमारे बॉलीवुड को भी क्रान्‍ति‍ करने का शौक चर्राया था। बाजार और बॉलीवुड में यदि भगतसिंह को बेचा जा सकता है तो इसमें हर्ज क्या है। बाजार हर चीज से मुनाफा कमाना चाहता है। पर मैं यहाँ फिल्मों में भगतसिंह को बेचने की बात नहीं कर रहा, न ही इस बात पर चिन्‍ता प्रकट कर रहा हूँ कि उन्होंने तुडुक तुडुक और बल्ले बल्ले करके भगतसिंह जैसे क्रान्‍ति‍कारी नायक को पर्दे पर नाचना दिखा दिया। मैं यहाँ बात कुछ दूसरी कहना चाहता हूँ। लखनऊ के उस मेले में एक रेस्त्रां बनाया गया था जिसका दरवाजा लाहौर जेल की तरह निर्मित किया गया। उसमें बैरों को वह ड्रेस पहनाई गई थी जिसे जेल के भीतर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पहना था। पानी जो वहाँ परोसा जा रहा था उसे काला पानी का नाम दिया गया था और घिनौनापन देखिए कि खाने के नाम पर स्वराज्य चिकन और काकोरी कबाब। यह हद से गुजर जाना है। लखनऊ एक प्रदेश की राजधानी है–सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक दलों का केंद्रीय स्थान। पर सब कुछ कई दिनों तक उस जगह ठीक ठाक चलता रहा। कोई हलचल नहीं। कोई विरोध नहीं। क्या हम वास्तव में मर चुके हैं, क्या हमारे भीतर कोई राष्ट्रीय चेतना शेष नहीं है। क्या हमें अपने राष्ट्रीय नायकों और शहीदों का अपमान कतई विचलित नहीं करता। क्या इतिहास के सवाल हमारे लिए इतने बेमानी हो गए हैं कि वे हमारे भीतर कोई उद्वेलन पैदा नहीं करते। कुछ लोग थोड़े वर्षों से तीसरा स्वाधीनता आंदोलन नाम से एक संगठन चला रहे हैं। शहीदेआजम भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने लाने लाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम करने वाले प्रो. जगमोहन सिंह जी भी उससे जुड़े हैं। पर इस संगठन के चिंतन के प्राथमिक बिन्‍दु पर गौर करिए कि आंदोलन चलाने से पहले ही उसने घोषित कर दिया कि इंडिया गेट को ध्वस्त कर वहाँ शहीदों की बड़ी मीनार बनाना है। क्या यही इस देश का तीसरा स्वतंत्राता युद्ध होगा। कल तक हम अपने बीच बचे रहे जिन्‍दा शहीदों को कोई सम्मान और आदर नहीं दे पाए, उनकी ओर आँख उठाकर भी हमने देखा नहीं, उन्हें ठंडी और गुमनाम मौत मर जाने दिया पर आज उनके ईंट पत्थर के बुत खड़े करने में हमारी गहरी दिलचस्पी है। भगतसिंह को याद करने वाले संगठन कितनी गलतफहमियों में जी रहे हैं यह देखने के लिये आँखों को ज्यादा फैलाने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह भी गौर करने लायक सच्चाई और त्रासदी नहीं है कि वामपंथी और साम्यवादी आंदोलन ही नहीं भगतसिंह के अनुयायी कहे जाने वाले लोगों और संस्थाओं ने भी सैद्धांतिक मीनमेख और थोड़े विमर्शों में स्वयं को अधिक उलझा लिया है। उनके बीच निर्लज्ज किस्म की संकीणताएं भी विद्यमान हैं। भगतसिंह का नाम स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए लिया जाना कतई ठीक नहीं।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या/मार्च 2012 से साभार)
लेखक :- श्री सुधीर विद्यार्थी
संपर्क :- 6, पवन विहार , फेज़-5 विस्तार ,पोस्ट रूहेलखंड विश्वविद्यालय ,
बरेली ,उत्तर प्रदेश - 262201


from Tumblr http://ift.tt/2rcFG4Q
via IFTTT

आज का भगवद चिन्तन 9-6-2017 प्रकृति से सूक्ष्म आत्मा, आत्मा से सूक्ष्म परमात्मा, इसलिए परमात्मा...

आज का भगवद चिन्तन
9-6-2017

प्रकृति से सूक्ष्म आत्मा, आत्मा से सूक्ष्म परमात्मा,
इसलिए परमात्मा सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न सर्वशक्तिमान सर्वेश्वर सर्वाधार।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
जो चीज जितनी अधिक सूक्ष्म उतनी अधिक गुणवत्ता में शक्ति में अधिक
इस बात का पता लगाना हो तो वेद का स्वाध्याय कर ऋषि मुनियों की खोज को देखिए किस तरह उन्होंने ईश्वर से सूक्ष्म बुद्धि के बल सूक्ष्म तत्वों का पता लगाया हमारे समक्ष अग्निहोत्र यज्ञ जैसी पर्यावरण शुद्धि के लिए भौतिक सामिग्री को सूक्ष्म करने की इतनी सरल पद्धति रखी जो मात्र 15 मिनट की क्रिया से तीनों लोकों तक पहुँचकर सभी देवों को शुद्ध कर देती है। उसी आधार पर आधुनिक वैज्ञानिक जेम्सवाट ने भाप की शक्ति का पता लगाया ओर हम सब भी यदि जलती हुई अग्नि में एक मिर्च डालते हैं तो पूरे मोहल्ले से छींकने की आवाज सुनने में आजाती है। उसी मिर्च को खाने पर एक ही व्यक्ति पर असर दिखाई पड़ता है वह भी कम।
सृष्टि में हर पदार्थ विभिन्न अवस्थाओं में विद्यमान रहते हैं।
जमीन में पानी द्रव्य रूप में रहता है
ठंडे प्रदेशों में बर्फ रूप में
वायुमंडल में वाष्प रूप में।
बर्फ को जहाँ कम स्थान चाहिए वहीं पानी को अधिक और भाप तो अत्यधिक सूक्ष्म हो बहुत दूर तक फैल जाती है।
ठीक इसी तरह अग्नि में जो भी स्थूल पदार्थ डालते हैं अग्नि अपने स्वभावानुसार उसे सूक्ष्म कर सभी तत्वों अर्थात् देवों को दूर दूर तक बांट देती है। अग्नि में डाली गई औषधियाँ सूक्ष्म होकर तीन जगहों पर अपना असर दिखाती हैं पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक।
अतः विमल वेद द्वारा यज्ञ के वैज्ञानिक रहस्य को समझ नित्य दोनों समय यज्ञ करते हुए जीवन को चारों ओर से निर्मल विमल शुद्ध पवित्र बनाते हुए खुशियों से भरें। तभी सबका कल्याण।
अग्नि में डाली गई आहुति सूक्ष्म होकर वायुमंडल में फैल जाती है।
अग्नि हुतं हविः सम्यक् आदित्यम् उप तिष्ठति।- मनुस्मृति
🙏🙏🙏🙏🙏🙏


from Tumblr http://ift.tt/2rXtRwz
via IFTTT

पादहस्तासन से कमर और पेट को मिलेगा एक साथ फायदा इस आसन मे हम दोनों हाथों से अपने पैर के अँगूठे को...

पादहस्तासन से कमर और पेट को मिलेगा एक साथ फायदा
इस आसन मे हम दोनों हाथों से अपने पैर के अँगूठे को पकड़ते हैं, पैर के टखने भी पकड़े जाते हैं। चूँकि हाथों से पैरों को पकड़कर यह आसन किया जाता है इसलिए इसे पादहस्तासन कहा जाता है। यह आसन खड़े होकर किया जाता है।
‍‍विधि : यह आसन खड़े होकर किया जाता है। पहले कंधे और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को धीरे-धीरे ऊपर उठाया जाता है। हाथों को कंधे की सीध में लाकर थोड़ा-थोड़ा कंधों को आगे की ओर प्रेस करते हुए फिर हाथों को सिर के ऊपर तक उठाया जाता है। ध्यान रखें की कंधे कानों से सटे हुए हों।
तत्पश्चात हाथ की हथेलियों को सामने की ओर किया जाता है। जब बाँहें एक-दूसरे के समानान्तर ऊपर उठ जाएँ तब धीरे-धीरे कमर को सीधा रख श्वास भीतर ले जाते हुए नीचे की ओर झुकना प्रारम्भ किया जाता है। झुकते समय ध्यान रखे की कंधे कानों से सटे ही रहें।
तब घुटने सीधे रखते फिर हाथ की दोनों हथेलियों से एड़ी-पंजे मिले दोनों पाँव को टखने के पास से कस के पकड़कर माथे को घुटने से स्पर्श करने का प्रयास किया जाता है। इस स्थिति में श्वास लेते रहिए। इस स्थिति को सूर्य नमस्कार की तीसरी स्थिति भी कहा जाता है। सुविधा अनुसार 30-40 सेकंड इस स्थिति में रहें।
वापस आने के लिए धीरे-धीरे इस स्थिति से ऊपर उठिए और क्रमश: खड़ी मुद्रा में आकर हाथों को पुन: कमर से सटाने के बाद विश्राम की स्थिति में आ जाइए। कुछ क्षणों का विराम देकर यह अभ्यास पुन: कीजिए। इस तरह 5 से 7 बार करने पर यह आसन असरकारक होता है।
सावधा‍‍नी : रीढ़ की हड्डी में कोई शिकायत हो तथा साथ ही पेट में कोई गंभीर बीमारी हो ऐसी स्थिति में यह आसन न करें।
इसके लाभ : यह आसन मूत्र-प्रणाली, गर्भाशय तथा जननेन्द्रिय स्रावों के लिए विशेष रूप से अच्‍छा होता है। इससे कब्ज की शिकायत भी दूर होती है। यह पीठ और रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाता है तथा जंघाओं और पिंडलियों की माँसपेशियों को मजबूत करता है। आँतों के व पेट के प्राय: समस्त विकार इस आसन को नियमित करने से दूर होते हैं। इससे सुषुम्ना नाड़ी का खिंचाव होने से उनका बल बढ़ता है।
करो योग रहो निरोग
योगी बनो निरोगी बनो
स्वदेशी अपनायेगे देश बचायगे


from Tumblr http://ift.tt/2rbWM37
via IFTTT

दुर्भाग्य है उन लोगों का जो रामपाल जैसे धूर्त,मूर्ख,हत्यारे,गोबर गणेश, अनाडी, पाखंडी,...

दुर्भाग्य है उन लोगों का जो रामपाल जैसे धूर्त,मूर्ख,हत्यारे,गोबर गणेश, अनाडी, पाखंडी, घमंडी,देशद्रोही, व्यभिचारी के पैर धोकर पीते हैं और उसे सन्त सद्गुरु वा तत्वज्ञानी मानते हैं !! आर्य वीरों व सरकार ने उसकी सब पोल खोल कर उसे जेल में ठूंस दिया है,जेल के एक कर्मचारी ने तो उसके मुंह पर थूक दिया ! झूठ बोलने ,वेदमंत्रो के उल्टे पुल्टे अर्थ करने, कबीर को ही परमात्मा बताने व गुरुडम फैलाने की सजा भुगत रहा है । ऐसे लोग मृत्यु बाद नीच योनियों में भटकते हैं । यह बुद्धु परमात्मा को साकार बताता है और वेदों में कबीर का वर्णन बताता है ! ईश्वर उसे व उसके चेले चपाटों को सद्बुद्धि दे ! भंडारे करने व भीड इकट्ठी करने से कोई महान नहीं बन जाता । वेद व संस्कृत का क ख ग भी नहीं आता और बडा विद्वान बनने का ढोंग करता है । ऋषि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश को ध्यान से पढने वाला ही पूर्ण सत्य को जान सकता है ।


from Tumblr http://ift.tt/2rX3FCl
via IFTTT

*“ काश ऐसी बारिश आए ”*.., जिसमें *अहम* डूब जाए, *मतभेद* के किले ढह जाएं, *घमंड* चूर चूर...

*“ काश ऐसी बारिश आए ”*..,
जिसमें
*अहम* डूब जाए,
*मतभेद* के किले ढह जाएं,
*घमंड* चूर चूर हो जाए,
*गुस्से* के पहाड़ पिघल जाए,
*नफरत* हमेशा के लिए दफ़न हो जाए,
और, हम सब
*“ मैं ”* से *“ हम ”* हो जाए …
🌹 🌹


from Tumblr http://ift.tt/2rcF67o
via IFTTT

नमस्ते जी, शुभ संध्या। भविष्य को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जो तय है वह...

नमस्ते जी,
शुभ संध्या।

भविष्य को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जो तय है वह अवश्यम्भावी है। यदि कुछ परिवर्तित हो सकता है तो वह है मनुष्य की दैनिक दिनचर्या, उसका दृष्टिकोण, उसके आचार-विचार तथा व्यवहार, उसका जीवन लक्ष्य। इतना विश्वास मन में रखना चाहिए कि उपरोक्त पर यदि नियंत्रण कर लिया जाये तो निश्चित ही भविष्य को भी परिवर्तित किया जा सकता है। हमारा आज अर्थात् वर्तमान ही भविष्य का सटीक निर्धारण करता है। यदि जीवन में, भविष्य में कुछ पृथक परिवर्तन की आशा करते हैं तो सर्वप्रथम स्वयं से ही प्रारंभ करना होगा। संयमित रहें! पहले स्वयं को बदलें फिर परिवार को बदलें और अंत में समाज को।

🕉 *ईश्वर सदैव हमारे संग हैं* 🕉


from Tumblr http://ift.tt/2rXwbE0
via IFTTT

📕 *ऋग्वेदभाष्यभूमिका*📕 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ तथैव पूर्वोक्तासु...

📕 *ऋग्वेदभाष्यभूमिका*📕
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तथैव पूर्वोक्तासु देवतास्वग्निपृथिव्यादित्यचन्द्रमोनक्षत्राणि चेति पञ्च वसवो विग्रहवत्यः सन्ति। एवमेकादश रुद्रा द्वादशादित्या मनः षष्ठानि ज्ञानेन्द्रियाणि वायुरन्तरिक्षं द्यौर्मन्त्राश्चेति शरीररहिताः। तथा स्तनयित्नुविधियज्ञौ च सशरीराशरीरे देवते स्त इति। एवं सशरीर- निश्शरीरभेदेन देवताद्वयं भवति। तत्रैतासां व्यवहारोपयोगित्वमात्रमेव देवतात्वं गृह्यते। इत्थमेव मातृपित्राचार्य्यातिथीनां व्यवहारोपयोगित्वं परमार्थप्रकाशकत्वं चैतावन्मात्रं च। परमेश्वरस्तु खल्विष्टोपयोगित्वेनैवोपास्योऽस्ति। नातो वेदेषु ह्यपरा काचिद्देवता पूज्योपास्यत्वेन विहितास्तीति निश्चीयताम्।

भाषार्थ - इसी प्रकार पूर्वोक्त आठ वसुओं में से अग्नि, पृथिवी, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र ये पांच मूर्तिमान् देव हैं। और ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, मन, अन्तरिक्ष, वायु, द्यौ और मन्त्र, ये मूर्तिरहित देव हैं। तथा पांच ज्ञानेन्द्रियां, बिजुली और विधियज्ञ ये सब देव मूर्त्तिमान् और अमूर्त्तिमान् भी हैं। (टिप्पणी- इन्द्रियों की शक्तिरूपद्रव्य अमूर्त्तिमान् और गोलक मूर्त्तिमान् तथा विद्युत् और विधियज्ञ में जो जो शब्द तथा ज्ञान अमूर्त्तिमान् और दर्शन तथा सामग्री मूर्त्तिमान् जाननी चाहिए।) इससे साकार और निराकार भेद से दो प्रकार की व्यवस्था देवताओं में जाननी चाहिए। इन में से पृथिव्यादि का देवपन केवल व्यवहार में तथा माता, पिता, आचार्य और अतिथियों का व्यवहार में उपयोग और परमार्थ का प्रकाश करनामात्र ही देवपन है और ऐसे ही मन और इन्द्रियों का उपयोग व्यवहार और परमार्थ करने में होता है। परन्तु सब मनुष्यों को उपासना करने योग्य एक परमेश्वर ही देव है।
*साभार-:अथ वेदविषयविचारः:ऋग्वेदभाष्यभूमिका*
—– *स्वामी दयानन्द सरस्वती*_

*_क्रमश:_*


from Tumblr http://ift.tt/2rcF5Am
via IFTTT

*लोग कहते हैं शूद्र छोटे होते हैं ?* ⛲🗼⛲🗼⛲🗼⛲🗼⛲🗼 *—-आर्यपुत्र निगमेंद्र* ➡ लोग तो घमंड,...

*लोग कहते हैं शूद्र छोटे होते हैं ?*

⛲🗼⛲🗼⛲🗼⛲🗼⛲🗼

*—-आर्यपुत्र निगमेंद्र*

➡ लोग तो घमंड, आलोचना, नशा आदि दुर्गुणों को भी तुच्छ बोलते हैं, लेकिन तुच्छ बोलकर भी लोग इन्हें सिर आंखों पर बैठाकर कर रखते हैं। शायद इसके बिना किसी मनुष्य का गुजारा भी नही चलता है। लोगो का क्या कुछ भी बोल दें।

लेकि शूद्रों का महत्व जानने के लिए हमे इसके उद्भव तक जाना होगा। लोगो ने शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण नही बनाये। जिसने बनाये उसने इन्हें किस रूप में परिभाषित किया ? किस रूप में इनकी महत्ता का बखान किया, ये समझने - सोचने की आवश्यकता है पहले। प्रकृति मनुष्यो को 4 गुणों में विभाजित करती है और गुणों के आधार पर ही 4 अलग अलग भागों के अलग अलग नाम रखे गए। चारों का अपना अपना महत्व है समाज के लिये।

*चारों वर्णों को ऊँचा-नीचा, छोटा- बड़ा के आधार पर विभाजित नही किया गया जैसा की आज लोग समझते हैं।* और ब्राह्मण अपने को उच्च सिद्ध करने में लगे रहते है और क्षत्रिय लोग भी।

*चारों वर्णों को ही अपने गुण धर्म के आधार पर समाज- देश के लिए विशेष योगदान देना होता है। मानव समाज इन चारों वर्णों के समान योगदान के बिना संतुलित रूप में कभी नही चल सकता। पूरे मानव समाज की रीढ़ हैं चारो वर्ण। सबका अपना अपना दायित्व है देश और समाज के लिए।*

*1——-* सर्वप्रथम मानव समाज को ईश्वर प्रदत्त धर्म के सत्य ज्ञान आदि से शिक्षित कर उन्हें सभ्य, सुशील, श्रेष्ठ, पुरुषार्थी,सुसंस्कृत, धार्मिक बनाने का सेवा कार्य करने वाले ब्राह्मण कहे जाएंगे। चाहे वो कोई भी व्यक्ति हो, किसी भी वर्ण या कुल में पैदा हुआ हो।

*2——-* द्वितीय मानव समाज और राष्ट्र की रक्षा करने, जनकल्याण करने, सबके हितों की रक्षा करने, न्याय व्यवस्था को बनाये रखने, धर्म स्थापना में सहयोग करने और देश और समाज की उन्नति के लिए नित्य सेवा कार्य करने वाले क्षत्रिय कहे जाएंगे।

*3—–* मानव समाज व देश की सेवा करने वाले, प्रत्येक ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों के सेवा कार्यो में सहयोग करने वाले, प्रत्येक उद्यम में श्रम योगदान द्वारा सेवा कार्य करने वाले शूद्र कहे जाएंगे।

*4——-* राष्ट्र व मानव समाज की अर्थ व्यवस्था को चलाने वाले, उद्योग, व्यापार कर मनुष्यो के आवश्यक पदार्थो व वस्तुओं की पूर्ति करने वाले, अनाज, वस्त्र, भवन आदि निर्माण कर सेवा कार्य करने वाले वैश्य कहे जाएंगे।

💧 *निष्कर्ष —–* इन चार वर्णों को मनुष्य शरीर से तुलना कर समझाया गया है कि मुख- मस्तिष्क ज्ञान का द्योतक है। सो मुख ब्राह्मण है। यही इसका मुख्य सेवा धर्म है।
शरीर की भुजाएं द्वारा ही बलपूर्वक कार्य सम्पन्न किया जाता है अतः भुजा ही क्षत्रिय है।
पेट मे अग्नि पाचन स्थान है जहाँ से पूरे शरीर को जीवित रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा शक्ति प्राप्त होती है। इसके बिना मुख, भुजा और पांव सब निष्क्रिय हो जाएंगे। अतः पेट को वैश्य कहा गया है।
अब सबसे मुख्य आधार शरीर का पाँव होता है, जिसकी आधारशिला पर मुख, भुजा, पेट टिके होते हैं, मानव समाज रूपी शरीर इसी के दम पर सार्थक कार्य कर सकने में सक्षम होते हैं। अतः पाँव को शुद्र कहा गया है।

अब ये कहना कि शूद्र छोटे और ब्राह्मण- क्षत्रिय बड़े होते हैं और क्षत्रिय- ब्राह्मण के पाँव छूने चाहिए तो इसमें भी महत्व शूद्रों का ही तो बताते हैं। क्योंकि शूद्र ही तो पाँव है और पाँव ही शूद्र है तो अंततः सदा पाँव पर शीश (ब्राह्मण) शीश ही झुकता है और सदा चरण छूने को भुजाएँ ( क्षत्रिय ) ही आगे बढ़ती हैं। चरण पादुका आज भी वंदनीय व सम्मानीय हैं हमारी आर्य संस्कृति में। पेट कभी किसी की तरफ नही झुकता है क्योंकि वह सबके लिए बराबर अपरिहार्य है, सबके बीच संतुलन बनाये रखने का कार्य वैश्य का ही है।

*अब यदि क्षत्रिय और ब्राह्मण शूद्र को अज्ञानवश छोटा समझें तो उन्हें पाँव पर झुकने की बात का स्मरण कर लेना चाहिए।* जिसके बिना मनुष्य जीवन जीने की कल्पना भी नही कर सकता। किसी भवन की बुलंदी का आधार उसकी बुनियाद होती है और जब बुनियाद कमजोर पड़ती है तब बड़ा से बड़ा बहुमंज़िल भवन भी मिट्टी के ढेर के समान ढह जाता है। शूद्र की यही महानता है आर्य संस्कृति में। जिसे त्याग कर लोगो ने हिन्दू पंथ स्वीकार कर लिया है जिसने वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था में परिवर्तित करके आपस मे ही भेदभाव करना शुरू कर दिया। आज हिन्दू पंथ समाज मे जितनी भी कुरुतियां और बुराइयाँ व्याप्त हैं वे सबकी सब 1000 वर्षों के भीतर ही विकसित की गई हैं। इनका प्राचीन आर्य संस्कृति और वैदिक धर्म से दूर दूर तक कोई सरोकार संबंध नही है।

*अतः विद्वानजनो से यही आग्रह है मेरा यदि अपना खोया हुआ वैभव, सुख, संपदा, शांति, प्रेम, सौहार्द पाना चाहते हैं तो सबको साथ लेकर वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता संस्कृति को अंगीकार करें, अपने जीवन मे उसे उतारें, परिवार को वेद ज्ञान देकर सुसंस्कृत करें। वर्ण व्यवस्था को ग्रहण कर सरनेम बताने में और यथा सम्भव प्रयोग करने से बचें। शूद्र जन लोग अपमान बोध से बाहर निकलकर गर्व सम्मान से अपना महत्व समझें और सबको बताएं। और यदि कोई श्रेष्ठ कर्म करने में दक्ष होते हैं तो स्वयं को ब्राह्मण, वैश्य अथवा क्षत्रिय बताएं।*

*यथा गुण तथा वर्ण*

✍🏼

*8/6/2017*
⛳ *आर्य विचार* ⛳


from Tumblr http://ift.tt/2rX9oYW
via IFTTT

*ओ३म्* *🌷अनुपम उपदेश🌷* *🌻स्वदोष दर्शन-*परमात्मा उसका भला करे जो मेरे दोषों का ज्ञान कराता...

*ओ३म्*

*🌷अनुपम उपदेश🌷*

*🌻स्वदोष दर्शन-*परमात्मा उसका भला करे जो मेरे दोषों का ज्ञान कराता है।

*🌻आश्चर्य की बात:-*आश्चर्य है उस मानव पर जिसे मृत्यु का निश्चय है और फिर भी पापासक्त है।आश्चर्य है उस इन्सान पर जो संसार को नाशवान जानता है फिर भी उसमें फंसा है,आश्चर्य है उस मनुष्य पर जो ईश्वर विश्वासी हो और फिर भी चिन्तातुर रहे।आश्चर्य है उस बुद्धिमान पर जो दुर्गति से बचना चाहति है और फिर भी दुष्कर्म करता है।आश्चर्य है उस व्यक्ति पर जो ईश्वर भक्त होकर भी उसके स्थान पर दूसरी वस्तु का पूजन करे,आश्चर्य है ऐसे योगी पर जो मुक्ति का इच्छुक है और विषयों में लीन है।

*🌻दुष्ट:-*बुरे लोगों की जिस प्रकार चाहे परिक्षा कर ले,सांप और बिच्छुओं से कम न पायेगा।

*🌻भगवान की व्यापकता:-*हे मानव यदि तू पाप का इच्छुक है तो ऐसे स्थान की खोज कर जहां भगवान् न हो।

*🌻भक्ति:-*हे मानव:-यदि तू उसकी भक्ति नहीं करना चाहता तो उसकी बनाई वस्तु का प्रयोग तथा उपभोग भी न कर।पशु अपने मालिक को पहचानता है किन्तु आश्चर्य है,इन्सान अपने भगवान को नहीं पहचानता।

*🌻विपत्ति:-*प्रभु की और से जो विपत्ति हम पर आती है वह हमारे कल्याण के लिए ही आती है।विपत्ति से घबरा जाना सबसे बड़ी विपत्ति है।

*🌻निन्दा-*बुरों की बुराई करना निन्दा नहीं है अपितु भलों की बुराई करना निन्दा है।

*🌻सज्जन-दुर्जन:-*सज्जन का स्वभाव है जब कोई कठोरता से बरते तो कठोर हो जाता है और जब कोई नम्रता से बरते तो नम्र हो जाता है।इसके विपरित दुर्जन का स्वभाव है कि जब कोई नम्रता से बरते तो कठोर हो जाता है और कठोरता से बरते तो नम्र हो जाता है।

*🌻अपना सम्मान:-*जो अपनी कदर आप नहीं जानता,उसकी कदर कोई दूसरा मनुष्य भी नहीं पहचानता।चाहे कोई तेरी कदर न भी करे तो नेकी को बन्द मत कर।

*🌻कृपा पात्र कौन?:-*वह विद्वान जो मूर्खों के आदेश से काम करे।(2) वह सज्जन जिस पर दुर्जन शासक हो (3) वह गुणवान जो निर्गुणियों के आधीन हो।
ये तीनों सर्वाधिक कृपा के पात्र हैं।

*🌻अनिष्ट वस्तुएं:-*विद्वानों में कुकर्म (2) हाकिमों में लोभ (3) धनवानों में कृपणता (4) स्त्रियों में निर्लज्जता (5) वृद्धों में व्यभिचार।पांचों पर प्रभु की मार।

*🌻क्रोध और अभिमान:-*जब तक तेरे अन्दर क्रोध और अभिमान है तब तक अपने को ज्ञानियों में मत समझ-क्योंकि तू मूर्ख ही है।

*🌻सम्मान:-*दूसरों का सम्मान न करने वाला प्रभु तथा प्रजा दोंनो का कोप पात्र होता है।

🌻ओ भोले,मकानों के बनाने में आयु व्यतीत कर रहा है ।बसेंगे दूसरे और हिसाब देगा तू।

*🌻उससे डर:-*जो उस से डरता है उससे सारा संसार डरता है।

*🌻भाग्यशाली:-*भाग्यशाली वह है जो नेकी करे और डरे।भाग्यहीन वह है जो बदी करे और सर्वप्रिय होने की आशा करे।

*🌻दिल दुखाना:-*नास्तिकता के पश्चात सबसे बड़ा पाप किसी का दिल दुखाना है।

*🌻सुकर्म:-*सुकर्मियों को ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति होती है और कुकर्मी उससे वंचित रहते हैं।

*🌻मन की मलीनता:-*तीन वस्तुएं मन की मलीनता को प्रकट करती हैं-
(1) ईर्ष्या करना (2) दिखावा करना, (3) अपने को बडा तथा दूसरे को छोटा समझना।

*🌻निर्धनों की उपेक्षा:-*वह सहभोज सबसे निकृष्ट है जिसमें धनवान बुलाये जाएं और निर्धनों की उपेक्षा की जाए।

*🌻स्त्री से व्यवहार:-*स्त्री के साथ सदव्यवहार कर।स्वयं कष्ट सह परन्तु उसे कष्ट न दे।
🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻
-जय तनेजा जी, पानीपत


from Tumblr http://ift.tt/2rctvFq
via IFTTT

ओ३म् ‘भारत में गोहत्या होगी तो यह भूमि मरघट बन जायेगीः डा. ज्वलन्त कुमार...

ओ३म्
‘भारत में गोहत्या होगी तो यह भूमि मरघट बन जायेगीः डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री’
……….
डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी आर्यजगत के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान है। वह वेद और वेदार्थ आदि अनेक ग्रन्थों के रचयिता, वैदिक पथ के सम्पादक, शास्त्रीय एवं आर्यसमाज के इतिहास पर अधिकारी, प्रभावशाली व श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले व्याख्यान देने वाले वक्ता हैं। गुरुकुल पौंधा, देहरादून के 2 जून से 4 जून, 2017 को आयोजित 3 दिवसीय वार्षिकोत्सव में उनका गोरक्षा पर प्रभावशाली व्याख्यान हुआ। उसी को इस लेख में प्रस्तुत करने का हमारा प्रयास है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की रचना ‘भारत भारती’ खूब लोकप्रिय हुई थी। यह पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई कि जितना अन्य कोई काव्य संग्रह लोकप्रिय नहीं हुआ। डा. ज्वलन्त कुमार जी ने उस पुस्तक से गोरक्षा विषयक एक कविता आद्योपान्त पढ़कर श्रोताओं को सुनाई। कविता में एक पंक्ति आती है कि यदि भारत में गोरक्षा नहीं की जायेगी, गोहत्या होगी, गोमांसाहार का लोग सेवन करेंगे तो यह भारत भूमि मरघट बन जायेगी। इस कविता में विद्वान कवि ने यह भी कहा है कि देश में गोहत्या इसलिए जारी है क्योंकि यहां अंग्रेजों का राज है। इसका अर्थ है कि यदि अंग्रेजों का राज न होकर भारतीयों का राज्य होता तो देश में गोहत्या न होती। आचार्य ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगी जी के कार्यकाल में गोरक्षा के जो क्रियात्मक उपाय किये जा रहे हैं वह प्रशंसनीय हंै। आचार्य जी ने कहा कि सन् 1966 के साल में देश में गोहत्या आन्दोलन चला।

आचार्य ज्वलन्त जी तब लगभग 12 वर्ष के थे। उन दिनों भारत में केवल 100 हिन्दू रहे होंगे जो गोहत्या को उचित मानते होंगे। देश के शेष हिन्दू गोहत्या को अनुचित मानते थे। हिन्दू जाति का यह दुर्भाग्य है कि उनके अपने देश में गाय की हत्या होती है। देश में लाखों मन्दिर व सैकड़ो धर्माचार्य हैं परन्तु यह सब गोहत्या के पाप को चुपचाप देखते रहते हैं। आचार्य जी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सेकुलर सरकार के शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम को भी गोहत्या वा गोमांसाहार के सेवन में वृद्धि का कारण बताया। आचार्य जी ने गोरक्षा का वर्णन करते हुए कहा कि आज गोरक्षा की बात करने पर हिन्दू ही इसका विरोध करने लगते हैं। कुछ एक्टर व नेता टीवी के पर्दे पर आकर कहते हैं कि हम गोमांस खाते हैं। वह कहते हैं कि खाने पीने का धर्म से क्या संबंध है? आचार्य जी ने कुछ प्रसिद्ध हस्तियों ऋषि कपूर, शोभा डे, बी.एम. झा स्तम्भकार, प्रसून वाजपेयी, दक्षिण के कुछ वशिष्ठ ब्राह्मणों का उल्लेख कर कहा कि ये लोग कहते हैं कि वह गोमांसाहार के पक्षधर हैं। विद्वान वक्ता ने कहा कि 50 सालों से पाठ्यक्रम में गोरक्षा विरोधी विचारों को पढ़ायें जाने का परिणाम है जिसके कारण आज की स्थिति आई है। यह पूर्व की सरकारों का पाप है।

आचार्य जी ने कहा कि किसी भी पशु का मांस खाना पाप है। केरल में पिछले दिनों घटी गाय की सार्वजनिक रूप से हत्या करने की घटना व उनके द्वारा गो मांस खाने की चर्चा की और कहा कि कांग्रेस ने गांधी जी की गोरक्षा विषयक एक बात भी नहीं मानी। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने कहा था कि वह गोरक्षा में कहीं अधिक व्यापक रूप से विश्वास रखते हैं। सभी पशु मूक प्राणी हैं इसलिये गाय सहित सभी पशुओं की रक्षा की जानी चाहिये। गांधी जी ने यह भी कहा है था कि हिन्दू धर्म की विश्व को महत्वपूर्ण देन है गोरक्षा। डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने गांधी जी के पत्र यंग इण्डिया के 7 जुलाई, 1927 अंक की चर्चा करते हुए कहा कि इसमें गांधी जी ने लिखा है कि सच्चे हिन्दू की पहचान तिलक नहीं है अपितु उसकी पहचान गोरक्षा है। गांधी जी ने सरकार को सलाह दी है कि वह गोहत्या रोकने के लिए गाय आदि पशुओं की उचित बोली लगाकर खरीद ले और स्वयं गोदुग्ध की बिक्री की व्यवस्था करे। सरकार को आदर्श पशु-शालायें खोलनी चाहिये। पशुओं के लिए सरकार यथेष्ट गोचर भूमि की व्यवस्था करे। गोरक्षा के लिए पृथक सरकारी विभाग स्थापित करे। गांधी के अनुसार सभी राज्यों को गोरक्षा का बोझ उठाना चाहिये। डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी ने कहा कि मुसलमानों से ज्यादा हिंदू मोदी जी व योगी जी की टांग खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज को सभी हिन्दू संगठनों के सहयोग से तीव्र आन्दोलन खड़ा करना चाहिये।

डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने कहा कि ऋषि दयानन्द को 29 सितम्बर, सन् 1883 को जोधपुर में विष दिया गया था। इससे पूर्व 7 जुलाई, 1883 को ऋषि ने उदयपुर रियासत के प्रधान मंत्री श्यामल दास जी को गोरक्षा के कार्यों का विवरण देते हुए पत्र लिखा था। अपने जोधपुर प्रवास में स्वामी दयानन्द जी ने जोधपुर नरेश को भी अपने राज्य में पूर्ण गोहत्या बंद करने को कहा था। उन्होंने बताया कि जोधपुर नरेश महाराजा जसवन्त सिंह ने स्वामी जी को पत्र लिख कर सूचित किया था कि उनके मारवाड़ राज्य में 14.61 लाख हिन्दू तथा 1.56 लाख मुसलमान रहते हैं। उन्होंने अपने राज्य में गाय सहित कुल तीन पशुओं की हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था। आचार्य जी ने कहा कि वह लोग दुष्ट व धूर्त हैं जो गोहत्या को अन्य पशुओं की हत्या के बराबर बताते हैं। उन्होंने कहा कि गोहत्या व अन्य पशुओं की हत्या में कोई बराबरी व समानता नहीं है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सज्जन व दुष्ट की हत्या बराबर नही होती है। गाय को आचार्य जी ने हितकारी पशु बताया।

विद्वान आचार्य जी ने कहा कि रूस के वैज्ञानिकों के अनुसार भूकम्प का कारण गोहत्या है। उन्होंने कहा कि गाय के ऊपर हाथ सहलाने से जो स्वास्थ्य आदि अनेक लाभ होते हैं वह लाभ अन्य किसी काम को करने से नहीं होते। गो के मूत्र व गोबर से जो लाभ होते हैं वह बहुत अधिक हैं। आचार्य जी ने कहा कि गोमूत्र एक अच्छा कीटनाशक है। उन्होंने कहा कि गोबर की खाद का प्रयोग करने से रोगरहित अन्न पैदा होता है। गाय से इतने लाभ हैं तथा उसका कोई व किसी प्रकार का अर्थ-भार मनुष्यों पर नहीं पड़ता। आचार्य जी ने बताया कि बाबर, हुमायूं, अकबर और औरंगजेब तक ने देश में गोहत्या बन्द कराई थी। हैदर अली के शासन काल में गोहत्या करने वाले की गर्दन काट ली जाती थी और टीपू सुल्तान के काल में गोहत्या करने वाले के हाथ काट दिये जाते थे। डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता कीर्तिशेष राजीव दीक्षित जी के न्यायालय में प्रस्तुत गोरक्षा विषयक तथ्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गोहत्या का कंलक बर्दाश्त के लायक नहीं है। शास्त्रों के पारदर्शी विद्वान डा ज्वलन्त कुमार शास्त्री ने कहा कि वेद में गोहत्या का विधान नहीं है। आचार्य जी ने गीता तथा प्राचीन भारत में गोरक्षा ग्रन्थ का उल्लेख कर उनमें गोरक्षा विषयक विचारों की समीक्षा भी की। उन्होंने कहा रामायण में गोहत्या का विधान कल्पित व मिथ्या है। गोहत्या के समर्थक लोगों से उन्होंने पूछा कि वह शास्त्रों में गोहत्या विरोधी बातों का उल्लेख क्यों नहीं करतेे। शास्त्री जी ने कहा कि वेदादि शास्त्रों में गो का एक नाम अघ्न्या है जिसका अर्थ है जिसे मारना निषिद्ध है वा जो अवध्य है अर्थात् हिंसा के योग्य नहीं है।

आचार्य डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री जी ने यह भी बताया कि वशिष्ठ धर्म सूत्र में तीन रोगों ईष्र्या, भूख और बुढ़ापे का वर्णन है। चरक संहिता में लिखा है कि गोहत्या व गोमांसाहार से 98 रोग बढ़ गये हैं। आचार्य जी ने ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश का उललेख कर उसके गोरक्षा विषयक विचारों से भी श्रोताओं को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि गोमेध का अर्थ अन्न होता है न कि गोमेध का अर्थ गो को मारना होता है। वाममार्गियों ने गोमेध के गलत अर्थ का प्रचार किया है। पं. गंगाप्रसाद, न्यायाधीश टिहरी राज्य ने लिखा है कि पारसियों के धर्म ग्रन्थ ‘जन्दावस्ता’ में गोमेध शब्द का अर्थ खेती करना व अन्न पैदा करना कहा है। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि सभी दृष्टि से गोहत्या महापाप है। उन्होंने कहा कि मांसाहारी हिन्दू भी व्रतों में व तीर्थों सहित एकादशी व पूर्णिमा आदि अनेक अवसरों पर मांस नहीं खाते जिसका कारण है कि वह मानते हैं कि मांस का खाना अनुचित है। इसी के साथ आचार्य जी का व्याख्यान समाप्त हो गया।

आचार्य जी का गोरक्षा सम्मेलन में यह भाषण तथ्यों व प्रमाणों से पूर्ण, ओजस्वी वाणी, प्रभावशाली व प्रवाहपूर्ण शब्दों में था। इस भाषण में आचार्य जी ने अपने शास्त्रीय ज्ञान, गोमाता के प्रति अपनी भावनाओं सहित देश के हित को केन्द्र बिन्दु में रखा है। ओ३म् शम्।


from Tumblr http://ift.tt/2rXqWEp
via IFTTT

ओ३म् “अनादि से अनन्त काल की यात्रा में जीवात्मा कर्मानुसार अनेक प्राणी योनियों में विचरता रहा है और...

ओ३म्
“अनादि से अनन्त काल की यात्रा में जीवात्मा कर्मानुसार अनेक प्राणी योनियों में विचरता रहा है और आगे भी विचरेगा”
………
यदि हम आर्यसमाज की बात न करें और इतर मनुष्यों व समुदायों की बातें करें तो हम देखते हैं कि मनुष्य को जड़ व चेतन का भेद व उसका तत्वार्थ ज्ञात नहीं है। मनुष्य का जन्म होता है, माता-पिता उसका पालन करते हैं, स्कूल व कालेजों में पढ़ने के लिए उसे भेजा जाता है, वहां जो पढ़ाया जाता है वह पढ़ता है, उसके बाद वह अपने भविष्य के कार्य व व्यवसाय को चुनता है और उसके लिए जो करना होता है, उसे करते हुए वह अपने मुकाम व लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है। मुकाम प्राप्त हो जाये तो सुख मिलता है, नहीं तो वह कुछ दुःखी व चिन्ता में रहते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देता है। वृद्धावस्था आती है, कुछ को रोग हो जाते हैं, उपचार चलता है और 50 से 80 के बीच अधिकांश स्त्री व पुरुषों की जीवनलीला समाप्त होकर मृत्यु हो जाती है। यदि इनमें कोई बचता है तो वह कुछ वर्ष बाद चल बसता है। जीवित व मृतक मनुष्य कहां से आये थे यह उन्हें पता नहीं होता। कहां जाना है व मरकर गये, इसका पता न उनको था न माता-पिता व परिवार के लोगों को ही होता है। परिवार के छोटे व बड़े लोग हैं, वह भी अपने कार्यों में लगे हुए सुखों को भोगने की इच्छा रखते हुए व प्रयास करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाते रहते हैं और जब तक मृत्यु न आये यही क्रम चलता है। प्रायः सभी लोग इसी को जीवन मानते हैं। उनके अनुसार जीवन का और कोई विशेष लक्ष्य आदि नहीं है। वेद से इतर अनेक मत-मतान्तर हैं, सबकी अपनी अपनी मान्यतायें हैं। कुछ बातें सत्य हैं तो बहुत सी मिथ्या व अविवेकपूर्ण भी हैं। वह सब अपने अपने अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

वैदिक धर्मियों के पास सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा दिया गया वेदेां का सत्य ज्ञान है जिसमें मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को तो बताया ही गया है, उसकी प्राप्ति के साधनों ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, पितृयज्ञ आदि सहित परोपकार व सेवा आदि के कामों का विधान भी किया गया है। वेदों के अनुसार यह संसार ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीन मौलिक सत्ताओं व तत्वों से मिलकर बना है। ईश्वर व जीव चेतन तत्व हैं। ईश्वर सर्वज्ञ एवं जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वव्यापक है तो जीवात्मा एकदेशी, अल्पपरिमाण, ससीम, कर्मानुसार जन्म व मृत्यु के बन्धनों में बंधा हुआ है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप होने से सदा-सर्वदा आनन्द से युक्त रहता है। वह सर्वान्तर्यामी होने से जीवात्मा के अन्दर व बाहर सर्व़व्यापक है। जीवात्मा सच्चित (सत्य$चेतन) है, आनन्द से युक्त नहीं है जैसा कि ईश्वर है। चेतन सत्ता होने के कारण इसे आनन्द वा सुखों की अभिलाषा रहती है। अज्ञान के कारण यह भौतिक पदार्थों की ओर अपना मुख करता है। भौतिक पदार्थों में सीमित व अल्प मात्रा में सुख हैं। उसी में यह उलज्ञ जाता है। भौतिक सुखों के लिए ही यह धन व द्रव्यों का संग्रह करता है। परिग्रही बनता है। धनोपार्जन व भौतिक सुखों में ऐसा लिप्त होता है कि ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप व इनके गुणों की उपेक्षा कर देता है। जीवात्मा को लक्ष्य का ज्ञान कराने में सबसे बड़ी बाधा मत-मतान्तर हैं। इसका कारण है कि इनमें ईश्वर व जीवात्मा का यथार्थ, तर्क व युक्तिसंगत ज्ञान नहीं है और न ही यह जानना चाहते हैं। इन मत-मतान्तरों की नींव अविद्या पर है। ऐसा नहीं कि सभी मत-मतान्तरों में शत प्रतिशत अविद्या ही हो, किसी में कम व किसी में अधिक भाग अविद्या का है परन्तु इनमें जितनी अविद्या है उसके कारण यह ईश्वर व जीवात्मा को भली प्रकार से जान नहीं पा रहे हैं। यह सभी मत-मतान्तर अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य ‘धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष’ तथा उसके साधनों को जानकर उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उन्हें इनका यथार्थ स्वरूप विदित नहीं है। संसार में अशान्ति का कारण भी अविद्या व मिथ्या ज्ञान ही सिद्ध होता है। यदि यह अविद्या व मिथ्याज्ञान समाप्त हो जाये तो संसार से दुःख व अशान्ति अपने आप दूर हो सकती है। संसार व जीवन विषयक सत्य स्थिति को जानकर कोई मनुष्य किसी के प्रति अन्याय व अत्याचार नही कर सकता। हिंसा व चोरी सहित धन व द्रव्यों का परिग्रह भी नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि उसे ज्ञात हो जाता है कि सृष्टि के सभी पदार्थों ईश्वर ने सभी मनुष्यों व प्राणियों के लिए बना रखे हैं और इन पर सबका समान अधिकार है। ईश्वर की आज्ञा ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ है कि मनुष्यों को सभी सांसारिक पदार्थों का भोग त्यागपूर्वक करना है। नहीं करेंगे तो दण्डनीय होंगे। यह दण्ड मनुष्य को इस जन्म व परजन्म में कब कैसे ईश्वर से प्राप्त होगा उसका ज्ञान ईश्वर ने आवश्यक न समझ कर वेदों में नहीं दिया है। फिर भी हम अपने अपने विवेक से व शास्त्रों में ऋषियों द्वारा किये गये विवेचन को पढ़कर कुछ कुछ जान सकते हैं।

ईश्वर, जीव व प्रकृति तीनों अनादि, अनुत्पन्न, सनातन, सदा रहने वाले, अनन्त काल तक रहने वाले, अमर व अविनाशी मौलिक पदार्थ हैं। ईश्वर अजन्मा होने से उसका जन्म व अवतार कभी नहीं होता। मनुष्य व अन्य प्राणियों के रूप में जीवात्मायें ईश्वरीय व्यवस्था से जन्म लेती हैं। इसका आधार पूर्व जन्म के कर्म होते हैं। ईश्वर हमारे पूर्व के सभी अनन्त जन्मों का साक्षी है। किसी जीवात्मा के जिन कर्मों का भोग करना शेष है, उनमें से कुछ व सभी कर्मों के आधार पर ईश्वर जीव को मनुष्य व अन्य योनियों में पक्षपातरहित होकर जन्म देता है। यही क्रम अनन्त काल तक आगे भी चलना है। इस जन्म में हम मनुष्य बने हैं। हमें अपने जन्म से अब तक घटी प्रायः सभी प्रमुख बातों का किसी का कम व किसी का पूर्ण ज्ञान है। जन्म से पूर्व हम थे या नहीं, थे तो कहां थे और नहीं थे तो इस जन्म में हमारी आत्मा जो कि एक चेतन सत्ता है, जो सुख, दुःख, हानि, लाभ, मान, अपमान, ईष्र्या व द्वेष का अनुभव व व्यवहार करती है, वह कहां से व कैसे इस मानव शरीर में आ गई। इन सभी प्रश्नों का समुचित निभ्र्रान्त उत्तर मत-मतान्तरों के ग्रन्थों व आचार्यों से नहीं मिलता, केवल वेद और वैदिक साहित्य में मिलता है। पुराण आदि ग्रन्थ इस विषय में परस्पर विरोघी व अविश्वसनीय बातें करते हैं। इस जन्म से पूर्व सुख व दुख का अनुभव करने वाली हमारी आत्मा का अस्तित्व नहीं था, इसका किसी के पास कोई भी प्रमाण नहीं है। बिना प्रमाण के ही हम यह मानते रहते हैं कि हमारा अस्तित्व नहीं था। हमें तो यह व्यवहार बुद्धिहीनता व मूर्खता का प्रतीत होता है। हम जीवात्मा के अस्तित्व, उसके स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव व उत्पत्ति विषयक प्रश्नों को जानने का भी प्रयास नहीं करते। यदि हमारा इस जन्म से पूर्व अस्तित्व न होता अर्थात् हमारा पूर्वजन्म न होता तो संसार के सभी मनुष्य व प्राणियों में, जिनके शरीरों में एक-एक चेतन आत्मा है, किसी भी प्रकार का भेद नहीं होना चाहिये था। सबकी आकृति, प्रकृति, संवेदनायें, ज्ञान व कर्म तथा परिवेश एक जैसे होने चाहिये थे। दो व अधिक मनुष्यों के देश, काल व परिस्थितियों तथा गुण-कर्म व स्वभाव में भेद ‘कर्मफल सिद्धान्त व पूर्वजन्म’ को सिद्ध करता है। हमारा पूर्वजन्म था, हमारे कर्म अलग अलग थे, उसी के अनुसार पुरस्कार व दण्ड स्वरूप हम मनुष्यों व इतर प्राणियों को नाना प्रकार के शरीर व अच्छी-बुरी परिस्थितियां ईश्वर द्वारा हम सभी को दी र्गइं हंै। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप पर विचार व चिन्तन-मनन करें। जिन प्रश्नों के उत्तर न मिले उसके लिए हमें सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेद, दर्शन व उपनिषद् आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। अन्धविश्वास के आधार पर किसी ग्रन्थ की कोई बात न मानें। जो तर्क व युक्तिसंगत हो, सृष्टिकर्म के अनुकूल हो तथा जिसे अपनी आत्मा स्वीकार करे, उसी बात को ही मानना चाहिये। ऐसा करके जीवात्मा के सत्य, स्वतन्त्र, अनादि, अनुत्पन्न, जन्म-मरण धर्मा, कर्मानुसार सुख व दुखों को भोगने वाले चेतन स्वरूप का निभ्र्रान्त ज्ञान होता है। ईश्वर व प्रकृति के सत्यस्वरूप सहित अपने लक्ष्य, उसकी प्राप्ति के साधनों व कर्तव्यों का ज्ञान भी हो जाता है।

मनुष्य के रूप में हम विद्यमान है। हमारा अस्तित्व चेतन जीवात्मा व मरणधर्मा शरीर का एक संयुक्त जीवन्त रूप है। सभी लोगों की जीवनयात्रा अनादि काल से चल रही है। लक्ष्य दुःखों से सर्वथा मुक्ति है जिसे मोक्ष कहते हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर का सत्य ज्ञान व उपासना से उसका साक्षात्कार करना आवश्यक है। साक्षात्कार तभी होता है जब जीवात्मा अपने पूर्व अशुभ कर्मों को प्रायः भोग लेता है और सद्कर्मों को करके आत्मा को पवित्र व दोषरहित कर लेता है। हमें लगता है कि उपासना में देर से सफलता मिलने का एक कारण हमारे जन्म जन्मान्तर के अशुभ कर्म व उनका पूर्णतया भोग कर उन्हें समाप्त करना है। जब तक अशुभ कर्मों का भोग पूरा नहीं होता, प्रयत्न व पुरुषार्थ करने पर भी जीवात्मा को ईश्वर साक्षात्कार नहीं होता। यदि अशुभ कर्म अधिक होंगे तो उपासना आदि साधनों को करने पर भी ईश्वर साक्षात्कार में विलम्ब हो सकता है। अतः मनुष्य जीवन में वेदाध्ययन से सत्य ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर की उपासना व सद्कर्मों पर ध्यान देना चाहिये। अशुभ कर्म पूर्णतः बन्द कर देने चाहिये। ऐसी अवस्था बना लेने पर भी भोग के लिए बचे हुए पूर्व के अशुभ कर्मों के कारण जीवन में दुःख आ सकते हैं। ऐसा होने पर दुःखी न होकर अपने मोक्ष के साधनों के अनुसार कर्तव्य पथ का अनुसरण व अनुगमन करते रहना चाहिये। ईश्वर का साक्षात्कार हो या न हो, हमें लगता है कि शुभ कर्म व उपासना आदि साधनों का सही प्रकार से सेवन करने से हम उपासना व ईश्वर-साक्षात्कार में आगे बढ़ते हैं। इसे जारी रखना चाहिये और स्वयं को ईश्वर में समर्पित रखना चाहिये। ऐसा होने पर हम तीव्र गति से आगे बढ़ सकते हैं। यह विश्वास रखना चाहिये कि हम ईश्वर द्वारा वेदों में कही गई ईश्वर की प्राप्ती की यात्रा पर सही दिशा में चल रहे हैं तो मंजिल कभी न कभी तो आयेगी ही। मंजिल दूर है अतः समय लग सकता है। यह जरूरी नहीं की हमें हमारी मंजिल मोक्ष इसी जन्म में मिल जाये। हमारे ऋषि व विद्वान बताते हैं कि मोक्ष प्राप्ति में अनेक जन्म भी लग सकते हैं। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता है। शायद इसी लिए धैर्य को धर्म का प्रथम लक्षण बनाया गया है।

जीवात्मा अनादि काल से जन्म मरण के बंधनों में बंधता व छूटता आ रहा है। हमारा अनेक बार मोक्ष भी हुआ है और अनेकानेक, अनन्त बार जन्म व मरण भी हुआ है। हम संसार में दृष्टिगोचर होने वाली प्रायः सभी योनियों में एक व अनेक बार हम रह आये हैं और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा। हम व अन्य कोई जीव दुःख नही चाहता। इन अनचाहे सभी दुःखों से बचने का एकमात्र उपाय केवल मोक्ष के साधनों का सेवन व व्यवहार है। मोक्ष को प्राप्त होकर जीवात्मा बहुत लम्बी अवधि, 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक, मुक्ति में दुःखों से सर्वथा मुक्त रहेंगे और ईश्वर के सान्निध्य से उसके आनन्द को भोगेंगे। उसके बाद पुनः जन्म, मरण, पुनर्जन्म होगा और देर में व शीघ्र फिर मुक्ति हो सकती है। यह वेद व शास्त्रों का ज्ञान है। इसमें वेद सहित हमारे दर्शन व उपनिषदकार आप्त ऋषि प्रमाण हैं जो असत्य व अनुचित कथन व शब्द प्रयोग कभी नहीं करते। अतः इस पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिये। हम यह भी बता दें कि हम कोई बड़े साधक नहीं है। हमने जो पढ़ा, विचार किया व हमें उचित लगा, उसे हमने इस लेख में दिया है। हमें लगता है कि हमारे विद्वान हमसे इन विषयों में पूर्णतः व कुछ सीमा तक सहमत होंगे। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य


from Tumblr http://ift.tt/2soZqSR
via IFTTT

Friday, March 17, 2017

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो - जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को...

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो -
जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को “सौर वर्ष ” कहते हैं । सौर वर्ष में पृथिवी अपनी यह परिक्रमा आकाश में जिस परिधि पर रहकर करती है, उसे “क्रान्तिवृत्त” कहते हैं।इस क्रान्तिवृत्त के १२ भाग कल्पित किये गये हैं और उन १२ भागों के नाम उन-उन स्थानों पर विद्यमान आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुयी आकृति से मिलते जुलते आकार वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं जो कि इस प्रकार हैं -१मेष , २वृष , ३मिथुन , ४कर्क , ५सिंह , ६कन्या , ७तुला , ८वृश्चिक , ९धनु , १०मकर , ११कुम्भ , १२मीन । ये प्रत्येक भाग वा आकृति"राशि" कहलाते हैं। जब एक राशि से दूसरी राशि में पृथिवी संक्रमण करती है तब उसको “ संक्रान्ति” कहते हैं। पृथिवी के इस संक्रमण को लोक में सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं।पृथिवी के इस संक्रमण में सूर्य ६ महीने क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता है तथा ६ मास दक्षिण की ओर निकलता है ।ये ६ -६ महीने की अवधियां उत्तरायण व दक्षिणायन कहलाती हैं। सूर्य की मकरराशि की संक्रान्ति से उत्तरायण व कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है।
सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व दिया गया है इस कारण उत्तरायण के आरम्भ दिवस को मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। यद्यपि इस समय उत्तरायण परिवर्त्तन , प्रचलन में आ रही मकर संक्रान्ति के दिन नहीं होता है। अयन चलन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण जो लगभग २२ - २३ दिन का अन्तर आ गया है उसे ठीक कर लेना चाहिये।
जिस प्रकार बाहर के जगत् में सूर्य का उत्तरायण दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार हमारे अभ्यन्तरीण आध्यात्मिक जगत् में भी उत्तरायण हुआ करता है । उत्तरायण कहते हैं ऊपर की ओर गति। गीता में कहा है - “ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:” अर्थात् सत्त्वगुण में रहने वाले मनुष्य ऊपर जाते हैं। यह मनुष्य के लिये ऊपर को जाना, ज्ञान के प्रकाश के द्वारा सम्भव है। सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक है, इसलिये यह मनुष्य को ज्ञान के सम्बन्ध से जोड़ता है। ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम् ज्ञान की ही पराकाष्ठा को वैराग्य कहा गया है। बस इस वैराग्य रूप ज्ञान के होने पर उन्नति अर्थात् मोक्ष मार्ग की ओर गति का होना आरम्भ हो जाता है।
महाभारत काल के इतिहास पर दृष्टिपात करके देखो कि मृत्यञ्जयी ब्रह्मचारी भीष्म पितामह जब शरशय्या पर आसीन हो गये थे तब उन्होंने कहा था कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं जायेगा और सूर्य ही नहीं अपितु वस्तुतः जब तक मेरे जीवन का उत्तरायण काल नहीं आता है तब तक मैं देहत्याग नहीं करूंगा। इसी प्रकार हमें भी तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान आदि योग साधनों के द्वारा अपने जीवन के उत्तरायण का निर्माण करना चाहिये, यही प्रेरणा ग्रहण करना मकर संक्रान्ति पर्व की पर्वता है। जीवन को उत्तर अर्थात् श्रेष्ठ बनाने पर ही देहावसान होने के पश्चात् जीव को श्रेष्ठ नवजीवन रूप सद्गति प्राप्त होती है। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि मकर संक्रान्ति पर्व आप और हम सबके जीवन के उत्तरायण के लिये प्रेरक बनता हुआ मंगलमय हो। लेखक-विष्णुमित्र वेदार्थी ९४१२११७९६५


from Tumblr http://ift.tt/2nNu0PR
via IFTTT

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु...

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु के उपरान्त, पोप कालूराम शास्त्री ने *आर्यसमाज की मौत* नामक पुस्तक लिखी, जिसका उत्तर शास्त्रार्थ महारथी *मनसाराम वैदिक तोप* ने इस पुस्तक *पौराणिक पोल प्रकाश* यहाँ से download कीजिये, कुल 580 पृष्ठों में, 4 भागों में विभाजित:

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-1:* [21 MB]
http://ift.tt/2ibCBh9

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-2:* [20 MB]
http://ift.tt/2iZPw2P

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-3:* [34 MB]
http://ift.tt/2ibHPcJ

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-4:* [34 MB]
http://ift.tt/2iZPwQn


from Tumblr http://ift.tt/2mXLtb2
via IFTTT

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी...

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी सज्जन के बाग मे हुई और आर्यसमाज के लिए ५००० /- का पहला योगदान मुस्लिम संप्रदाय के मतावलम्बी श्री अल्लाहरखाँ ने दिया था | अनेक पादरी उनके सहयोगी थे | अमर शहीद भगतसिंह के दादा श्री अजीत सिंह सिख संप्रदाय से थे किन्तु महर्षि दयानंद के विचारो से प्रेरित होकर वैदिक धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने लगे | उन्होंने आर्यसमाज के मंत्री के स्वरूप मे पंजाब मे आर्यसमाज के विस्तार हेतु सक्रिय भुमीका निभाई |
लाला लाजपत राय, शहीद चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्र लोहड़ी, अश्फाक उल्ला खाँ, शहीद-ए-आजम सरदार भगतसिंह, क्रांतिगुरू श्याम जी कृष्ण वर्मा, भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी, स्वामी श्रद्धानंद, वीर सावरकर, मदनलाल धींग्रा को कौन नही जानता? इन सभी ने आर्यसमाज के ही विचारो से प्रेरित होकर माँ भारती को परतंत्रता की बेडीयो से मुक्त कराने हेतु अपणे प्राणो की आहुती दी. |
मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध, परोपकार के लिए सदैव तत्पर आर्यसमाज में आपका स्वागत है |
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी एवं योगीराज श्रीकृष्ण चंद्र जी आदी भारतीय संस्कृति के महान प्रेरणास्पद रहे है | महाभारत तथा रामायण इत्यादी ग्रन्थ मनुष्य रचित सच्चे ऐतिहासिक ग्रंथ है तथा मनुष्यों के लिए शिक्षाप्रद है | आर्यसमाज मानता है के ईश्वर एक है जो ईस ब्रम्हांड का रचियता है, वही कर्ता धर्ता है | वह सर्वव्यापक है, निराकार है | वह मनुष्यो के कर्मो का फल देता है (बुरे का बुरा और अच्छे का अच्छा) आर्यसमाज तर्कपूर्ण वैज्ञानिक मान्यताओं को महत्व देता है | आर्यसमाज मानता है के “वेद” ही ईश्वरीय ज्ञान है और सभी ज्ञान का भंडार है | सभी सत्य विद्याओं का पुस्तक है | आर्य समाज शाकाहार को मनुष्य का भोजन मानता है तथा मांसाहार, शराब, सिगरेट आदी व्यसनों को धर्म के विरुद्ध मानता है और इसका कडा विरोध करता है |
आर्य समाज छुआछूत तथा जाति-पाति को मनुष्य के सामाजिक उन्नति में बाधक मानता है | आर्यसमाज संस्कृत को भाषाओं की जननी मानता है तथा मातृभाषा को प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक मानता है | मानव के संपुर्ण जिवन के लिए आर्यसमाज आश्रम व्यवस्था का पुरस्कार करते हुवे (ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) को समाज की उन्नति का आवश्यक साधक मानता है | आर्यसमाज मानता है के कर्म के आधार पर ही वर्ण बने है (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य आदी)
.
आर्य समाज का विशालकाय, विश्वव्यापी संगठन निम्न स्वरूप कार्यरत है..
.
👉लगभग १०००० आर्यसमाज मंदिर विश्व भर मे स्थापित है
👉लगभग २५०० विज्ञालयो एवं महाविद्यालयों का संचालन जिसमे (डीएवी) यह प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था भी सम्मिलित है | सरकार के बाद संभवतः यह सब से बडी आर्यसमाज की शैक्षणिक शृंखला है |
👉लगभग ६०० गुरुकुलो (आवासिय) शिक्षण संस्थानों का संचालन |
👉१०,००० से अधिक अनाथ बच्चों का अनाथालयो द्वारा पालन पोषण |
👉२५० से लगभग ५००० लघु स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन द्वारा मनुष्य मात्र की सेवा |
👉आडम्बर और जातिआधारीत बन्धनो से मुक्त हजारों विवाहों का प्रतिवर्ष आयोजन
👉नौजवानों के शारिरिक विकास के लिए आर्य वीर दल द्वारा हजारो व्यायाम शाला का संचालन तथा नैतिक व शारीरिक शिक्षा के लिए हजारो आवासीय निःशुल्क शिबीरो का प्रतिवर्ष आयोजन
👉महिलाओं के लिए लघु उद्योग, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम का संचालन
आर्य समाज का विस्तार विश्व के लगभग हर कोने मे हुआ है
१ भारत
२ कनाडा
३ केन्या
४ फ्रांन्स
५ युगाण्डा
६ गयाना
७ त्रीनीडाड
८ सूरीनाम
९ टार्मिनीया
१० नेपाल
११ म्यांमार
१२ बांग्लादेश
१३ सिंगापुर
१४ अमेरिका
१५ इंग्लैंड
१६ मारीशस
१७ पाकिस्तान
१८ हाँलैड
१९ थाईलैंड
२० न्यूजीलैण्ड
२१ आँस्ट्रेलिया
२२ फीजी
.
जातिवाद विहीन समाज की स्थापना करना चाहते हो?
अंधविश्वास को दुर करना चाहते हो?
पाखण्ड से समाज को बचाना चाहते हो?
आर्यसमाज आपको आमंत्रित करता है |
अपने निकट के आर्यसमाज से आज ही संबंन्ध स्थापित करे |
.
महाराष्ट्र आर्य प्रतिनिधी सभा
आर्य समाज परली बैजनाथ, जिला बीड, महाराष्ट्र - ४३१५१५
. जगदाले रोहित आर्य
आर्यसमाज, परभणी, महाराष्ट्र ४३१ ४०१.
मो ०९९६०९८३९९१.


from Tumblr http://ift.tt/2nNwgH8
via IFTTT

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते...

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।गीता (2/20)
शरीर में 6 विकार होते हैं – उत्पन्न होना,सत्तावाला दीखना,परिवर्तन होना,वृद्धि होना,घटना और नष्ट होना।आत्मा इन विकारों से मुक्त है। यह सनातन है।यह कभी मृत्यु को आलिंगन नहीं करती।जिसका जन्म होता है,उसी की मृत्यु अवश्यंभावी है।आत्मा में संयोग एवं वियोग नहीं होते।
आत्मा स्वतःसिद्ध निर्विकार है।इसकी सत्ता का आरम्भ और अन्त नहीं होता।इसे जन्मरहित कहते हैं।इसका अपक्षय कभी भी नहीं होता।शरीर कुछ आयु पश्चात् घटने लगता है,शक्ति क्षीण होने लगती है,इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं।लेकिन नित्य –तत्त्व आत्मा में किन्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
आत्मा अनादि है।इस नित्य – तत्त्व में कोई वृद्धि भी नहीं होती।शरीर नश्वर है,जबकि आत्मा अविनाशी है।
शरीर परिवर्तनशील और विकारी होने के कारण आत्मा का अंग नहीं है।
ओम शान्ति


from Tumblr http://ift.tt/2mXMoIo
via IFTTT

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को...

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को ही याद करते हुए कीजिए सब काज ,वही सबका मित्र है वही सबका नाथ //🕉🕉🕉⛳⛳🕉🕉🕉


from Tumblr http://ift.tt/2nNLMmk
via IFTTT

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन || एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला...

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन
|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! ||
1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ
2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा।
प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े।
और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था।
3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’
प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है।
4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल
5. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है।
गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे।
6. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए।
7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता।
प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी।
8. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी।
9. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं।
10. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लो और वेदो की ओर लोटो!


from Tumblr http://ift.tt/2mXMgbM
via IFTTT

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏 🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏 दिनांक – 18 दिसम्बर 2016 दिन – रविवार तिथि...

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏
🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏

दिनांक – 18 दिसम्बर 2016
दिन – रविवार
तिथि – पंचमी
नक्षत्र– आश्लेषा
पक्ष– कृष्ण
माह – पौष
ऋतु – हेमन्त
सूर्य – दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 117
कलयुगाब्द – 5118
विक्रम संवत् – 2073
शक संवत् – 1939
दयानंदाब्द – 193

🌷 जो धर्म को त्यागता है , धर्म उसे त्याग देता है ।
🌷 जो समय नष्ट करता है , समय उसे नष्ट कर देता है ।
🌷 जो धर्म का पालन करता है , धर्म उसका पालन करता है ।
🌷 जो ईशवर के आश्रित होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है , ईशवर उसका पालन करता है ।
🌷 जो अपनी आत्मा जैसी दुसरे की आत्मा को समझता है , वह किसी से बैरभाव नही रख सकता ।

🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🌷🍃🌷🍃

🌷 यथोद्वरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिन : ।। ( मनु स्मृति )

🌷 अर्थ :- जैसे धान से चावल निकालने वाला छिलके को अलग कर चावलों की रक्षा करता है ।चावलों को टूटने नही देता । वैसे ही राजा रिश्वतखोरों , अन्यायकारियों , चोर बाजारी करने वालों , डाकुओं , चोरों और बलात्कारियों को मारे और बाकी प्रजा की रक्षा करें ।

🌷🍃🌷🍃 ओउम् 🌷🍃🌷🍃 सुदिनम 🌷🍃🌷🍃 सुप्रभातम


from Tumblr http://ift.tt/2nNOpEz
via IFTTT

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं । तू आदमी है, अवतार नहीं ।। गिर, उठ, चल, दौड, फिर...

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं ।
तू आदमी है, अवतार नहीं ।।
गिर, उठ, चल, दौड, फिर भाग,
क्योंकि
“जीत” संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं


from Tumblr http://ift.tt/2mXPI67
via IFTTT

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||~~न्यायदर्शन~यजुर्वेद~४०~४~~पद्यानुवाद~~~~~अद्वितीय निश्चल अकम्पन्, मन से तीव्र है वेगवान| पहले से व्यापक वह ठहरा, देख न पाये अविद्वान्| सब जीवों को धारण कर, सबको नियमों में चलाने वाला| अंतर्यामी घट घट वासी, खुद ही खुद से मिलाने वाला|| आओ विमल प्रशांत बना मन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभु को ध्यावें| अतुलनीय उस परमेश्वर के, अमृत मोक्षानंद को पावें||👏


from Tumblr http://ift.tt/2nNClmI
via IFTTT

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु...

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु अपना पुरुषार्थ छोडना नहीं चाहिए।


from Tumblr http://ift.tt/2mXLsE0
via IFTTT

"ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।"

“ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।”

- ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।
from Tumblr http://ift.tt/2nNOrMH
via IFTTT

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412 ना तो जनवरी साल का पहला मास है...

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412
ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..
जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..
नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे
December बन गया ..
ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..
जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..
इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..
साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..
लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..
भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।
इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??
तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।
चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..
इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..
जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..
कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेसब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..
हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं? जय आर्य जय आर्यव्रत🙏🙏


from Tumblr http://ift.tt/2mXMfVg
via IFTTT

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim): 7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से...

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim):

7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से जाता रहा। भारत में इस्लामिक शासन का विस्तार 7वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिन्ध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों द्वारा हुआ। लगभग 712 में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बूच पर के अभियान का सफल नेतृत्व किया।

इस्लामिक खलीफाओं ने सिन्ध फतह के लिए कई अभियान चलाए। 10 हजार सैनिकों का एक दल ऊंट-घोड़ों के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया। 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया।

मुहम्मद बिन कासिम अत्यंत ही क्रूर यौद्धा था। सिंध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सर कटवाना स्वीकर किया, पर मीर कासिम की पत्नी बनना नहीं। इसी तरह वहां के राजा दाहिर (679ईस्वी में राजा बने)और उनकी पत्नियों और पुत्रियों ने भी अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। सिंध देश के सभी राजाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक और दुखदायी हैं। आज सिंध देश पाकिस्तान का एक प्रांत बनकर रह गया है। राजा दाहिर अकेले ही अरब और ईरान के दरिंदों से लड़ते रहे। उनका साथ किसी ने नहीं दिया बल्कि कुछ लोगों ने उनके साथ गद्दारी की।


from Tumblr http://ift.tt/2nNHXNT
via IFTTT

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે, કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે; ઘાયલ મરતાં મરતાં રે! માતની...

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે,
કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે;
ઘાયલ મરતાં મરતાં રે!
માતની આઝાદી ગાવે.

કો’ની વનિતા, કો’ની માતા, ભગિનીઓ ટોળે વળતી,
શોણિતભીના પતિ-સુત-વીરની રણશૈયા પર લળતી,
મુખથી ખમા ખમા કરતી
માથે કર મીઠો ધરતી.

થોકે થોકે લોક ઊમટતા રણજોધ્ધા જોવાને,
શાહબાશીના શબદ બોલતા પ્રત્યેકની પિછાને;
નિજ ગૌરવ કેરે ગાને
જખ્મી જન જાગે અભિમાને.

સહુ સૈનિકનાં વહાલાં જનનો મળિયો જ્યાં સુખમેળો,
છેવાડો ને એક્લવાયો અબોલ એક સૂતેલો;
અણપૂછયો અણપ્રીછેલો
કોઇનો અજાણ લાડીલો.

એનું શિર ખોળામાં લેવા કોઇ જનેતા ના’વી;
એને સીંચણ તેલ-કચોળાં નવ કોઇ બહેની લાવી;
કોઇના લાડકવાયાની
ન કોઇએ ખબર પૂછાવી.

ભાલે એને બચીઓ ભરતી લટો સુંવાળી સૂતી,
સન્મુખ ઝીલ્યા ઘાવો મહીંથી ટપટપ છાતી ચૂતી;
કોઇનો લાડકવાયાની
આંખડી અમૃત નીતરતી.

કોઇના એ લાડકવાયાનાં લોચન લોલ બિડાયાં,
આખરની સ્મૃતિનાં બે આંસુ કપોલ પર ઠેરાયાં;
આતમ-દીપક ઓલાયા,
ઓષ્ઠનાં ગુલાબ કરમાયાં.

કોઇનાં એ લાડકડા પાસે હળવે પગ સંચરજો,
હળવે એનાં હૈયા ઊપર કર-જોડામણ કરજો;
પાસે ધૂપસળી ધરજો,
કાનમાં પ્રભુપદ ઉચરજો !

વિખરેલી એ લાડકડાની સમારજો લટ ધીરે,
એને ઓષ્ઠ-કપોલે-ભાલે ધરજો ચુંબન ધીરે;
સહુ માતા ને ભગિની રે !
ગોદ લેજો ધીરે ધીરે !

વાંકડિયા એ ઝુલ્ફાંની મગરૂબ હશે કો માતા,
એ ગાલોની સુધા પીનારા હોઠ હશે બે રાતા;
રે ! તમ ચુંબન ચોડાતાં
પામશે લાડકડો શાતા.

એ લાડકડાની પ્રતિમાનાં છાનાં પૂજન કરતી,
એની રક્ષા કાજ અહર્નિશ પ્રભુને પાયે પડતી;
ઉરની એકાંતે રડતી
વિજોગણ હશે દિનો ગણતી.

કંકાવટીએ આંસુ ઘોળી છેલ્લું તિલક કરંતા,
એને કંઠ વીંટાયા હોશે કર બે કંકણવંતા;
વસમાં વળામણાં દેતા
બાથ ભીડી બે પળ લેતાં.

એની કૂચકદમ જોતી અભિમાનભરી મલકાતી,
જોતી એની રૂધિર-છલક્તી ગજગજ પહોળી છાતી;
અધબીડ્યાં બારણિયાંથી
રડી કો હશે આંખ રાતી.

એવી કોઇ પ્રિયાનો પ્રીતમ આજ ચિતા પર પોઢે,
એકલડો ને અણબૂઝેલો અગન-પિછોડી ઓઢે;
કોઇના લાડકવાયાને
ચૂમે પાવકજ્વાલા મોઢે.

એની ભસ્માંકિત ભૂમિ પર ચણજો આરસ-ખાંભી,
એ પથ્થર પર કોતરશો નવ કોઇ કવિતા લાંબી;
લખજો: ‘ખાક પડી આંહી
કોઇના લાડકવાયાની’.

- ઝવેરચંદ મેઘાણી


from Tumblr http://ift.tt/2mXNHXX
via IFTTT

ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015...

ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015 RAJNEESH LEAVE A COMMENT संस्कृत भाषा में परमात्मा = परम + आत्मा तथा जीवात्मा = जीव + आत्मा दो शब्द हैं। परमात्मा शब्द का अर्थ है – सर्वश्रेष्ठ आत्मा और जीवात्मा का अर्थ है प्राणधारी आत्मा आत्मा शब्द दोनों के लिए आता है और बहुधा परम-आत्मा तथा जीव-आत्माओ का भेदभाव किये बिना समस्त जीवनतत्वो के लिए व्यवहृत किया जाता है। परमात्मा और जीवात्माओं के कार्यो में इतनी समानता है [मगर दोनों के कार्य क्षेत्र निसंदेह अत्यंत विभिन्न हैं] की प्रायः इनके सम्बन्ध के विषय में भ्रम हो जाता है और इस भ्रम के कारन दर्शनशास्त्र तथा धर्म दोनों क्षेत्रो में बाल की खाल निकाली जाती है। खासतौर पर ईश्वर को ना मानने वाले लोग मनुष्य को ही “सिद्ध” व “ईश्वर” का दर्ज देकर अपनी अल्पज्ञता के कारण ऐसा विचार लाते हैं – वैदिक ईश्वर का स्वरुप कैसा है और जीव का स्वरुप कैसा है – जब इस प्रकार की चर्चा की जाती है तब आवश्यक हो जाता है इस प्रकृति के बारे में भी कुछ जाना जाए – तो आइये – इस विषय पर कुछ विचार करे – इस कार्यरूप सृष्टि में तीन नियम बहुत ही स्पष्ट रूप से दीखते हैं : पहिला – इस सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ नियमपूर्वक, परिवर्तनशील है। दूसरा – प्रत्येक जाती के प्राणी अपनी जाती के ही अंदर उत्तम, माध्यम और निकृष्ट स्वाभाव से पैदा होते हैं। तीसरा – इस विशाल सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है वह सब नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। पहिला नियम : सृष्टि नियमपूर्वक परिवर्तनशील है इसका अर्थ जो लोग सृष्टि को स्वाभाविक गुण से परिवर्तनशील मानते हैं वे गलती पर हैं क्योंकि स्वाभाव में परिवर्तन नहीं होता ऐसे लोग भूल जाते हैं की परिवर्तन नाम है अस्थिरता का और स्वाभाव में अस्थिरता नहीं होती क्योंकि उलटपलट, अस्थिर ये नैमित्तिक गुण हैं स्वाभाविक नहीं। इसलिए सृष्टि में परिवर्तन स्वाभाविक नहीं। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है की यदि प्रकृति में परिवर्तन स्वाभाविक माने तो ये अनंत परिवर्तन यानी अनंत गति माननी पड़ेगी और फिर एकसमान अनंत गति मानने से संसार में किसी भी प्रकार से ह्रासविकास संभव नहीं रहेगा किन्तु सृष्टि में बनने और बिगड़ने की निरंतर प्रक्रिया से सिद्ध होता है की सृष्टि का परिवर्तन नैमित्तिक है सवभविक नहीं, इसीलिएि इस परिवर्तनरुपी प्रधान नियम के द्वारा यह सिद्ध होता है की सृष्टि के मूल कारणों में से यह एक प्रधान कारण है जो खंड खंड, परिवर्तन शील और परमाणुरूप से विद्यमान है। परन्तु यह परमाणु चेतन और ज्ञानवान नहीं हैं इसकी बड़ी वजह है की जो भी चेतन और ज्ञानवान सत्ता होगी वो कभी दूसरे के बनाये नियमो में बंध नहीं सकती बल्कि ऐसी सत्ता अपनी ज्ञानस्वतंत्रता से निर्धारित नियमो में बाधा पहुचाती है – जहाँ तक हम देखते हैं परमाणु बड़ी ही सच्चाई से अपना काम कर रहे हैं – जिस भी जगह उनको दूसरे जड़ पदार्धो में जोड़ा गया – वहां आँख बंद करके भी कार्य कर रहे हैं जरा भी इधर उधर नहीं होते इससे ज्ञात होता है की इस सृष्टि का परिवर्तनशील कारण जो परमाणु रूप में विद्यमान है ज्ञानवान नहीं बल्कि जड़ है – इसी जड़, परिवर्तनशील और परमाणु रूप उपादान कारण को माया, प्रकृति, परमाणु मेटर आदि नामो से कहा जाता है और संसार के कारणों में से एक समझा जाता है दूसरा नियम : सभी प्राणियों के उत्तम और निकृष्ट स्वाभाव हैं। अनेक मनुष्य प्रतिभावान, सौम्य और दयावान होते हैं, अनेक मुर्ख उद्दंड और निर्दय होते हैं। इसी प्रकार अनेक गौ, घोडा आदि पशु स्वाभाव से ही सीधे होते हैं और अनेक शेर, आदि क्रोधी और दौड़दौड़कर मारने वाले होते हैं यहाँ देखने वाली बात है की ये स्वभावविरोध शारीरिक यानी भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है, जो चैतन्य बुद्धि और ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। लेकिन ध्यान देने वाली है ये ज्ञान प्राणियों के सारे शरीर में व्याप्त नहीं है, क्योंकि यदि सारे शरीर में ये ज्ञान व्याप्त होता तो किसी का कोई अंग भंग यथा अंगुली, हाथ, पैर आदि कट जाने पर उसका ज्ञानंश कम हो जाना चाहिए लेकिन वस्तुतः ऐसा होता नहीं इसलिए यह निश्चित और निर्विवाद है की ज्ञानवाली शक्ति जो प्राणियों में वास करती है वो पुरे शरीर में व्याप्त नहीं है प्रत्युत वह एकदेशी, परिच्छिन्न और अनुरूप ही है क्योंकि सुक्षतिसूक्ष्म कृमियों में भी मौजूद है दूसरा तथ्य ये भी है की यदि पुरे शरीर में ज्ञानशक्ति मौजूद होती तो जैसे शरीर का आकर बढ़ता है वैसे उस शक्ति को भी बढ़ना पड़ता जबकि ऐसा होता नहीं और ये शक्ति परमाणुओ के संयोग से भी नहीं बनी क्योंकि ऊपर सिद्ध किया गया की ज्ञानवान तत्व, परमाणु संयुक्त होकर नहीं बन सकता और न ही ये हो सकता है की अनेक जड़ और अज्ञानी परमाणु एकत्रित होकर परस्पर संवाद ही जारी रख सकते हो। यदि कोई मनुष्य ब्रिटेन में जिस समय पर गाडी दौड़ा रहा है – तो उसी समय पूरी दुनिया में मौजूद इंसान उस गाडी और मनुष्य को नहीं देख पा रहे इसलिए प्राणियों में मौजूद ज्ञानवान शक्ति, अल्पज्ञ है, एकदेशी है, परिच्छिन्न है। इसलिए इस शक्ति को जीव, रूह और सोल के नाम से जानते हैं। इस विस्तृत सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है, वह नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। सूर्य चन्द्र और समस्त ग्रह उपग्रह अपनी अपनी नियत धुरी पर नियमित रूप से भ्रमण कर रहे हैं। पृथ्वी अपनी दैनिक और वार्षिक गति के साथ अपनी नियत सीमा में घूम रही है। वर्षा, सर्दी और गर्मी नियत समय में होती है। मनुष्य और पशुपक्ष्यादि के शरीरो की बनावट वृक्षों में फूलो और फलो की उत्पत्ति, बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज का नियम और प्रत्येक जाती की आयु और भोगो की व्यवस्था आदि जितने इस सृष्टि के स्थूल सूक्ष्म व्यवहार हैं, सबमे व्यवस्था, प्रबंध और नियम पाया जाता है। नियामक के नियम का सब बड़ा चमकार तो प्रत्येक प्राणी के शरीर की वृद्धि और ह्रास में दिखलाई देता है। क्यों एक बालक नियत समय तक बढ़ता और क्यों एक जवान धीरे धीरे ह्रास की और – वृद्धावस्था की और बढ़ता जाता है इस बात का जवाब कोई नहीं दे सकता यदि कोई कहे की वृद्धि और ह्रास का कारण आहार आदि पोषक पदार्थ हैं, तो ये युक्तियुक्त और प्रामाणिक नहीं होगा क्योंकि हम रोज देखते हैं एक ही घर में एक ही परिस्थिति में और एक ही आहार व्यवहार के साथ रहते हुए भी छोटे छोटे बच्चे बढ़ते जाते हैं और जवान वृद्ध होते जाते हैं तथा वृद्ध अधिक जर्जरित होते जाते हैं। इन प्रबल और चमत्कारिक नियमो से सूचित होता है की इस सृष्टि के अंदर एक अत्यंत सूक्ष्म, सर्वव्यापक, परिपूर्ण और ज्ञानरूपा चेतनशक्ति विद्यमान है जो अनंत आकाश में फ़ैल हुए असंख्य लोकलोकान्तरो का भीतरी और बाहरी प्रबंध किये हुए हैं। ऐसा इसलिए तार्किक और प्रामाणिक है क्योंकि नियम बिना नियामक के, नियामक बिना ज्ञान के और ज्ञान बिना ज्ञानी के ठहर नहीं सकता। हम सम्पूर्ण सृष्टि में नियमपूर्वक व्यवस्था देखते हैं, इसलिए सृष्टि का यह तीसरा कारण भी सृष्टि के नियमो से ही सिद्ध होता है। इसी को परमात्मा, ईश्वर खुदा और गॉड कहते आदि अनेक नामो से पुकारते हैं हैं जिसका मुख्य नाम ओ३म है। सृष्टि के ये तीनो कारण स्वयंसिद्ध और अनादि हैं। मेरे मित्रो, ज्ञान और विज्ञान की और लौटिए, सत्य और न्याय की और लौटिए वेदो की और लौटिए…. आओ लौट चले वेदो की और।

Read more at Aryamantavya: ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं http://wp.me/p6VtLM-1Wc


from Tumblr http://ift.tt/2nNFO4V
via IFTTT

हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या...

हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या आपने कभी देखा है की सिखों के दस गुरु है उनको कभी मंचों य स्टेजों पर नाचते हुए - 2⃣किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं की किसी भी सिख गुरु की कहीं नचवा दे । 3⃣क्यों की सिख अपने गुरुओं का आदर करते है और उनका अपमान बिलकुल भी सहन नहीं कर सकते ।। 4⃣क्या कभी किसी मुश्लिम को उनके गुरु य मोहम्मद य कोई भी उनके नजरों में उनका कोइ महापुरुष य महामानव आपने नाचता हुआ य उसका अपमान होता देखा है । 5⃣क्यों की मुश्लिम भी अपने महापुरुषों की ( उनकी नजरों में ) बेज्जती सहन नहीं कर सकते ,किसी के माई के लाल में हिम्मत नहीं है की कोइ उनके मोहम्मद य किसी और के बारे में कुछ कह दे तलवार चल जाती है । 6⃣ऐसे ही इसाई है
7⃣लेकिन हिन्दू - अपने महापुरुष श्री कृष्ण को स्टेजों पर “ राधा "के साथ ( जबकि राधा के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था ) नचवाने में अपनी शान समझते है ,, एक तरफ तो उनको परमात्मा मान कर पूजा करते है और दूसऱी तरफ उनको चोर , रास रचाने वाला , स्त्रियों के कपडे चुराने वाला कहने में अपनी शान समझते है ,,, ऐसे ही शिव जी को अपना परमात्मा बना कर पूजते है , और दूसरी तरफ उनको भंगेड़ी ( भांग पीने वाला ) भी कहने में अपनी शान समझते है ,,,,,, हिन्दुओं ( आर्यो ) कब तक अपने महापुरुषों का अपमान तुम अपने आप ही करते रहोगे ।………………..


from Tumblr http://ift.tt/2mXEFdt
via IFTTT

ओ३म् *🌷अण्डा―एक जहर🌷* _(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल...

ओ३म्

*🌷अण्डा―एक जहर🌷*

_(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल का बहुत बड़ा स्रोत है।यह मानव चर्म की परतों में जमा हो धमनियों को सिकुड़ा देता है।परिणामतः दिल का दौरा, लकवा, जेथोमा जैसे भयंकर रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है।"हायपर-कौलिस्टेरोलेमिया" होने पर मनुष्य उच्च रक्तचाप का रोगी बन जाता है।बच्चों के लिए तो यह बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है।इसमें सोडियम सॉल्ट की मात्रा अधिक होती है।ब्लडप्रैशर के मरीजों के लिए जहर रुप है।अण्डे के सफेद भाग में नमक और पीले भाग में कोलिस्ट्रोल दोनों ही स्वास्थ्य हेतु घातक हैं।_

_(2) अण्डे में कार्बोहाइड्रेटस बिल्कुल नहीं है।इससे कब्ज, जोडों के दर्द जैसी बीमारियां अनायास हो जाती हैं।अण्डा कफदायक होने से शरीर के पोषक-तत्त्वों को असन्तुलित कर देता है।अण्डे में साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के अतिरिक्त एक नया माइक्रोव बैक्टीरिया भी पाया जाता है।यह आंतों में भयंकर रोग उत्पन्न करता है।अण्डे खाने से गठिया, गाउट जैसी वात-जनित बीमारियाँ हो जाती हैं जो बुढ़ापे में खतरनाक, पीड़ादायक मोड़ ले-लेती हैं।अण्डे में तुरन्त ऊर्जा देने वाले शुगर और स्टार्च नहीं हैं।_

_(3) पोल्ट्री-फार्म की मुर्गियों को रख-रखाव हेतु विभिन्न प्रकार की घातक दवाइयाँ दी जाती हैं, या उनका छिड़काव किया जाता है, परिणामतः वे घातक दवाइयों का बहुत सारा अंश श्वास अथवा मुँह के माध्यम से खाने के संग पेट में पहुँच जाता है।यही कारण है कि कई प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि उनके पेट में डी०डी०टी० जैसा जहर भी पाया जाता है जो खाने वालों के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होता है।जैसे गाय, बैल, भैंसों, सूअर, बकरा आदि को मांसवर्द्धक दावाएँ दी जाती हैं।पोल्ट्री-फार्मों में भी इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।चूजे और गिद्ध को एण्टीबायोटिक्स की हल्की मात्रा वजन वृद्धि हेतु दी जाती है और उनका व्यापारिक शोषण किया जाता है।बुद्धिधारियो ! जरा गम्भीर चिन्तन करें।ऐसे अण्डे, मांस खाने वालों पर इसका क्या दुष्परिणाम होगा?क्या यह मनुष्य समाज पर अभिशाप सिद्ध नहीं होगा ?_

_(4) अण्डे में १३.३ प्रतिशत, हरे चने में २४ तथा मूंगफली में ३१.५ प्रतिशत और सोयाबीन में ४३.२ प्रतिशत प्रोटीन होता है।एक अण्डे से ८६.५ प्रतिशत कैलोरिज़ मिलती है जबकि गेहूं के आटे से १७६.५ प्रतिशत कैलोरिज प्राप्त होती है।अण्डे कोई कैल्शियम का स्रोत भी नहीं हैं।एक अण्डे में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम मिलता है जो कि लगभग १५ पैसे में उपलब्ध हो जाता है, इसके विपरित ७५ ग्राम सरसों की भाजी में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम सस्ते भाव में प्राप्त हो सकता है।दूध और अण्डे को समान मानना बहुत भारी भूल सिद्ध होगी।अण्डे में विटामिन बी-२, बी-१२, तथा कैल्शियम होते हैं।अण्डे को पकाने में या तलने में बी-१, बी-२, पच्चीस प्रतिशत तक नष्ट हो जाता है और बी-१२ भी अंशतः नष्ट हो जाता है।_

_(5) भारतीय धर्म, संस्कृति अण्डे,मांस के पक्ष में नहीं है।*अथर्ववेद ८।६।१२ में स्पष्ट है कि―"मैं उन दुष्टों को नष्ट करता हूँ जो अण्डे, मांस खाते हैं।"* अण्डे कई बार एनीमल हायपर सेंसिटिविटि (पाशविक अति संवेदनशीलता) उत्पन्न कर देते हैं।परिणामतः अण्डाहारी बर्बर आदतों से नहीं चूकता। उसकी भावनाओं में जोश ही जोश होता है , होश नहीं।अतः परिणाम बहुत भयंकर भुगतने पड़ते हैं।बाद में तो केवल पछताना ही उसके पास रह जाता है।_

_(6) अण्डा कभी शाकाहारी नहीं होता। यह भ्रामक नामकरण है कि सेये हुए अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य होता है, अनिषेचित अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य नहीं होता। इसे अखाद्य मानना चाहिए।_

_सच्चाई तो यह है कि ये मनुष्य के सेवन हेतु नहीं बना।यह तो सेवन करने वाले को ही अप्राकृतिक बना देता है।पश्चिम देशों में अब इसे पौष्टिक आहार की श्रेणी में नहीं रखते।वहाँ इसका प्रयोग निषेध रुप में पाया जा रहा है।यदि चिन्तन करें तो विदित होगा कि मनुष्य मूलतः ‘मस्तिष्क’ है 'पेट’ नहीं।विभिन्न अध्ययन, अनुसन्धान स्पष्ट करते हैं कि अण्डाहारी का मस्तिष्क तानाशाही, अशालीनता और अपराधीवृत्ति की और झुक जाता है।भारतीय संस्कृति और सभ्यता में हमारे धार्मिक ग्रन्थ मनुष्य को यही चेतावनी देते आए हैं कि" जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन, जैसा पीए पानी, वैसी बोले वाणी" । अर्थात् तामसिक पाशविक भोजन मानव की वृद्धि और विकास नहीं बल्कि उसके अधोपतन का कारण बनता है।_


from Tumblr http://ift.tt/2nNqLbd
via IFTTT

દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:– સત્યઘટના છે: - ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના...

દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:–

સત્યઘટના છે: -

ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના દિકરા, નામ એનુ પથુભા. નાની ઉંમર એમની. કોઈ કામ સબબ એમને કુંભાજીની દેરડી કેવાય છે ત્યા જવાનુ બનેલું. એટલે ૨૫-૩૦ ઘોડેસવારોની સાથે પોતે નીકળ્યા.

એમા કુકાવાવના પાદરમા પહોચ્યા. ઘોડાઓ નદિમા પાણી પીએ છે.

કુંવર (માણસોને) : હવે દેરડી કેટલુ દુર છે?

માણસો : કેમ કુંવરસાબ?

કુંવર : મને ભુખ બહુ લાગી છે.

માણસો : બાપુ, હવે દેરડી આ રહ્યુ, અહિથી ૪ માઇલ દેરડી આઘુ છે, આપણે ઘોડા ફેટવીએ એટલે હમણા આપણે ન્યા પોગી જાઈ અને ત્યા ડાયરો ભોજન માટે આપણી વાટ જોતો હશે.

કુંવર : ના, મારે અત્યારે જ જમવુ છે.

આ તો રાજાનો કુંવર એટલે બાળહઠ ને રાજહઠ બેય ભેગા થ્યા.

એટલામા કુકાવાવનો એક પટેલ ખેડુત પોતાનુ બળદગાડું લઈને નીકળ્યો ને એણે કુંવરની વાત સાંભળી એટલે આડા ફરીને રામ રામ કર્યા ને કિધુ કે, “ખમ્મા ઘણી બાપુને, આતો ગોંડલનું જ ગામ છે ને, પધારો મારા આંગણે.”

કુંવર અને માણસો પટેલની ઘરે ગ્યા.

ઘડિકમા આસન નખાઇ ગ્યા, આ બાજુ ધિંગા હાથવાળી પટલાણીયુ એ રોટલા ઘડવાના શરૂ કરી દિધા, રિંગણાના શાક તૈયાર થઈ ગ્યા, મરચાના અથાણા પીરસાણા અને પોતાની જે કુંઢિયુ બાંધેલી એની તાજી માખણ ઉતારેલી છાશું પીરસાણી.

કુંવર જમ્યા ને મોજના તોરા મંડ્યા છુટવા કે શાબાશ મારો ખેડુ, શાબાશ મારો પટેલ અને આદેશ કર્યૌ કે બોલાવો તલાટીને, ને લખો, “કે હુ કુવર પથુભા કુકાવાવમા પટેલે મને જમાડ્યો એટલે હું પટેલને ચાર સાતીની ઉગમણા પાદરની જમીન આપુ છું.” ને નિચે સહિ કરી ને ઘોડે ચડિને હાલતા થ્યા.

કુંવર ગયા પછી તલાટી જે વાણિયો હતો તે ચશ્મામાંથી મરક મરક દાંત કાઢવા લાગ્યો ને પટેલને કિધુ કે, “પટેલ, આ દસ્તાવેજને છાશમા ઘોળીને પી જાવ. આ ક્યા ગોંડલનુ ગામ છે કે કુંવર તમને જમીન આપી ને વ્યા ગ્યા.”આ તો કાઠી દરબાર જગા વાળા નુ ગામ છે.

પટેલને બિચારાને દુઃખ બહુ લાગ્યુ અને આખુ ગામ પટેલની મશ્કરી કરવા લાગ્યુ.

પટેલને ધરતી માર્ગ આપે તો સમાઈ જવા જેવુ થ્યુ. પણ એક વાત નો પોરસ છે કે કુંવરને મે જમાડ્યા.

ઉડતી ઉડતી એ વાત જેતપુર દરબાર જગાવાળાને કાને પડી.

એમણે ફરમાન કીધુ
કે -“બોલાવો પટેલને અને એને કેજો કે સાથે દસ્તાવેજ પણ લાવે.”

પટેલ બીતા-બીતા જેતપુર કચેરીમા આવે છે.

જગાવાળા : પટેલ, મે સાંભળ્યુ છે કે મારા દુશ્મન ગોંડલના કુંવર પથુભા કુકાવાવ આવ્યાતા ને તમે એને જમાડ્યા. સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ, એમને ભુખ બહુ લાગીતી એટલે મે એને જમાડ્યા.

જગાવાળા : હમ્મ્મ્મ અને એણે તમને ચાર સાતીની જમીન લખી આપી એય સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ એને એમ કે આ ગોંડલનુ ગામ છે એટલે આ દસ્તાવેજ લખી આપ્યો.

ત્યારે જગાવાળાએ પોતાના માણસોને કિધુ કે - તાંબાના પતરા પર આ દસ્તાવેજમા જે લખેલ છે એ લખો અને નીચે લખો કે, “મારા પટેલે મારા દુશ્મનને જમાડ્યો એટલે મારી વસ્તીએ મને ભુંડો નથી લાગવા દિધો. એટલે હું જગાવાળો, જેતપુર દરબાર, પટેલને બીજી ચાર સાતીની જમીન આપુ છુ અને આ આદેશ જ્યા સુધી સુર્યને ચાંદો તપે ત્યા સુધી મારા વંશ વારસોએ પાળવાનો છે અને જે નહિ પાળે એને ગૌહત્યાનુ પાપ છે”
એમ કહીને નીચે જગાવાળાએ સહિ કરિ નાખી,

અને એક પત્ર ગોંડલ લખ્યો કે, “સંગ્રામજીકાકા તારો કુંવર તો દેતા ભુલ્યો, કદાચ આખુ કુકાવાવ લખી દિધુ હોત ને તોય એય પટેલ ને આપી દેત.”

આ વાતની ખબર સંગ્રામસિંહજીને પડતા એને પણ પોરસના પલ્લા છુટવા માંડ્યા કે “વાહ જગાવાળા શાબાશ બાપ! દુશ્મન હોય તો આવો. જા બાપ તારે અને મારે કુકાવાવ અને બીજા ૧0 ગામનો જે કજિયો ચાલે છે
તે તને માંડિ દવ છું…!“

આનુ નામ દુશ્મન કેવાય, આને જીવતરના મુલ્ય કેવાય.
વેરથી વેર ક્યારેય શમતુ નથી એને આમ મિટાવી શકાય,
આવા અળાભીડ મર્દો આ ધરતિમા જન્મ્યા.

ધન્ય છે…

” આપણી સંસ્કૃતિ અને આપણો વારસો “


from Tumblr http://ift.tt/2mXMbol
via IFTTT

*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग* *✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे...

*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग*

*✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे परम चिकित्सक है। पवित्रता, शान्ति और शक्ति की किरणें परमात्मा से उतारकर मुझ आत्मा पर पढ़ रही है। मैं आत्मा परमात्मा की शक्तिशाली किरणों से भरपूर हो रही हूँ। अब इन अद्भुत किरणों को मैं अपने शरीर के भीतर प्रवाहित कर रही हूँ। ये किरणे पेट के वरिष्ठ भाग में स्थित पैंक्रियास ग्रंथि पर पढ़ रही है अब मैं इनके अलौकिक प्रभाव को देख रही है। मेरे पैंक्रियास के अंदर बिता सेल्स जो की लगभग नष्ट हो चुके थे अब उनका निर्माण होना शुरू हो रहा है। इन नवनिर्मित बीटा सेल्स से आवश्यक मात्रा में इन्सुलिन बनता जा रहा है ..। फिर से मेरी एक एक कोशिका के भीतर ग्लूकोस बड़ी आसानी से पहुँच रहा है। मेरा इन्सुलिन रजिस्ट्रेशन भी अब खत्म हो रहा है। ग्लूकोस हर कोशिका के अंदर जा कर पर्याप्त शक्ति का संचार कर रही है। अब मैं आत्मा देख रही हूँ की कैसे मेरे रक्त में ग्लूकोस की मात्रा का स्तर सामान्य होता जा रहा है। मेरा हर अंग परमात्मिक प्रकाश से प्रभावित हो स्वस्थ होता जा रहा है। मधुमेह से ग्रस्त सभी विकृतियां दूर हो रही हैं। मेरे रक्त में वसा की मात्रा भी संतुलित हो रही है। मैं अपने शरीर को अब स्वस्थ रूप में अब देख रही हूँ, ईश्वर के शक्तिशाली प्रकम्पन से आत्मा के साथ साथ शरीर भी सतोप्रधान और पावन होता जा रहा है। अब मैं स्वयं को एवेरहेल्थी महसूस कर रही हूँ और सुखद जीवन जीने का मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।

*अभ्यास*

रोज़ाना सुबह और शाम कम से कम 5 मिनट करें। इससे तन और मन दोनों स्वस्थ होते जा रहे हैं।


from Tumblr http://ift.tt/2nNthyk
via IFTTT

सत्संग का महत्व नियमित सत्संग में आने वाले एक आदमी नें जब एक बार सत्संग में यह सुना कि जिसने जैसे...

सत्संग का महत्व

नियमित सत्संग में आने वाले एक
आदमी नें जब एक बार सत्संग में
यह सुना कि जिसने जैसे कर्म किये
हैं उसे अपने कर्मो अनुसार वैसे ही
फल भी भोगने पड़ेंगे । यह सुनकर
उसे बहुत आश्चर्य हुआ अपनी आशंका
का समाधान करने हेतु उसने सतसंग
करने वाले संत जी से पूछा….. अगर
कर्मों का फल भोगना ही पड़ेंगा तो
फिर सत्संग में आने का किया फायदा
है…..?
संत जी नें मुसकुरा कर उसे देखा
और एक ईंट की तरफ इशारा
कर के कहा की तुम इस ईंट को छत
पर ले जा कर मेरे सर पर फेंक दो ।
यह सुनकर वह आदमी बोला संत जी
इससे तो आपको चोट लगेगी दर्द होगा ।
मैं यह नहीं कर सकता…..
संत ने कहा….अच्छा, फिर उसे उसी
ईंट के भार के बराबर का रुई का
गट्ठा बांध कर दिया और कहा अब
इसे ले जाकर मेरे सिर पे फैंकने से
भी कया मुझे चोट लगेगी….??
वह बोला नहीं…..
संत ने कहा…..
बेटा इसी तरह सत्संग में आने से
इन्सान को अपने कर्मो का बोझ
हल्का लगने लगता है और वह हर
दुःख तकलीफ को परमात्मा की
दया समझ कर बड़े प्यार से सह
लेता है ।
सत्संग में आने से इन्सान का मन
निरमल होता है और वह मोह माया
के चक्कर में होने वाले पापों से भी
बचा रहता है और अपने सतगुरु की
मौज में रहता हुआ एक दिन अपने
निज घर सतलोक पहुँच जाता है,
जहाँ केवल सुख ही सुख है….
🙏🙏


from Tumblr http://ift.tt/2mXPmMR
via IFTTT

Saturday, January 21, 2017

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो - जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को...

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो -
जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को “सौर वर्ष ” कहते हैं । सौर वर्ष में पृथिवी अपनी यह परिक्रमा आकाश में जिस परिधि पर रहकर करती है, उसे “क्रान्तिवृत्त” कहते हैं।इस क्रान्तिवृत्त के १२ भाग कल्पित किये गये हैं और उन १२ भागों के नाम उन-उन स्थानों पर विद्यमान आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुयी आकृति से मिलते जुलते आकार वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं जो कि इस प्रकार हैं -१मेष , २वृष , ३मिथुन , ४कर्क , ५सिंह , ६कन्या , ७तुला , ८वृश्चिक , ९धनु , १०मकर , ११कुम्भ , १२मीन । ये प्रत्येक भाग वा आकृति"राशि" कहलाते हैं। जब एक राशि से दूसरी राशि में पृथिवी संक्रमण करती है तब उसको “ संक्रान्ति” कहते हैं। पृथिवी के इस संक्रमण को लोक में सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं।पृथिवी के इस संक्रमण में सूर्य ६ महीने क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता है तथा ६ मास दक्षिण की ओर निकलता है ।ये ६ -६ महीने की अवधियां उत्तरायण व दक्षिणायन कहलाती हैं। सूर्य की मकरराशि की संक्रान्ति से उत्तरायण व कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है।
सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व दिया गया है इस कारण उत्तरायण के आरम्भ दिवस को मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। यद्यपि इस समय उत्तरायण परिवर्त्तन , प्रचलन में आ रही मकर संक्रान्ति के दिन नहीं होता है। अयन चलन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण जो लगभग २२ - २३ दिन का अन्तर आ गया है उसे ठीक कर लेना चाहिये।
जिस प्रकार बाहर के जगत् में सूर्य का उत्तरायण दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार हमारे अभ्यन्तरीण आध्यात्मिक जगत् में भी उत्तरायण हुआ करता है । उत्तरायण कहते हैं ऊपर की ओर गति। गीता में कहा है - “ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:” अर्थात् सत्त्वगुण में रहने वाले मनुष्य ऊपर जाते हैं। यह मनुष्य के लिये ऊपर को जाना, ज्ञान के प्रकाश के द्वारा सम्भव है। सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक है, इसलिये यह मनुष्य को ज्ञान के सम्बन्ध से जोड़ता है। ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम् ज्ञान की ही पराकाष्ठा को वैराग्य कहा गया है। बस इस वैराग्य रूप ज्ञान के होने पर उन्नति अर्थात् मोक्ष मार्ग की ओर गति का होना आरम्भ हो जाता है।
महाभारत काल के इतिहास पर दृष्टिपात करके देखो कि मृत्यञ्जयी ब्रह्मचारी भीष्म पितामह जब शरशय्या पर आसीन हो गये थे तब उन्होंने कहा था कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं जायेगा और सूर्य ही नहीं अपितु वस्तुतः जब तक मेरे जीवन का उत्तरायण काल नहीं आता है तब तक मैं देहत्याग नहीं करूंगा। इसी प्रकार हमें भी तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान आदि योग साधनों के द्वारा अपने जीवन के उत्तरायण का निर्माण करना चाहिये, यही प्रेरणा ग्रहण करना मकर संक्रान्ति पर्व की पर्वता है। जीवन को उत्तर अर्थात् श्रेष्ठ बनाने पर ही देहावसान होने के पश्चात् जीव को श्रेष्ठ नवजीवन रूप सद्गति प्राप्त होती है। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि मकर संक्रान्ति पर्व आप और हम सबके जीवन के उत्तरायण के लिये प्रेरक बनता हुआ मंगलमय हो। लेखक-विष्णुमित्र वेदार्थी ९४१२११७९६५


from Tumblr http://ift.tt/2iY339y
via IFTTT

Tuesday, January 10, 2017

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु...

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु के उपरान्त, पोप कालूराम शास्त्री ने *आर्यसमाज की मौत* नामक पुस्तक लिखी, जिसका उत्तर शास्त्रार्थ महारथी *मनसाराम वैदिक तोप* ने इस पुस्तक *पौराणिक पोल प्रकाश* यहाँ से download कीजिये, कुल 580 पृष्ठों में, 4 भागों में विभाजित:

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-1:* [21 MB]
http://ift.tt/2ibCBh9

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-2:* [20 MB]
http://ift.tt/2iZPw2P

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-3:* [34 MB]
http://ift.tt/2ibHPcJ

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-4:* [34 MB]
http://ift.tt/2iZPwQn


from Tumblr http://ift.tt/2ibPI1J
via IFTTT

Monday, January 2, 2017

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी...

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी सज्जन के बाग मे हुई और आर्यसमाज के लिए ५००० /- का पहला योगदान मुस्लिम संप्रदाय के मतावलम्बी श्री अल्लाहरखाँ ने दिया था | अनेक पादरी उनके सहयोगी थे | अमर शहीद भगतसिंह के दादा श्री अजीत सिंह सिख संप्रदाय से थे किन्तु महर्षि दयानंद के विचारो से प्रेरित होकर वैदिक धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने लगे | उन्होंने आर्यसमाज के मंत्री के स्वरूप मे पंजाब मे आर्यसमाज के विस्तार हेतु सक्रिय भुमीका निभाई |
लाला लाजपत राय, शहीद चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्र लोहड़ी, अश्फाक उल्ला खाँ, शहीद-ए-आजम सरदार भगतसिंह, क्रांतिगुरू श्याम जी कृष्ण वर्मा, भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी, स्वामी श्रद्धानंद, वीर सावरकर, मदनलाल धींग्रा को कौन नही जानता? इन सभी ने आर्यसमाज के ही विचारो से प्रेरित होकर माँ भारती को परतंत्रता की बेडीयो से मुक्त कराने हेतु अपणे प्राणो की आहुती दी. |
मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध, परोपकार के लिए सदैव तत्पर आर्यसमाज में आपका स्वागत है |
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी एवं योगीराज श्रीकृष्ण चंद्र जी आदी भारतीय संस्कृति के महान प्रेरणास्पद रहे है | महाभारत तथा रामायण इत्यादी ग्रन्थ मनुष्य रचित सच्चे ऐतिहासिक ग्रंथ है तथा मनुष्यों के लिए शिक्षाप्रद है | आर्यसमाज मानता है के ईश्वर एक है जो ईस ब्रम्हांड का रचियता है, वही कर्ता धर्ता है | वह सर्वव्यापक है, निराकार है | वह मनुष्यो के कर्मो का फल देता है (बुरे का बुरा और अच्छे का अच्छा) आर्यसमाज तर्कपूर्ण वैज्ञानिक मान्यताओं को महत्व देता है | आर्यसमाज मानता है के “वेद” ही ईश्वरीय ज्ञान है और सभी ज्ञान का भंडार है | सभी सत्य विद्याओं का पुस्तक है | आर्य समाज शाकाहार को मनुष्य का भोजन मानता है तथा मांसाहार, शराब, सिगरेट आदी व्यसनों को धर्म के विरुद्ध मानता है और इसका कडा विरोध करता है |
आर्य समाज छुआछूत तथा जाति-पाति को मनुष्य के सामाजिक उन्नति में बाधक मानता है | आर्यसमाज संस्कृत को भाषाओं की जननी मानता है तथा मातृभाषा को प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक मानता है | मानव के संपुर्ण जिवन के लिए आर्यसमाज आश्रम व्यवस्था का पुरस्कार करते हुवे (ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) को समाज की उन्नति का आवश्यक साधक मानता है | आर्यसमाज मानता है के कर्म के आधार पर ही वर्ण बने है (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य आदी)
.
आर्य समाज का विशालकाय, विश्वव्यापी संगठन निम्न स्वरूप कार्यरत है..
.
👉लगभग १०००० आर्यसमाज मंदिर विश्व भर मे स्थापित है
👉लगभग २५०० विज्ञालयो एवं महाविद्यालयों का संचालन जिसमे (डीएवी) यह प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था भी सम्मिलित है | सरकार के बाद संभवतः यह सब से बडी आर्यसमाज की शैक्षणिक शृंखला है |
👉लगभग ६०० गुरुकुलो (आवासिय) शिक्षण संस्थानों का संचालन |
👉१०,००० से अधिक अनाथ बच्चों का अनाथालयो द्वारा पालन पोषण |
👉२५० से लगभग ५००० लघु स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन द्वारा मनुष्य मात्र की सेवा |
👉आडम्बर और जातिआधारीत बन्धनो से मुक्त हजारों विवाहों का प्रतिवर्ष आयोजन
👉नौजवानों के शारिरिक विकास के लिए आर्य वीर दल द्वारा हजारो व्यायाम शाला का संचालन तथा नैतिक व शारीरिक शिक्षा के लिए हजारो आवासीय निःशुल्क शिबीरो का प्रतिवर्ष आयोजन
👉महिलाओं के लिए लघु उद्योग, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम का संचालन
आर्य समाज का विस्तार विश्व के लगभग हर कोने मे हुआ है
१ भारत
२ कनाडा
३ केन्या
४ फ्रांन्स
५ युगाण्डा
६ गयाना
७ त्रीनीडाड
८ सूरीनाम
९ टार्मिनीया
१० नेपाल
११ म्यांमार
१२ बांग्लादेश
१३ सिंगापुर
१४ अमेरिका
१५ इंग्लैंड
१६ मारीशस
१७ पाकिस्तान
१८ हाँलैड
१९ थाईलैंड
२० न्यूजीलैण्ड
२१ आँस्ट्रेलिया
२२ फीजी
.
जातिवाद विहीन समाज की स्थापना करना चाहते हो?
अंधविश्वास को दुर करना चाहते हो?
पाखण्ड से समाज को बचाना चाहते हो?
आर्यसमाज आपको आमंत्रित करता है |
अपने निकट के आर्यसमाज से आज ही संबंन्ध स्थापित करे |
.
महाराष्ट्र आर्य प्रतिनिधी सभा
आर्य समाज परली बैजनाथ, जिला बीड, महाराष्ट्र - ४३१५१५
. जगदाले रोहित आर्य
आर्यसमाज, परभणी, महाराष्ट्र ४३१ ४०१.
मो ०९९६०९८३९९१.


from Tumblr http://ift.tt/2ixL1vW
via IFTTT

Wednesday, December 28, 2016

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते...

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।गीता (2/20)
शरीर में 6 विकार होते हैं – उत्पन्न होना,सत्तावाला दीखना,परिवर्तन होना,वृद्धि होना,घटना और नष्ट होना।आत्मा इन विकारों से मुक्त है। यह सनातन है।यह कभी मृत्यु को आलिंगन नहीं करती।जिसका जन्म होता है,उसी की मृत्यु अवश्यंभावी है।आत्मा में संयोग एवं वियोग नहीं होते।
आत्मा स्वतःसिद्ध निर्विकार है।इसकी सत्ता का आरम्भ और अन्त नहीं होता।इसे जन्मरहित कहते हैं।इसका अपक्षय कभी भी नहीं होता।शरीर कुछ आयु पश्चात् घटने लगता है,शक्ति क्षीण होने लगती है,इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं।लेकिन नित्य –तत्त्व आत्मा में किन्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
आत्मा अनादि है।इस नित्य – तत्त्व में कोई वृद्धि भी नहीं होती।शरीर नश्वर है,जबकि आत्मा अविनाशी है।
शरीर परिवर्तनशील और विकारी होने के कारण आत्मा का अंग नहीं है।
ओम शान्ति


from Tumblr http://ift.tt/2hqrITd
via IFTTT

Wednesday, December 21, 2016

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को...

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को ही याद करते हुए कीजिए सब काज ,वही सबका मित्र है वही सबका नाथ //🕉🕉🕉⛳⛳🕉🕉🕉


from Tumblr http://ift.tt/2hH1PlT
via IFTTT

Sunday, December 18, 2016

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन || एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला...

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन
|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! ||
1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ
2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा।
प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े।
और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था।
3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’
प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है।
4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल
5. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है।
गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे।
6. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए।
7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता।
प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी।
8. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी।
9. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं।
10. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लो और वेदो की ओर लोटो!


from Tumblr http://ift.tt/2h1sOJN
via IFTTT

Saturday, December 17, 2016

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏 🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏 दिनांक – 18 दिसम्बर 2016 दिन – रविवार तिथि...

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏
🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏

दिनांक – 18 दिसम्बर 2016
दिन – रविवार
तिथि – पंचमी
नक्षत्र– आश्लेषा
पक्ष– कृष्ण
माह – पौष
ऋतु – हेमन्त
सूर्य – दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 117
कलयुगाब्द – 5118
विक्रम संवत् – 2073
शक संवत् – 1939
दयानंदाब्द – 193

🌷 जो धर्म को त्यागता है , धर्म उसे त्याग देता है ।
🌷 जो समय नष्ट करता है , समय उसे नष्ट कर देता है ।
🌷 जो धर्म का पालन करता है , धर्म उसका पालन करता है ।
🌷 जो ईशवर के आश्रित होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है , ईशवर उसका पालन करता है ।
🌷 जो अपनी आत्मा जैसी दुसरे की आत्मा को समझता है , वह किसी से बैरभाव नही रख सकता ।

🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🌷🍃🌷🍃

🌷 यथोद्वरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिन : ।। ( मनु स्मृति )

🌷 अर्थ :- जैसे धान से चावल निकालने वाला छिलके को अलग कर चावलों की रक्षा करता है ।चावलों को टूटने नही देता । वैसे ही राजा रिश्वतखोरों , अन्यायकारियों , चोर बाजारी करने वालों , डाकुओं , चोरों और बलात्कारियों को मारे और बाकी प्रजा की रक्षा करें ।

🌷🍃🌷🍃 ओउम् 🌷🍃🌷🍃 सुदिनम 🌷🍃🌷🍃 सुप्रभातम


from Tumblr http://ift.tt/2i1SxxO
via IFTTT

Friday, December 16, 2016

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं । तू आदमी है, अवतार नहीं ।। गिर, उठ, चल, दौड, फिर...

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं ।
तू आदमी है, अवतार नहीं ।।
गिर, उठ, चल, दौड, फिर भाग,
क्योंकि
“जीत” संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं


from Tumblr http://ift.tt/2hErrR2
via IFTTT

Wednesday, December 14, 2016

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||~~न्यायदर्शन~यजुर्वेद~४०~४~~पद्यानुवाद~~~~~अद्वितीय निश्चल अकम्पन्, मन से तीव्र है वेगवान| पहले से व्यापक वह ठहरा, देख न पाये अविद्वान्| सब जीवों को धारण कर, सबको नियमों में चलाने वाला| अंतर्यामी घट घट वासी, खुद ही खुद से मिलाने वाला|| आओ विमल प्रशांत बना मन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभु को ध्यावें| अतुलनीय उस परमेश्वर के, अमृत मोक्षानंद को पावें||👏


from Tumblr http://ift.tt/2h2ZZIV
via IFTTT

Tuesday, December 13, 2016

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु...

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु अपना पुरुषार्थ छोडना नहीं चाहिए।


from Tumblr http://ift.tt/2hDsMrt
via IFTTT

"ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।"

“ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।”

- ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।
from Tumblr http://ift.tt/2gz72rK
via IFTTT

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412 ना तो जनवरी साल का पहला मास है...

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412
ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..
जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..
नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे
December बन गया ..
ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..
जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..
इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..
साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..
लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..
भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।
इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??
तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।
चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..
इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..
जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..
कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेसब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..
हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं? जय आर्य जय आर्यव्रत🙏🙏


from Tumblr http://ift.tt/2gYxhJo
via IFTTT

Sunday, October 30, 2016

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim): 7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से...

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim):

7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से जाता रहा। भारत में इस्लामिक शासन का विस्तार 7वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिन्ध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों द्वारा हुआ। लगभग 712 में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बूच पर के अभियान का सफल नेतृत्व किया।

इस्लामिक खलीफाओं ने सिन्ध फतह के लिए कई अभियान चलाए। 10 हजार सैनिकों का एक दल ऊंट-घोड़ों के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया। 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया।

मुहम्मद बिन कासिम अत्यंत ही क्रूर यौद्धा था। सिंध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सर कटवाना स्वीकर किया, पर मीर कासिम की पत्नी बनना नहीं। इसी तरह वहां के राजा दाहिर (679ईस्वी में राजा बने)और उनकी पत्नियों और पुत्रियों ने भी अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। सिंध देश के सभी राजाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक और दुखदायी हैं। आज सिंध देश पाकिस्तान का एक प्रांत बनकर रह गया है। राजा दाहिर अकेले ही अरब और ईरान के दरिंदों से लड़ते रहे। उनका साथ किसी ने नहीं दिया बल्कि कुछ लोगों ने उनके साथ गद्दारी की।


from Tumblr http://ift.tt/2f1enS3
via IFTTT

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે, કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે; ઘાયલ મરતાં મરતાં રે! માતની...

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે,
કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે;
ઘાયલ મરતાં મરતાં રે!
માતની આઝાદી ગાવે.

કો’ની વનિતા, કો’ની માતા, ભગિનીઓ ટોળે વળતી,
શોણિતભીના પતિ-સુત-વીરની રણશૈયા પર લળતી,
મુખથી ખમા ખમા કરતી
માથે કર મીઠો ધરતી.

થોકે થોકે લોક ઊમટતા રણજોધ્ધા જોવાને,
શાહબાશીના શબદ બોલતા પ્રત્યેકની પિછાને;
નિજ ગૌરવ કેરે ગાને
જખ્મી જન જાગે અભિમાને.

સહુ સૈનિકનાં વહાલાં જનનો મળિયો જ્યાં સુખમેળો,
છેવાડો ને એક્લવાયો અબોલ એક સૂતેલો;
અણપૂછયો અણપ્રીછેલો
કોઇનો અજાણ લાડીલો.

એનું શિર ખોળામાં લેવા કોઇ જનેતા ના’વી;
એને સીંચણ તેલ-કચોળાં નવ કોઇ બહેની લાવી;
કોઇના લાડકવાયાની
ન કોઇએ ખબર પૂછાવી.

ભાલે એને બચીઓ ભરતી લટો સુંવાળી સૂતી,
સન્મુખ ઝીલ્યા ઘાવો મહીંથી ટપટપ છાતી ચૂતી;
કોઇનો લાડકવાયાની
આંખડી અમૃત નીતરતી.

કોઇના એ લાડકવાયાનાં લોચન લોલ બિડાયાં,
આખરની સ્મૃતિનાં બે આંસુ કપોલ પર ઠેરાયાં;
આતમ-દીપક ઓલાયા,
ઓષ્ઠનાં ગુલાબ કરમાયાં.

કોઇનાં એ લાડકડા પાસે હળવે પગ સંચરજો,
હળવે એનાં હૈયા ઊપર કર-જોડામણ કરજો;
પાસે ધૂપસળી ધરજો,
કાનમાં પ્રભુપદ ઉચરજો !

વિખરેલી એ લાડકડાની સમારજો લટ ધીરે,
એને ઓષ્ઠ-કપોલે-ભાલે ધરજો ચુંબન ધીરે;
સહુ માતા ને ભગિની રે !
ગોદ લેજો ધીરે ધીરે !

વાંકડિયા એ ઝુલ્ફાંની મગરૂબ હશે કો માતા,
એ ગાલોની સુધા પીનારા હોઠ હશે બે રાતા;
રે ! તમ ચુંબન ચોડાતાં
પામશે લાડકડો શાતા.

એ લાડકડાની પ્રતિમાનાં છાનાં પૂજન કરતી,
એની રક્ષા કાજ અહર્નિશ પ્રભુને પાયે પડતી;
ઉરની એકાંતે રડતી
વિજોગણ હશે દિનો ગણતી.

કંકાવટીએ આંસુ ઘોળી છેલ્લું તિલક કરંતા,
એને કંઠ વીંટાયા હોશે કર બે કંકણવંતા;
વસમાં વળામણાં દેતા
બાથ ભીડી બે પળ લેતાં.

એની કૂચકદમ જોતી અભિમાનભરી મલકાતી,
જોતી એની રૂધિર-છલક્તી ગજગજ પહોળી છાતી;
અધબીડ્યાં બારણિયાંથી
રડી કો હશે આંખ રાતી.

એવી કોઇ પ્રિયાનો પ્રીતમ આજ ચિતા પર પોઢે,
એકલડો ને અણબૂઝેલો અગન-પિછોડી ઓઢે;
કોઇના લાડકવાયાને
ચૂમે પાવકજ્વાલા મોઢે.

એની ભસ્માંકિત ભૂમિ પર ચણજો આરસ-ખાંભી,
એ પથ્થર પર કોતરશો નવ કોઇ કવિતા લાંબી;
લખજો: ‘ખાક પડી આંહી
કોઇના લાડકવાયાની’.

- ઝવેરચંદ મેઘાણી


from Tumblr http://ift.tt/2eJekfq
via IFTTT