Monday, June 18, 2018

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और...

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और विमान की तकनीक का लाभ उठाना हो, तो उसे जोखिम तो लेना ही पड़ेगा ।

इसी प्रकार से जीवन में आपको किसी भी क्षेत्र में उन्नति करनी हो, आगे बढ़ना हो, तो वहां सफलता असफलता दोनों हो सकती हैं। इसलिए जोखिम तो लेना ही पड़ेगा।

विमान इस डर से आप न उड़ाएं कि कहीं दुर्घटना ना हो जाए, जमीन पर यह सुरक्षित है , तो उस विमान का कोई लाभ नहीं ।

ऐसे ही यदि आप किसी भी क्षेत्र में असफलता के भय से पुरुषार्थ ना करें, तो जीवन का कोई लाभ नहीं। जीवन इसीलिए ही तो है, कि जोखिम लिया जाए और उन्नति की जाए ।

हां इतना अवश्य ध्यान रखें, कि जोखिम सोच समझकर बुद्धिमत्ता पूर्वक लेना चाहिए , अंधाधुंध नहीं । अपनी क्षमता को देखकर जोखिम उठाना चाहिए । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग...

जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग तो जागे नहीं, तो मैं उनके लिए सवेरा क्यों करूं ? फिर भी सूर्य अपना कार्य करता ही है ।

इसी प्रकार से आप देश धर्म समाज के लिए कार्य करते हैं , और देश धर्म समाज के लोग आपके कार्य का मूल्य नहीं समझते, उसको महत्व नहीं देते, आपके कार्य का सम्मान नहीं करते । तो इसका अर्थ यह नहीं है, कि आप अपना कार्य छोड़ देवें।

जैसे सूर्य अपना कार्य करता रहता है, कोई जागे या ना जागे, वह उदय होता ही है, और अपना प्रकाश फैलाता ही है । इसी प्रकार से कोई आपके कार्य का मूल्य समझे या न समझे, आप अपना कार्य करते रहें। हो सकता है, कि संसार के लोग आपके कार्य का मूल्य न समझें, परंतु ईश्वर तो अवश्य ही समझता है। समय आने पर ईश्वर तो अवश्य ही आपके कार्य का मूल्यांकन करेगा और निश्चित रूप से आपके उत्तम कर्मों का फल देगा। (सूर्य यद्यपि जड़ पदार्थ है वह सोचता नहीं है , फिर भी आलंकारिक रूप में हमने सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत किया है) - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Sunday, June 10, 2018

*।। ओ३म् ।।**वैदिक साहित्य और विज्ञान*सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों...

*।। ओ३म् ।।*


*वैदिक साहित्य और विज्ञान*


सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों कि.मी. तक फैला है, को प्रभामंडल कहा जाता है। इसका तापमान मिलियन डिग्री केल्विन से भी अधिक है, जोकि करीबन 6000 केल्विन के सौर डिस्क तापमान से भी बहुत अधिक है। सौर भौतिकी में अब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया है कि किस प्रकार प्रभामंडल का तापमान इतना अधिक होता है।

सूर्य के अध्धयन के लिए नासा के अतिरिक्त विश्व का हर देश जो ब्रम्हांड का रहस्यों को लेकर उत्सुक है सूर्य के अध्धयन के लिए आतुर है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानो को देखने वाला ISHRO भी सूर्य के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिए आदित्य-1 मिशन सूर्य की स्टूडी के लिए भेजने की तैयारी कर रहा है, दृश्य उत्सर्जन रेखा प्रभामंडललेखी (वी.ई.एल.सी.) नामक महत्वाकांक्षी उपग्रह को ले जाने हेतु 400 कि.ग्रा. श्रेणी उपग्रह के रूप में किया गया था तथा उसे 800 कि.मी. निम्न भू कक्षा में स्थापित करने की योजना थी। सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लेग्रांजी बिंदु के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में स्थापित उपग्रह से मुख्य लाभ यह होता है कि इससे बिना किसी आच्छादन/ग्रहण के लगातार सूर्य को देखा जा सकता है। अत: आदित्य-1 मिशन को अब “आदित्य-एल1 मिशन” में संशोधित कर दिया गया है और इसे एल़1 के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में प्रविष्ट कराया जाएगा, जोकि पृथ्वी से 1.5 मिलियन कि.मी. पर है जिसका उद्देश्य सूर्य के उन रहस्यों को जानना है जिनसे अभी तक मानव सभ्यता अनजान है -


*इन वैज्ञानिक खोजो से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्यो में पृथ्वी, सूर्य, ग्रहों, ब्रम्हांड आदि के बारे में पहले से ही लिखा गया है* सैकड़ो साल पहले आर्यभट्ट ने ग्रहों की दूरी का सटीक आकलन किया। वैदिक साहित्यो में आसान और आलंकारिक भाषा मे इसे समझाया गया लेकिन हम इन वैदिक साहित्यो को सिर्फ पूजा पाठ की सामग्री मानकर पढ़ना तो दूर इसके बारे में जानने के लिए भी कभी प्रयत्न नही करते -


सूर्य के विषय मे वैदिक साहित्य में विस्तृत जानकारी दी गयी है कुछ जानकारियां आइये आपसे साझा करता हूं -

1 - सूर्य_के_प्रकाश_की_गति -

आधुनिक विज्ञान अनुसार - 1,86,286 मील प्रति सेकेण्ड है ।


वैदिक - *‘तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते-द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते ।।’*

।। सायण ऋृग्वेद भाष्य 1.50.4 ।।

अर्थात्

आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है ।

गणना - ½ निमेश = 0.1056 सेकेण्ड

(निमेष की गणना प्रथम कंमेंट में )

अर्थात् 1 योजन = 9.09 मील

(योजन की गणना द्वितीय कमेंट में)

इस सूक्त के अनुसार -

प्रकाश की गति = 2202 योजन प्रति ½ निमेश

2202x9.09 मील प्रति 0.1056 सेकेण्ड = 189547.15909 मील प्रति सेकेण्ड


2 - सूर्य_के_किरणों_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने इस तथ्य पर वैज्ञानिक प्रयोग किए तथा बताया कि श्वेत प्रकाश (सूर्य का प्रकाश या किरण) में सात रंग पहले से ही मौजूद होते है। प्रिज्म से गुजरने पर अपवर्तन के कारण यह 7 रंगों में विभक्त हो जाता है।

वैदिक -

*एको अश्वो वहति सप्तनामा ।* -ऋग्वेद 1-164-2

सूर्य के प्रकाश में 7 रंग होता है इस सूक्त में पहले से है ।

*अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मय: ।* – अथर्ववेद 17-10 /17/9

सूर्य की सात किरणें दिन को उत्पन्न करती है। सूर्य के अंदर काले धब्बे होते है। जिसे विज्ञान आज इन धब्बो को सौर कलंक कहा है।


3 - सूर्य_की_बनावट -

आधुनिक विज्ञान - सूर्य का बाह्य प्रभामंडल दृश्यमान अंतिम परत है। इसके उपर की परते नग्न आंखों को दिखने लायक पर्याप्त प्रकाश उत्सर्जित करने के लिहाज से काफी ठंडी या काफी पतली है। और उसके चारो ओर गैसों का आवरण है ।

वैदिक -

*‘शकमयं धूमम् आराद् अपश्यम्, विषुवता पर एनावरेण।’* ऋग्वेद(1.164.43)

यानी सूर्य के चारों और दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई हैं। यहां गैस के लिए धूम शब्द का प्रयोग किया गया है।


4 - ग्रहण_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - ग्रहण एक खगोलीय अवस्था है जिसमें कोई खगोलिय पिंड जैसे ग्रह या उपग्रह किसी प्रकाश के स्रोत जैसे सूर्य और दूसरे खगोलिय पिंड जैसे पृथ्वी के बीच आ जाता है जिससे प्रकाश का कुछ समय के लिये अवरोध हो जाता है इस अवस्था को ग्रहण कहते है।

वैदिक -

*यं वै सूर्य स्वर्भानु स्तमसा विध्यदासुर: ।*

*अत्रय स्तमन्वविन्दन्न हयन्ये अशक्नुन ॥* – ऋग्वेद 5-40-9

अर्थात जब चंद्रमा पृथ्वी ओर सूर्य के बीच में आ जाता है तो सूर्य पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई नहीं देता। चंद्रमा द्वारा सूर्य के प्रकाश को ढंक लेना ही सूर्य ग्रहण है ।


5 - सूर्य_से_ग्रहों_की_दूरी -

आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी (1.5 * 108 KM) है। इसे एयू (खगोलीय इकाई- astronomical unit) कहा जाता है। इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है :-

ग्रह आर्यभट्ट का मान आधुनिक विज्ञान

बुध 0.375 एयू 0.387 एयू

शुक्र 0.725 एयू 0.723 एयू

मंगल 1.538 एयू 1.523 एयू

गुरु 5.16 एयू 5.20 एयू

शनि 9.41 एयू 9.54 एयू

ग्रहों की दूरी क्या हजारो वर्षो में प्रभावित नही हुई होगी ?


6 - सूर्य_एक_जीवाणुरोधी -

आधुनिक विज्ञान - अंधकार जीवाणुओं के परिवर्धन में सहायक है। बहुत से जीवाणु, जो सक्रिय रूप से अंधकार में चर (mobile) होते हैं, प्रकाश में लाए जाने पर आलसी हो जाता हैं तथा सूर्य के प्रकाश में पतले स्तर में रखे गए जीवाणु तीव्रता से मरते हैं। इन परिस्थितियों में कुछ केवल 10-15 मिनट के लिये जीवित रहते हैं। इसी कारण सूर्य का प्रकाश रोगजनक जीवाणुओं का नाश करनेवाले शक्तिशाली कारकों में माना गया है। साधारणत: दृश्य वर्णक्रम (spectrum) जीवाणुओं पर थोड़ा ही विपरीत प्रभाव रखते हैं तथा प्रकाश के वर्णक्रम के पराबैंगनी (ultraviolet) छोर में यह घातक शक्ति निहित रहती है।

वैदिक -

*'उत पुरस्तात् सूर्य एत, दुष्टान् च ध्नन् अदृष्टान् च,*

*सर्वान् च प्रमृणन् कृमीन्।’* अथर्ववेद (3.7)

अर्थात -

सूर्य का प्रकाश दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले सभी प्रकार के प्रदूषित जीवाणुओं और रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।


7 - चंद्रमा_पर_प्रकाश -

आधुनिक विज्ञान -

चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।

वैदिक -

*सुषुम्णः सूर्य रश्मिः चंद्रमा गरन्धर्व, अस्यैको रश्मिः चंद्रमसं प्रति दीप्तयते।’*

निरुक्त( 2.6)

*'आदित्यतोअस्य दीप्तिर्भवति।’*

यानी सूर्य की सुषुम्ण नामक किरणें चंद्रमा को प्रकाश देती हैं। चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।


विशेष -

प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं। इस हेतु ऋषि प्रत्यक्ष अवलोकन करते थे। कहते हैं, ऋषि दीर्घतमस् सूर्य का अध्ययन करने में ही अंधे हुए, ऋषि गृत्स्मद ने चन्द्रमा के गर्भ पर होने वाले परिणामों के बारे में बताया। यजुर्वेद के 18वें अध्याय के चालीसवें मंत्र में यह बताया गया है कि सूर्य किरणों के कारण चन्द्रमा प्रकाशमान है।

यंत्रों का उपयोग कर खगोल का निरीक्षण करने की पद्धति रही है। आर्यभट्ट के समय आज से 1500 से अधिक वर्ष पूर्व पाटलीपुत्र में वेधशाला (Observatory) थी, जिसका प्रयोग कर आर्यभट्ट ने कई निष्कर्ष निकाले।

भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं, “काल” के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं। वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।

प्रत्यक्ष निरीक्षण एवं अचूक ग्रहीय व कालगणना का 6000 वर्ष से अधिक पुराना इतिहास रखने वाले हम भारतीय आज पश्चिमी देशों की ओर उम्मीद से देखते है जबकि उनसे बेहतर हम सदियो से थे बस अपना आत्मगौरव भूले बैठे है । *आइये एक बेहतर सनातन परंपरा को आगे बढ़ाए। पौराणिक अंधश्रद्धा को छोड़ के वेदों की और पुनः लौटे ।*



*।। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।*


*ओ३म* 🚩


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*🔥ओ३म्🔥**सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१ हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा । ...

*🔥ओ३म्🔥*


*सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१


हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा ।

*💥शम्💥*

🔥

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प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है ,...

प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है , हम इसका विरोध नहीं करते।

परंतु इन सबसे बढ़िया धन *चरित्र का धन* है। और वह चरित्र का धन प्राप्त होता है , ईश्वर की उपासना से भक्ति से। परमात्मा का ध्यान करें। उससे जो आपके मन की शुद्धता बनेगी और फिर ईश्वर आपके मन में और आपकी आत्मा में जो सेवा परोपकार दान दया ईमानदारी सच्चाई आदि आदि गुणों की संपत्ति भर देगा, वास्तव में वही असली संपत्ति है। इन सारी चीजों को मिलाकर के चरित्र कहलाता है । इसलिए परमात्मा का ध्यान करें , ओम् नाम से ध्यान करें, अर्थ सहित करें। परमात्मा से इन गुणों की प्राप्ति करें , अपना चरित्र उज्जवल बनाएं । यही संसार में सबसे बड़ा धन है । जिसके पास यह धन है वही संसार में सबसे अधिक सुखी है । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Bibal

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Saturday, May 5, 2018

आर्यों के विमर्श के लिए…आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप...

आर्यों के विमर्श के लिए…


आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप के विषय में

——————–


महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में ईश्वर और जीवात्मा दोनों चेतन (conscious), अदृश्य (invisible), अभौतिक (non-material or non-physical) सत्ताएं हैं।


ईश्वर अनन्त (infinite or endless) है, उसकी सत्ता अनन्त है। ऐसा कह सकते हैं कि वह इतना महान् है कि वह स्वयं भी अपना अन्त नहीं जानता, स्वयं को अनन्त ही समझता है ! यह विचित्र बात है जो आसानी से समझ में नहीं आती है। ईश्वर जैसी सत्ता भी स्वयं को अनन्त जाने अर्थात् अपनी ही विद्यमानता (presence) अवकाश (space) में कहां तक –कितने स्थान पर्यन्त है, इसका उसे ही ज्ञान न हो, अथवा स्वयं को अनन्त ही जाने – यह बात हम महर्षि दयानन्द जी के ग्रन्थ को प्रमाण मानकर स्वीकार तो कर लेते हैं, परन्तु इसे ठीक से – स्पष्ट संकल्पना पूर्वक (conceptually) समझना आसान नहीं है।


जैसे ईश्वर की अनन्त विद्यमानता (infinite presence) को समझना कठिन है, उसकी थाह पाना असम्भव-सा (unfathomable) है, वैसे ही जीवात्मा का अणु-स्वरूप, उसकी सूक्ष्म सत्ता, उसकी परिच्छिन्नता (finitude or boundedness) को समझना कठिन है, क्योंकि वह भी हम जान न पाए इतना छोटा (infinitely or immeasurably small) है।


जैसे क्षेत्र (domain, occupation, region, area, presence) की दृष्टि से ईश्वर अनन्त चेतन सत्ता है, वैसे ही जीवात्मा भी अत्यन्त अणु सत्ता है। जैसे अनन्त ईश्वर की सत्ता की कोई सीमा (border or limit) नहीं है, वैसे जीवात्मा ससीम होते हुए भी उसकी सूक्ष्मता (smallness or minuteness) भी एक प्रकार से ‘अनन्त’ है, वह इतना अत्यन्त अल्प है, छोटा है।


व्यापकत्व (pervasiveness or the quality of being pervaded, permeated or penetrated in others) की दृष्टि से विचार किया जाए तो ईश्वर सर्वव्यापक है, अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर है। इस गुण को लेकर दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में जीवात्मा को ईश्वर से स्थूल और ईश्वर को जीवात्मा से सूक्ष्म लिखा है। जीवात्मा में यह व्यापकत्व गुण नहीं है, ऐसा मैं समझता हूं।


एक कठिन विषय को मैंने अपनी अल्प मति से जैसा समझ पाया हूं, यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है – इस आशा के साथ कि सुविज्ञ आर्य पाठक इन बातों पर सम्यक् विचार करेंगे जिससे सत्य की गवेषणा हो सके। मैंने यहां जो लिखा है वही सत्य है, ऐसा मैं मन में भी नहीं सोचता हूं। प्रत्युत मैं ऐसा समझता हूं कि यह विषय गहन है, अतः चिन्तनशील आर्यों को धैर्यपूर्वक विचार-विमर्श करना होगा।


जिन आर्यों ने ‘जीवात्मा सर्वथा निराकार नहीं है’ इस प्रकार की बातें प्रसारित की हैं, मैं नहीं समझता हूं कि उन्होंने किसी अ-भद्र भावना से ऐसा किया है। यह विषय ही ऐसा है कि कुछ लोग अन्यथा विचार या निर्णय कर सकते हैं।


लेखक : भावेश मेरजा ( आर्यसमाज, भरूच)


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*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता...

*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता १८/६६*


इस श्लोक का क्या अर्थ होता है?


*उत्तर"*


अर्थ : “सब धर्मों(वर्णाश्रम कर्त्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा । मैं तुझ को सब पापों से छुड़ा दूंगा ,चिन्ता मत कर ।


*भावार्थ-* सर्वत्र ब्रह्म को व्यापक देखने का अभ्यास करते-करते अब और आगे बढ़ें और वर्णाश्रम के धर्मों(कर्त्तव्यों) की परवाह छोड़कर सारा समय और अपनी सारी शक्ति ब्रह्म तन्मय हो जाने (समाधि आदि) में लगादें (उस के शरण में जाने का तात्त्पर्य यही है।) तो परमात्मा सर्व पापों से छुड़ा देगा ।


*प्रश्न-* *क्या परमेश्वर पाप को माफ़ कर देंगे? ,फल नहीं भुगवाएँगे?*


*उत्तर-* योग(ध्यान,धारणा,समाधि) तथा ज्ञानरुपी अग्नि में पापरुपी मल दग्ध हो जाता है । परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ईश्वर पापों को क्षमा कर देगा,पाप कर्म का दण्ड तो अवश्य मिलेगा ।


परंतु योग व ज्ञान से पापों की निवृत्ति होती है यहि अर्थग्रहण करना चाहिए, यही बात मुण्डकोपनिषद् में कही है : *मुण्डक :२ काण्ड :२ श्लोक संख्या :८ ) भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।*


*पदार्थ-* (भिद्यते) टूट जाती है। (हृदयग्रन्थिः) रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर से वियोग हो जाता है। जन्म-मरण में तो सूक्ष्म शरीर साथ रहता है, परन्तु उस दशा में पृथक् हो जाता है। (छिद्यन्ते) नष्ट हो जाते हैं। टूट जाते हैं। (सर्वसंशयाः) सब प्रकार के सन्देह। (क्षीयन्ते) क्षीण हो जाते हैं। (च) और (अस्य) उस ब्रह्मज्ञानी के। (कर्माणि) सब कर्म। (तस्मिन्) उस अवस्था में। (दृष्टे) जब साक्षात् देख लेता है। (परावरे) जो इन्द्रियों से अनुभव होने योग्य नहीं है। *भावार्थ-* जब कोई पुरुष इन्द्रियों से अनुभव न होने योग्य परमात्मा को भीतर ज्ञान-चक्षु से देख लेता है, तब उसके रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर का सबन्ध टूट जाता है। सब संदेहों का सबन्ध मन से है और मन का सूक्ष्म शरीर से। जब सूक्ष्म शरीर ही न रहा, तो मन कहां? जब मन ही नहीं तो उसमें उत्पन्न होने वाले संदेह कहां? *अतः सपूर्ण सन्देह दूर हो जाते हैं। और जब मन ही न रहा, जिसमें सब कर्मों के संस्कार रहते हैं तो उसमें रहने वाले कर्म किस प्रकार रह सकते हैं? उस ज्ञानी के सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात की उक्त "गीता” के श्लोक में सङ्गति करें ।*


*प्रश्न-क्या सपूर्ण कर्म ब्रह्मज्ञानी होने पर नष्ट हो जाते हैं?*


*उत्तर-* जब तक (वर्णाश्रम धर्मोंका) कर्मों का अभिमान बना है, तब तक ब्रह्मज्ञान या मुक्ति हो ही नहीं सकती। जब मुक्ति होती है, तब कोई कर्म शेष नहीं रहता। जैसे जब दीवाला निकल जावे तब लेने और देने की समाप्ति हो जाती है।


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*🔥ओ३म्🔥**🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं...

*🔥ओ३म्🔥*


*🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-६ ॥ 


*पदार्थ—* यक्ष ने (तस्मै) उस अग्निदेव के लिए (तृणम्) एक तिनका (निदधौ) धर दिया और (एतत्) इस तिनके को (दह, इति) जला दे, ऐसा कहा । अग्नि (तत्) उस तिनके के (सर्वजवेन, उपप्रेयाय) पूरे वेग से समीप गया, परन्तु (तत्) उसको (दग्धुम्) जलाने को (न, शशाक)समर्थ न हो सका । (ततः, एव) उसके बाद ही (सः) वह अग्निदेव (निववृते) वापस आ गए और दूसरे देवों से कहने लगे (यत्) जो (एतत्) यह (यक्षम्, इति) यक्ष है (एतत्) इसको (विज्ञातुम्) जानने को (न, अशकम्) मैं समर्थ नहीं हुआ ।

*भावार्थ—* यक्ष ने अग्नि के अहङ्कार का मर्दन करने के लिए अग्नि के सम्मुख एक छोटा सा तिनका रक्खा, किन्तु अग्नि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को न जला सका और निराश होकर वापस आ गया और देवों से आकर कहने लगा कि मैं इस यक्ष को नहीं जान सका । क्रमश:…

*💥शम्💥*

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Friday, May 4, 2018

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-ગીતા બહેન પટેલ -ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…પણ,એમની...

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-


ગીતા બહેન પટેલ -

ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…

પણ,

એમની કોઠાસૂઝ ગજબની !


એમના પતિ કરસનભાઈને -

ડૉક્ટર ભાવસાર સાહેબે આ વખતે તો ચોક્ખા શબ્દોમાં કીધું કે -

હવે ડાયાબિટીસ કાબૂમાં નહિં રાખો…

તો,

પગ કપાવવો પડશે !


આ છેલ્લી વખતનું ઓપરેશન છે…

જો ‘સડો’ હાડકામાં પહોંચ્યો…

તો,

આટલા ડાયાબિટીસને લીધે - 'સેપ્ટિસિમીયા’ થઈ આખા શરીરમાં એનું ઝેર પહોંચી શકે છે !


જો એવું થાય તો,

ઝેરનાં લીધે -

કિડની, લિવર , મગજ , ફેફસાં અને હૃદય બધું જ ઠપ થઈ જાય !


ગીતા બહેને પણ આ વાતને ગંભીરતાથી લીધી.


એમણે ભાવસાર સાહેબને પૂછ્યું કે -

પહેલા તો એક ગોળી થી ડાયાબિટીસ કાબૂમાં આવતો હતો…

પછી,

ધીમે ધીમે બે, ત્રણ, ચાર ગોળીઓ અને પાછળથી તો એ પણ અસર કરતી ન હતી.


હવે તો ઈન્સ્યુલીનના ઈંજેકશન પણ થાકી ગયા હતા.


આ વખતનો એચ. બી. એ. વન. સી રિપોર્ટ ૧૨.૫ હતો,

ફાસ્ટિંગ ૨૨૦ અને પી.પી.બી.એસ. ૪૫૦.


દિવસે દિવસે પરિસ્થિતિ બેકાબૂ બનતી હતી…

એમાં -

હવે પગમાં કશું વાગી જાય તો -

ખબર પણ પડતી ન હતી !


જ્યારે પાકે અને રસી નીકળે…

ત્યારે -

કોઈ કહે તો જ કરસનભાઈનું ધ્યાન જાય.


એમને પગનાં તળિયામાં સોય વાગે કે કાચ કોઈ જ વેદના ના થાય.


આનું કારણ જાણવા ગીતાબહેને સાહેબને વિનંતી કરી…


ડૉક્ટર ભાવસારે જણાવ્યું કે -

લાંબા ગાળાના ડાયાબિટીસમાં આખા શરીરની લોહીની નળીઓ અને ચેતાઓ સૂઝી જાય છે.


હૃદય, કિડની, મગજ વગેરે અંગો ખરાબ થઈ જાય છે.


હૃદય અને મગજમાંથી -

વિવિધ અંગો હાથ પગ તરફ આવતી જતી ચેતાઓ પણ સૂઝીને બિનકાર્યક્ષમ થઈ જાય છે.


આ બધાને કારણે રોગપ્રતિકારક શક્તિ પણ ઘટે છે…

અને,

સંવેદના પણ જતી રહે છે.


એટલે -

નાનું મોટું વાગવાનું થાય તો ખબર પડતી નથી.


ગીતા બહેને પૂછ્યું કે -

સારામાં સારા ડાયાબિટીસના ડૉક્ટરોને બતાવવા છતાં પણ…

આ રોગ કેમ કાબૂમાં નથી આવતો ?


ડૉ. ભાવસારે જૂની બધી ફાઈલો અને રિપોર્ટ તપાસ્યાં.


ડૉક્ટરો તો બધાં ડીગ્રીધારી હતાં,

કોઈ ઊંટવૈદ પાસે તો એ લોકો જતાં ન હતાં.


દવાઓ પણ બધી જ સારી અને સ્ટાન્ડર્ડ હતી…


તો પછી -

પાંચ જ વર્ષમાં આ હાલત શા માટે ?


ડૉક્ટરે કઢાવી કરસનભાઈનાં ખોરાક (ભોજન) ની આદતોને…


ઊંડા ઊતરતા ખબર પડી કે -

એમને 'બે’ વખત પેટ ભરીને જમવાની આદત હતી.


આખા દિવસનો ખોરાક ખૂબ વધારે હતો…


પાછી,

તેમની આદત હતી કે -

બંને વખત પેટ ભરીને દબાવીને ઓડકાર આવે એમ ખાવું !


પાછું વચ્ચે-વચ્ચે નાસ્તા ફરસાણ અને ચાર-પાંચ વખત ચા-પાણી…


આ બધી આદતો -

ડાયાબિટીસનાં દર્દી માટે તો આપઘાત કરવા બરાબર કહેવાય !!


બીજું,

કરસનભાઈ જમવામાં માત્ર રોટલી , ભાખરી, પરોઠા અને શાક જ ખાતાં હતાં.


બધા ડૉક્ટરોએ -

એમને ભાત - બટાકા - ખાંડ - ગોળ -આઈસ્ક્રીમ - મિઠાઈથી દૂર રહેવાનું કીધું હતું.


એ બધી પરેજીઓનું એ ચુસ્ત પાલન કરતાં હતાં…


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Monday, April 16, 2018

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है ।...

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है । मेरी इच्छा जहां होगी मैं वहां वैसे उतना खर्च करूंगा ।* यह सोच गलत है । क्योंकि आप जो धन कमाया, वह आप तब कमा पाए , जब बचपन से आपके माता पिता ने आपको पाल-पोसकर खिला-पिलाकर बड़ा किया । आपके गुरुजनों ने आपको अनेक विद्या सिखाईं । अन्य भी अनेक विद्वानों संन्यासियों महात्माओं ने आपको शिक्षा दी । ईश्वर ने भी आपके खाने पीने के लिए तरह तरह के अनाज फल फूल साग सब्जियां और सूर्य चंद्रमा पृथ्वी जल अग्नि इत्यादि पदार्थ बनाए। और इन पदार्थों की सहायता से आप इतने बलवान बुद्धिमान विद्वान धनवान एवं समर्थ बन पाए।

ईश्वर, माता पिता और गुरु जनों के अतिरिक्त, देशभर के लोगों ने भी आपके लिए रेल बनाई सड़क बनाई बिजली बनाई टेलीफोन बनाया कंप्यूटर बनाया टेलीविजन बनाया मोबाइल फोन बनाया जिन पदार्थों की सहायता से आप इतने समर्थ हुए और ₹2 कमा पाए ।

यदि ये सब लोग आपकी सहायता न करते , तो आप कुछ भी नहीं कमा पाते, और ना ही इतने स्वस्थ, बलवान व धनवान होते। इसलिए इन सब का उपकार मानना चाहिए। और इनकी सहायता से जो धन आपने कमाया , उस धन पर इन सब लोगों का भी कुछ हिस्सा अधिकार मानना चाहिए । तथा उनके लिए कुछ खर्च दान आदि भी करना चाहिए। यही बुद्धिमत्ता है और यही न्याय है । -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Saturday, April 14, 2018

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का...

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का ज्ञान अनुभव आदि बच्चों की तुलना में अधिक होता है। संसार में सबसे उत्तम वस्तु है ज्ञान। जिसका ज्ञान शुद्ध है और उसके अनुसार आचरण भी ठीक है , वही व्यक्ति संसार में सुखी हो सकता है ।

तो माता-पिता का ज्ञान बालक के ज्ञान से अधिक है , और यदि आचरण भी वैसा ही हो , तो बालकों को अपने माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए।


जो बच्चे अपने माता-पिता के ज्ञान और आचरण को अपना लेते हैं, उनके निर्देश आदेश संदेश का पालन करते हैं , वे संसार में सुखी होते हैं और जीवन में बहुत अच्छा विकास करते हैं ।

जो बच्चे अपने माता पिता की बात नहीं मानते , वे सदा दुखी और परेशान रहते हैं , उनके जीवन का विकास ठीक नहीं होता। और बुढ़ापे में वे खूब पछताते हैं कि हमने अपने माता-पिता के अनुभवों का लाभ नहीं लिया। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Friday, April 13, 2018

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*। वास्तव में फल मिलता नहीं है ,...

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*।

वास्तव में फल मिलता नहीं है , फल न्याय पूर्वक सोच समझ कर माप तोल कर दिया जाता है। मोटी भाषा में लोग कह देते हैं, वैसा फल मिलेगा ।

कोई नौकर किसी सेठ के यहां नौकरी करता है , तो उसे वेतन मिलता नहीं है, सेठ अपने हाथ से उसे नापतोल कर वेतन देता है। यह उसका कर्म फल है ।


तो जिस व्यक्ति के जीवन में अच्छे गुण हों, उन गुणों के कारण वह अच्छे अच्छे कर्म करता हो , तो निश्चित रुप से उसे अच्छा ही फल मिलेगा , कुछ इस जन्म में और कुछ अगले जन्मों में। जब जिस कर्म का फल प्राप्त होने का समय आएगा , उसी समय उसको फल दिया जाएगा। चाहे समाज और सरकार देवे, चाहे ईश्वर देवे। इसलिए फल प्राप्ति में कभी संशय नहीं करना चाहिए।

लोग फल प्राप्ति में जल्दबाजी करते हैं । ठीक समय की प्रतीक्षा नहीं करते , और चिल्लाने लगते हैं कि अब तक हमें हमारे अच्छे कर्मों का फल नहीं मिला , अब तक हमें अच्छा फल नहीं मिला । यह कोई नहीं कहता कि *अब तक हमें हमारे बुरे कर्मों का दंड क्यों नहीं मिला?*

तो चिंता ना करें अच्छे बुरे सभी कर्मों का फल समय आने पर अवश्य मिलेगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन...

*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन में ला नहीं पाते।

इसी प्रकार से अभिमान की बहुत निंदा करते हैं, फिर भी उसे छोड़ नहीं पाते ।

कोई बात नहीं । किसी भी दोष को छोड़ने के लिए और गुण को धारण करने के लिए बार बार पुरुषार्थ करना चाहिए , चाहे जितनी बार भी असफल हों, तब भी कभी निराश नहीं होना चाहिए , सफलता एक दिन अवश्य मिलेगी ।

तो *नम्रता ही अच्छी है , यही सुखदायक है , समाज में प्रतिष्ठा जनक है । जबकि अभिमान बुद्धि का विनाशक है, दुखदायक है, प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाला है* ।

ऐसा बार-बार सोचें। ऐसा कुछ प्रयास करने के बाद, आप का अभिमान धीरे-धीरे कम होने लगेगा, और नम्रता बढ़ने लगेगी । तब देखिएगा, जीवन में कितना आनंद होगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ।


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Thursday, April 5, 2018

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके...

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…

नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके सुरक्षित रखें। इन सभी लिंक्स में विषयानुरूप और सेंकडो हिंदी - अंग्रेजी पुस्तकें सम्मिलित होने वाली है।
                   👇🏼👇🏼👇🏼

👇🏼 महापुरुषों के जीवन चरित संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1-ZD_Eq-SYkx1UmX4a7693ayD382G0JQv

👇🏼 स्वामी दयानन्द सरस्वती विषयक ग्रन्थ संग्रह संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=16pMp0wlopdqKkApFPYSz_wvGeaNvhhPW

👇🏼 महर्षि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1jC__V4uKRAjqi6SXrYc-aqsqV21CbNd5

👇🏼 खण्डन-मंडन पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1XXBovQ-rqNjKQC4vpgH-pBnIav9jl6J7

👇 श्री कृष्ण विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1Ex0AZkFUgvNgU6VEG0s2BntIUse_TjKz

👇🏼 वैदिक साहित्य संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1oRxZ4o-d1XZ59sMm4RhJlVZ_JyZxQ479

👇🏼 इस्लाम विषयक खण्डनात्मक पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1MKu2JIZKbCNG_zPf8x7i_rD8n-m2PNJG

👇🏼 ईसाई मत खंडन पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1mPIecrRVKT-SOkMEbvrXWnUHvDIFtCrj

👇🏼 इतिहास विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1yoJc0hhHt2d9aVMDsZVOZVWTtXQOM9EG

🙏🏻 Read and encourage others to read… स्वयं पढ़े और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें।🙏🏻


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Wednesday, April 4, 2018

लघु आत्म कथा









लघु आत्म कथा


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Tuesday, April 3, 2018

।।ओ३म्।।सही ‘हनुमान् चालीसा’:-यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी...

।।ओ३म्।।

सही ‘हनुमान् चालीसा’:-


यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ 

लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी सज्जन महावीर हनुमान् के नाम पर फैल रहे अंधविश्वास,पाखंड और को त्याग कर हनुमान् के यथार्थ चरित्र की विशेषताओं को जान सके, उनके सद्गुणों को अपने जीवनों में धारण कर सकें तथा सच्चे ईश्वरभक्त बनकर अपने जीवनों को सुखी बना सकें।


‘ओ३म्’

‘हनुमान् चालीसा’

करता हूँ वर्णन यहाँ,करके प्रभु का ध्यान।

सुनो वीर हनुमान् का,सुखदाई गुणगान॥


1-पितु पवन थे अंजना माता।

उनके घर जन्मा दुख-त्राता॥


2-चैत्र वदि शुभ अष्टमी आई।

मंगलवार जन्म सुखदाई॥


3-सुन्दरतम हनु अंग सुहाए।

इसीलिए हनुमान् कहाए॥


4-मात-पिता प्रभु के गुण गाते।

बालक को बलवान बनाते॥


5-रवि-सम तेजस्वी मुख पाया।

हृष्ट-पुष्ट सुन्दरतम काया॥


6-ऋषि अगस्त्य के गुरुकुल आए।

वैदिक विद्या पढ़ सुख पाए॥


7-वेद ज्ञान-विज्ञान पढे थे।

सदाचार के पंथ बढ़े थे॥


8-मल्ल-युद्ध गदा थे प्यारे।

नहीं किसी से डरे न हारे॥


9-मात-पिता,गुरु भक्त कहाते।

उठकर प्रात: शीश झुकाते॥


10-शक्ति,शील,सौन्दर्य सारे।

महावीर विनम्र थे प्यारे॥


11-वेद-पाठ सुन्दरतम गाते।

श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते॥


12-नीति-निपुण,रक्षा सज्जन के।

न्याय करें प्यारे जन-जन के॥


13-संध्या और हवन नित करते।

वेद-ज्ञान,सद्गुण मन धरते॥


14-ब्रह्मचर्य-व्रत जीवन धारे।

सत्य,न्याय,परहित ही प्यारे॥


15-अतुलित बल,यौवन-धन पाया।

संयम का जीवन अपनाया॥


16-परमेश्वर का ध्यान लगाते।

ओम-ओम ही जपते जाते॥


17-प्राण साधना अद्भुत करते।

अनुपम बल तन-मन में भरते॥


18-परमेश्वर का दर्शन पाया।

मानव-जीवन सफल बनाया॥


19-वन-रक्षक अनुपम नर नेता।

सब युद्धों में रहे विजेता॥


20-त्याग तपस्या अनुपम पाए।

सकल विश्व उनके गुण गाए॥


21-मित्र सहायक बनकर आए।

अद्भुत सेना-नायक पाए॥


22-दृढ़ प्रतिज्ञ हनुमान् हमारे।

दुष्ट गदा से रण में मारे॥


23-कभी नहीं विचलित होते थे।

नहीं धीरता को खोते थे॥


24-वेद-ज्ञान के पण्डित भारी।

दिव्य,तपस्वी,शोभा प्यारी॥


25-सन्तजनों की सेवा करते।

उनके सब दु:खों को हरते॥


26-नारी का सम्मान बढ़ाते।

सन्नारी को शीश झुकाते॥


27-रामचन्द्र सुग्रीव मिलाए।

बने सहायक दुख मिटाए॥


28-रामदूत बनकर सुख चाहा।

दिया वचन जो उसे निबाहा॥


29-लाँघ सिन्धु लंका में आए।

सीता को खोजा सुख पाए॥


30-रावण को सब कुछ समझाया।


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वैदिक दर्शन भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जीदर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन...

वैदिक दर्शन 

भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जी


दर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन इति दर्शनम्” से सम्यक दृष्टिकोण ही दर्शन है अर्थात् समग्रता को यथार्थरूप में कहने वाला दर्शन है। जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसा ही उपदेश करना सत्य है और यही सत्य दर्शनों द्वारा प्रतिपादित किया गया है। वेद को प्रमाणित मानने वाले छः दर्शन है, इन्हीं को वैदिक दर्शन या षड्दर्शन कहते हैं। ये छः दर्शन है – न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त।


महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ “सत्यार्थप्रकाश” में दर्शनों के अध्ययन-अध्यापन की विधि का उल्लेख किया है – 

“तदनन्तर पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त अर्थात् जहाँ तक बन सके, वहाँ तक ऋषिकृत व्याख्यासहित अथवा उत्तम विद्वानों की सरल व्याख्यायुक्त छः शास्त्रों को पढे-पढावें” – सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास3 

इससे दर्शनों के महत्त्व का ज्ञान होता है।


सभी दर्शनों में कुछ समानताएं हैं, जो निम्न प्रकार है – 

1 सभी में वैदिक मङ्गलाचरण ‘अथ’ शब्द से होता है।

2 सभी दर्शनों में प्रथम सूत्र में ही अपना प्रतिपाद्य विषय निश्चित है। 

3 सभी दर्शन उद्देश्य कथन के उपरान्त, उसका लक्षण बताते हैं, पुनः शेष शास्त्र में उसका परीक्षण करते हैं।

4 सभी शास्त्रों की शैली सूत्ररूप अर्थात् संक्षेप में कहने की है।

5 सभी शास्त्र अपने प्रधान विषय का परिज्ञान करने के साथ-साथ अनेक उपविषयों का भी परिज्ञान कराते हैं। 

6 सभी शास्त्र वेदों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं।

7 सभी शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।


इन सभी दर्शनों के अपने-अपने विषय है। जिनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है – 

1 मीमांसा दर्शन – इसमें धर्म एवम् धर्मी पर विचार किया गया है। यह यज्ञों की दार्शनिक विवेचना करता है लेकिन साथ-साथ यह अनेक विषयों का वर्णन करता है। इसमें वेदों का नित्यत्व और अन्य शास्त्रों के प्रमाण विषय पर विवेचना प्रस्तुत की गई है। 

2 न्याय दर्शन – इस दर्शन में किसी भी कथन को परखने के लिए प्रमाणों का निरुपण किया है। इसमें शरीर, इन्द्रियों, आत्मा, वेद, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि विषयों पर गम्भीर विवेचना प्राप्त होती है। 

3 योग दर्शन – इस दर्शन में ध्येय पदार्थों के साक्षात्कार करने की विधियों का निरुपण किया गया है। ईश्वर, जीव, प्रकृति इनका स्पष्टरूप से कथन किया गया है। योग की विभुतियों और योगी के लिए आवश्यक कर्तव्य-कर्मों का इसमें विधान किया गया है। 

4 सांख्य दर्शन – इस दर्शन में जगत के उपादान कारण प्रकृति के स्वरूप का वर्णन, सत्त्वादिगुणों का साधर्म्य-वैधर्म्य और उनके कार्यों का लक्षण दिया गया है। 

त्रिविध दुःखों से निवृत्ति रूप मोक्ष का विवेचन किया है। 

5 वैशेषिक दर्शन – इसमें द्रव्य को धर्मी मानकर गुण आदि को धर्म मानकर विचार किया है। छः द्रव्य और उसके 24 गुण मानकर उनका साधर्म्य-वैधर्म्य स्थापित किया है। भौत्तिक-विज्ञान सम्बन्धित अनेंको विषयों को इसमें सम्मलित किया गया है। 

6 वेदान्त दर्शन – इस दर्शन में ब्रह्म के स्वरूप का विवेचन किया है तथा ब्रह्म का प्रकृति, जीव से सम्बन्ध स्थापित किया है। उपनिषदों के अनेकों स्थलों का इस ग्रन्थ में स्पष्टीकरण किया गया है।


इन सभी दर्शनों पर सरल और विस्तृत भाष्य आचार्य उदयवीर शास्त्री द्वारा रचित है। यह भाष्य दर्शनों के वास्तविक अभिप्राय को प्रकट करता है। इस भाष्य समुच्चय में प्रत्येक दर्शन भाष्य से पूर्व विस्तृत भूमिका दी गई है और अन्त में सूत्रानुक्रमणिका दी गई है। दर्शनों को आत्मसाद् करने के लिए इस दर्शन समुच्चय को अवश्य प्राप्त कर, अध्ययन करें।


प्राप्ति स्थान - vedrishi.com


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*विभिन्न रोग और उनका उपचार*1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा...

*विभिन्न रोग और उनका उपचार*


1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा समाप्त हो जाता है।

2. नकसीर (नाक में से खून का आना) :नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबरमात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने सेनकसीर का चलना बन्द हो जाता है।

3. बालों का असमय में सफेद होना (पालित्य रोग) :नीम के बीजों के तेल को 2-2 बूंद नाक सेलेने से और केवल गाय के दूध का सेवन करने से पालित्य रोग में लाभ होता है।

4. नीम के तेल को सूंघने से बाल काले हो जाते हैं।नीम के बीजों को भांगरा और विजयसार केरस की कई भावनाएं देकर बीजों का तेलनिकाल लें, फिर इसकी 2-2 बूंदों को नाक से लेने से तथाआहार में केवल दूध और भात खाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।

5.बालों की रूसी :एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकरनहाने से 1 घंटे पहले सिर पर मलने से रूसी मिटजाती है।

6. नीम की निबौलियों को सुखाकरअरीठा के साथ मिलाकर बारीकपीसकर रख लें। इसे 2 चम्मच भर एक गिलास गर्मपानी में घोलकर सिर को धो लेने से सिर कीजूंएं, लीखें, सिर की दुर्गन्ध खत्म होजाती है तथा बाल काले और मुलायम होते हैं।

7. नीम के पत्तों को पीसकर पानीमें उबालकर ठंड़ा होने दें। इसके बाद इसे छानकर इससे सिर को धोलें और बालों को सही तरह से मालिश करें। बालों केसूख जाने पर स्वच्छ एरण्ड का तेल और नारियल का तेल बराबरमात्रा में लेकर इसे मिला लें और इससे सिर कीअच्छी तरह से मालिश करें। इससे सिर कीरूसी मिट जाएगी।


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➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*“...

➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*


1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*

“ वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।


2. *हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946):*

” वेदों का सनातन धर्म का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा तभी एकदिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी और उसी दिन ही दिल शाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी सलाम हो उस दिन “।


3. *अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955):*

"मैं समझता हूँ कि आर्यों ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके, वेदों मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।


4. *हसटन स्मिथ (1919):*

"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो वेद आधारित सनातन धर्म है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।


5. *माइकल नोस्टरीडाम (1503 - 1566):*

” वैदिक सनातन धर्म ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर आर्य लोगों की राजधानी बन जाएगा"।


6. *बर्टरांड रोसल (1872 - 1970):*

“मैंने वेदों को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है, वैदिक धर्म पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में सनातन धर्म के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि आर्य संस्कृति ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।


7. *गोस्टा लोबोन (1841 - 1931):*

” वैदिक धर्म ज्ञान ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार के ही विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।


8. *बरनार्डशा (1856 - 1950):*

“सारी दुनिया एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगी, अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी।

पश्चिम एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगा और वेद ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।


9. *जोहान गीथ (1749 - 1832):*

"हम सभी को अभी या बाद मे सनातन धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है, मुझे कोई आर्य कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा,

मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ।



*जय आर्य जय वैदिक धर्म*

🙏🏼 *जय आर्यावर्त राष्ट्र की* 🙏


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