Saturday, March 19, 2016

अगर किसी दलित को आदर्श मानना है तो रोहित वेमूला को आदर्श मानने से अच्छा है की छोटा राजन को आदर्श...

अगर किसी दलित को आदर्श मानना है तो रोहित वेमूला को आदर्श मानने से अच्छा है की छोटा राजन को आदर्श माना जाए. छोटा राजन एक दलित परिवार से हैं. लेकिन उन्होनें देश के दुश्मनो का साथ देने के स्थान पर देश के दुश्मनो का सफ़ाया किया. मुंबई धमाकों के आरोपियों को छोटा राजन ने अपने दम पर उन्ही की भाषा में जवाब दिया. मुंबई में फैले दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क को किसी शिवसेना, भाजपा संघ आदि ने नही बल्कि छोटा राजन ने अपने बलबूते पर कमजोर किया.भाजपा सरकार ने दाऊद इब्राहिम को गिरफ्तार करने का वादा किया था लेकिन उसके स्थान पर राष्ट्रवादी छोटा राजन को गिरफ्तार किया और उसके आदमियों को गिरफ्तार करके उसके नेटवर्क को कमजोर किया. भाजपा के लोग बड़ी बेशर्मी से इसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं.

जो लोग रोहित वेमूला के नाम पर राजनीति कर रहे हैं उन्हें उसके जीवन से कुछ सीखना चाहिए. रोहित एक सम्मानित लेखक बनना चाहता था. लेकिन वामपंथियों की संगत में आकर वो एक दानव बन गया. वो समझ गया की उसने अपना जीवन बर्बाद कर लिया है. और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली. उसने आत्महत्या करने से पहले अपनी मौत पर राजनीति ना करने की इच्छा व्यक्त की थी. लेकिन रोहित वेमूला के नाम पर हंगामा करने वालों ने उसकी अंतिम इच्छा का सम्मान भी नही किया. खुद रोहित की माता ने अपने पुत्र की मौत पर हो रही राजनीति का विरोध किया. लेकिन इन सेक्युलर राष्ट्रद्रोहियों पर कोई असर नही हुआ. आज भी ये वामपंथी और सेक्युलर सोच रोहित जैसे अनेक प्रतिभाशाली युवाओं का जीवन बर्बाद कर रही है.

सेक्युलर लोग दलितों को कल्पना की दुनिया में धकेल रहे हैं और उनको सत्य से दूर किया जा रहा है. अरुण महोर, नरेंद्र राजोरिया जैसे दलितों की हत्या जेहादियों द्वारा कर दी गयी. लेकिन सेकुलरों को इसमें दलितों का उत्पीड़न नज़र नही आया. उत्तर प्रदेश में एक नही अनेक मामले सामने आए हैं जब मुस्लिमों ने दलित महिलाओं का बलात्कार करके उनकी हत्या कर दी. मुसलमानो द्वारा दलित महिलाओं का उत्पीड़न उत्तर प्रदेश में आम हो चुका है और समाजवादी पार्टी की सरकार दलितों पर अत्याचार करने वालों को खुला संरक्षण दे रही है. पुणे में दलितों को मुसलमानो ने जिंदा जला दिया. बंगाल केरल आदि में एक के बाद एक मुस्लिम हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं उनमें अधिकांश दलित हैं. लेकिन खुद को दलितों का हितैषी कहने वाले सेकुलरों को इसमे दलित उत्पीड़न नज़र नही आ रहा. पंजाब में दलितों की आबादी का सर्वाधित प्रतिशत है लेकिन आजतक वहाँ कोई दलित मुख्य मंत्री नही बना. दर्शन सिंह केपी जैसे राष्ट्रवादी दलित का जब पंजाब की राजनीति में कद बढ़ना शुरू हुआ तो खालिस्तानियों ने उनकी हत्या कर दी. केजरीवाल जैसे लोग पंजाब में राजनीति कर रहे हैं और निर्दोषों की हत्या करने वाले खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन कर रहे हैं. अगर उनमे साहस है तो पंजाब में दलितों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठायें. क्या आम आदमी पार्टी पंजाब में किसी दलित को मुख्य मंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करेगी.सेकुलरों के अनुसार जेहादियों और खालिस्तानियों को दलितों पर अत्याचार करने का पूरा अधिकार है लेकिन अगर किसी सवर्ण और दलित के बीच विवाद की झूठी अफवाह भी फैल जाए तो ये सेक्युलर पूरा देश अपने सर पर उठा लेते हैं. ये दोहरे मापदंड कब तक चलेंगे.

आज देश को छोटा राजन जैसे राष्ट्रवादियों की आवश्यकता है जो देश के दुश्मनो को उन्ही की भाषा में जवाब दे. दलितों को रोहित वेमूला के स्थान पर छोटा राजन को अपना आदर्श मानना चाहिए. रोहित वेमूला तो राह से भटक गया और असफल होकर दुनिया से चला गया लेकिन छोटा राजन ने देश के लिए जो काम किया वो हमारे देश की पुलिस और खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले संगठन भी नही कर पाए. सेक्युलर राष्ट्रभक्षी ये साबित करने में लगे हैं की सवर्ण विदेशी है और दिन में पाँच बार एक विदेशी भाषा में नमाज़ पढ़ने वाले मूलनीवासी हैं. हिंदुओं में फूट डालने की कोशिश की जा रही है. दलितों को काल्पनिक ख़तरे दिखा कर भटकाया जा रहा है लेकिन दलितों को अब अपनी आँखें खोलकर अपने दोस्तों और दुश्मनो में अंतर करना होगा. स्वयं बाबा साहब अंबेडकर के इस्लाम के बारे में क्या विचार थे इस बात का दलितों को अध्ययन करना होगा. दलित महात्मा बुद्ध को आदर्श मानते हैं लेकिन मुस्लिमों ने बौद्धों के साथ क्या किया है इसका इतिहास भी दलितों को जानना होगा. जो मुस्लिम अपनो के नही हुए वो दलितों के क्या होंगे. दलित हो या सवर्ण दोनो तब तक सुरक्षित हैं जब तक भारत की और हिंदुओं अखंडता सुरक्षित है. जिस दिन देश की अखंडता टूट जाएगी उस दिन ना सवर्ण बचेंगे और ना ही दलित. मुसलमान दलितों का प्रयोग करके सत्ता हासिल करना चाहते हैं. सत्ता मिलते ही वो भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर देंगे और फिर सवर्ण और दलित में कोई अंतर किए बिना सभी हिंदुओं की हत्या करेंगे.


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“संसार में बहुत लोग असफल हो जाने के डर से प्रतिस्पर्धा में नही पड़ते। यह कहना कि प्रभु ने जो...

“संसार में बहुत लोग असफल हो जाने के डर से प्रतिस्पर्धा में नही पड़ते। यह कहना कि प्रभु ने जो दिया है मैं उसमें सन्तुष्ट हूँ। यह संतोष नहीं कमजोरी है, भय है, नकारात्मक संतोष है। अपने आप को विकसित करने से रोक देने जैसा है, फूल को खिलने से रोक देने जैसा है।।

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डॉ० कुलवीर बैनीवाल 📞09254222201☎


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Wednesday, March 16, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 🌻स्वतंत्र भारत कैसा होगा🌻 अजी ऐजी एक दम पलटेगा रंग जमाना। पीछे धोखा खाते रहे अब आगे मत...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

🌻स्वतंत्र भारत कैसा होगा🌻

अजी ऐजी एक दम पलटेगा रंग जमाना।
पीछे धोखा खाते रहे अब आगे मत खाना।।
जब पलटेगा रंग जंग घोर घमसान होंगे।
जाति के दीवानें वीर जाति पे कुर्बान होंगे।।
कायर क्रूर भागेंगे और सामने नौ जवान होंगे।
आजादी देवी की भेंट लाखों ही बलिदान होंगे।।
गोरों के गुलामों का तो बिल्कुल बाईकाट होगा।
भागेंगे विदेशी और अपना राज पाट होगा।।
रहे ना विदेशी वस्तु सब स्वदेशी ठाठ होगा।
चार वर्ण,एक जाति ना कोई गुज्जर जाट होगा।
अपनी हो भाषा,बाना।-।। १ ।।

मतभेदों का नाश करके सबके एक ख्याल होंगे।
गऊ भक्षक मिटाए जाएं,आर्य गोपाल होंगे।
शिखा,सूत्र होंगे सबपे,जुल्फों के ना बाल होंगे।
चोर जार रहें नहीं तैयार ऐसे जाल होंगे।
जो ओरों का खून पिये इनके बुरे हाल होंगे।
घी,दूध के देख लेना घर-घर अन्दर ताल होंगे।
सिर पे होगा ताज राज करते वीर लाल होंगे।
हो दूध दही का खाना।-।। २ ।।

रहेंगे ना भेदभाव आपस में भलाई होगी।
किसानों का राज होगा खेतों में कमाई होगी।
हाथी,घोड़े,बैल बढ़िया गऊओं की चराई होगी।
खेतों में कपास घर-घर सूत की कताई होगी।
शादी और विवाहों में ये स्वदेशी मिठाई होगी।
खद्दर का बिछौना और खद्दर की रजाई होगी।
त्याग कर म्लेच्छ भाषा वेदों की पढ़ाई होगी।
रंड़ी,हिजड़े,सांगियों की जूतों से पिटाई होगी।
जो भरते भेष जनाना-।। ३ ।।

लेडी और बाबू न होंगे,ऋषियों का जमाना होगा।
जितनी है मशीन सबका यहाँ कारखाना होगा।
जहाज हवाई रेल मोटर घड़ियों का बनाना होगा।
शिल्प का प्रचार घर-घर लाजमी कराना होगा।
करेगी आनन्द बुलबुल अपना आशियाना होगा।
हो सबपे हथियार हर कोई मारत निशाना होगा।
फाँसी पै चढ़ाया जाएगा मर्द जो जनाना होगा।
उत्सवों में शादियों में “भीष्म” तेरा गाना होगा।
ऋषि दयानन्द के गुण गाना।-।। ४ ।।


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🌷 राष्ट्रीय प्रार्थना🌷 💐 ब्रह्मन!स्वराष्ट्र में हो , 💐द्विज ब्रह्मतेजधारी । 🌷क्षत्रिय महारथी हो...

🌷 राष्ट्रीय प्रार्थना🌷

💐 ब्रह्मन!स्वराष्ट्र में हो ,
💐द्विज ब्रह्मतेजधारी ।
🌷क्षत्रिय महारथी हो ,
🌷अरिदल विनाशकारी ।।
💐होंवें धुधारु गौंवें ,
💐पशु अश्व आशुवाही ।
🌷आधार राष्ट्र की हों ,
🌷नारी सुभग सदा ही ।।
💐बलवान सभ्य योधा ,
💐यजमान पुत्र होंवे ।
🌷इच्छानुसार बर्षे,
🌷 पर्जन्य ताप धोवें।।
💐फल फूल से लदी हों ,
💐औषध अमौघ सारी।
🌷 हो योग क्षेमकारी,
🌷स्वाधीनता हमारी ।।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
……. नरेन्द्र आर्य ……….
💐वैदिक क्रांति दल 💐
🌻9910244014🌻


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Saturday, March 12, 2016

લિજ્જત છે ! : અમૃત ‘ઘાયલ...

લિજ્જત છે ! : અમૃત ‘ઘાયલ ’
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ગભરુ આંખોમાં કાજળ થઈ, લહેરાઈ જવામાં લિજ્જત છે,
ચર્ચાનો વિષય એ હોય ભલે, ચર્ચાઈ જવામાં લિજ્જત છે !

વેચાઈ જવા કરતાંય વધુ વહેંચાઈ જવામાં લિજ્જત છે,
હર ફૂલ મહીં ખુશબો પેઠે ખોવાઈ જવામાં લિજ્જત છે .

પરવાના પોઢી જાયે છે ચિર મૌનની ચાદર ઓઢીને,
હે દોસ્ત, શમાની ચોખટ પર ઓલાઈ જવામાં લિજ્જત છે .

દુઃખ પ્રીતનું જ્યાં ત્યાં ગાવું શું ? ડગલે પગલે પસ્તાવું શું ?
એ જોકે વસમી ઠોકર છે પણ ખાઈ જવામાં લિજ્જત છે .

જે અંધ ગણે છે પ્રેમને તે આ વાત નહીં સમજી જ શકે :
એક સાવ અજાણી આંખથી પણ અથડાઈ જવામાં લિજ્જત છે .

બે વાત કરીને પારેવાં થઈ જાયે છે આડાંઅવળાં ,
કૈં આમ પરસ્પર ગૂંથાઈ, વિખરાઈ જવામાં લિજ્જત છે !

સારાનરસાનું ભાન નથી પણ એટલું જાણું છું 'ઘાયલ’
જે આવે ગળામાં ઊલટથી એ ગાઈ જવામાં લિજ્જત છે .


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भारत के ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा??? चारों वेदों को छोड़कर अन्य लगभग सभी ग्रन्थों में...

भारत के ऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा???

चारों वेदों को छोड़कर अन्य लगभग सभी ग्रन्थों में न्यूनाधिक प्रक्षेप हुआ है. पूर्वाग्रह-रहित होकर निम्नलिखित मापदण्डों से प्रक्षेप (मिलावट) का पता चलता है:
१) अन्तर्विरोध या परस्पर-विरोध
२) प्रसंग-विरोध
३) विषय-विरोध
४) अवान्तर-विरोध
५) शैली-विरोध
६) पुनरुक्ति
७) वेद-विरोध

सारे मिलावट पिछले 2500 वर्षों में हुए हैं, जैसे मनुस्मृति के 2685 श्लोकों में, 1471 मिलावटी (प्रक्षिप्त) हैं, केवल 1214 शुद्ध श्लोक उपलब्ध हैं. महाभारत में व्यासजी एवं उनके शिष्यों द्वारा रचित 10,000 श्लोक थे, जो विक्रमादित्य के काल में 20,000 श्लोक और राजा भोज के काल में 30,000 श्लोकों का हो गया.
आज १ लाख श्लोकों का महाभारत उपलब्ध है. शतपथ-ब्राहमण-ग्रन्थ, सांख्य-दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रन्थों में मिलावट हुआ.

जब कोई विद्वान् हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे अधिकतर आर्ष-ग्रंथों में मिलावट की गई है, तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं की अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा ???

इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पर अभिमान होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे सनातन वैदिक धर्म में जन्म लिया है जो विश्व में सबसे महान हैं…

वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपुर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं..

वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 8 प्रकार से याद किया जाता था….

वेद-पाठ को 3 प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1) प्रकृति-पाठ
अ) संहिता पाठ (वाक्य पाठ): मन्त्र का यथार्थ पाठ (Recite as it is)
आ) पद पाठ : प्रत्येक पद (term) को अलग-अलग पढ़ते हैं.

2) क्रम पाठ: प्रथम पद + द्वितीय पद , द्वितीय पद + तृतीय पद…(1+2, 2+3, 3+4, 4+5, and so on…)

3) विकृति-पाठ: मन्त्र के पदों को तोड़-तोड़कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से पाठ करना
अ) जटा पाठ : (1+2 + 2+1 + 1+2), (2+3 + 3+2 + 2+3),…., and so on.
आ) माला पाठ
इ) शिखा पाठ: (1+2+3 + 3+2+1 + 1+2+3), (2+3+4 + 4+3+2 + 2+3+4), …and so on.
ई) रेखा पाठ
उ) ध्वज पाठ
ऊ) दण्ड पाठ
ए) रथ पाठ
ऐ) घन पाठ: (1+2+2+1 + 1+2+3 + 3+2+1 + 1+2+3), 2+3+3+2 + …. and so on.

पण्डित रघुनन्दन शर्मा ने इन 8 पाठों में से ३ पाठों को मुख्य माना है. पाठों के इन नियमों को “विकृति-वल्ली” नामक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं….
परिमाणत: श्रोत्रिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं, जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था
की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं….
मैक्समूलर ने 'India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —-
“आज भी यदि वेद के प्रकाश को कम से कम पाँच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोत्रिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं …. स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सौभाग्य मिला हैं जो न केवल सम्पूर्ण वेदों का मौखिक पाठ कर सकते हैं, अपितु उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं….
उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन अशुद्धियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी….”

वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ 'Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं —
“The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly
a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole
of the Rigveda”.

RigVeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly
speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word.
Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने
अपने 'India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—"The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.

वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्रम से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए उनकी अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी निम्नलिखित नामों से पाई जाती हैं:

शौनकानुक्रमणी,
अनुवाकानुक्रमणी,
सुक्तानुक्रमणी,
आर्षानुक्रमणी,
छंदोंनुक्रमणी,
देवतानुक्रमणी,
कात्यायनीयानुक्रमणी,
सर्वानुक्रमणी,
ऋग्विधान,
ब्रहद्देवता,
मंत्रार्षार्ध्याय,
प्रातिशाख्यसूत्रादि |

इन अनुक्रमणिकाओं पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की, "ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण सावधानता का उपयोग किया हैं….” इसका परिणाम यह हुआ की वेदों को ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम एवं अतुलनीय हैं.

साभार:
ऋग्वेद-संहिता (सम्पादक: पण्डित दामोदर सातवलेकर)
आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता (स्वामी विद्यानंद सरस्वती)


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ब्रम्हा के मुख से ब्राम्हण वाला सिद्धान्त गलत है। वर्ण व्यवस्था शारीरिक विकास मानशिक विकास भावनात्मक...

ब्रम्हा के मुख से ब्राम्हण वाला सिद्धान्त गलत है।
वर्ण व्यवस्था शारीरिक विकास मानशिक विकास भावनात्मक विकास चेतनात्मक विकास से सम्बंधित है


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मलिक जी नमस्कार। यह मौलिक लेख है। केवल मलिक जी को प्रस्तुत है। 🔸बी पी शाह पुरुष सूक्त और मनुष्य की...

मलिक जी नमस्कार। यह मौलिक लेख है। केवल मलिक जी को प्रस्तुत है।
🔸बी पी शाह

पुरुष सूक्त और मनुष्य की ब्रहमा के मुख से ब्राहमण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पग से शूद्र की उत्पत्ति का वर्णव्यवस्था का प्रतिपादित सिद्धांत अवैज्ञानिक, अमानवीय, अन्याय, अत्याचार और अधर्म का षडयंत्र है।

सभ्य समाज में यह वर्णव्यवस्था का सिद्धांत माननीय नहीं है।

कृष्ण बुद्ध नानक कबीर ने इस वर्णव्यवस्था को अस्वीकार किया है। जन्म के आधार पर वर्णव्यवस्था मानवता विरोधी है। कलाम साहब जन्म से मछुआरे थे। यदि वर्णव्यवस्था मान्य होती तो “कलाम साहब पढ़ लिख नहीं सकते थे। इसरो के वैज्ञानिक नहीं बन सकते थे। मिसाइल मैन भी नहीं बन सकते हैं। राष्ट्रपति तो कभी बन ही नहीं सकते थे।”

अध्यात्म अव्यक्त तत्व सदाशिव ब्रम ऊर्जा शक्ति है। वर्णव्यवस्था से परे पराविज्ञान है। मनुष्य चराचर प्राणी, जीवात्मा परमात्मा का अंश है। मन वचन कर्म साधना योग ध्यान समाधि से प्रत्येक मनुष्य ईश्वरीय विभूतिमय अध्यात्म शक्तियों को प्राप्त कर सकता है।


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दूध का दूध पानी का पानी ! 6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक...

दूध का दूध पानी का पानी !

6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित ‘भ्रांति निवारण’ सोलह पृष्ठीय लेख 'सार्वदेशिक ’ मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।

आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें - अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज - पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।

1 - ’ अछूत कौन और कैसे ’

डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।

पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।

पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।

डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।

पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।

पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में'उक्ष’ बलवर्धक औषधि का नाम है जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ 'बैल’ क्यों न हो ।

डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।

पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार,“ दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।”

डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही 'गोघ्न’ , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।

प. शिवपूजन सिंह- 'गोघ्न’ का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द 'गौ’ और 'हन’ के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा - वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि 'हन’ का अर्थ 'गति’ और 'हिंसा’ बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं - ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । 'गोघ्न’ का अर्थ हुआ - ’ गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ’ = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि 'गोघ्न’ कहलाता है ।

डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।

प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।

डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर 'गो-मांसाहार’ अनिवार्य ठहराया है ।

पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

———————————–

2- ’ शूद्रों की खोज ’

डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।

पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय - 'संगठित समुदाय’- 'एक पुरूष’ रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ’ ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्…’ (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।

उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर 'इनका समुदाय’ पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।

राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।

आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही 'एक पुरुष’ रूप है।

चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-

“इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।”

आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक “ ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात ” में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।

डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।

पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।

डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)

पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ’ मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।’ कविराज श्यामल दास जी लिखते है - ’ शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ’ यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसी प्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

- ’ आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(अरुण लवानिया)


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Friday, March 11, 2016

जातिवाद पर मार हथौड़ा। आजतक मालूम नहीं है कि जातिवाद पर मार हथौड़ा समूह में शामिल करने के लिए किस...

जातिवाद पर मार हथौड़ा।

आजतक मालूम नहीं है कि जातिवाद पर मार हथौड़ा समूह में शामिल करने के लिए किस मित्र ने मेरा मोबाइल नम्बर दिया। मेरा विचार दर्शन आईडी खाते में स्पष्ट लिखा है।

मित्रता समान विचारों से होती है। विद्वान समदर्शी लोगों से होती है।

जाति का अहंकार मुझे भी है। लेकिन अहंकार का अभिमान नहीं है।

वह जातिवाद और वर्णव्यवस्था अन्याय अत्याचार हिंसा बर्बर लड़ाकू जनसंहारक अधर्म का अज्ञान अंधकार अंधविश्वास है। जो ब्रहमा के शरीर से उत्पन्न वर्णवाद की मान्यता प्रतिपादित करता है।

भारत के सिवाय जातिवाद वर्णव्यवस्था का ब्रहम राक्षस वरणासुर दुनिया में कहीं भी प्रतिपादित नहीं है।

जातिवादी और वर्णव्यवस्था पर आधारित धर्म महापापी अधर्म है। जो कि अवैज्ञानिक असत्य सतपथ अविज्ञान है।

जो जाति और मनुष्य अध्यात्म स्वधर्म ब्रहम विज्ञान को नहीं जानता है। वह अपराधी पापी अन्यायी अत्याचारी अधर्मी पशु मूर्ख है।
पंचमहाभूत सूर्य, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी का देवता दाता धर्म है।
शिव तत्व अव्यक्त तत्व ब्रहम ऊर्जा शक्ति अध्यात्म धर्म विज्ञान का परम सत्य है।
लेकिन कुछ जातियां अपने आपको ब्रहमा भगवान देवता सिद्ध करने पर लगे हैं।

भारत का विनाश जातिवाद और वर्णव्यवस्था का अधर्म है।


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शिवलिंग – ईश्वर के कल्याणकारी और मंगलमय होने का प्रमाण कुछ लोग लिंग शब्द की व्याख्या ठीक नहीं करते...

शिवलिंग – ईश्वर के कल्याणकारी और मंगलमय होने का प्रमाण

कुछ लोग लिंग शब्द की व्याख्या ठीक नहीं करते -

कुछ लिंग शब्द की व्याख्या ही गलत करते हैं -

कुछ ऐसे भी हैं जो लिंग शब्द की व्याख्या अपने अनुरूप करते हैं -
अब पता नहीं ये अति विशिष्ट ज्ञानी - कौन से ज्ञान का प्रदर्शन करते है ?????

सदैव अर्थ का अनर्थ ही करते हैं -

उनमे कुछ ऐसे भी हैं जो बस केवल लिंग शब्द की व्याख्या कर “शिवलिंग” को सिद्ध करना चाहते हैं - जब इन व्यख्याकारो से इस शब्द के अर्थ का प्रमाण मांगो की ये अर्थ कहाँ से किस आधार पर किया तो वो उनके पास होता नहीं - फिर और ज्ञान का प्रदर्शन कर अपशब्द और भद्दी भद्दी गालियाँ शुरू हो जाती हैं - जब पुराणो से “शिवलिंग” बताओ तो मानते नहीं - बस अपना अनर्थ ही सिद्ध करने का प्रयोजन करते हैं जो ठीक विदित नहीं होता -

आइये देखते हैं - लिंग का अर्थ आखिर है क्या ???

लिंग का अर्थ होता है “प्रमाण” -

ब्रह्म सूत्र के चौथे अध्याय के पहले पाद का दूसरा सूत्र है-

“लिंगाच्च”

वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आया है. सूक्ष्म शरीर 17 तत्त्वों से बना है. शतपथ ब्राह्मण-5-2-2-3 में इन्हें सप्तदशः प्रजापतिः कहा है. मन बुद्धि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ पांच कर्मेन्द्रियाँ पांच वायु. इस लिंग शरीर से आत्मा की सत्ता का प्रमाण मिलता है. वह भासित होती है. आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी के सात्विक अर्थात ज्ञानमय अंशों से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन बुद्धि की रचना होती है. आकाश सात्विक अर्थात ज्ञानमय अंश से श्रवण ज्ञान, वायु से स्पर्श ज्ञान, अग्नि से दृष्टि ज्ञान जल से रस ज्ञान और पृथ्वी से गंध ज्ञान उत्पन्न होता है. पांच कर्मेन्द्रियाँ हाथ, पांव, बोलना. गुदा और मूत्रेन्द्रिय के कार्य सञ्चालन करने वाला ज्ञान.

प्राण अपान,व्यान,उदान,सामान पांच वायु हैं. यह आकाश वायु, अग्नि, जल. और पृथ्वी के रज अंश से उत्पन्न होते हैं. प्राण वायु नाक के अगले भाग में रहता है सामने से आता जाता है. अपान गुदा आदि स्थानों में रहता है. यह नीचे की ओर जाता है. व्यान सम्पूर्ण शरीर में रहता है. सब ओर यह जाता है. उदान वायु गले में रहता है. यह उपर की ओर जाता है और उपर से निकलता है. सामान वायु भोजन को पचाता है.

आइये अब देखते हैं शिव का अर्थ क्या होता है -

“मंगलमय और कल्याणकर्ता”

अब इन दोनों अर्थो को मिला कर देखिये -

शिव + लिंग = मंगलमय और कल्याणकर्ता + प्रमाण

तो इससे सिद्ध है की शिवलिंग का अर्थ हुआ

वह ईश्वर जो मंगलमय और कल्याणकर्ता है उसका यह प्रमाण है की - मृत्यु के उपरान्त प्राणी की आत्मा को आवृत्त रखनेवाला वह सूक्ष्म शरीर जो पाँचों, प्राणों, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, पाँचों सूक्ष्मभूतों, मन, बुद्धि और अहंकार से युक्त होता है परन्तु स्थूल अन्नमय कोश से रहित होता है। लोक-व्यवहार में इसी को सूक्ष्म-शरीर कहते हैं। विशेष—कहते हैं कि जब तक पुनर्जन्म न हो या मोक्ष की प्राप्ति न हो, तब तक यह शरीर बना रहता है।

शिव कल्याणकर्ता है - मंगलमय है इसीलिए वह ईश्वर (शिव) यह कर्मफल व्यवस्था है कि आप जब तक मोक्ष प्राप्त न कर लो - इस हेतु आपका पुनर्जन्म होता रहेगा - और ये सूक्ष्म शरीर इसी लिए प्रमाण है की आप स्थूल शरीर से उत्तम कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करो - इसी कारण ईश्वर को शिव अर्थात कल्याणकारी कहा जाता है।

यह है वैज्ञानिक और वेदो के आधार पर “शिवलिंग” का अर्थ -

वह शिवलिंग नहीं जिसका पुराणो में बड़ा ही अश्लील चित्रण मिलता है -

मैं सभी हिन्दू भाइयो से विनम्र प्रार्थना करता हु कृपया सत्य को जाने - वेदो को पढ़िए - ज्ञान और विज्ञानं की और लौटिए - दुराग्रह को त्याग कर सत्य को जाने और शिव को शिव (मंगलमय और कल्याणकर्ता) ही जाने - अन्य नहीं -

ऋषि बोधोत्सव की हार्दिक शुभकामनाये, आइये हम भी सच्चे शिव को जानकार, ईश्वर की शरण ग्रहण करे।

नमस्ते -

आओ लौट चले वेदो की और


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સાવજ ગરજે ! વનરાવનનો રાજા ગરજે ગીરકાંઠાનો કેસરી ગરજે ઐરાવતકુળનો અરિ ગરજે કડ્યપાતળિયો જોદ્ધો...

સાવજ ગરજે !

વનરાવનનો રાજા ગરજે
ગીરકાંઠાનો કેસરી ગરજે
ઐરાવતકુળનો અરિ ગરજે
કડ્યપાતળિયો જોદ્ધો ગરજે
મોં ફાડી માતેલો ગરજે
જાણે કો જોગંદર ગરજે
નાનો એવો સમદર ગરજે !
ક્યાં ક્યાં ગરજે ?

બાવળના જાળામાં

ગરજે ડુંગરના ગાળામાં ગરજે
કણબીના ખેતરમાં ગરજે
ગામ તણા પાદરમાં ગરજે
નદીઓની ભેખડમાં ગરજે
ગિરિઓની ગોહરમાં ગરજે
ઉગમણો, આથમણો ગરજે
ઓરો ને આઘેરો ગરજે

થર થર કાંપે !

વાડામાં વાછડલાં કાંપે
કૂબામાં બાળકડાં કાંપે
મધરાતે પંખીડાં કાંપે
ઝાડ તણાં પાંદડલા કાંપે
પહાડોના પથ્થર પણ કાંપે
સરિતાઓના જળ પણ કાંપે
સૂતાં ને જાગંતાં કાંપે
જડ ને ચેતન સૌએ કાંપે

આંખ ઝબૂકે

કેવી એની આંખ ઝબૂકે
વાદળમાંથી વીજ ઝબૂકે
જોટે ઊગી બીજ ઝબૂકે
જાણે બે અંગાર ઝબૂકે
હીરાના શણગાર ઝબૂકે
જોગંદરની ઝાળ ઝબૂકે
વીર તણી ઝંઝાળ ઝબૂકે
ટમટમતી બે જ્યોત ઝબૂકે

જડબાં ફાડે !

ડુંગર જાણે ડાચાં ફાડે !
જોગી જાણે ગુફા ઉઘાડે !
જમરાજાનું દ્વાર ઉઘાડે !
પૃથ્વીનું પાતાળ ઉઘાડે !
બરછી સરખા દાંત બતાવે
લસ લસ કરતા જીભ ઝુલાવે.

બ્હાદર ઊઠે !

બડકંદાર બિરાદર ઊઠે
ફરસી લેતો ચારણ ઉઠે
ખડગ ખેંચતો આહીર ઊઠે
બરછી ભાલે કાઠી ઊઠે
ઘર ઘરમાંથી માટી ઊઠે
ગોબો હાથ રબારી ઊઠે
સોટો લઈ ઘરનારી ઊઠે
ગાય તણા રખવાળો ઊઠે
દૂધમલા ગોવાળો ઊઠે
મૂછે વળ દેનારા ઊઠે
ખોંખારો ખાનારા ઊઠે
માનું દૂધ પીનારા ઊઠે !
જાણે આભ મિનારા ઊઠે !

ઊભો રે’જે

ત્રાડ પડી કે ઊભો રે’જે !
ગીરના કુત્તા ઊભો રે’જે !
કાયર દુત્તા ઊભો રે’જે !
પેટભરા ! તું ઊભો રે’જે !
ભૂખમરા ! તું ઊભો રે’જે !
ચોર લૂંટારા ઊભો રે’જે !
ગા-ગોઝારા ઊભો રે’જે !

ચારણ કન્યા

ચૌદ વરસની ચારણ કન્યા
ચૂંદડીયાળી ચારણ કન્યા
શ્વેતસુંવાળી ચારણ કન્યા
બાળી ભોળી ચારણ કન્યા
લાલ હિંગોળી ચારણ કન્યા
ઝાડ ચડંતી ચારણ કન્યા
પહાડ ઘૂમંતી ચારણ કન્યા
જોબનવંતી ચારણ કન્યા
આગ ઝરંતી ચારણ કન્યા
નેસ નિવાસી ચારણ કન્યા
જગદમ્બા શી ચારણ કન્યા
ડાંગ ઉઠાવે ચારણ કન્યા
ત્રાડ ગજાવે ચારણ કન્યા
હાથ હિલોળી ચારણ કન્યા
પાછળ દોડી ચારણ કન્યા

ભયથી ભાગ્યો !

સિંહણ, તારો ભડવીર ભાગ્યો
રણ મેલીને કાયર ભાગ્યો
ડુંગરનો રમનારો ભાગ્યો
હાથીનો હણનારો ભાગ્યો
જોગીનાથ જટાળો ભાગ્યો
મોટો વીર મૂછાળો ભાગ્યો
નર થઈ તું નારીથી ભાગ્યો
નાનકડી છોડીથી ભાગ્યો !

– ઝવેરચંદ મેઘાણી


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Thursday, March 10, 2016

हमारे ऋषियों और महाऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा? जब कोई आर्य बंधू हमारे भाइयों के ये बताने...

हमारे ऋषियों और महाऋषियों ने वेदों को कैसे सुरक्षित रखा?

जब कोई आर्य बंधू हमारे भाइयों के ये बताने की कोशिश करता हैं की हमारे ज्यादातर ग्रंथों में मिलावट की गई है तो वो वेदों पर भी ऊँगली उठाते हैं की अगर सभी में मिलावट की गई है तो वेदों में भी किसी ने मिलावट की होगी…. मैं उन्हें बताना चाहता हूँ की हमारे ने किस तरह वेदों को सुरखित रखा… इस लेख को पूरा पढने के बाद आपको अपने भारतीय होने पे गर्व होगा की हमने ऐसे देश में और ऐसे धर्म (वैदिक ना की हिन्दू) में जन्म लिया है जो दुनिया में सबसे महान हैं…
वेदों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी अनुपुर्वी, एक-एक शब्द और एक एक अक्षर को अपने मूल रूप में बनाये रखने के लिए जो उपाय किये गए उन्हें आज कल की गणित की भाषा में ‘Permutation and combination’ कहा जा सकता हैं.. वेद मन्त्र को स्मरण रखने और उनमे एक मात्रा का भी लोप या विपर्यास ना होने पाए इसके लिए उसे 13 प्रकार से याद किया जाता था…. याद करने के इस उपाय को दो भागों में बनता जा सकता हैं…. प्रकृति-पाठ और विकृति-पाठ…. प्रकृति पाठ का अर्थ हैं मन्त्र को जैसा वह है वैसा ही याद करना…. विकृति- पाठ का अर्थ हैं उसे तोड़ तोड़ कर पदों को आगे पीछे दोहरा-दोहरा कर भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करना…. याद करने के इन उपायों के 13 प्रकार निश्चित किये गए थे— संहिता-पाठ, पद-पाठ, कर्म-पाठ, जटा-पाठ, पुष्पमाला-पाठ, कर्ममाला-पाठ, शिखा-पाठ, रेखा-पाठ, दण्ड-पाठ, रथ-पाठ, ध्वज-पाठ, धन-पाठ और त्रिपद धन-पाठ…. पाठों के इन नियमों को विकृति वल्ली नमक ग्रन्थ में विस्तार से दिया गया हैं…. परिमाणत: श्रोतिय ब्राह्मणों (जिन्हें मैक्समूलर ने जीवित पुस्तकालय नाम से अभिहित किया हैं) के मुख से वेद आज भी उसी रूप में सुरक्षित हैं जिस रूप में कभी आदि ऋषिओं ने उनका उच्चारण किया होगा… विश्व के इस अदभुत आश्चर्य को देख कर एक पाश्चात्य विद्वान् ने आत्मविभोर होकर कहा था की यदि वेद की सभी मुद्रित प्रतियाँ नष्ट हो जाएँ तो भी इन ब्राह्मणों के मुख से वेद को पुनः प्राप्त किया जा सकता हैं…. मैक्समूलर ने 'India-What can it teach us’ (प्रष्ठ 195) में लिखा हैं —- आज भी यदि वेद की रचना को कम से कम पाच हजार वर्ष (मैक्समूलर के अनुसार) हो गए हैं… भारत में ऐसे श्रोतिय मिल सकते हैं जिन्हें समूचा वैदिक साहित्य कंठस्थ हैं …. स्वयं अपने ही निवास पर मुझे ऐसे छात्रों से मिलने का सोभाग्य मिला हैं जो न केवल समूचे वेद को मौखिक पाठ कर सकते हैं वरन उनका पाठ सन्निहित सभी आरोहावरोह से पूर्ण होता हैं…. उन लोगो ने जब भी मेरे द्वारा सम्पादित संस्करणों को देखा और जहाँ कही भी उन्हें अशुद्धि मिली उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उन अशुद्धियों की और मेरा ध्यान आकर्षित किया….

मुझे आश्चर्य होता है उनके इस आत्मविश्वास पर जिसके बल पर वे सहज ही उन असुधियों को ध्यान में ला देते थे जो हमारे संस्करणों में जहाँ-तहाँ रह जाती थी…. वेदों की रक्षा के लिए किये गए इन प्रयत्नों की सराहना करते हुए मैक्समूलर ने अपने ग्रन्थ 'Origin of Religion’ के प्रष्ठ 131 पर लिखा हैं — “The text of the Vedas has been handed down to us with such accuracy that there is hardly a various reading in the proper sense of the work or even an uncertain aspect in the whole of the Rigveda”. Regeda Vol. I part XXV में मैक्समूलर ने पुनः लिखा —- :As far as we are able to judge we can hardly speak of various readings in the Vedic hymns in the usual sense of the word. Various readings to be gathered from a collection manuscripts, now accessible to us there are none.“

वेदों को शुद्धरूप में सुरक्षा का इतना प्रबंध आरम्भ से ही कर लिया गया था की उनमे प्रक्षेप करना संभव नही था….
इन उपायों के उद्देश्य के सम्बंध में सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ.भंडारकर ने अपने 'India Antiquary’ के सन् 1874 के अंक में लिखा था—"The object of there different arrangements is simply he most accurate preservation of the sacred text of the Vedas.
वेदों के पाठ को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखने के लिए जो दूसरा उपाय किया गया था वह यह था की वेदों की छंद- संख्या, पद-संख्या, तथा मंत्रानुक्र्म से छंद, ऋषि, देवता को बताने के लिए उनके अनुक्रमणियां तैयार की गई जो अब भी शौनकानुक्रमणी, अनुवाकानुक्रमणी, सुक्तानुक्रमणी, आर्षानुक्रमणी, छंदोंनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, कात्यायनीयानुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी, ऋग्विधान, ब्रहद्देवता, मंत्रार्षार्ध्याय, कात्यायनीय, सर्वानुक्रमणी, प्रातिशाख्यसूत्रादि, के नामों से पाई जाती हैं

….इन अनुक्रमणीयों पर विचार करते हुए मैक्समूलर ने `Ancient Sanskrit Literature’ के प्रष्ठ 117 पर लिखा है की ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उनके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं की अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों शब्दों और पदों की वही संख्या हैं जो कभी कात्यायन के समय में थी….

इस विषय में प्रो. मैकडानल ने भी स्पष्ट लिखा हैं की आर्यों ने अति प्राचीन कल से वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए असाधारण सावधानता का उपयोग किया हैं…. इसका परिणाम यह हुआ की इसे ऐसी शुद्धता के साथ रक्खा गया है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम हैं.

आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता

(स्वामी विद्यानंद सरस्वती)


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पं० लेखराम की विजय: स्वामी श्रद्धानन्द जी श्री मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी ने अप्रेल १८८५ ईस्वी में...

पं० लेखराम की विजय: स्वामी श्रद्धानन्द जी

श्री मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी ने अप्रेल १८८५ ईस्वी में एक विज्ञापन के द्वारा भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के विशिष्ट व्यक्तियों को सूचित किया कि दीने इसलाम की सच्चाई परखने के लिए यदि कोई प्रतिष्ठत व्यक्ति एक वर्ष के काल तक मेरे पास क़ादयान में आ कर निवास करे तो मैं उसे आसमानी चमत्कारों का उसकी आँखों से साक्षात् करा सकता हूं । अन्यथा दो सौ रुपए मासिक को गणना से हरजाना या जुर्माना दूँगा ।

इस पर पं० लेखराम जी ने चौबीस सौ रुपए सरकार में जमा करा देने की शर्त के साथ स्वीकृति दी । उस समय वह आर्यसमाज पेशावर के प्रधान थे ।

मिर्ज़ा जी ने इस पर टालमटोल से कार्य करते हुए क़ादयान, लाहौर, लुध्याना, अमृतसर और पेशावर के समस्त आर्य सदस्यों की अनुमति की शर्त लगा दी कि वह पं० लेखराम जी को अपना नेता मानकर उनके आसमानी चमत्कार देख लेने के साथ ही उनके सहित ननुनच के बिना दीनें इसलाम को स्वीकार करने की घोषणा करें । जब कि स्वयं मिर्ज़ा जी ने स्वीकार किया है कि “वह आर्यों का एक बड़ा एडवोकेट और व्याख्यान दाता था ।”

“वह अपने को आर्य जाति का सितारा समझता था और आर्य जाति भी उसको सितारा बताती थी ।”

अन्ततः मिर्ज़ा जी ने चौबीस सो रूपये सरकार में सुरक्षित न करा कर केवल पं० जी को दो तीन दिन के लिए कादयान आने का निमन्त्रण दिया और साथ ही चौबीस सौ रूपये सरकार में सुरक्षित कराने की शर्त पं० जी के लिए बढ़ा दी जिससे चमत्कार स्वीकृति से इन्कार की अवस्था में वह रूपए मिर्ज़ा जी प्राप्त कर सकें । पं० जी ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया और लिखा कि जो आसमानी चमत्कार आप दिखायेंगे, वह कैसा होगा ? उसका निश्चय पूर्व हो जाए । क्या कोई दूसरा सूर्य दिखाओगे कि जिस का उदय पश्चिम और अस्त पूर्व में होगा ? अथवा चांद के दो टुकड़े करने के चमत्कार को दोहराएंगे ? अर्थात् पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा के दो खण्ड हो जावें और अमावस्या की रात्रि को पूर्णिमा की भान्ति पूर्ण चन्द्र का उदय हो जावे । इसमें जो चमत्कार दिखाना सम्भव हो, इसकी तिथि और चमत्कार दिखाने का समय निश्चित किया जाए जिसे जनता में प्रसिद्ध कर दिया जाए ।

किन्तु मिर्ज़ा जी इस स्पष्ट और भ्रमरहित नियम को स्वीकार न कर सके । इसका उत्तर देना और स्वीकार करना इनके लिए असम्भव हो गया । स्वीकार किया कि हम यह शर्त पूरी नहीं कर सकते और न ऊपर लिखे चमत्कार दिखा सकते हैं । किन्तु हमें ज्ञात नहीं कि क्या कुछ प्रगट होगा या न होगा ? और इस आकस्मिक आपत्ति से पीछा छुड़ाना चाहा ।”

अन्ततः पं० जी ने मिर्ज़ा जी को लिखा किः—

“बस शुभ प्रेरणा के विचार से निमन्त्रण दिया जाता है …. वेद मुकद्दस पर ईमान लाईये । आप को भी यदि दृढ़ सत्यमार्ग पर चलने की सदिच्छा है तो सच्चे हृदय से आर्य धर्म को स्वीकार करो । मनरूपो दर्पण को स्वार्थमय पक्षपात से पवित्र करो । यदि शुभ सन्देश के पहुंचने पर भी सत्य की ओर (ञ) ध्यान न दोगे तो ईश्वर का नियम आपको क्षमा न करेगा …. और जिस प्रकार का आत्मिक, धार्मिक अथवा सांसारिक सन्तोष आप करना चाहें—सेवक उपस्थित और समुद्यत है ।

पत्र प्रेषकः—

लेखराम अमृतसर ५ अगस्त १८८५ ईस्वी

इस अन्तिम पत्र का उत्तर मिर्ज़ा जी की ओर से तीन मास तक न आया । तब पं० जी ने एक पोस्ट कार्ड स्मरणार्थ प्रेषित किया । उसके उत्तर में मिर्ज़ा जी का कार्ड आया कि क़ादयान कोई दूर तो नही है । आकर मिल जाएं । आशा है कि यहां पर परस्पर मिलने से शर्ते निश्चित हो जाएंगी ।

इस प्रकार से पं० जी की विजय स्पष्ट है जिसे कोई भी नहीं छिपा सकता । मिर्ज़ा जी के पत्रानुसार अन्ततः पं० जी क़ादयान पहुंचे । वहां दो मास तक रहने पर भी मिर्जा जी किसी एक बात पर न टिक सके । क़ादयान में दो मास ठहर कर वहां आर्यसमाज स्थापित करके चले आए । आर्य-समाज कादयान की स्थापना हुई तो मिर्ज़ा जी के चचेरे भाई मिर्ज़ा इमाम दीन और मुल्लां हुसैना भी आर्यसमाज के नियम पूर्वक सदस्य बने । मिर्ज़ा जी ने भी पं० जी को दो मास तक कादयान निवास को स्वीकार किया है ।

पं० जी ने कादयान में रह कर मिर्जा जी को उनके वचनानुसार आसमानी चमत्कार दिखाने के लिए ललकारा और लिखा कि आप अच्छी प्रकार स्मरण रखें कि अब मेरी ओर से शर्त पूरी हो गी । सत्य की ओर से मुख फेर लेना बुद्धिमानों से दूर है । ५ दिसम्बर १८८५ ईस्वी

मिर्ज़ा जी ने आसमानी चमत्कार दिखाने के स्थान पर आर्य धर्म और इसलाम के दो तीन सिद्धान्तों पर शास्त्रार्थ करने का बहाना किया । अन्य शर्ते निश्चित करने का भी लिखा । जिस पर पं० ने लिखा कि मेरा पेशावर से चलकर कादयान आने का प्रयोजन केवल यही था और अब तक भी इस आशा पर यहां रह रहा हूं कि आपके चमत्कार = प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कार्य, करामात व इलहामात और आसमानी चिह्नों का विवेचन करके साक्षात करूं । और इससे पूर्व कि किसी अन्य सिद्धान्त पर शास्त्रार्थ किया जाए यह चमत्कार दर्शन की बात एक प्रतिष्ठित लोगों की सभा में अच्छी प्रकार निर्णीत हो जानी चाहिए । और इसके सिद्ध कर सकने में यदि आप अपनी असमर्थता बतावें तो शास्त्रार्थ करने से भी मुझे किसी प्रकार का इन्कार नहीं ।

तीसरा और चौथा पत्र

पुनः पं० जी ने तीसरे पत्र में लिखा कि ….. मुझे आज यहां पच्चीस दिन आए हुए हो गए है । मैं कल परसों तक जाने वाला हूं । यदि शास्त्रार्थ करना है तो भी, यदि चमत्कार दिखाने के सम्बन्ध में नियम निश्चित करने है तो भी शीघ्रता कीजिए । अन्यथा पश्चात मित्रों में फर्रे मारने का कुछ लाभ न  होगा । किन्तु बहुत ही अच्छा होगा कि आज ही स्कूल के मैदान में पधारें । शैतान, सिफारिश, चांद के टुकड़े होने के चमत्कार का प्रमाण दें । निर्णायक भी नियत कर लीजिए । मेरी ओर से मिर्ज़ा इमामदीन जी (मिर्जा जी के चचेरे भाई) निर्णायक समझें । यदि इस पर भी आपको सन्तोष नहीं है तो ईश्वर के लिए चमत्कारों के भ्रमजाल से हट जाइए । १३ दिसम्बर १८८५ ईस्वी

पं० जी ने चतुर्थ पत्र में मिर्ज़ा जी को पूर्ण बल के साथ ललकारा और लिखा कि ….. आप सर्वथा स्पष्ट बहाना, टालमटोल और कुतर्क कर रहे है । मिर्ज़ा साहब ! शोक ! ! महाशोक ! ! ! आप को निर्णय स्वीकार नही है । किसी ने सत्य कहा है किः-

(ट)

उजुरे नामआकूल साबितमेकुनद तक़स़ीर रा ।

बुद्धिशून्य टालमटोल तो जुर्म को ही सिद्ध करता है ।

इसके अतिरिक्त आप द्वितीय मसीह होने का दावा करते हैं । इस अपने दावा को सिद्ध कर दिखाइए । (लेखराम कादयान ९ बजे दिन के)

अन्ततोगत्वा मिर्ज़ा जी ने समयाभाव और फारिग न होने का बहाना किया । जिससे पं० जी को दो मास कादयान रहकर लौट आना पड़ा ।

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि मिर्ज़ा  जी ने पं० लेखराम जी की भावना शुद्ध न होने का भी बहाना किया है । यह दोषारोपण हक़ीकतुल्वही पृष्ठ २८८ से खंडित हो जाता है । क्योंकि वहां उनके स्वभाव में सरलता का स्वीकरण स्पष्ट विद्यमान है । इस पर भी अहमदी मित्र यदि पं० लेखराम जी की पराजय और श्री मिर्ज़ा जी की विजय का प्रचार करते और ढ़ोल बजाकर अपने उत्सवों में घोषणा करते है तो यह उनका साहस उनकी अपनी पुस्तकों और मिर्जा जी के लेखों के ही विरुद्ध है । यदि पं० का वध किया जाना आसमानी चमत्कार समझा जाए तो भी ठीक नहीं । क्योंकि आसमानी चमत्कार दिखाने का समय एक वर्ष के अन्दर सीमित था । और इसके साथ पं० लेखराम जी के इसलाम को स्वीकार करने की शर्त बन्धी हुई थी जैसा कि मिर्ज़ा जी के विज्ञापन में लिखा गया था । इन दोनों बातों के पूरना न होने के कारण पं० जी की विजय सूर्य प्रकाशवत् प्रगट है क्योंकि मिर्ज़ा जी ने स्वयं लिखा है किः—

“यह प्रस्ताव न अपने सोच विचार का परिणाम है किन्तु हज़रत मौला करीम (दयालु भगवान्) की ओर से उसकी आज्ञा से है । ………इस भावना से आप आवेंगे तो अवश्य इन्शाअल्लाह (यदि भगवान चाहे) आसमानी चमत्कार का साक्षात् करेंगे । इसी विषय का ईश्वर की ओर से वचन हो चुका है जिसके विरुद्ध भाव की सम्भावना कदापि नहीं ।” तब्लीगे रसालत जिल्द १ पृ० ११-१२

शर्त निश्चित न हो सकने के कारण पं० जो को कादयान से वापिस लौटना पड़ा । इसका प्रमाण पं० जी और मिर्जा जी की पुस्तकों से प्रगट है ।

पं० जी ने लिखा ही तो है किः—

” ……… अन्ततोगत्वा मिर्ज़ा साहब ने एक वर्ष रहने की शर्त को भी धनाभाव के कारण बहाना साजी, क्रोध और छल कपट से टाल दिया । बाधित होकर मैं दो मास कादयान रहकर और वहां आर्य-समाज स्थापित करके चला आया ।”

इशतहार सदाकत अनवार में श्री मिर्ज़ा जी ने पं० लेखराम जी के कादयान में आकर दो मास ठहरने और शर्तें निश्चित न हो सकने का उल्लेख किया है । अतः अहमदी मित्रों को ननुनच के बिना स्वीकार कर लेने में संकोच न करना चाहिए कि आगे के घटना चक्र में हत्या का विषय चमत्कार का परिणाम नहीं किन्तु इस पराजय का परिणाम ही है जिसे भविष्यवाणी का नाम दे दिया गया है । किन्तु सत्य तो अन्ततोगत्वा सत्य ही है कि श्री मिर्ज़ा साहब सुनतानुल्क़लम (मिर्जा जी का इलहाम सुनतानुल्क़लम का है । अतः वह अपने को क़लम का बादशाह मानते थे) की लेखनी से सत्य का प्रकाश हुए बिना न रह सका । और पं० लेखराम जी के वध को केवल हत्या नहीं प्रत्युत बलिदान अर्थात् शहीद मान लिया । देखिये स्पष्ट लिखा है किः—

(ठ)

“सो आसमानों और जमीन के मालिक ने चाहा कि लेखराम सत्य के प्रकाश के लिए शहीद हुए हैं । शहीद शब्द अरबी भाषा का है । अतः मिर्ज़ा जी ने इसका पर्यायवाची शब्द बलिदान रखा है । वेद में अंग-२ कटा कर धर्म प्रचार की सच्चाई प्रमाण देने वाले मनुष्य को अमर पदवी की प्राप्ति होती है । इसकी मुक्ति में कोई सन्देह नहीं रहता । क़ुरान शरीफ़ में भी शहीदों, सत्य पर मिटने वालों को जीवित कहा है । जिनके लिए न कोई भय और न कोई शोक है । खुदा के समीप इनका पद उच्च से उच्च है ।

पं० लेखराम की शहादत पर संसार ने साक्षी दी कि उनका धर्म सत्य और वह सत्य के प्रचारक थे । स्वयं श्री मिर्ज़ा जी ने पं० जी के बलिदान से पूर्व वेदों को नास्तिक मत का प्रतिपादक घोषित किया था ।

नास्तिक मत के वेद हैं हामी ।

बस यही मुद्आ (प्रयोजन) है वेदों का ।।

किन्तु पं० लेखराम आर्य पथिक के महा बलिदान के पश्चात् स्पष्ट रूप से घोषणा की जब कि मिर्ज़ा जी के दिवंगत होने में चार दिन शेष थे । अतः यह उनका अन्तिम लेख और अहमदी मित्रों के लिए यह उनकी अन्तिम वसीयत है कि वह भी श्री मिर्ज़ा की भान्ति पं० जी को सच्चा शहीद और वेद मुगद्दस को पूर्ण ईश्वरीय ज्ञान स्वीकार करें ।

मिर्ज़ा जी ने अपनी अन्तिम पुस्तक में घोषणा की है— यह पूज्य पं० जी की ईश्वर से सच्चे मन से की गई प्रार्थना का परिणाम है जो इस प्रकार है किः—

………..हे परमेश्वर ! हम दोनों में सच्चा निर्णय कर और जो तेरा सत्य धर्म है उसको न तलवार से किन्तु प्यार से तर्क संगत प्रकाश से जारी कर और विधर्मी के मन को अपने सत्य ज्ञान से प्रकाशित कर जिस से अविद्या, पक्षपात, अत्याचार और अन्याय का नाश हो । क्योंकि झूठा सच्चे की भान्ति तेरे सम्मुख प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकता ।” नुसखा (निदान) १८८८ ईस्वी

मिर्जाजी की प्रार्थना असफल

पं० जी की प्रार्थना से पूर्व मिर्ज़ा जी ने भी अपने विचार तथा मन्तव्य़ के अनुसार ईश्वर से प्रार्थना की थी । जो निम्न प्रकार हैः—

“……. ऐ मेरे जब्वारो कहार खुदा ! यदि मेरा विरोधी पं० लेखराम कुरआन को तेरा कलाम (वाणी) नहीं मानता । यदि वह असत्य पर है तो उसे एक वर्ष के अन्दर अजाब (दुःख) की मृत्यु दे ।”             सुरमा सन् १८८६ ईस्वी

मिर्ज़ा जी ने १८८६ ईस्वी में पं० जी के विरुद्ध ईश्वर से उन के लिये दुःखपूर्ण मौत मारने की प्रार्थना की । किन्तु यह प्रार्थना वर्ष भर बीत जाने पर भी स्वीकार नहीं हुई । अतः मिर्ज़ा जी के प्रार्थना के शब्दों में कुरान शरीफ़ ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध न हो सका । किन्तु पं० लेखराम जी ने मिर्जा जी की प्रार्थना का एक वर्ष बीत जाने पर और उस प्रार्थना के विफल सिद्ध होने पर १८८८ ईस्वी में अपनी आर्यों की गौरव पूर्ण प्रार्थना परमात्मा के समक्ष सच्चे एकाग्र मन से लिखी । जिस में एक वर्ष की अवधि की शर्त नही थी । जीवन भर में किसी समय भी इस प्रार्थना की आपूर्ति सम्भव थी जो परमात्मा की कृपा से पूर्ण सफल हुई । अतः वेद के ईश्वरीय ज्ञान होने तथा पं० जी के सत्य सिद्ध होनेमें कोई सन्देह न रहा ।

इसलमा की परिभाषा में इसी का नाम “मुकाबला” है । जो दो भिन्न विचारवान् व्यक्ति भीड़ के सम्मुख शपथ पूर्वक परमात्मा से प्रार्थना करते हैं । मिर्ज़ा जी ने अन्तिम निर्णय के लिए मुकाबला की प्रस्तावना रखी थी और उस की विस्त़ृत प्रार्थना लिख कर छाप दी थी । चाहे नियम पूर्वक मुकाबला नहीं हुआ । किन्तु उस की रसम पूरी मान ली जाए । तो मिर्ज़ा जी की पराजय और आर्य गौरव पं० जी की विजय स्पष्ट सिद्ध है ।

पं० जी की प्रार्थना यह है कि “विधर्मी (मिर्ज़ा जी) के मन में सत्य ज्ञान का प्रकाश कर ।”

परमात्मा ने इसे स्वीकार किया और मिर्ज़ा जी धीरे-२ वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के निकट आते चले गये । प्रथम मिर्ज़ा जी ने जीव तथा प्रकृति को नित्य स्वीकार किया । पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर ईमान लाए । स्वर्ग, नरक के इसलामिक सिद्धांत को परिवर्तित किया । जिहाद की समाप्ति की घोषणा की । अन्त में अपनी मृत्यु से चार दिन पूर्व ” पैगामे सुलह” (शान्ति का सन्देश) नामी पुस्तक लिखी जिस में अपने वैदिक धर्मी होने की घोषणा इन शब्दों में कीः—

(१) “हम अहमदी सिलसिला के लोग सदैव वेद को सत्य मानेंगे । वेद और उस के ऋषियों की प्रतिष्ठा करेंगे तथा उन का नाम मान से लेंगे ।”

(२) “इस आधार पर हम वेद की ईश्वर की ओर से मानते है और उस के ऋषियों को महान् और पवित्र समझते है ।

(३) ” तो भी ईश्वर की आज्ञानुसार हमारा दृढ़ विश्वास है कि वेद मनुष्य की रचना नहीं है । मानव रचना में यह शक्ति नहीं होती कि कोटि मनुष्यों को अपनी ओर खेंच ले और पुनः नित्य का क्रम स्थिर कर दे ।”

(४) “हम इन कठिनाईयों के रहते भी ईश्वर के भय से वेद को ईश्वरीय वाणी जानते हैं और जो कुछ उस की शिक्षा में भूलें हैं वह वेद के भाष्यकारों की भूले समझते हैं ।”

इस से  सिद्ध हुआ कि वेद की कोई भूल नहीं । वेद के वाम मार्गी भाष्यकारों की भूल है ।

(५) मैं वेद को इस बात से रहित समझता हूं कि उस ने कभी अपने किसी पृष्ठ पर ऐसी सिक्षा प्रकाशित की हो जो न केवल बुद्धिविरुद्ध और शून्य हो किन्तु ईश्वर की पवित्र सत्ता पर कंजूसी और पक्षपात का दोष लगाती हो ।”

अतः वेद का ज्ञान ही तर्क की कसौटी पर उत्तीर्ण है और बुद्धि विरुद्ध नहीं तथा ईश्वर की दया से पूर्ण है क्योकि ईश्वर में कंजूसी नहीं । आरम्भ सृष्टि में आया है कि जिस से सब के कल्याण के लिए हो और किसी के साथ ईश्वर का पक्षपात न हो ।

(६) “इस के अतिरिक्त शान्ति के इच्छुक लोगों के लिए यह एक प्रसन्नता का स्थान है कि जितनी इसलाम में शिक्षा पाई जाती है । वह वैदिक धर्म की किसी न किसी शाखा प्रशाखा में विद्यमान है ।”

(ढ़)

अतः सिद्ध हुआ कि इसलाम संसार में कोई पूर्ण धर्म का प्रकाश नहीं कर सकता । क्योंकि उसकी सिक्षा तो अधूरी है । वह तो वैदिक धर्म की शाखा प्रशाखा में पूर्व से लिखी हुई है । वास्तव में तो वेद का धर्म ही पूर्ण और भूलों से रहित होने से परम पावन है ।

परमात्मा आर्यावर्त, पाक, इसलामी देशों और संसार भर के अमहदी  मि6 तथा अन्य सभी लोगों को यह सामर्थ्य प्रदान करें कि वह अपने मनों को पवित्र करके स्वार्थ और पक्षपात की समाप्ति के साथ सत्य सिद्धान्त युक्त वेद के धर्म को पूर्णतः स्वीकार करें । पं० लेखराम जी ने भगवान् से यही प्रार्थना सच्चे हृदय और पवित्र मन से की ।

इस प्रार्थना की पुष्टि के लिए उन्होंने अपना जीवन वैदिक धर्म की बलिवेदी पर स्वाहा कहकर आहुत कर दिया । और सच्चे धर्म की सच्ची शहादत अपने खून से दे दी । जिस का प्रभाव यह हुआ कि मिर्ज़ा गुलाम अहमद के विचार परिवर्तित होते होते उनको वैदिक धर्म का शैदाई बना गए ।

ऐ काश ! हमारी भी शाहदत प्रभु के सम्मुख स्वीकार हो और हमें वीर लेखराम की पदवी प्राप्त हो । पदवी नहीं, गुमनामी ही सही । किन्तु वैदिक धर्म की पवित्र बलिवेदी पर हमारी आहुति भी डाली जाकर उसके किंचित् प्रकाश से संसार में उजाला और वेदों का बोलबोला हो । परमेश्वर सत्य हृदय से की गई प्रार्थना को स्वीकार करें ।

ओ३म् शम्

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🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷🌷 🌷सावधान गद्दारों से🌷 अगर जवानों जीना है,तो बन्द शस्त्र झंकार न करना। कहो देवियों से...

🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷🌷

🌷सावधान गद्दारों से🌷

अगर जवानों जीना है,तो बन्द शस्त्र झंकार न करना।
कहो देवियों से जेवर और फैशन के संग प्यार न करना।।
पर्वत मालाएं गुंजत है शत्रु की हुंकारों से।
मशीन गन चल रही,बन्दूकें,तोपों की धुआंधारों से।।
महावीर नहीं घबराते कभी बम्ब,तोप,तलवारों से।
सावधान रहना लेकिन इन भारत के गद्दारों से।।
है शत्रु चालाक चोरटा इससे कोई इनकार न करना-।। १ ।।

होशियार रहना शिवाजी अफजल खाँ की चालों से।
पेट फाड़ना बाघनखा से खुद बचना चण्डालों से।।
दूध पिलाकर प्यार किया था,आपने विषधर कालों से।
वरना दुनिया भय माने थी भारत माँ के लालों से।।
एक सूत्र में बन्धकर रहना,अपनों पर प्रहार न करना-।। २ ।।

उलट पलट कर दूं लंका को पढ़ा लखन ऐलान नहीं क्या।
महाभारत में डाला था अर्जुन ने तीर कमान नहीं क्या।।
समरांगण में दिया कृष्ण ने गीता का व्याख्यान नहीं क्या।
कुरूक्षेत्र को करके रख दिया वीरों ने श्मशान नहीं क्या।
चित्तौड़ में जो जल रहे अब तक,ठंड़े वो अंगार न करना-।। ३ ।।

भारतीय वीरों की वीरता दिखा रही आलोक जगत में।
अश्वमेध का घोड़ा छोड़ा पकड़ सका ना कोई जगत में।।
राणा,शिवा,नलवा कर गए सफल मात की कोख जगत में।
सच पूछो तो बदनाम हो गई अब टोपी की नोंक जगत में।।
जवान कायर बनै “भीष्म” कभी तू ऐसा प्रचार न करना-।। ४ ।।


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🚩🚩🙏🙏🌞🙏🙏🚩🚩 जय श्रीराम पूर्ण हिंदू स्वराज संघ 🌞 हिंदू फंड इतिहास गवाह है हम हिंदू अपनो से हमेशा हारे...

🚩🚩🙏🙏🌞🙏🙏🚩🚩
जय श्रीराम

पूर्ण हिंदू स्वराज संघ 🌞 हिंदू फंड

इतिहास गवाह है हम हिंदू अपनो से हमेशा हारे है ।यही कारण है कि आज हमारे सनातन धर्म व राष्ट्र की ये हालत है कि हमारे अपने घरो मे विदेशी भाषा विदेशी संस्कृती विदेशी सभ्यता का कब्जा हो चुका है ।और मे सनातन धर्म व राष्ट्र विरोधी हमारे दुश्मन व ग़द्दार खुलेआम सामने आकर ।राष्ट्र को तोड़ने व सनातन धर्म को खत्म करने की कोशिश कर रहे है ।और वह कामयाब भी हो रहे है ।हम सब कुछ अपनी आंखो से देख रहे है ।
हम अपनी पारिवारिक जरूरतो को पुरा करने मे लगे है ।और हमारे धर्म व राष्ट्र के ग़द्दार व दुश्मन हमे खत्म करने की अपनी कोशिश मे लगे है ।आज देश व सनातन धर्म के हालातो से कोई अनजान नही है ।कुछ देश व धर्म को बचाने की कोशिश भी कर रहे है ।पर उनके पास कोई ठोस योजना नही है ।इधर देश व धर्म धीरे धीरे खत्म हो रहा है और कुछ लोगो को पद , प्रतिष्ठा व अपने मान सम्मान व धन दौलत की पड़ी है ।कुछ इसलिए शांत है कि मोदी जी सब कुछ ठीक कर देगे ।कुछ अपने अपने पारिवारिक जरूरतो की पूर्ति मे लगे है ।और कुछ अपने पारिवारिक समस्याओं मे उलझे हुये है ।
इन सभी समस्याओं को देखते हुये ।पूर्ण हिंदू स्वराज संघ ने कुछ ठोस व सरल योजनाएँ बनाई है ।पूर्ण हिंदू स्वराज संघ ने अपनी योजनाएँ अभी तक जिसे भी बताई है ।किसी ने भी अभी तक हमारी योजनाओ मे एक भी कमी नहीँ बताई है ।सबको पता है किसी भी कार्य को करने के लिये फंड की ज़रूरत पड़ती है ।पर अभी तक किसी ने भी पूर्ण हिंदू स्वराज संघ से ये नहीँ कहा की लो 100 रुपये हम देते है आप देश व धर्म को बचा रहे हो ।हमारा भी जिगर देखिये हमने भी अभी तक किसी से ये नहीँ कहां है कि हमे 100 रुपये दे दो ।हमने अभी तक दो हिंदू भाईयो से कहा था कि कृपया आप लोग हमारी इस कार्य मे मदद करे ।पर अब धीरे धीरे उन्होंने भी फ़ोन उठाना बंद कर दिया है ।
देश व धर्म पर बड़ी बड़ी बाते सब करना जानते है ।पर समय आने पर सब पीछे हट जाते है ।अभी उन दोनो हिंदू शेरो के परिवार बीमार होते तो दिन रात एक करके अपने परिवार पर लाखो लगा देते ।पर आज मां भारती बीमार है तो उनके लिये ।मदद करने की जगह फ़ोन तक नहीँ उठा रहे है ।ये है हिंदू वीर शेर ।सबका पता है कि आज हिंदू समाज व मां भारती पर खतरा है ।सब जानते है कि हम सब की पर व हमारे सबके परिवारो पर ख़तरा है ।सबको पता है कि ख़तरा अगर हमारे धर्म व राष्ट्र पर है तो हमारे परिवारो पर है ।
पर सब ऐसे नहीँ है ।हमे विश्वास है कि हम अपने सभी हिंदू भाई बहनो की मदद व सहयोग से हम जल्द अपने राष्ट्र व धर्म के इस होते पतन को रोकेगे ।
हमारी सभी तैयारी पुरी हो चुकी है ।होली के आस पास
पूर्ण हिंदू स्वराज संघ की राष्ट्रीय कार्यकारणी व उत्तर प्रदेश व हरियाणा व राजस्थान व महाराष्ट्र की प्रदेश कार्यकारणी और 30 -35 जिला कार्यकारणी घोषित कर दी जायेगी ।
हमारी योजनाओ व उदेश्यो को जानने व हमसे जुडने के लिये ।हमसे सम्पर्क ज़रूर करे ।

पूर्ण हिंदू स्वराज हमे प्राणो से प्यारा है ।
एक ही धरती एक ही राज , पूर्ण हिंदू स्वराज

पूर्ण हिंदू स्वराज संघ 🌞 हिंदू फंड
09044466655 , 07786074755 व्हटऐप


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सीपीआई ( माले ) की छात्र इकाई के आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन ने वामदलों के छात्र संगठनों के साथ...

सीपीआई ( माले ) की छात्र इकाई के आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन ने वामदलों के छात्र संगठनों के साथ मिलकर महिला दिवस के अवसर पर मनुस्मृति के पन्ने जलाये गए क्योंकि उनका मानना है कि इसमें महिलाओं के शोषण की बात लिखी है ।
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अबे दिमागी अपाहिजो के मानस पुत्रो !

तुम इस धरती पर कलंक हो । तुम्हें क्या मालूम कि महिलाओं का मान- सम्मान किस बात में है । तुममे से एक को भी संस्कृत और सभ्यता का क ख घ भी नहीं पता । तुम्हारे कारण ही आज तथाकथिक आजादी के नाम पर महिलाएं अनादर पा रही हैं ।

महिलाओं की आजादी बारे तुम्हारे विचारों को तो भला आदमी सार्वजनिक रूप से लिखने में भी लज्जा का अनुभव करता है । तुम्हारी गन्दी मानसिकता को बताने में भी शर्म को भी शर्म आती है ।


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ।।।।।
लिखने वाले मनु महिलाओं का अनादर कर सकते हैं क्या ??????????????

लेकिन भारतीय संस्कृति को बदनाम करने की तुम्हारी राह का रोड़ा बना यह मन्त्र तुम्हे अखरता है ।


महिलाओं को बदनाम करने की तुम्हारे विचार-पोषित मानसिकता के कारण महिलाएं आज सर्वाधिक अपमानित हो रही हैं ।


केवल इसलिए कि तुम जैसे गधों को भी संविधान ने बोलने की आजादी दी है - मनु को बदनाम न करें जिसके तुम और तुम्हारे विचार-दाता पैरों की धूल भी नहीं है ।


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आयुर्वेद का वरदान आज मनुष्य मे स्वार्थ व पक्षपात बढ़ता जा रहा है। मानव मे मानवता खत्म होती जा रही...

आयुर्वेद का वरदान

आज मनुष्य मे स्वार्थ व पक्षपात बढ़ता जा रहा है। मानव मे मानवता खत्म होती जा रही है। आज सामान्य मनुष्य की चिकित्सा की तो बात दूर भोजन पर भी दुष्टों की नजर है।
फिल्मों मे अपने को गरीब का प्यारा दिखाने वाले अमिताभ बच्चन हो या माधुरी दीक्षित पैसे के लिए TV पर मैगी नाम का जहर बेच रहे हैं।

यदि किसी गरीब को लीवर का रोग या गुर्दे का रोग हो जाए तो ठीक होने के लिए बेचारे को घर बेचना पड़ता है। सरकारी अस्पताल मे रोग का पता केवल पोस्ट मार्टम से ही चलता है।

परंतु वेदवाणी के अनुसार आचरण करने वाले परम दयालु महर्षियों ने आयुर्वेद रूपी अमृत को बिना किसी भेदभाव के बांटा। ऋषियों का यह अमृत उन के लिए भी है जो उन्हे आदर्श मानते हैं।
उनके लिए भी है जो अपने को मूल निवासी कहकर ऋषियों को गाली देने मे ही गौरव अनुभव करते हैं और खुद को रावण और महिषासुर का वंशज बताते हैं। हत्यारे अफजल गुरु + मकबूल भट्ट+ याकूब मेनन की प्रशंसा करते और भारत के सच्चे सपूत सैनिकों को हत्यारा कहते हैं.
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आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत संहिता सूत्र स्थान अध्याय 2 मे महर्षि धन्वन्तरी जी अपने शिष्य को जनेऊ देते समय उपदेश देते है-
ब्राह्मण, गुरु, दरिद्र, मित्र, सन्यासी, पास मे नम्रता पूर्वक आए, सज्जन, अनाथ, दूर से आए सज्जनों की चिकित्सा स्वजनों (अपने परिवार के सदस्य) की भांति अपनी औषधियों से करनी चाहिए। यह करना साधु (श्रेष्ठ ) है।
व्याध (शिकारी), चिड़िमार, पतित (नीच आचरण वाला) पाप करने वालो की चिकित्सा धन का लाभ होने पर भी नहीं करनी चाहिए।
ऐसा करने से विद्या सफल होती है, मित्र, यश, धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है। ऐसा ही विवरण चरक संहिता मे मिलता है। (क्या आज का चिकित्सक यह कर्त्तव्य निभाता है)
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यह अमृत पाना इतना आसान है कि गरीब से गरीब भी इसका प्रयोग कर सकता है। इतना प्रभावशाली है कि बड़े बड़े महंगे इलाज भी इससे बढ़ कर नहीं है।
गर्मी मे 2 अंगों की बीमारियाँ बहुत अधिक होती हैं।
1- यकृत = Liver के रोग – जैसे पीलिया,
2- गुर्दे = Kidney के रोग
इन दोनों रोगों के लिए आयुर्वेद मे एक चमत्कारी औषधि है – भूमि आंवला/ भूम्यामलकी/ PHYLLANTHUS NIRURI
यह एक छोटा सा पौधा है जो बरसात मे अपने आप उग जाता है। यह परम पिता परमात्मा की महान कृपा है कि जीवन दायिनी जड़ी बूटियाँ अपने आप उगती रहती हैं। सभी जड़ी बूटी की दुकानों पर सुखा हुआ भूमि आंवला का पौधा मिल जाता है.
वैसे यह बरसात मे अपने आप उग जाता है परंतु छायादार नमी वाले स्थानो पर पूरा साल मिलता है। इसके पत्ते के नीचे छोटा सा फल लगता है जो देखने मे आंवले जैसा ही दिखाई देता है। बरसात मे यह मिल जाए तो इसे उखाड़ कर रख ले व छाया मे सूखा कर रख ले।
जड़ी बूटी की दुकान से आसानी से मिल जाता है।
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यकृत की यह सबसे अधिक प्रमाणिक औषधि है . लीवर बढ़ गया है या या उसमे सूजन है तो यह पौधा उसे बिलकुल ठीक कर देगा . बिलीरुबिन बढ़ गया है , पीलिया हो गया है, सारा शरीर पीला व मूत्र का रंग लाल पीला हो गया हो तो इसका प्रयोग बहुत लाभकारी है. रोग की शुरुआत में ही इसका प्रयोग करना शुरू करे तो अधिकाँश रोगियों को अस्पताल में भरती होने की जरूरत ही नहीं होगी.
पीलिया किसी भी कारण से हो चाहे पीलिया का रोगी मौत के मुंह मे हो यह देने से बहुत अधिक लाभ होता है। LIVER CIRRHOSIS जिसमे यकृत मे घाव हो जाते हैं यकृत सिकुड़ जाता है उसमे भी बहुत लाभ करता है। Fatty LIVER जिसमे यकृत मे सूजन आ जाती है पर बहुत लाभ करता है।

Kidney (गुर्दे) की समस्या के आरम्भ में जैसे पेशाब मे इन्फेक्शन, पेशाब में खून आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब की मात्रा कम हो जाना आदि में बहुत लाभ करेगा।
इसका कोई साइडेफेक्ट नहीं है
लीवर व किडनी के रोगी को खाने मे घी तेल मिर्च खटाई व सभी दाले बंद कर देनी चाहिए। मूंग की दाल कम मात्रा मे ले सकते हैं। मिर्च के लिए कम मात्र मे काली मिर्च व खटाई के लिए अनारदाना प्रयोग करना चाहिए।
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प्रयोग विधि –
सुखा पौधा लाकर छोटे छोटे टुकडे कर ले. 4 चम्मच यह टुकडे धोकर 2 कप पानी में चाय की तरह उबाल कर बर्तन को ढक दे. ठण्डा होने पर छान कर पि ले. दिन में 3 बार.
ताजा पौधा पीस कर ज़रा सा पानी मिलाकर रस निकाल ले. 2 चम्मच यह रस दिन में 2 से 3 बार ले.
———
भोजन मे चावल का अधिक प्रयोग करना चाहिए
हरे नारियल का पानी लिवर (यकृत /जिगर) के रोग बहुत अच्छा है परन्तु गुर्दे के रोगों में हमेशा उपयोगी नहीं होता इसलिए गुर्दे के रोगी को विचार कर पीना चाहिए.
भोजन –
1- सभी किस्म की दाले बंद कर दे। केवल मूंग बिना छिलके की दाल ले सकते।
2-लाल मिर्च, हरी मिर्च, अमचूर, इमली, गरम मसाला और पैकेट का नमक बंद कर दे।
3- सैंधा नमक और काली मिर्च का प्रयोग करे बहुत कम मात्रा मे।
4- यदि खटाई की इच्छा हो खट्टा सूखा अनारदाना प्रयोग करे।
5- प्रतिदिन लगभग 50 ग्राम किशमिश/दाख/ मुनक्का (सूखा अंगूर) , खजूर व सुखी अंजीर पानी मे धो कर खिलाए।
6- चावल उबालते समय जो पानी (माँड़) निकलता है वह ले। वह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है।
7- गेहू का दलिया, लौकी की सब्जी, परवल की सब्जी दे
8- भिंडी, घुइया (अरबी), कटहल आदि न खाए।
9- सफ़ेद पेठा (कूष्माण्ड जिसकी मिठाई बनाई जाती है) वह मिले तो उसका रस पिए व उसकी सब्जी खाए। पीले रंग का पेठा जिसे काशीफल या सीताफल कहते हैं वह न खाए.
10 – तम्बाकू +शराब+ बीयर+कोका कोला+पेप्सी +बाजार के शर्बत+ जलजीरा+गोलगप्पा +समोसा+पकौडा+काजू, बादाम +मूंगफली – बिलकुल बन्द. ———–
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2- महर्षि दयानन्द की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश अवश्य पढ़ें और दूसरों को पढने की प्रेरणा दे.
3- गौ रक्षा में अपना सहयोग दें.
4- पूज्य राजीव दीक्षित की सभी पुस्तके पढ़े व उनके सभी AUDIO अवश्य सुने. गूगल पर Rajiv Dikshit खोजे.


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राष्ट्र और धर्म विरोधी शक्तियां लगातार हमलावर हैं | कभी ऐसी शक्तियों के लिये मुसीबत समझा जाने...

राष्ट्र और धर्म विरोधी शक्तियां लगातार हमलावर हैं |
कभी ऐसी शक्तियों के लिये मुसीबत समझा जाने वाला
आर्य समाज मृतप्राय है |

मुझे लगता था कि पिछले 3-४ वर्षो में जो हम नव-युवक
इससे जुड़े हैं, वो मिलकर कुछ नया करेंगे पर अफ़सोस
हमें एक-दूसरे की टांग खींचने से ही फुरसत नही है |


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 🌻राजधर्म🌻 🌼विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् द्रियन्ते दस्युभि: प्रजा:। सम्पश्यत: सभृतस्य...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

🌻राजधर्म🌻

🌼विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् द्रियन्ते दस्युभि: प्रजा:।
सम्पश्यत: सभृतस्य मृत: स: न तु जीवति।।६।। मनु०।।
जिस राजा के राज्य में भ्रत्य सहित देखते हुए डाकू
लोग रोती विलाप करती प्रजा के पदार्थ और प्राणों
को हरते रहते हैं वह जानो
भ्रत्य अमात्यसहित मृतक है जीता नहीं और महादु:ख
का पाने वाला है।

🌼प्राज्ञं कुलीनं शूरम् च दक्ष दात्रमेव च।
क्रतज्ञं ध्रतिमन्तञ्च कष्टमाहुररिं बुधा:।।३।। मनु०।।
सदा इस बात को द्रढ रक्खे
कि कभी बुद्धिमान कुलीन,
शूरवीर,चतुर,दाता,किये हुए को जानने हारे और धैर्यवान पुरुष को शत्रु न
बनावे क्योंकि जो ऐसे को
शत्रु बनावेगा वह दु:ख पावेगा।

🌼धर्मों विद्धस्त्वधर्मेण सभाम् यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासद:।।७।। मनु।।
जिस सभा में अधर्म से घायल होकर धर्म उपस्थित होता है अर्थात धर्मी को मान और अधर्मी को दण्ड नहीं मिलता उस सभा में
जितने सभासद हैं वे सब
मरे हुए के समान हैं।

🌼सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम्।
अब्रुवन्विब्रुवन्वापि नरो
भवति किल्विषी।।८।। मनु०।।
धार्मिक मनुष्य को योग्य है
कि सभा में कभी प्रवेश न करे और जो प्रवेश किया हो तो सत्य ही बोले।जो
कोई सभा में अन्याय होते
हुए को देखकर मौन रहे
अथवा सत्य न्याय के विरुद्ध
बोले वह महापापी होता है।

🌼यत्र धर्मों ह्यधर्मेण सत्यं यत्रान्रतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासद:।।९।। मनु०।।
जिस सभा में अधर्म से धर्म,असत्य से सत्य सब सभासदों के देखते हुए
मारा जाता है उस सभा
में सब मरे हुए के समान
हैं।जानो उनमें कोई भी
नहीं जीता।

🌼धर्म एव हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मों न हन्तव्यो मा नो
धर्मों हतोsवधीत्।।१०।। मनु०।।
मारा हुआ धर्म मारने वाले का नाश और रक्षित किया
धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना इस डर से
कि मारा हुआ धर्म कभी
हमको न मार डाले।

🌼एक एव सुह्द्धर्मों निधनेsप्यनुयाति य:।
शरीरेण समं नाशं सर्वमध्यद्धि गच्छति।। १२।।
मनु०।।
इस संसार में एक धर्म ही है
जो मृत्यु के पश्चात् भी साथ चलता है और सब पदार्थ वा संगी शरीर के नाश के
साथ ही नाश को प्राप्त होते
हैं अर्थात सबका संग छूट जाता है परन्तु धर्म का संग
कभी नहीं छूटता ।

🌼अदण्डयान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।
अयशो महद् आप्नोति नरकं
चैव गच्छति।।८।। मनु०।।
जो राजा दण्डनीयों को दण्ड नहीं देता व अदण्डनीयों को दण्ड देता
है अर्थात दण्ड देने योग्य को छोड देता और जिसको
दण्ड देना न चाहिए उसको
दण्ड देता है वह
जीता हुआ बडी निन्दा को
और मरे पीछे बडे दु:ख को
प्राप्त होता है।
इसलिए जो अपराध करे
उसको सदा दण्ड देवे और
बिना अपराध वाले को दण्ड कभी न देवे।

🌼येन येन यथान्गेन स्तेनो न्रषु
विचेष्टते।
तत्तदेव हरेदस्य प्रत्यादेशाय
पार्थिव:।।१।। मनु०।।
चोर जिस प्रकार जिस जिस अंग से मनुष्यों में
विरुद्ध चेष्टा करता है उस उस अंग को सब मनु ष्यों
की शिक्षा के लिये राजा
छेदन कर दे।

🌼पिताचार्य्य: सुह्न्माता भार्या पुत्र: पुरोहित:।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोsस्ति य: स्वधर्में न तिष्ठति।२।। मनु०।।
चाहे पिता,आचार्य,मित्र,माता,स्त्री,पुत्र और पुरोहित क्यों
न हो जो स्वधर्म में स्थित
नहीं रहता वह राजा का दण्डनीय होता है।अर्थात जब राजा न्यायासन पर
बैठ न्याय करें तब किसी का पक्षपात न करे किन्तु
यथोचित दण्ड देवे।

🌼न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात्।
समुत्सृजेत् साहसिकान् सर्वभूतभयावहान्।।९।। मनु०।।
न मित्रता,न पुष्कल धन की
प्राप्ति से भी जो राजा सब
प्राणियों को दु:ख देने वाले
पापी मनुष्य को दण्ड दिये
बिना कभी न छोडे।

🌼गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं
वा बहु्श्रुतम् ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।१०।। मनु०।।
चाहे गुरु हो,चाहे पुत्रादि बालक हों,चाहे पिता आदि
व्रद्ध,चाहे ब्राह्मण और चाहे
बहुत शास्त्रों का श्रोता क्यों
न हो,जो धर्म को छोड अधर्म में वर्तता है,दूसरे को बिना अपराध मारने वाले हैं उनको बिना विचारे मार
डालना अर्थात मारने के पश्चात् विचार करना चाहिए।

🌼नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।
प्रकाशं वाsप्रकाशं वा मन्युस्तन्नमृत्यु्मृच्छति।।११।। मनु०।।
दुष्ट पुरुषों के मारने में हन्ता को पाप नहीं होता,चाहे प्रसिद्ध मारे चाहे
अप्रसिद्ध,क्योंकि क्रोधी को
क्रोध से मारना जानो क्रोध
से क्रोध की लडाई है।

🌼यस्य स्तेन: पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक्।
न साहसिकदण्डघ्नौ स राजा श्ऋलोकभाक्।।१२।। मनु०।।
जिस राजा के राज्य में न चोर,न परस्त्रीगामी,न दुष्ट वचन बोलने हारा न साहसिक(दुष्ट)डाकू, और न दण्डघ्न अर्थात राजा की
आज्ञा का भंग करने वाला
है वह राजा अतीव श्रेष्ठ है।


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Monday, March 7, 2016

🌄सत्यार्थ प्रकाश 🌄 ~~~~~~~~~~~~~~~~ (प्रश्न) सदेव सोम्येदमग्र आसीत्॥1॥ असद्वा इदमग्र आसीत्॥2॥...

🌄सत्यार्थ प्रकाश 🌄
~~~~~~~~~~~~~~~~
(प्रश्न) सदेव सोम्येदमग्र आसीत्॥1॥
असद्वा इदमग्र आसीत्॥2॥
आत्मा वा इदमग्र आसीत्॥3॥
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्॥4॥
—ये उपनिषदों के वचन हैं।
हे श्वेतकेतो! यह जगत् सृष्टि के पूर्व सत्॥1॥ असत्॥2॥ आत्मा॥3॥ और ब्रह्मरूप था॥4॥ पश्चात्—
तदैक्षत बहुः स्यां प्रजायेयेति॥1॥
सोऽकामयत बहुः स्यां प्रजायेयेति॥2॥
—यह तैत्तिरीयोपनिषत् का वचन है।
वही परमात्मा अपनी इच्छा से बहुरूप हो गया है॥1॥॥2॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥
—यह भी उपनिषत् का वचन है।
जो यह जगत् है वह सब निश्चय करके ब्रह्म है। उस में दूसरे नाना प्रकार के पदार्थ कुछ भी नहीं किन्तु सब ब्रह्मरूप हैं।
(उत्तर) क्यों इन वचनों का अनर्थ करते हो? क्योंकि उन्हीं उपनिषदों में—
अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छ अद्भिस्सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः॥
—छान्दोग्य उपनि॰॥
हे श्वेतकेतो! अन्नरूप पृथिवी कार्य से जलरूप मूल कारण को तू जान। कार्यरूप जल से तेजोरूप मूल और तेजोरूप कार्य से सद्रूप कारण जो नित्य प्रकृति है उस को जान। यही सत्यस्वरूप प्रकृति सब जगत् का मूल घर और स्थिति का स्थान है। यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और जीवात्मा, ब्रह्म और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था; अभाव न था और जो (सर्वं खलु॰) यह वचन ऐसा है जैसा कि ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनवाँ जोड़ा’ ऐसी लीला का है। क्योंकि—
सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।
—छान्दोग्य॥
और—
नेह नानास्ति किञ्चन॥
—यह कठवल्ली का वचन है॥
जैसे शरीर के अङ्ग जब तक शरीर के साथ रहते हैं तब तक काम के और अलग होने से निकम्मे हो जाते हैं, वैसे ही प्रकरणस्थ वाक्य सार्थक और प्रकरण से अलग करने वा किसी अन्य के साथ जोड़ने से अनर्थक हो जाते हैं। सुनो!
इस का अर्थ यह है—हे जीव! तू उस ब्रह्म की उपासना कर। जिस ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और जीवन होता है जिस के बनाने और धारण से यह सब जगत् विद्यमान हुआ है वा ब्रह्म से सहचरित है उस को छोड़कर दूसरे की उपासना न करनी। इस चेतनमात्र अखण्डैकरस ब्रह्मस्वरूप में नाना वस्तुओं का मेल नहीं है किन्तु ये सब पृथक्-पृथक् स्वरूप में परमेश्वर के आधार में स्थित हैं।
(अष्टम समुल्लास:सत्यार्थप्रकश)
-स्वामी दयानन्द सरस्वती


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🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 🌷महान देव की भक्ति🌷 येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व स्तभितं येन नाकः...

🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

🌷महान देव की भक्ति🌷

येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्व स्तभितं येन नाकः ।
योsअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। ५ ।।
-(यजु० अ० ३२ ।मं० ६)

अर्थ:-(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) उग्र-प्रकाशयुक्त (द्यौः) सूर्य आदि को (च) और (पृथिवी) पृथिवीलोक को (दृढा) दृढ़ किया है,(येन) जिस परमात्मा ने (स्वः) सांसारिक सुख को (स्तभितम्) थाम रखा है और (येन) जिस देवाधिदेव ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है,(य:) जो परमेश्वर (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) अनेक लोक-लोकान्तरों को (विमानः) विषेश रीति से निर्माण करता और आकाश में भ्रमण कराता है (कस्मै) उस आनन्ददायक (देवाय) कामना करने योग्य प्रभु के लिए (हविषा) अपने सब सामर्थ्य से (विधेम) विषेश भक्ति करें।

येन द्यौः उग्रा

परमात्मा ने उग्र स्वभाव वाले सूर्यादि को धारण किया हुआ है।द्युलोक उग्र है।क्यों?हमारे सूर्य,चन्द्रमा,शुक्र,मंगल,बुध,बृहस्पति और शनि को मिलाकर एक सौरमण्डल बनता है।इनकी उग्रता का का पता लगाना हो तो यूं समझिए कि सूर्य पृथिवी से साढ़े तेरह लाख गुणा बड़ा है।पृथिवी का भार ६ के आगे २१ बिन्दू रखे जाएँ (६०००००००००००००००००००००) इतने टन बनता है।हमारी संख्या महाशंख पर समाप्त हो जाती है।मानव-बुद्धि पृथिवी के भार की गणना करने में असमर्थ है,फिर सूर्य के भार की तो कल्पना भी असम्भव है।यह समस्त सौरमण्डल हमारी पृथिवी से करोड़ों गुणा बड़ा एवं भारी है।इस सौरमण्डल की भाँति और भी बहुत से सौर-मण्डल हैं।इस सूर्य की भाँति और भी अनेक सूर्य हैं।
वेद में कहा है:-

सप्तदिशो नानासूर्याः।-(ऋ० ९/११४/३)
दिग्दिगान्तरों में अनेक सूर्य हैं।
वैज्ञानिक अब तक दो अरब सौरमण्डलों का पता लगा चुके हैं।वैज्ञानिकों की बनाई हुई दृढ़-से-दृढ़ और शक्तिशाली दूरबीन जिस दूर-से-दूर के नक्षत्र को देख सकी है वहाँ से प्रकाश के पृथिवी पर पहुँचने में एक सहस्र वर्ष लगते हैं और कुछ सूर्य तो पृथिवी से इतनी दूर हैं कि जिनका प्रकाश सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक पृथिवी पर नहीं पहुँचा है।स्मरण रहे कि प्रकाश की गति एक लाख छियासी हजार मील प्रति सैकिण्ड है।क्या इस प्रकार के ग्रह-नक्षत्र,तारे और सितारे उग्र नहीं हैं?

वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी पृथिवी के कुछ ग्रहों की दूरी इस प्रकार है-

पृथिवी से चन्द्रमा कम से कम २,२१,६१० मील दूर है।
पृथिवी से शुक्र कम से कम २,३२,७१,००० मील दूर है।
पृथिवी से मंगल कम से कम २,३९,1६,००० मील दूर है।
पृथिवी से बुध कम से कम ४,८०,२०,००० मील दूर है।
पृथिवी से सूर्य कम से कम ९,१४,०६,००० मील दूर है।
पृथिवी से बृहस्पति कम से कम ३६,५८,१६,००० मील दूर है।
पृथिवी से शनि कम से कम ७४,२६,४६,००० मील दूर है।
पृथिवी से यूरेनस कम से कम १,६०,६१,८३,००० मील दूर है।
पृथिवी से नेपच्यून कम से कम २,६७,४३,५७,००० मील दूर है।

यदि हम सौ मील प्रति घण्टा की गति से चलने वाली ट्रेन द्वारा बिना रुके लगातार यात्रा करते रहें तो चन्द्रमा तक पहुँचने में ९० दिन,शुक्र में पहुँचने में २७ वर्ष,मंगल में पहुँचने में ३६ वर्ष,बुध तक जाने में ५४ वर्ष,सूर्य में जाने के लिए १०५ वर्ष,बृहस्पति की यात्रा करने में ४१७ वर्ष,शनि तक पहुँचने में ५५८ वर्ष,यूरेनस की यात्रा में १८३३ वर्ष और नेपच्यून तक पहुँचने में ३२१३ वर्ष लगेंगे।यह तो एक सौरमण्डल की बात हुई।पता नहीं ऐसे कितने सौरमण्डल हैं।इन सौरमण्डलों की विशालता पर विचार करते हुए बुद्धि आश्चर्यचकित हो जाती है।
इन सौरमण्डलों की विशालता और व्यापकता के सम्बन्ध में भी श्री जगदीशचन्द्रजी वसु ने ठीक ही कहा था:-

“हो सकता है मनुष्य समुद्र के बिन्दुओं की गणना कर ले,यह भी सम्भव है कि वह रेगिस्तान (मरुष्थल) के कणों की भी गणना कर डाले परन्तु द्युलोक के ग्रह और नक्षत्र ,चाँद और सितारों तथा सूर्यों की गणना करना असम्भव है।”

रात्रि के समय हमें आकाश में जो ज्योति का एक पुन्ज-सा फैला हुआ दिखाई देता है,उसे आकाश-गंगा कहते हैं।इसमें ४० अरब ऐसे सूर्य हैं जिनका अपना अलग-अलग मण्डल है।अब तक ऐसी दो करोड़ आकाशगंगाओं का पता लगाया जा चुका है।पता नहीं ऐसी और कितनी आकाशगंगाएँ हैं।एक-एक आकाशगंगा में अरबों सूर्य,एक-एक सूर्य की परिधि में घूमने वाले कई ग्रह-उपग्रह और आकाश-गंगा के अतिरिक्त अनेक नक्षत्र।महान् देव की इस महान् रचना को देखकर मनुष्य आश्चर्यचकित हो जाता है।

इन उग्र और तेजस्वी पिण्डों को किसने सँभाला हुआ है?
इन सबका धारण करने वाला अद्वितीय ईश्वर ही है।इनमें उसी की ज्योति और प्रकाश है।
उपनिषद के ऋषि ने ठीक ही कहा है-

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं,
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोsयमग्निः ।
तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्,
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ।।-(कठ० ५/१५)
उस प्रभु के प्रकाश के बिना न सूर्य चमक सकता है और न चन्द्रमा प्रकाशित हो सकता है,न बिजली ही चमक सकती है,फिर इस साधारण अग्नि की तो बात ही क्या है ? उसी के तेज से,उसी के प्रकाश से,उसी की ज्योति से,उसी की आभा से ये यह सारा संसार चमक रहा है,ज्योतिर्मान् हो रहा है।
उसी के प्रकाशित होने पर यह सारा जगत् प्रकाशित होता है।

ईश्वर की सत्ता को न मानने वाले भौतिकवादी कहते हैं कि यह सब चांस है,आकस्मिक है,अपने-आप हो रहा है।ऐसे लोगों की बुद्धि पर हँसी आती है और आश्चर्य भी होता है।एक छोटी-सी सुई बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति किसी लुहार की आवश्यकता अनुभव करता है,एक साधारण से दीपक को जलाने के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता प्रत्येक को अनुभव होती है,एक छोटे से घर को सुव्यवस्थित रखने के लिए किसी कुशल गृहिणी की आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है,परन्तु इस इतने विशाल और सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड की रचना के लिए किसी चेतन शक्ति को न माना जाए इससे अधिक विडम्बना और क्या हो सकती है?यह बुद्धिवाद का दिवाला नहीं तो और क्या है?

अधिक से अधिक १३० गज लम्बे और १०० गज चौड़े फुटबाल के मैदान में दोनों और के २२ खिलाड़ी एकत्र होते हैं।वे सभी अपनी और से पूर्ण प्रयत्न करते हैं कि फुटबाल आउट न हो जाए,परन्तु फिर भी वह आउट हो जाती है,खेल के क्षेत्र से बाहर चली जाती है,परन्तु इस अनन्त आकाश में वह परमात्मा अकेला होते हुए भी एक नहीं अपितु अरबों और खरबों गोल-गोल बालों को इस प्रकार व्यवस्था में चलाता है कि कोई भी बाल अपने स्थान से इधर-उधर नहीं होने पाती।समस्त ग्रह-उपग्रह और नक्षत्र नियमित गति और अपने-अपने क्षेत्र में सुव्यवस्थित रुप से चलते हैं।ये सूर्य,चन्द्र और नक्षत्र अपनी परिधि और गति में अकस्मात् नहीं चल रहे अपितु इन सबको परमात्मा चला रहा है।


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शिवरात्रि व् महर्षि दयानंद सरस्वती बोध दिवस पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ओम् नमः शम्भवाय च मयोभवाय...

शिवरात्रि व् महर्षि दयानंद सरस्वती बोध दिवस पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

ओम् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च
नमः शंकराय च मयस्कराय च
नमः शिवाय च शिवतराय च ।।

( यजुर्वेद अ० १६।म० ४१।।)


जो सुखस्वरूप संसार के उत्तम सुखों का देव्ने वाला कल्याण का कर्ता , मोक्षस्वरूप , धर्मयुक्त कामों का ही करनेवाला अपने भक्तों का सुख देनेवाला और धर्मयुक्त कामों में युक्त करनेवाला , अत्यंत मंगलस्वरूप और धार्मिक मनुष्यों को मोक्ष का सुख देनेवाला है उस सच्चिदानंद स्वरुप निराकार सर्व शक्तिमान न्यायकारी दयालु अजन्मे अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्वेश्वर सर्व व्यापक सर्वान्तर्यामी अजर अमर अभय नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता परमपिता परमात्मा को हमारा बारम्बार नमस्कार हो ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


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स्वामी स्वतन्त्रानन्द महर्षि दयानन्द के एक प्रमुख योग्यतम शिष्य MARCH 5,...

स्वामी स्वतन्त्रानन्द महर्षि दयानन्द के एक प्रमुख योग्यतम शिष्य

MARCH 5, 2016 
ओ३म्

‘स्वामी स्वतन्त्रानन्द महर्षि दयानन्द के एक प्रमुखयोग्यतम शिष्य’

–मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज आर्यसमाज के अनूठे संन्यासी थे। आपने अमृतसर के निकट सन् 1937 में दयानन्द मठ दीनानगर की स्थापना की और वेदों का दिगदिगन्त प्रचार कर स्वयं को इतिहास में अमर कर दिया। आपके बाद आपके प्रमुख शिष्य स्वामी सर्वानन्द सरस्वती इसी मठ के संचालक व प्रेरक रहे। आपके जीवन पर स्वामी सर्वानन्द जी ने एक लेख के माध्यम से बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उसी को हमने आज के इस लेख की विषय वस्तु बनाया है। स्वामी सर्वानन्द जी लिखते हैं कि पूज्यपाद सन्त शिरोमणि स्वामीस्वतन्त्रानन्द जी महाराज इतिहास के एक जाने–मानेविद्वान् थे। प्रो. राजेंद्र ’जिज्ञासु’ ने पूज्य स्वामी जी महाराज का जीवन-चरित लिखा है और ‘इतिहास दर्पण’नाम से स्वामी जी महाराज के प्रेरणाप्रद लेखों की खोज, संकलन व सम्पादन किया है। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज प्रतिवर्ष तीन बार दीनानगर मठ में कथा किया करते थे। सदा नई-नई घटनाएं और नये-नये उदहरण दिया करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी ने हरियाणा का भ्रमण किया। हरियाणा सैनिक भरती का बहुत बड़ा क्षेत्र है। श्री स्वामीजी ने हरियाणा के जवानों को देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाने की प्रेरणा दी थी। उनके देश-प्रम को उबारा। तब देश के अन्दर ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन चल रहा था और देश से बाहर आजाद हिन्द सेना देश को गुलामी के बन्धन से मुक्त करने के लिए लड़ रही थी। श्री महाराज की इस ऐतिहासिक यात्रा में श्री जगदेवसिंह सिद्धान्ती व आचार्य भगवान्देव जी, परवर्ती नाम स्वामी ओमानन्दसरस्वती उनके साथ रहे। इनका कहना था कि स्वामी जी महाराज प्रतिदिन नया-नया इतिहास और नई-नई घटनाएं सुनाते थे।

विख्यात शिक्षाविद् विद्यामार्तण्ड आचार्य प्रियव्रतजी कहा करते थे कि स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी को आर्यसमाज के इतिहास की छोटी-बड़ी घटनाओं का जितना ज्ञान था उतना और किसी को नहीं। आश्चर्य इस बात पर होता था कि यह सारा ज्ञान उन्हें स्मरण वा कंठस्थ था। डायरी या नोट बुक देखने की कभी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। भारत के प्राचीन इतिहास की बातें भी स्वामीजी महाराज यदा-कदा सुनाया करते थे। एक बार प्रसिद्ध इतिहासकार श्री जयचन्द्रविद्यालंकार दीनानगर मठ, निकट अमृतसर में आये।आपने स्वामीजी महाराज से प्राचीन भारत के नगरों वप्रदेशों के नाम पूंछें। स्वामीजी ने उनकी सारी समस्या का समाधान कर दिया और एतद्विषयक एक लेख भी पत्रों में प्रकाशित करवाया। पं. चमूपति जी आर्यजगत् के एक अद्भुत लेखक, कवि व विचारक थे। आपकी स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज के प्रति असीम श्रद्धा थी। आप लाहौर में स्वामीजी महाराज से इतिहास-विषय पर घण्टों चर्चा किया करते थे। आपने लिखा है कि स्वामीजीको इतिहास की खोज का चस्का है। स्वामीजी महाराज को विभिन्न प्रदेशों, वर्गों व जातियों के इतिहास व रीति-नीति का सूक्ष्म ज्ञान था।

किस मत की कौन-सी बात कैसे आरम्भ हुई, कौन-सा मत कैसे पैदा हुआ, उसने संसार का क्या व कितना हित-अहित किया, विश्व पर कितना प्रभाव छोड़ा, इन सब बातों की विस्तृत विवेचना स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी किया करते थे। श्रोता व पाठक स्वामी जी महाराज के गम्भीर ज्ञान को देख, सुन व पढ़कर आश्चर्य करते थे। सिखइतिहास के भी स्वामीजी मर्मज्ञ थे। सिखमत किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ, क्या कारण थे, सिखपंथ कैसे बढ़ा, इसने देश के लिए क्या किया, कहां भूल की–सिख गुरुओं का वास्तविक मन्तव्य क्या था, लोगों ने इसे कितना समझा और देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ा, इन सब बातों का उन्हें गहरा व प्रामाणिक ज्ञान था। जाने–माने सिख विद्वान् प्रिंसिपल गंगासिंहजी की प्रार्थना परआपने सिख मिशनरी कालेज में सिख इतिहास पर एकसप्ताह तक व्याख्यान दिये। व्याख्यानमाला की समाप्तिपर जब प्रिंसिपल गगासिंह जी ने प्रश्न पूछने को कहा तोसबने यह कहा कि हमें कोई शंका नहीं है। हमें स्वामीजीने तृप्त कर दिया है। प्राचार्य जोधासिंह जी तो दयानन्दमठ, दीनानगर में आकर आपसे बहुत विषयों पर चर्चाकिया करते थे। 

इतिहास की घटनाओं के कारणों व परिणामों को स्वामीजी महाराज बहुत अच्छे ढंग से समझाया करते थे। एक बार उदार विचार के एक मौलाना ने जो आर्य विद्वानों के सम्पर्क में थे, स्वामी जी के सामने कुछ शंकाएं रखीं। आपने मौलवीजी के सब प्रश्नों के उत्तर दिये। आपके विचार सुनकर उस मौलाना ने कहा इस्लाम-विषयक आपके गहरे ज्ञान से मैं बहुत प्रभावित हूं। मैंने ऐसी युक्तियुक्त प्रमाणिक बातें कभी नहीं सुनी। हमारे मौलवी इतनी गहराई में जाते ही नहीं।

स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी के इतिहास विषयक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इतिहास विषयक लेखों का एक संलकन ‘इतिहास दर्पण’ नाम से सन् 1997 में प्रकाशित हुआ जिसका सम्पादन प्रसिद्ध विद्वान, लेखक, विचारक और इतिहासकार प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु ने किया है। स्वामी सर्वानन्द जी ने इस पुस्तक और प्रा. जिज्ञासु जी के परिचय में लिखा है कि आपने इस ‘इतिहासदर्पण’ग्रन्थ के लिए बहुत परिश्रम किया है। इस अद्भुत पुस्तक में विभिन्न समयों में लिखे गये स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के लेखों का संग्रह किया गया है। इस पुस्तक का पाठ करने से आर्यसमाज के इतिहास के सम्बन्ध में ऐसी-ऐसी बातों का ज्ञान होगा जो बातें लोगों ने कभी न सुनी हों और धर्म-कर्म के बारे में बहुत-सी शंकाओं का भी इतिहासदर्पण पुस्तक से समाधान होगा। श्री जिज्ञासु जी ने इन लेखों के लिए बहुत दूर-दूर के विद्वानों से सम्पर्क करने के साथ अनेक संस्थाओं एवं समाजों में जाकर खोज की है। स्वामी सर्वानन्द जी बताते हैं कि उन्हें बड़ा आश्चर्य होता है कि जो बातें धर्म और इतिहास के बारे में हमने कभी सुनी ही नहीं थी, वे बातें जिज्ञासु जी ने खोज निकाली हैं जो इतिहासदर्पण पुस्तक में संग्रहीत हैं।

स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी का संक्षिप्त परिचय भी जान लेते हैं। स्वामी जी का जन्म लुधियाना के मोही ग्राम में एक प्रतिष्ठित सिख जाट परिवार में पौष मास की पूर्णिमा को सन् 1877 में हुआ था। स्वामीजी के माता-पिता ने आपको ‘केहर सिंह’ नाम दिया था। आपके पिता सेना में सूबेदार मेजर थे। माता समयकौर जब दिवंगत हुई तब केहरसिंह बहुत छोटी अवस्था के बालक थे। आपका पालन आपकी नानी माता महाकौर जी ने आपके ननिहाल लताला में बड़े लाड़-प्यार से किया। आपने स्कूली शिक्षा मिडल तक प्राप्त की। आपके ननिहाल में उदासीन साधुओं के डेरे से आपका सम्पर्क हुआ। उसकेमहन्त पं. विशनदास जी की प्रेरणा से आपने संस्कृतपढ़ी। फरीदकोट, ऋषिकेश व अमृसर आदि नगरों में भीकई विद्वानों के पास अध्ययन किया। यूनानी व आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का भी आपने गहन अध्ययन किया था। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने लिखा है कि कई बड़े-बड़े हकीमों ने दयानन्द मठ, दीनानगर में आपके चरणों में बैठकर आपसे यूनानी व आयुर्वेदिक चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त की। सन् 1898 में आपने अपनी लाखों की सम्पत्ति पर लात मार कर महर्षि दयानन्द के वेद प्रचार मार्ग को अपनाया।  सन् 1901 मेंआपने परवरनड़ ग्राम में स्वामी पूर्णानन्द जी से संन्यास–दीक्षा लेकर प्राणपुरी नाम पाया और कालान्तर में आपस्वामी स्वतन्त्रानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए। सन् 1901 में ही आपने दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों की धर्म प्रचारार्थ यात्रा की और इसका आरम्भ कलकत्ता के बन्दरगाह से जलपोत से किया। इस यात्रा में आपने मलयेशिया, फिलिपीन्स द्वीपसमूह, हिन्देशिया व चीन आदि कई देशों का भ्रमण कर वहां वेदों के अमृतमय ज्ञान की वर्षा की और सन् 1904 में स्वदेश लौटे। प्रा. जिज्ञासु जी ने स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के पूर्णरूपेण आर्यसमाज के प्रचार से जुड़ने पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि स्वामी जी भ्रमण करते हुए वैदिक धर्म का ही प्रचार करते थे, परन्तु भारत-भ्रमण से जब पंजाब लैटे तो पं. विशनदास जी ने आपको लताला बुलाकर आर्यसमाज के साथ जुड़कर धर्मप्रचार करने की आज्ञा दी। आपने इसे प्रवृत्ति का बखेड़ा कहकर ऐसा करने में संकोच दिखाया परन्तु पं. विशनदास जी का आदेश मानते हुए आर्यसमाज के साहित्य के विशेष अध्ययन में लग गए। आपकी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी थी। पन्द्रह दिनों में ही आपने गीता केसात सौ श्लोक कण्ठस्थ कर लिये। अब थोड़े से समयमें आपने आर्यसमाज के सब महत्वपूर्ण छोटे–बड़े ग्रन्थोंका स्वाध्याय करके आर्यसमाज की सेवा के लिएसमर्पित हो गये। आपने पं. विशनदास जी के साथ पहली बार आर्यसमाज मोगा के वार्षिकोत्सव में भी भाग लिया। अपनी दूसरी वेद प्रचार यात्रा में आपने मारीशस में तीन वर्षों तक वेदों का प्रचार किया। वहां से लौटने के समय तक मारीशस में 58 आर्य समाजें स्थापित हो चुकी थीं। आपके जाने से पूर्व यह संख्या 13 थी और वर्तमान में यह संख्या एक सौ से अधिक है। स्वामीजी ने देश की आजादी के आन्दोलन में भी सक्रिय भाग लिया था। पराधीनता के काल में हैदराबाद में हिन्दुओं को धार्मिक आजादी नहीं थी। पाकिस्तान व बंगलादेश में हिन्दुओं पर जो प्रतिबन्ध व दमघोटू वातावरण है, वैसा ही वातावरण तब हैदराबाद के हिन्दुजगत में था। कांग्रेस व इसके प्रमुख नेताओं को हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों के इस हनन पर कोई सहानुभूति नहीं थी। अतः आर्यसमाज को सन् 1939 में वहां एक अभूतपूर्व व्यापक सत्याग्रह करना पड़ा जिसके फील्ड मार्शल स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी थे। यह आन्दोलन पूर्ण सफल रहा। देश की आजादी के बाद भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने हैदराबाद का भारत में विलय कराया और यह स्वीकार किया कि इस हैदराबाद रियासत के भारत गणराज्य में विलय की भूमिका आर्यसमाज के सत्याग्रह ने तैयार की थी। स्वामी जी ने विश्व के अनेक देशों में प्रचार करने के साथ भारत में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार, दलितोद्धार कार्य व गोहत्या निवारण के अनेक प्रशंसनीय कार्य किये। आपका जीवन अनेक पे्ररणाप्रद घटनाओं से पूर्ण है। धर्म प्रचार में आपने अपने धर्म पिता महर्षि दयानन्द के जीवन के अनुसार ही अपने जीवन व चरित्र को ढ़ाला था। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने आपका जीवनचरित लिखकर एक अभूतपूर्व कार्य किया है। 3 अप्रैल, 1955 को 78 वर्ष की आयु में आपने नश्वर शरीर छोडा।जिज्ञासु जी ने लिखा है कि स्वामीजी गोधन की रक्षा केलिए वीरगति को प्राप्त हुए अर्थात् शहीद हुए।

स्वामी स्वतन्त्रानन्द महर्षि दयानन्द की परम्परा के उनके योग्यतम शिष्यों में से एक थे। उनका यशस्वी जीवन देशवासियों की एक आध्यात्मिक एवं सामाजिक धरोहर व पूंजी है। उनसे मार्गदर्शन लेकर देश और समाज को उन्नत किया जा सकता है। हम इस महापुरुष को उनके यशस्वी कार्यों के लिए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

–मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001


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MUST WATCH THIS VIDEO AND POST ..,क्या JNU…!!!, दिवंगत राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम के...

MUST WATCH THIS VIDEO AND POST ..,क्या JNU…!!!, दिवंगत राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम के राष्ट्रवादी रास्ते चलेगा, या…!!!, आहिस्ते आहिस्ते इस विरोध से .., राष्ट्रवाद की नैया डूबोकर.., देश की बर्बादी करने वाले मुट्ठी भर लोगों के भेट चढ़वाने के चंदे के धंधे से , देश को चकनाचूर के अपने सपने देखने वालों को मीडिया जो उन्हें अपने कंधे पर बिठाकर, अपने शरीर की लम्बाई बढाकर.., इस विश्व गुरू देश की सोने की चिड़िया के पंख कतरकर.., इसके मांस से अपना पेट भरने के खवाब से देश के टुकड़े कर आबाद होने के भ्रम से JNU की देशद्रोही धारा को लाजवाब कहते रहेगी
कन्हैया अब दुर्योधन बन, देश को दुर्दाशन के चक्र से कौरवी सेना का नेतृत्व कर , देश के मीडिया से प्रिंट मीडिया भी गांधारी व धृतराष्ट बनकर अपनी आँखों में पट्टी बांधकर , हमारे राष्ट्र को घृणता बताकर , राष्ट्र की जनता को दिखाकर …, अर्जुन मोदी को, अब अभिमन्यु समझकर इस चक्रव्यूह में घेरने की सोच में विश्व के सैकड़ों देशों को भीष्म पितामाह बनाकर .., इस कृत्य से आगामी चुनावों में विपक्षियों के अपने ६० सालों के शासन से गरीबों के बालों में जन्में जूं को, अब .., अपने सैलून में गरीबों को गंजा कर, ऊपर सर व नंगे पाँव से .., गरीबों को सर से पांव तक नंगा कह …दुनिया में हमारे देश के देशद्रोह को देश का सम्मान कह.., होड़ की दौड़ से .., JNU की आड़ में, नए नारों के सुरा-पान के नशे से अब मदहोश होते ही जा रहें हैं.
अपने को पहिले से ही दिल्ली का भीष्म पितामाह कहनेवाला केजरीवाल ने तो अपनी आतंरिक रिपोर्ट बनाकर, अदालत की अवहेलना कर , JNU के इस प्रकरण को बिना कारण बताये ही क्लीन चिट देकर , सत्ता का चाट खाने में लगा है…, अभी पकिस्तान के साहित्य एकादमी उत्सव का भी निमंत्रण आया है.., केजरीवाल भी पाकिस्तान जाने के लिए अति आतुर है.., जिनके उत्तर को पाकिस्तान भी स्वयंहित से भुनाकर एक नया उत्सव मनायेगा…
२०१४ के लोकसभा चुनाव की ANTI –MODI के पुन: प्रचार से बुरी तरह हारकर , विरोधी दल ५ साल के लिए निर्वासित होकर, अब, आगामी विधानसभा चुनावों में अब विपक्षी सियारों ने शेरी चोलों को पहनकर.., एक सुर में असुरी आवाज में BREAK –INDIA की चाल से मोदी को घेरने की चाल से चहलपहल कर जातिवाद , अलगाववाद,आतंकवाद से फुल रिचार्ज होने की तैयारी है .., अब JNU की यह बैटरी कितने दिनों में डिस्चार्ज होगी.., यह सेना के जवान, बाहरी दुश्मनों को व देशवासी, भीतरी दुश्मनों को सबक सिखायेंगे..
जागों देशवासियों.., JNU के चंद लोगों द्वारा देश को डूबाने की तैयारी हो गई है…, विदेशी देश भी इस चिंगारी को अपनी हवा देकर .., कही यह देश का दावानल न बन जाएँ .., कही देश की संस्कृति को कुठाराघात कर.., देश विदेशी मुट्ठीबल में न जकड़ जाए..
दोस्तों यह एक यथार्थ वेबस्थल है .., मेरा देश डूबा डॉट कॉम (One man Army) के डोमेन नाम की स्थापना २६ दिसम्बर २०११ को की गई जब देश “भारत निर्माण” के घोटालों के परतों में दबा था व सितम्बर २१०२ से अब तक ५२५ पोस्ट देशवासियों को राष्ट्रवाद से जगाने के लिए २५० से अधिक स्वंयनिर्मित कार्टून व १० से अधिक वीडियो एनीमेशन बनाएं है .., आज तक पैसे की चाह में इसका बाजारीकरण नहीं किया है.., इसमें सभी दलों को उनके कार्योंनुसार विरोध किया है … इस वेबस्थल का उद्धेश्य देश के “अच्छे दिन “ व माफियाओं के “बुरे दिन” लाने के संकल्प से ही बनाया… , जो की हर पार्टी में मौजूद है .., जब तक इसका सफाया नहीं होगा यह वेबस्थल अब तक न थका है न हारा है और न ही अपने सिद्धांतों से डिगेगा…
यह वेबस्थल जागो इंडिया की प्रसिध्ही से देश के सुबह की चाय ४२० रूपये किलों बेचने व देश का टाटा का नमक ३० रूपये बेचकर .., झूठी प्रसिद्दी से सिद्धी पाने के सिद्धांत का घोर विरोधी है .., जो दीखता है वह लिखता है - http://ift.tt/1QF3u2N
दोस्तों देश का एक ही अशोक स्तंभ के वर्गाकार शेर है…, जय जवान – जय किसान – जय विज्ञान – जिसे चलाने वाला चौथा स्तंभ राष्ट्रवादी हो तो, राष्ट्र भी बल का दंभ दुनिया की कोई भी ताकत किसी भी राष्ट्र को उन्नत बनाने से नहीं रोक सकती..


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Friday, March 4, 2016

😄😄😄👇👇👇 क्यूबा कैसे बरबाद हुआ, वामपंथी फिडेल कास्त्रो ने क्यूबा में कैसे औरतों का बलात्कार और पुरुषों...

😄😄😄👇👇👇
क्यूबा कैसे बरबाद हुआ, वामपंथी फिडेल कास्त्रो ने क्यूबा में कैसे औरतों का बलात्कार और पुरुषों की हत्या का खेल 40 साल खेलकर पुराने बच्चों को मारकर और बच्चियों को बडी होने के बाद उनमें अपने sperm डालकर पूरी की पूरी जनता का biological बाप बन गया ।
एक साल पहले मौत हुई उसकी, अब यही खेल फिडेल कास्त्रो का बेटा अपनी biological बहनों के साथ कर रहा ,उसे भी बाप का शौक लगा है देश के सभी बच्चों का पिता बनना यही है वामपंथ अर्थात Left अर्थात कम्युनिस्ट अर्थात लाल चड्डी । इनका धंधा है किसी भी अच्छी बुरी सरकार के खिलाफ आंदोलन अर्थात क्रांति करना। जैसे ही सत्ता में आते हैं अपना रंग तुरंत दिखाते हैं , फिडेल कास्त्रो को क्यूबा की सत्ता ऐसे ही मिली ठेकेदारी तरीके से क्रांति कर सत्ता किसी और को सौंप कर नयी क्रांति पर निकल जाते हैं

इसी कास्त्रो का उदाहरण
क्यूबा की क्रांति के बाद जब वामपंथी अर्नेस्टो चेग्वेरा ने लम्बी सशस्त्र क्रांति के बाद क्यूबा को आजाद कराया था फिर जब सत्ता संभालने की बारी आई तब चे ने अपने मित्र फिदेल कास्त्रो से कहा कि सत्ता तुम संभालो क्योंकि मुझे पता है कि जो वायदे मैंने प्रजा से किए हैं और जो सपने हमने लोगो को दिखाए है वह मैं कभी पूरा नहीं कर सकता ,प्रजा मेरे से पूछेगी और मेरे पास उसका कोई उत्तर नहीं होगा क्योंकि पब्लिक के सामने एक भाषण देना एक अलग बात है और सत्ता में आने के बाद उसे पूरा करना एक अलग बात है और मेरी आत्मा मुझे सत्ता में आकर लोगो की नजरो से गिरने की इजाजत नही देती । और मैं अब बोलीविया में क्रांति करूँगा ।
बाद में दुनिया का सबसे खनिज संपदा युक्त देश बोलिविया भी बरबाद हो गया
यही है वामपंथियों का पाप


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जिन बच्चों को स्कूल की किताबें चाहिए और जो बच्चे स्कूल की फीस नहीं भर सकते हैं, वो लोग नीचे दिए...

जिन बच्चों को स्कूल की किताबें चाहिए और जो बच्चे स्कूल की फीस नहीं भर सकते हैं, वो लोग नीचे दिए नम्बरों पर सम्पर्क करें।
9450309400
9328620003
8889712233
9926311234
8889995733
8889995731
9826813756
9752033255
9826858785
7489587851
9098321420
9879537809
9825086912
9672083938
इस मैसेज को जितना हो सके, फारवर्ड करे।
आपकी मदद से किसी बच्चे की जिंदगी संवर सकती है।


जरूर पढ़े और ओरो को भी भेजे

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Tuesday, March 1, 2016

🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷🌷 भूपेश आर्य प्रश्न१. क्या श्रीराम,श्रीकृष्ण,हनुमान आदि ईश्वर हैं? उत्तर- ये ईश्वर...

🌷🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

प्रश्न१. क्या श्रीराम,श्रीकृष्ण,हनुमान आदि ईश्वर हैं?

उत्तर- ये ईश्वर नहीं हो सकते इनमें से किसी ने संसार नहीं बनाया।जब ये आये संसार मौजूद था।
इन्होंने तो अपने मां बाप,भाई बहन,ताऊ चाचा को भी नहीं बनाया।क्या ये संसार का पालन करने वाले हैं?
ये संसार का पालन क्या करते ,मृत्यु इनको खा गयी शेष को खा जायेगी।कर्मों का फल ये क्या देंगे इन्हे ही अपने कर्मों के फल भोगने पडे ,राम को वनवास मिला,श्रीकृ्ष्ण जेल में पैदा हुए।शेष सब अपने कर्मों से भयभीत होकर सत्य का आमना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे।

प्रश्न२.सृष्टिकर्ता है भी या नहीं? ईश्वर के पक्ष में युक्तियां दीजिये।ईश्वर कर्मफलदाता भी है यह कैसे सिद्ध करोगे?

उत्तर-
१.प्रत्येक बनी वस्तु का बनाने वाला होना चाहिए।
दीवार का बनाने वाला राज प्रत्यक्ष है,सृष्टि का बनाने वाला ईश्वर केवल दिखता नहीं है।

२.सूर्य समय पर उदय होता है।आज से एक हजार साल बाद सूर्योदय,चन्द्रोदय,ज्वार भाटा,कब होंगे,मजे से बताया जा सकता है क्योंकि संसार एक नियम में बंधा चल रहा हैं।h2o से पानी बनता है,गन्धक का तेजाब नहीं।साइंस के समस्त फार्मूले इसी आधार पर स्थित है क्योंकि प्रकृति में नियम है।जहां जहां कोई नियम होता है वहां वहां उस नियम का नियामक या नियन्ता अवश्य होना चाहिए।नियम नियन्ता के बिना नहीं चलते।

३. आदि सृष्टि में परमाणु मौजूद थे।उन परमाणुओं को प्रथम गति देने वाला कोई चाहिये।परमाणु स्वयं जड हैं,स्वयं गति नहीं दे सकते।

४.फल पेट भरने के लिए ,दूध बच्चे का पोषण करने के लिए,वनों में बिखरी औषधियां मानव के रोग निवारण के लिए,बच्चे के जन्म के साथ माता के स्तनों में दूध आना,ये समस्त बातें यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि स्रष्टि का कोई उद्देश्य है यह अटकल पच्चु नहीं है।
इसके पीछे कोई ज्ञानवान सत्ता चाहिए।जड प्रकृति लक्ष्य निर्धारित नहीं कर सकती।

५.आदमी के नाक,कान,मुख कितने सलोके से बने हैं,तितलियों के पंखों में मखमली रंग भरे हैं,फूलों में क्या सुगन्ध भरी है,उदय व अस्त होते सूरज का द्रश्य मानव का मन मोह लेता है।प्रत्येक रचना में एक अनूठापन है।
ये अनूठापन रचनाकार के अस्तित्व को सिद्ध करता है।

६.जन्मजात बच्चों के ग्रुपों में अलग थलग रखकर तजुर्बे किये गये।बीस बीस
बरस के हो जाने पर भी कोई भी भाषा वे न बोल सकते थे।क्योंकि मानव भाषा तो नकल से सीखता है।भाषा बना नहीं सकती।जैसा मां बोलती है वह भी बोलता है।वातावरण की भाषा बोलता है।आदि सृष्टि में जब भाषा बोलने वाला मानव था ही नहीं तब मानव ने किस भाषा की नकल की थी।उसे वाणी जिसने दी उसका नाम ईश्वर है।आदि सृष्टि में भाषा ईश्वर देता है।

७.संसार में आज ज्ञान है।ज्ञान का ऐसा स्रोत होना चाहिए जहां से रिसकर ये ज्ञान हम तक पहुंचा हो ।
आदि सृष्टि में तो भाषा भी नहीं थी,ज्ञान ही कहां से आता।यदि ज्ञान आत्मा है तो भाषा उसका शरीर है।ज्ञान, बिना भाषा के,रह नहीं सकता।
जिसने भाषा दी उसी ने ज्ञान दिया।ज्ञान के उस आदि स्रोत का नाम ईश्वर है।

८.अष्टांग योग के द्वारा लाखों योगियों ने उस सृष्टिकर्ता को प्रत्यक्ष किया है।

ईश्वर कर्म फलदाता है:-
एक बच्चा जन्म से अन्धा पैदा होता है,दूसरा सनेत्र।एक लंगडा दूसरा सही साबुत।एक पागल,दूसरा कुशाग्र बुद्धि।कोई लखपति के घर में पैदा हो गया,कोई कंगाल के घर में।कौन चाहता है कि मैं अंधा लंगडा,लूला पैदा होता या कंगाल के घर में जन्म लेता? परन्तु ऐसा होता है।
मानव पाप कर्मों के करने के पश्चात् कभी उनका फल भोगना नहीं चाहता परन्तु वह शक्तिशाली न्यायधीश ईश्वर उसे सजा भोगने के लिए अन्धे,लंगडे,लूले कलेवरों में जन्म देता है।अमीरों और गरीबों के घर में जन्म देता है।
मनुष्य के किये गये अच्छे बुरे कर्म स्वयं जड होने के कारण फल नहीं दे सकते।

सृष्टिकर्ता ईश्वर निराकार है या साकार ? सिद्ध करो।

उत्तर:-
१.ईसाई,मुसलमान,पारसी,सिख,पौराणिक,आर्यसमाजी यह सब मानते हैं कि ईश्वर आंखों से दिखाई नहीं देता,यानि निराकार तो है ही।इतने से ही सिद्ध हो गया।

२.प्रकाश की गति १८६००० मील प्रति सेकिंड है।यदि हम दियासलाई की एक तिल्ली जलायें तो एक सैकिंड बाद उसका प्रकाश १८६००० मील तक फैल जायेगा।सूर्य हमसे इतना दूर है कि वहां का प्रकाश लगभग नौ मिनट में पहुंचता है।हमारी पृथ्वी का घेरा २५००० मील का है।
यह सूर्य इतना बडा है कि हमारी पृथ्वी जैसी १३ लाख प्रथ्वियां इसमें समा जाएं।परन्तु हमारा यह सूर्य कुछ बडा नहीं है।ज्येष्ठा नक्षत्र का व्यास हमारे सूर्य के व्यास से ४५० गुणा है।
यानि हमारे सूर्य जैसे नौ करोड सूर्य एक ज्येष्ठा नक्षत्र में समा जायेंगे।
हमारी आकाश गंगा के पास दूसरी आकाश गंगा में एक अन्य नक्षत्र है “एसडोराडस” ।
एक लाख छियासी हजार मील प्रति सैकिंड की गति से भागता हुआ प्रकाश १०२ वर्ष में वहां से प्रथ्वी तक पहुंचता है।
उस नक्षत्र का व्यास हमारे सूर्य से १४०० गुणा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे कहीं बडे बडे अनगिनत नक्षत्र आकाश मे हैं।

बताओ कि कोई छ: फुटा,१० फूटा इंसान चाहे कितना ही शक्तिशाली हो ,इन नक्षत्रों,ग्रहों,तारों,धूमकेतुओं का निर्माण कर सकता है? क्या वह वहां पहुंच भी सकता है?
जो ये कहते हैं कि ईश्वर साकार है वे यदि संसार की विशालता का विचार करेंगे तो स्पष्ट हो जायेगा कि कोई साकार कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो,कितना ही विशाल क्यों न हो,इस विशाल ब्रह्माण्ड का निर्माण नहीं कर सकता।
उसे तो सर्वव्यापक होना चाहिए जो वहां तक पहुंच सके और निराकार ही सर्वव्यापक हो सकता है।
माता के पेट में बच्चे का निर्माण देखो,पलकों के बाल,आंख की पुतलियां बन रही हैं।क्या कोई साकार बना सकता है।


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Sunday, February 28, 2016

📕सत्यार्थ प्रकाश 📕 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (प्रश्न) ‘सोऽयं देवदत्तो य उष्णकाले काश्यां दृष्टः स...

📕सत्यार्थ प्रकाश 📕
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(प्रश्न) ‘सोऽयं देवदत्तो य उष्णकाले काश्यां दृष्टः स इदानीं प्रावृट्समये मथुरायां दृश्यते।’ अर्थात् जो देवदत्त मैंने उष्णकाल में काशी में देखा था उसी को वर्षा समय में मथुरा में देखता हूं। यहां वह काशी देश उष्णकाल, यह मथुरा देश और वर्षाकाल को छोड़ कर शरीरमात्र में लक्ष्य करके देवदत्त लक्षित होता है। वैसे इस भागत्यागलक्षणा से ईश्वर का परोक्ष देश, काल, माया, उपाधि और जीव का यह देश, काल, अविद्या और अल्पज्ञता उपाधि छोड़ चेतनमात्र में लक्ष्य देने से एक ही ब्रह्म वस्तु दोनों में लक्षित होता है। इस भागत्यागलक्षणा अर्थात् कुछ ग्रहण करना और कुछ छोड़ देना जैसा सर्वज्ञत्वादि वाच्यार्थ ईश्वर का और अल्पज्ञत्वादि वाच्यार्थ जीव का छोड़ कर चेतनमात्र लक्ष्यार्थ का ग्रहण करने से अद्वैत सिद्ध होता है। यहां क्या कह सकोगे?

(उत्तर) प्रथम तुम जीव और ईश्वर को नित्य मानते हो वा अनित्य?
(प्रश्न) इन दोनों को उपाधिजन्य कल्पित होने से अनित्य मानते हैं।
(उत्तर) उस उपाधि को नित्य मानते हो वा अनित्य?
(प्रश्न) हमारे मत में—
जीवेशौ च विशुद्धाचिद्विभेदस्तु तयोर्द्वयोः।
अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः॥1॥
कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः।
कार्यकारणतां हित्वा पूर्णबोधोऽवशिष्यते॥2॥
—ये ‘संक्षेपशारीरक’ और ‘शारीरकभाष्य’ में कारिका हैं।
हम वेदान्ती छः पदार्थों अर्थात् एक जीव, दूसरा ईश्वर, तीसरा ब्रह्म, चौथा जीव और ईश्वर का विशेष भेद, पांचवां अविद्या अज्ञान और छठा अविद्या और चेतन का योग इन को अनादि मानते हैं॥1॥परन्तु एक ब्रह्म अनादि, अनन्त और अन्य पांच अनादि सान्त हैं जैसा कि प्रागभाव होता है। जब तक अज्ञान रहता है तब तक ये पांच रहते हैं और इन पांच की आदि विदित नहीं होती। इसलिये अनादि और ज्ञान होने के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं इसलिये सान्त अर्थात् नाशवाले कहाते हैं॥2॥
(उत्तर) ये तुम्हारे दोनों श्लोक अशुद्ध हैं क्योंकि अविद्या के योग के विना जीव और माया के योग के विना ईश्वर तुम्हारे मत में सिद्ध नहीं हो सकता।
इससे ‘तच्चितोर्योगः’ जो छठा पदार्थ तुमने गिना है वह नहीं रहा। क्योंकि वह अविद्या माया जीव ईश्वर में चरितार्थ हो गया और ब्रह्म तथा माया और अविद्या के योग के विना ईश्वर नहीं बनता फिर ईश्वर को अविद्या और ब्रह्म से पृथक् गिनना व्यर्थ है। इसलिये दो ही पदार्थ अर्थात् ब्रह्म और अविद्या तुम्हारे मत में सिद्ध हो सकते है, छः नहीं।
तथा आपका प्रथम कार्योपाधि और कारणोपाधि से जीव और ईश्वर का सिद्ध करना तब हो सकता कि जब अनन्त, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, सर्वव्यापक ब्रह्म में अज्ञान सिद्ध करें। जो उसके एक देश में स्वाश्रय और स्वविषयक अज्ञान अनादि सर्वत्र मानोगे तो सब ब्रह्म शुद्ध नहीं हो सकता। और जब एक देश में अज्ञान मानोगे तो वह परिच्छिन्न होने से इधर-उधर आता जाता रहेगा। जहां-जहां जायगा वहां-वहां का ब्रह्म अज्ञानी और जिस-जिस देश को छोड़ता जायगा उस-उस देश का ब्रह्म ज्ञानी होता रहेगा तो किसी देश के ब्रह्म को अनादि शुद्ध ज्ञानयुक्त न कह सकोगे और जो अज्ञान की सीमा में ब्रह्म है वह अज्ञान को जानेगा। बाहर और भीतर के ब्रह्म के टुकड़े हो जायेंगे।
जो कहो कि टुकड़ा हो जाओ, ब्रह्म की क्या हानि? तो अखण्ड नहीं। जो अखण्ड है तो अज्ञानी नहीं। तथा ज्ञान के अभाव वा विपरीत ज्ञान भी गुण होने से किसी द्रव्य के साथ नित्य सम्बन्ध से रहेगा। यदि ऐसा है तो समवाय सम्बन्ध होने से अनित्य कभी नहीं हो सकता। जैसे शरीर के एक देश में फोड़ा होने से सर्वत्र दुःख फैल जाता है वैसे ही एक देश में अज्ञान सुख दुःख क्लेशों की उपलब्धि होने से सब ब्रह्म दुःखादि के अनुभव से युक्त होगा और सब ब्रह्म को शुद्ध न कह सकोगे।
वैसे ही कार्योपाधि अर्थात् अन्तःकरण की उपाधि के योग से ब्रह्म को जीव मानोगे तो हम पूछते हैं कि ब्रह्म व्यापक है वा परिच्छिन्न? जो कहो व्यापक उपाधि परिच्छिन्न है अर्थात् एकदेशी और पृथक्-पृथक् है तो अन्तःकरण चलता फिरता है वा नहीं?
(उत्तर) चलता फिरता है।
(प्रश्न) अन्तःकरण के साथ ब्रह्म भी चलता फिरता है वा स्थिर रहता है?
(उत्तर) स्थिर रहता है।
(प्रश्न) जब अन्तःकरण जिस-जिस देश को छोड़ता है उस-उस देश का ब्रह्म अज्ञानरहित और जिस-जिस देश को प्राप्त होता है उस-उस देश का शुद्ध ब्रह्म अज्ञानी होता होगा। वैसे क्षण में ज्ञानी और अज्ञानी ब्रह्म होता रहेगा। इससे मोक्ष और बन्ध भी क्षणभङ्ग होगा और जैसे अन्य के देखे का अन्य स्मरण नहीं कर सकता वैसे कल की देखी सुनी हुई वस्तु वा बात का ज्ञान नहीं रह सकता। क्योंकि जिस समय देखा सुना था वह दूसरा देश और दूसरा काल; जिस समय स्मरण करता वह दूसरा देश और काल है।
जो कहो कि ब्रह्म एक है तो सर्वज्ञ क्यों नहीं? जो कहो कि अन्तःकरण भिन्न-भिन्न हैं, इस से वह भी भिन्न-भिन्न हो जाता होगा तो वह जड़ है। उस में ज्ञान नहीं हो सकता। जो कहो कि न केवल ब्रह्म और न केवल अन्तःकरण को ज्ञान होता है किन्तु अन्तःकरणस्थ चिदाभास को ज्ञान होता है तो भी चेतन ही को अन्तःकरण द्वारा ज्ञान हुआ तो वह नेत्र द्वारा अल्प अल्पज्ञ क्यों है? इसलिये कारणोपाधि और कार्योपाधि के योग से ब्रह्म जीव और ईश्वर नहीं बना सकोगे। किन्तु ईश्वर नाम ब्रह्म का है और ब्रह्म से भिन्न अनादि, अनुत्पन्न और अमृतस्वरूप जीव का नाम जीव है।
जो तुम कहो कि जीव चिदाभास का नाम है तो वह क्षणभङ्ग होने से नष्ट हो जायगा तो मोक्ष का सुख कौन भोगेगा? इसलिये ब्रह्म जीव और जीव ब्रह्म कभी न हुआ, न है और न होगा।
(सप्तम समुल्लास:सत्यार्थप्रकश)
-स्वामी दयानन्द सरस्वती


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आज हिन्दू को अपने देवी देवता की रक्षा करना पड रहा है क्योंकि सेक्युलर हिन्दू ही कट्टर हिन्दुओ की...

आज हिन्दू को अपने देवी देवता की रक्षा करना पड रहा है क्योंकि सेक्युलर हिन्दू ही कट्टर हिन्दुओ की टांग काट रहा है।
हम मात्र कहने को बहुसंख्यक हिन्दू है 80 करोड़ बाकि तो ये सूअर के पिल्लै ही ऐश मौज कर रहे है नेता मंत्रियो को अपनी ऊँगली पर नचाते है और हमारे कुछ हिन्दू भाई बहन रोटी को तरसते है मदद के लिए कोई नहीं आता।
रोड पर एक्सीडेंट हो जाये तो डरते है पुलिस केस न हो और हम उसे मरने को छोड़ देते है।
ये आरक्षण नाम का जहरीला तत्व ही हम हिन्दुओ को जातियो में बांटे रखा है वर्ना किसकी मजाल हमें आपस में लड़ने को मजबूर करे।
भगवान को राह चलता सूअर की औलाद गाली दे देता है नंगी फ़ोटो शेयर करते है राम हनुमान भगवान पर केस करते है और हम बस क्या चाहते है 2 वक्त की रोटी पैसा बंगला बीवी सुखी परिवार और आरक्षण।

शर्म करो हिन्दुओ अभी नहीं जागे तो कैसे बचाओगे अपने बच्चों को परिवार को।
शिवाजी नाथूराम भगत सिंह बाला साहेब बनो।
मिलकर रहोगे तो कोई कुछ नहीं कर पायेगा बाकि आप समझदार हो।
🚩🚩🚩🙏🏻🙏🏻🚩🚩😔


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