🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻
🌻राजधर्म🌻
🌼विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् द्रियन्ते दस्युभि: प्रजा:।
सम्पश्यत: सभृतस्य मृत: स: न तु जीवति।।६।। मनु०।।
जिस राजा के राज्य में भ्रत्य सहित देखते हुए डाकू
लोग रोती विलाप करती प्रजा के पदार्थ और प्राणों
को हरते रहते हैं वह जानो
भ्रत्य अमात्यसहित मृतक है जीता नहीं और महादु:ख
का पाने वाला है।
🌼प्राज्ञं कुलीनं शूरम् च दक्ष दात्रमेव च।
क्रतज्ञं ध्रतिमन्तञ्च कष्टमाहुररिं बुधा:।।३।। मनु०।।
सदा इस बात को द्रढ रक्खे
कि कभी बुद्धिमान कुलीन,
शूरवीर,चतुर,दाता,किये हुए को जानने हारे और धैर्यवान पुरुष को शत्रु न
बनावे क्योंकि जो ऐसे को
शत्रु बनावेगा वह दु:ख पावेगा।
🌼धर्मों विद्धस्त्वधर्मेण सभाम् यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासद:।।७।। मनु।।
जिस सभा में अधर्म से घायल होकर धर्म उपस्थित होता है अर्थात धर्मी को मान और अधर्मी को दण्ड नहीं मिलता उस सभा में
जितने सभासद हैं वे सब
मरे हुए के समान हैं।
🌼सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम्।
अब्रुवन्विब्रुवन्वापि नरो
भवति किल्विषी।।८।। मनु०।।
धार्मिक मनुष्य को योग्य है
कि सभा में कभी प्रवेश न करे और जो प्रवेश किया हो तो सत्य ही बोले।जो
कोई सभा में अन्याय होते
हुए को देखकर मौन रहे
अथवा सत्य न्याय के विरुद्ध
बोले वह महापापी होता है।
🌼यत्र धर्मों ह्यधर्मेण सत्यं यत्रान्रतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासद:।।९।। मनु०।।
जिस सभा में अधर्म से धर्म,असत्य से सत्य सब सभासदों के देखते हुए
मारा जाता है उस सभा
में सब मरे हुए के समान
हैं।जानो उनमें कोई भी
नहीं जीता।
🌼धर्म एव हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मों न हन्तव्यो मा नो
धर्मों हतोsवधीत्।।१०।। मनु०।।
मारा हुआ धर्म मारने वाले का नाश और रक्षित किया
धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना इस डर से
कि मारा हुआ धर्म कभी
हमको न मार डाले।
🌼एक एव सुह्द्धर्मों निधनेsप्यनुयाति य:।
शरीरेण समं नाशं सर्वमध्यद्धि गच्छति।। १२।।
मनु०।।
इस संसार में एक धर्म ही है
जो मृत्यु के पश्चात् भी साथ चलता है और सब पदार्थ वा संगी शरीर के नाश के
साथ ही नाश को प्राप्त होते
हैं अर्थात सबका संग छूट जाता है परन्तु धर्म का संग
कभी नहीं छूटता ।
🌼अदण्डयान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।
अयशो महद् आप्नोति नरकं
चैव गच्छति।।८।। मनु०।।
जो राजा दण्डनीयों को दण्ड नहीं देता व अदण्डनीयों को दण्ड देता
है अर्थात दण्ड देने योग्य को छोड देता और जिसको
दण्ड देना न चाहिए उसको
दण्ड देता है वह
जीता हुआ बडी निन्दा को
और मरे पीछे बडे दु:ख को
प्राप्त होता है।
इसलिए जो अपराध करे
उसको सदा दण्ड देवे और
बिना अपराध वाले को दण्ड कभी न देवे।
🌼येन येन यथान्गेन स्तेनो न्रषु
विचेष्टते।
तत्तदेव हरेदस्य प्रत्यादेशाय
पार्थिव:।।१।। मनु०।।
चोर जिस प्रकार जिस जिस अंग से मनुष्यों में
विरुद्ध चेष्टा करता है उस उस अंग को सब मनु ष्यों
की शिक्षा के लिये राजा
छेदन कर दे।
🌼पिताचार्य्य: सुह्न्माता भार्या पुत्र: पुरोहित:।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोsस्ति य: स्वधर्में न तिष्ठति।२।। मनु०।।
चाहे पिता,आचार्य,मित्र,माता,स्त्री,पुत्र और पुरोहित क्यों
न हो जो स्वधर्म में स्थित
नहीं रहता वह राजा का दण्डनीय होता है।अर्थात जब राजा न्यायासन पर
बैठ न्याय करें तब किसी का पक्षपात न करे किन्तु
यथोचित दण्ड देवे।
🌼न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात्।
समुत्सृजेत् साहसिकान् सर्वभूतभयावहान्।।९।। मनु०।।
न मित्रता,न पुष्कल धन की
प्राप्ति से भी जो राजा सब
प्राणियों को दु:ख देने वाले
पापी मनुष्य को दण्ड दिये
बिना कभी न छोडे।
🌼गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं
वा बहु्श्रुतम् ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।१०।। मनु०।।
चाहे गुरु हो,चाहे पुत्रादि बालक हों,चाहे पिता आदि
व्रद्ध,चाहे ब्राह्मण और चाहे
बहुत शास्त्रों का श्रोता क्यों
न हो,जो धर्म को छोड अधर्म में वर्तता है,दूसरे को बिना अपराध मारने वाले हैं उनको बिना विचारे मार
डालना अर्थात मारने के पश्चात् विचार करना चाहिए।
🌼नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।
प्रकाशं वाsप्रकाशं वा मन्युस्तन्नमृत्यु्मृच्छति।।११।। मनु०।।
दुष्ट पुरुषों के मारने में हन्ता को पाप नहीं होता,चाहे प्रसिद्ध मारे चाहे
अप्रसिद्ध,क्योंकि क्रोधी को
क्रोध से मारना जानो क्रोध
से क्रोध की लडाई है।
🌼यस्य स्तेन: पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक्।
न साहसिकदण्डघ्नौ स राजा श्ऋलोकभाक्।।१२।। मनु०।।
जिस राजा के राज्य में न चोर,न परस्त्रीगामी,न दुष्ट वचन बोलने हारा न साहसिक(दुष्ट)डाकू, और न दण्डघ्न अर्थात राजा की
आज्ञा का भंग करने वाला
है वह राजा अतीव श्रेष्ठ है।
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