Friday, March 25, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 🌷दुर्गुण त्याग🌷 वेद दुर्गुण,दुर्व्यसन और बुराइयों को दूर करने,नष्ट करने और निकाल भगाने...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

🌷दुर्गुण त्याग🌷

वेद दुर्गुण,दुर्व्यसन और बुराइयों को दूर करने,नष्ट करने और निकाल भगाने का आदेश देते हैं।मांस भक्षण का निषेध करते हुए वेद कहता है-

शेरभक शेरभ पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त।।-(अथर्व० २/२४/१)

हे नृशंस हिंसक ! हे हत्यारे ! सर्वभक्षियो ! तुम्हारे अनुयायी लौट जाएँ।तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र भी तुम्हारे पास ही लौट जाएँ अर्थात् तुम्हारे हथियार तुम्हें ही दुःखदायी हों।तुम जिनके सम्बन्धी हो उन्हें खाओ,जो तुम्हें हिंसा के लिए प्रेरित करें उसे खाओ,अपने मांस को खाओ।

वेद ने मांस-भक्षण का कितने प्रबल शब्दों में निषेध किया है।

मद्यपान(शराब) का निषेध करते हुए वेद कहता है-

ह्रत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम् ।
ऊधर्न नग्ना जरन्ते ।।–(ऋ० ८/२/१२)
अर्थ:-जी खोलकर शराब पीने वाले मदयुक्त पुरुषों की भांति परस्पर लड़ते हैं और नग्नों की भांति रात को बड़बड़ाया करते हैं।

शराब पीने वालों की दशा का वर्णन कर वेद इस दुर्व्यसन को छोड़ने का उपदेश करता है।

अब जुआ-निषेध का अवलोकन कीजिए-
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः ।
तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे विचष्टे सवितायमर्यः ।।-(ऋग्वेद १०/३४/१३)

अर्थ:-हे जुआरी ! तू जुआ मत खेल,खेती ही कर।उसको ही बहुत मानता हुआ खेती द्वारा प्राप्त धन में आनन्दलाभ कर।हे जुआरी ! उसी खेती में गौएँ हैं,उसी में स्त्री=गृहसुख है।सर्वप्रेरक उपदेष्टा तुझे उसी का उपदेश करे।

काम,क्रोध,लोभ आदि को दूर करने का उपदेश देते हुए वेद कहता है-

उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र ।।-(अथर्व० ८/४/२२)

अर्थ:-उलूक=उल्लू की चाल मोह को,भेड़िये की चाल क्रोध को,कुत्ते की चाल स्वजाति-द्रोह,मत्सर=जलन और चाटकारिता को,कोक=चिड़ा-चिड़े की चाल कामवासना को,गरुड़ की चाल अहंकार को और गीध की चाल लोभवृत्ति को छोड़ दे।हे आत्मन् ! इन राक्षसों(दुष्ट प्रवृत्तियों) को ऐसे रगड़ दे जैसे सिल-बट्टे पर मसाला रगड़ा जाता है।

वेदभक्त अपने जीवन के सभी दुर्गुणों और दुर्व्यसनों को दूर करने के लिए प्रभु से प्रार्थना करते हुए कहता है-

अति निहो अति स्रिधोsत्यचित्तिमत्यरातिमग्ने ।
विश्वा ह्यग्ने दुरिता सहस्वाथास्मभ्यंसहवीरांरयिं दाः ।।-(यजु० २७/६)

अर्थ:-हे सर्वविघ्नवारक प्रभो ! असत्य आदि गिरावट के साधनों को दूर कर दे।हमारी मूर्खता और अज्ञान का नाश कर दे।कंजूसी के भाव को हमारे जीवन से निकाल दो।हे दुःखदलनकर्ता प्रभो ! सभी बुराइयों को मसल दे।हमें वीर-सन्तान तथा धन-सम्पत्ति प्रदान करो।

विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रन्तन आसुव ।।-(यजु० ३०/३)

अर्थ:-हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता ! दिव्यगुण युक्त परमेश्वर ! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों को दूर कर दीजिए और जो कल्याणकारी एवं भद्र है वह हमें प्राप्त कराइए।


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