🌄सत्यार्थ प्रकाश 🌄
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(प्रश्न) सदेव सोम्येदमग्र आसीत्॥1॥
असद्वा इदमग्र आसीत्॥2॥
आत्मा वा इदमग्र आसीत्॥3॥
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्॥4॥
—ये उपनिषदों के वचन हैं।
हे श्वेतकेतो! यह जगत् सृष्टि के पूर्व सत्॥1॥ असत्॥2॥ आत्मा॥3॥ और ब्रह्मरूप था॥4॥ पश्चात्—
तदैक्षत बहुः स्यां प्रजायेयेति॥1॥
सोऽकामयत बहुः स्यां प्रजायेयेति॥2॥
—यह तैत्तिरीयोपनिषत् का वचन है।
वही परमात्मा अपनी इच्छा से बहुरूप हो गया है॥1॥॥2॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन॥
—यह भी उपनिषत् का वचन है।
जो यह जगत् है वह सब निश्चय करके ब्रह्म है। उस में दूसरे नाना प्रकार के पदार्थ कुछ भी नहीं किन्तु सब ब्रह्मरूप हैं।
(उत्तर) क्यों इन वचनों का अनर्थ करते हो? क्योंकि उन्हीं उपनिषदों में—
अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छ अद्भिस्सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः॥
—छान्दोग्य उपनि॰॥
हे श्वेतकेतो! अन्नरूप पृथिवी कार्य से जलरूप मूल कारण को तू जान। कार्यरूप जल से तेजोरूप मूल और तेजोरूप कार्य से सद्रूप कारण जो नित्य प्रकृति है उस को जान। यही सत्यस्वरूप प्रकृति सब जगत् का मूल घर और स्थिति का स्थान है। यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और जीवात्मा, ब्रह्म और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था; अभाव न था और जो (सर्वं खलु॰) यह वचन ऐसा है जैसा कि ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनवाँ जोड़ा’ ऐसी लीला का है। क्योंकि—
सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।
—छान्दोग्य॥
और—
नेह नानास्ति किञ्चन॥
—यह कठवल्ली का वचन है॥
जैसे शरीर के अङ्ग जब तक शरीर के साथ रहते हैं तब तक काम के और अलग होने से निकम्मे हो जाते हैं, वैसे ही प्रकरणस्थ वाक्य सार्थक और प्रकरण से अलग करने वा किसी अन्य के साथ जोड़ने से अनर्थक हो जाते हैं। सुनो!
इस का अर्थ यह है—हे जीव! तू उस ब्रह्म की उपासना कर। जिस ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और जीवन होता है जिस के बनाने और धारण से यह सब जगत् विद्यमान हुआ है वा ब्रह्म से सहचरित है उस को छोड़कर दूसरे की उपासना न करनी। इस चेतनमात्र अखण्डैकरस ब्रह्मस्वरूप में नाना वस्तुओं का मेल नहीं है किन्तु ये सब पृथक्-पृथक् स्वरूप में परमेश्वर के आधार में स्थित हैं।
(अष्टम समुल्लास:सत्यार्थप्रकश)
-स्वामी दयानन्द सरस्वती
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