🌷🌷ओ३म्🌷🌷
🌷ईश्वर का स्वरुप🌷
प्रश्न :-परमात्मा निराकार क्यों है?हमको क्यों नहीं दिखता?
समाधान:-परमात्मा निराकार है इसके अनेक कारण हैं।कुछ यहाँ लिखते हैं:-
(1) सर्वव्यापी चेतन वस्तु का कोई रुप-रंग-आकार नहीं होता है।
न तस्य प्रतिमाs अस्ति -(यजु० ३२/३)
(2) सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से वह अदृश्य रहता है।
अदृष्टता (ऋ० १/१८७/७०)
ईश्वर दिखने वाली चीज नहीं हऐ,वह अदृश्य रहता है।
(3) जैसे आकाश विभु है-सर्वत्र व्यापक है,वैसे ही परमात्मा आकाशवत् सर्वव्यापक है।कैसे दिखाई दे सकता है?
आ यस्तस्थौ भुवनान्यमर्त्यः-(ऋ० ९/८४/२)
वह अमर ईश सारे संसार में व्याप्त है।
(4) चेतन तत्त्व निराकार होता है जिसका दर्शन(अनुभव) निराकार चेतन ही कर सकता है।
अकाय (यजु०४०/८),अपात् (ऋ० ८/६९/११)
(5) ईश्वर सृष्टिकर्ता है,सर्वान्तर्यामी है।रचना का कार्य अंदर से ही करता है।प्रकृति से परमाणु इकट्ठा करना,उनको गति देना,सृष्टि-उत्पत्ति करना-ये अन्तर्यामी निराकार ईश्वर के ही कार्य हैं,अतः वह निराकार है।
(6) जैसे शब्द आकाश का गुण है,दिखाई नहीं देता,उसी तरह आनन्द ईश्वर का गुण है जो अनुभव होता है,दिखाई नहीं देता,अतः वह आनन्दस्वरुप परमात्मा अकाय है,निराकार है।
(7) जो वस्तु बहुत पास या बहुत दूर होती है या अतिसूक्ष्म या अतिमहान् होती है वह दिखाई नहीं देती।ईश्वर आत्मा के भीतर विद्यमान है और सर्वत्र विद्यमान है,इसलिए चर्म-चक्षुओं से ओझल रहता है।
विष्णोः कर्माणि पश्यत…..(ऋ० १/२२/१९)
न तं विदाथ……(ऋ० १०/८२/७)
(8) भौतिक चक्षुओं से भौतिक पदार्थ दिखते हैं।ईश्वर चेतन है,वह चेतन आत्मा ही के दर्शन का विषय है,इस कारण निराकार है।
(9) दृश्यमान(दिखने वाली) सब वस्तुओं में विकार होता है।ईश्वर निर्विकार है।वह शुद्ध-बुद्ध-मुक्त और निर्लेप है इसलिए निराकार है।
(10) आत्मा के ऊपर तीन प्रकार के आवरण हैं जिनकी वजह से वह दिखाई नहीं देता।आवरण,विक्षेप और मल के हटने पर ही निर्मल मन-मंदिर में आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
(11) आकार वाली वस्तु स्थान घेरती है अर्थात् वह सीमित होती है,परन्तु ईश्वर असीम है,सर्वव्यापी है,वह स्थान नहीं घेरता और निराकार है।
पूर्णात् पूर्णमुदचति……..परिषिच्यते।।-(अथर्व० १०/८/२९)
(12) ईश्वर अखंड है,पूर्ण है,वह खंडित और अपूर्ण नहीं हो सकता,अतः निराकार है और निराकार ही रहेगा क्योंकि वह नित्य है और अचल है।
अनेजदेकं मनसो जवीयो-(यजु० ४०/४)
तदेजति तन्नैजति (यजु० ४०/५)
वह समस्त ब्रह्माण्ड को चलाता है पर स्वयं अचल है।
अनाद्यनन्तं महतः परम ध्रुवं-(कठ० ४/५)
परमात्मा आदि और अन्त रहित है और ध्रुव अर्थात् अचल है।जो वस्तु सर्वव्यापी होती है वही अचल होती है।
(13) वैदिक दर्शन में ईश्वर ही ऐसा तत्त्व है जो आकाशवत् व्यापक होता हुआ आकाश से भी महान् है,जो आकाश की परिधि है-सीमा है।
परमं व्योम (यजु० २३/६२)
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् (ऋ० १/१६४/३९)
अकायमव्रणम् (यजु० ४०/४)
त्वमस्य पारे रजसो व्योमन् (ऋ० १/५२/१२)
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् (ऋ० १०/१२९/७)
स भूमिः सर्वत स्पृत्वा (यजु० ३१/१)
नाभ्याs आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत (यजु० ३१/१३)
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म…..परमे व्योमन् (तैत्तिरीयोपनिषद्)
भावार्थ एक ही है कि ईश्वर आकाश के अवकाश से भी अनादि-अनन्त है अर्थात् वह हर दिशा में आदि-अन्तरहित है,अतः वह निराकार है।आदि-अन्त रहित होने से वह पूर्ण है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
पूर्ण से पूर्ण घटाने पर भी पूर्ण ही बचता है,वह केवल निराकार ही हो सकता है।
from Tumblr http://ift.tt/1UKd22r
via IFTTT
No comments:
Post a Comment