Thursday, August 4, 2016

.भारतीय स्वतन्त्रता पर्व के उपलक्ष में विशेष प्रस्तुति:- 15 🌹जिन्हें हम भूल गए 🌹 अमर शहीद...

.भारतीय स्वतन्त्रता पर्व के उपलक्ष में विशेष प्रस्तुति:- 15

🌹जिन्हें हम भूल गए 🌹
अमर शहीद क्रन्तिकारी तांत्या भील
( झारखण्ड : 1842- 1888 )

भारत माता के वीर सपूत तांत्या भील ने अंग्रेज हहुक्मरानों के द्वारा मालगुजारी के नाम पर हो रहे अत्याचार का खुलकर विरोध किया और उनके विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। उसने थानों को लूट कर हथियार एकत्र किये। मालगुजरों से धन लूटकर गरीबों में बनता, इस प्रकार इस क्रन्तिकारी ने अंग्रेज सरकार की नींद हराम कर दी।। अंत में गोरी सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर के नवम्बर 1888 में फाँसी पर लटका दिया।


स्वामी भीष्म वेद प्रचार मण्डल घरौण्डा, अमर शहीद भारत माता के वीर सैनानी तांत्या भील को शत शत नमन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

विशेष:- यदि आप भारत के इस स्वतन्त्रता सेनानी को श्रद्धाञ्जलि अर्पित करना चाहते हैं तो इस सन्देश को अपने सर्कल में अधिक से अधिक प्रचारित करें ताकि आज की पीढ़ियों को इन गुमनाम शहीदों की जानकारी मिल सके।

शहीदों को नतमस्तक: शिव कुमार आर्य, घरौण्डा।


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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🌻॥ॐ॥ओ३म् सच्चिदानन्दाय नम:॥ 🌻 🌻 श्रीमानजी। सादर हार्दिक नमस्ते॥ 🌻 🌻 प्रियात्मन् आपका दिन...

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🌻॥ॐ॥ओ३म् सच्चिदानन्दाय नम:॥ 🌻
🌻 श्रीमानजी। सादर हार्दिक नमस्ते॥ 🌻
🌻 प्रियात्मन् आपका दिन मंगलमय हो 🌻
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—***★★★॥पुष्प-२४॥★★★***—
व्यसने क्लिश्यमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते।
अनुनीय यथाशक्ति तं नृशंसं विदुर्बुधा: ॥
आकेशग्रहणात् मित्रमकार्यात् सन्निवर्तयन् ।
अवाच्य : कश्चिद् भवति कृतयत्नो यथाबलम्॥
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जो मित्र को किसी व्यसन (बुरी आदत) का शिकार होता देख बचाता नहीं , वह क्रूर हैं।
आपति में पड़ते आत्मीय को केशों से पकड़कर भी खींचने का यत्न करे, तब मनुष्य निन्दा का पात्र नहीं होता।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
“पवित्र वेद” के ऋषियों का ना भूलें उपकार।
विश्वगुरु बन जायें हम, ज्ञान का करें प्रसार ॥
आओ मिल हम सब करें, वेदिक धर्म प्रचार ।
गूंजे फिर संसार में, श्री सत्य-धर्म जयकार॥
-*: बोलो सत्य सनातन वेदिक धर्म की जय :*-
✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯✯
धर्म को क्रान्ति बनायें “सत्यार्थप्रकाश” पढे़॥
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🙏🙏


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*🌷प्रातःकाल बोलने के मन्त्र🌷* *ओ३म् प्रातरिग्नं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा...

*🌷प्रातःकाल बोलने के मन्त्र🌷*

*ओ३म् प्रातरिग्नं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना ।*
*प्रार्तभगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ।।*

*भावार्थ:-*हे स्त्री-पुरुषो जैसे हम उपदेशक लोग प्रभात-बेला में स्वप्रकाशस्वरुप,परमैश्वर्य के दाता और परमैश्वर्ययुक्त,प्राण-उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान्,सूर्य-चन्द्र को उत्पन्न करने वाले परमात्मा की स्तुति करते हैं और भजनीय,सेवनीय,ऐश्वर्ययुक्त,पुष्टिकर्ता,अपने उपासक,वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करने हारे,अन्तर्यामी,प्रेरक और पापियों को रुलाने हारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की स्तुति-प्रार्थना करते हैं वैसे तुम लोग भी किया करो।

*ओ३म् प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता ।*
*आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ।।*

*भावार्थ:-*प्रातः जयशील,ऐश्वर्य के दाता,तेजस्वी,अन्तरिक्ष के पुत्ररुप सूर्य की उत्पत्ति करने हारे,सब ओर जोकि सूर्यादि लोकों को विशेष करके धारण करने हारा,सब ओर से धारण कर्त्ता,जिस किसी का भी जानने हारा,दुष्टों को दण्डदाता और सबका प्रकाशक है-जिस भजनीय स्वरुप को मैं इस प्रकार सेवन करता हूँ और इसी प्रकार परमेश्वर सबको उपदेश करता है कि तुम मेरी ही आज्ञा में चलो और मेरी ही उपासना करो,इससे हम लोग उसकी स्तुति करते हैं।

*ओ३म् भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः ।*
*भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम ।।*

*भावार्थ:-*हे भजनीय परमात्मा ! सबके उत्पादक,सत्याचार में प्रेरक ऐश्वर्यवाद !
हमें प्रज्ञा दीजिए और अपने दान से हमारी रक्षा किजिए।आप गाय,घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को हमारे लिए प्रकट कीजिए।आपकी कृपा से हम लोग उत्तम मनुष्यों के सहयोग से बहुत वीर मनुष्यों वाले अच्छे प्रकार होवें।

*ओ३म् उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्याम् ।*
*उतोदिता मधवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ।।*

*भावार्थ:-*हे भगवन् ! आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इस समय प्रकर्षता तथा उत्तमता की प्राप्ति में और इन दोनों के मध्य में ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान् होवें।और हे परम पूजित असंख्य धन देने हारे ! सूर्यलोक के उदय में पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप्त लोगों की अच्छी उत्तम प्रज्ञा और सुमति में हम सदा प्रवृत्त रहें।।

*ओ३म् भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम ।*
*तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुर एता भवेह ।।*

*भावार्थ:-*हे सकलैश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर ! हे ऐश्वर्यप्रद ! इस संसार और हमारे गृहस्थाश्रम में अग्रगामी और आगे-आगे सत्यकर्मों में बढ़ाने हारे होइये और जिससे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे पूजनीय होवें,उसी हेतू से हम विद्वान् लोग सकलैश्वर्यसम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन,मन,धन से प्रवृत्त होवें।


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ओ३म् आजकल हिन्दु समाज के पोपजी ( हिन्दु पंडित ) और उनके चम्मचो ने यह कहना शुरू किया है की...

ओ३म्
आजकल हिन्दु समाज के पोपजी ( हिन्दु पंडित ) और उनके चम्मचो ने यह कहना शुरू किया है की शिवलिंग मे रेडियोएक्टिव तत्व होता है और इसलिए इसपर पानी चढ़ाया जाता है जिससे यह ठंडा रहे है बिस्फोट न हो | केवल यही नही इन पाखंडियो ने यह अफवाह भी फैला रखा है की शिवलिंग पर चढ़ने वाला धतूरा, भाग आदी भी रेडियोएक्टिव तत्वो को अवशोषित करने वाला होता है !!
पता नही इन हिन्दूओ को कब अक्ल आएगी की ये जिसे भगवान कहकर पूजते है उसे नशीली चीजी खाने को देते है , ये कौन सी अक्लमन्दी का काम है | अगर नशीली चीजे भगवान को चढ़ाना धर्म है तो फिर अधर्म किसे कहा जाय ????
रेडियोएक्टिव रियेक्टर की सच्चाई पोपजी और उनके चमचो ध्यान से पढ़ना :—
१. मै आपको यह बता दूँ रेडियोएक्टिव रियेक्टर को ठंडा करने के लिए हार्ड वाटर ( D2O ) का प्रयोग होता है न की साधारण जल, दुग्ध, भांगव धतूरे के पत्तो और फलो का | अगर भांग और धतूरे से रेडियोएक्टिव तत्व शांत रह सकते है तो फिर विकरण प्रयोग मे गोधन का प्रयोग क्यो होता है ???? अगर इन भाग और धतूरो से रेडियोएक्टिव तत्व शांत हो सकते है तो भाभा परमाणु केन्द्र से लेकर सभी अनुशंधान केन्द्रो मे रियेक्टर को ठंडा करने हेतू सरकार करोड़ो रूपये क्यो खर्च कर रही है ???
२. जब शिवलिंग मे रेडियोएक्टिव ऊर्जा है तो भारत सरकार को सबकुछ छोड़ शिवलिंग से ही पूरे भारत को ऊर्जा देना चाहीए जिससे कोई भी भारतवासी अंधेरे मे न रहे और विज्ञान की सुविधाओ का उपयोग कर सके | इसमे तो सरकार का कुछ खर्च भी नही है प्रत्येक व्यक्ति अपने घर मे ही शिवालय बना लेगा | इससे सरकार को करोड़ो का फायदा होगा क्योकी विदेशो से यूरेनियम आदी को लाने मे जो खर्च है वह बंद हो जायेगा क्योकी ऊर्जा पूर्ति शिवलिंग से ही हो जायेगा | तब बिजली बनाने के लिए पवन चक्की, बाँध, परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदी के लिए सरकार को करोड़ो रूपये खर्च नही करना पड़ेगा हर हिन्दू अपने घर मे शिवलिंग बना ले उसी से ऊर्जी मिलती रहेगी |

३. जब शिवलिंग मे रेडियोएक्टिव ऊर्जा है तो सरकार बेकार मे ही भारतीय वैज्ञानिको को पीछे करोड़ो रूपये का खर्च कर रही है शिवलिंग से ही परमाणु बम , अणु बम , क्रुज मिसाईलस जैसे हथियार बन सकते है तो सरकार करोड़ो का व्यय क्यो कर रही है ??

४. अगर सच मे शिवलिंग मे रेडियोएक्टिव तत्व है तो सरकार को सबसे पहले प्रत्येक शिवालय पर विकरण रोधी यंत्रो को लगाना चाहीए और जब तक सम्पूर्ण देश मे यह यंत्र न लग जाय तब तक शिवालय के आस पास भी किसी को भटकने न दिया जाय नही तो उक्त व्यक्ति को कैसर, नपुशंकता , बंध्यता , क्षय रोग ( टीवी ) आदी आदी जैसे गम्भीर रोगो का शिकार होना पढ़ सकता है और केवल वह व्यक्ति ही नही बल्कि उसकी आगे आने वाली पिढ़ी विक्लांग ( लूला , लंगड़ा , बहरा , अपंग ) ही होती रहेगी | और अगर कोई हिन्दू शिव मन्दिर जाने के बाद भी किसी भी बिमारी का शिकार हो रहा है तो इसके जिम्मेदार शिवलिंग है अतः सरकार को तुरन्त सभी शिव मन्दिरो पर प्रतिबंध लगा देना चाहीए ताकी कोई भी हिन्दू को नुकसान न पहुचे |

५. ये हिन्दु कहते है शिवलिंग पर चढ़ाया जल नदी के साथ मिलकर औषधी बन जाता है तो पोपजी फिर डॉक्टर को पाँच सौ रूपये का शुल्क देकर हजार रूपये का दवा क्यो क्यो करते हो नदी का पानी ही पीकर अपना इलाज क्यो नही कर लेते हो ???
६. जब शिव नराज हो जायेगे तो प्रलय आ जायेगा अरे पोपजी जब सोमनाथ का मंदिर सत्रह बार लूटा गया मुहम्ममद गोरी द्वारा तो तब शिव ने प्रलय क्यो नही किया ??? क्या गोरी कोई रिश्तेदार था ??

देखो भाईयो पोपजी के ऐसे ही बातो के कारण लाखो भारतीय मारे गये , करोड़ो बेटी बहनो का जीवन बर्बाद हुआ , करोड़ो भारतीय या तो मुस्लिम या ईसाई बन गये लेकिन महादेव ने अपना प्रकोप नही दिखाया और आज के देश की हालत आप देख ही रहे हो जहाँ आजम खान, बुखारी, सईद, अवौसी , जाकिर नाईक जैसे लोग रोजाना जिहाद करने और देश के ईस्लामीकरण को बखूबी अजाम दे रहे है तो वही ईसाईयत संस्थाए धन और स्वर्ग का लाललच देकर ईसाईकरण | आज हमारे देश का दक्षिणी भाग ( आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक , गोवा तिमलनाड्डु ) और बिहार उ० प्र, प० बंगाल जैसे राज्यो का ईस्लामी करण और ईसाईकरण लगभग हो चुका है |
लेकिन
हमारे पोपजी के महादेव ने न ही अपनी त्रिनेत्र खोला और नही प्रलय किया और न ही कल्कि अवतार हुआ |

अगर किसी पौराणिक स्वर्ग के दलाल और धर्म के ठेकेदार को बात बुरी लगी हो तो माफ करना लेकिन एक भी तर्क को मिथ्या और गलत साबित कर दिखाये |


उठो जागो मेरे देश को आर्यो असत्य और पाखंड का त्याग कर सत्य को धारण करो क्योकी आप मनुष्य हो आपके अन्दर बुद्धि विवेक और सोचने समझने की शक्ति है और तब तक न रूके जबतक पाखंड , अंधविश्वास और अधर्मियो का नाश न हो जाये |
एक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती अकेले थे तो इतना बदलाव कर गये आज तो उनके अनेके सिपाही है और मै उन्ही सिपाहीयो मे से एक हूँ | अकेला जरूर हूँ परन्तु सत्य मेरा साथी है और महर्षि स्वामी दयानन्द मेरे आर्दश |
सभी आर्यो कहलाने वाले से यह निवेदन है इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर हिन्दू समाज को गडढ़े मे गिरने से बचाए |
एक वैदिक धर्मी

अगले लेख मे प्रमाण दूगाँ क्यो, कैसे और किसने कहने से शिवलिंग का पूजन शुरू हुआ |
धन्यवाद / Thank You
02/08/2016


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*एक जिज्ञासु ने हमसे पूछा कि यदि लोग आर्य समाज की बातो पर चलने लगे तो क्या होगा, * *उस सवाल का जवाब...

*एक जिज्ञासु ने हमसे पूछा कि यदि लोग आर्य समाज की बातो पर चलने लगे तो क्या होगा, *

*उस सवाल का जवाब *

1= यदि लोग आर्य समाज की बातो को अपना ले, तो जिस राम राज्य की लोग कल्पना करते है वह आ जाएगा,
2= लोग घर-घर मे हवन करने लगेंगे और पत्थर पूजा का ढोंग समाप्त हो जाएगा,
3= गाय की हत्या करने वाले को फांसी होगी क्योंकि वेद मे इसका आदेश है,
4= लोग ईश्वर का सच्चा स्वरुप समझ जाएंगे, कि वह आत्मा के अंदर है, जो हर बुरे काम से टोक कर हमे बचाता है
और अच्छे काम की प्रेरणा देता, है , क्या किसी ने पत्थर से एसी आवाज आना सुनी कभी ? नही ना
5= केवल एक धार्मिक ग्रन्थ होगा, वेद,
6= केवल एक ईश्वर की उपासना होगी, जिसका नाम ओंकार ( ओ३म ) है
7= भूत-प्रेत, शंका कुशंका, भाग्य रेखा लॉटरी, इनका कारोबार बंद हो जाएगा,
8=कोई भी खुलेआम देश द्रोह, सेना पर हमला आतंकवाद आदि नही फैला पाएगा, क्योकि, मानवता के हत्यारे के लिए वेद मे आदेश है कि उसे दूसरे दिन का सूर्य भी मत देखने दो ,अर्थात आज ही मार डालो,
8= मांसाहार, व्याभिचार, आदि पाप समाप्त हो जाएगे, क्योकि, वेदो मे इनके लिए कठोर दंड है
9= सारे देश मे एक भाषा एक शिक्षा होगी, इससे हर राज्य का आपस का तनाव दूर होगा,
10= और आजकल शिक्षा, जो कि मनुष्य को बैल बनाने के लिए दी जाती, है,
यह सही अर्थो मे दी जाएगी, अर्थात जैसी जिसकी रूचि है उसी आधार पर, जो विद्वान है,
वह पंडित, उसे वेदो के प्रचार-प्रसार का और लोगो की समस्या दूर करने मे मदद का काम ,जो बल मे मजबूत उसे देश समाज की रक्षा सेना आदि का काम
और जो, व्यापार पशुपालन खेती आदि मे निपुण है, उसे, वेश्य, का काम, और जो ज्यादा कुछ समझ नही पाता, अधिक शिक्षा देने पर भी जिसकी बुद्धि का विकास नही हो पाता उसे, इन तीनो, अर्थात, ब्राह्मण छत्री, वैश्य, आदि जिससे पास भी अच्छा लगे उसके यहा सेवा काम अर्थात, शूद्र का काम
यह चार वर्ण, ही रहेंगे केवल

अर्थात देश से सारे जातिवाद का सफाया हो जाएगा,

वैसे तो वेदो पर चलने के और भी बहुत सारे लाभ होंगे, लेकिन अभी केवल यह दस लाभ ही गिनाये है,

ओ३म


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*सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ समुल्लास* भाग १५ *_अब विद्यार्थियों के लक्षण— _* *आलस्यं मदमोहौ च चापल्यं...

*सत्यार्थ प्रकाश चतुर्थ समुल्लास*
भाग १५

*_अब विद्यार्थियों के लक्षण— _*

*आलस्यं मदमोहौ च चापल्यं गोष्ठिरेव च। *
*स्तब्धता चाभिमानित्वं तथाऽत्यागित्वमेव च। *
*एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥1॥ *

*सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्। *
*सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्॥2॥ *

—ये भी विदुरप्रजागर के श्लोक हैं। 

(आलस्य) शरीर और बुद्धि में जड़ता, नशा, मोह=किसी वस्तु में फंसावट, चपलता और इधर-उधर की व्यर्थ कथा करना सुनना, पढ़ते पढ़ाते रुक जाना, अभिमानी, अत्यागी होना ये सात दोष विद्यार्थियों में होते हैं॥1॥

जो ऐसे होते हैं उन को विद्या कभी नहीं आती। सुख भोगने की इच्छा करने वाले को विद्या कहां? और विद्या पढ़ने वाले को सुख कहां? क्योंकि विषयसुखार्थी विद्या को और विद्यार्थी विषयसुख को छोड़ दे॥2॥ 

ऐसे किये विना विद्या कभी नहीं हो सकती। और ऐसे को विद्या होती है— 

*सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम्। *
*ब्रह्मचर्यं दहेद् राजन् सर्वपापान्युपासितम्॥1॥ *

जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिन का वीर्य अधःस्खलित कभी न हो उन्हीं का ब्रह्मचर्य सच्चा और वे ही विद्वान् होते हैं॥1॥

इसलिये शुभ लक्षणयुक्त अध्यापक और विद्यार्थियों को होना चाहिये। 

*अध्यापक लोग ऐसा यत्न किया करें जिस से विद्यार्थी लोग सत्यवादी, सत्यमानी, सत्यकारी सभ्यता, जितेन्द्रिय, सुशीलतादि शुभगुणयुक्त शरीर और आत्मा का पूर्ण बल बढ़ा के समग्र वेदादि शास्त्रों में विद्वान् हों।*

सदा उन की कुचेष्टा छुड़ाने में और विद्या पढ़ाने में चेष्टा किया करें और विद्यार्थी लोग सदा जितेन्द्रिय, शान्त, पढ़ानेहारों में प्रेम, विचारशील, परिश्रमी होकर ऐसा पुरुषार्थ करें जिस से पूर्ण विद्या, पूर्ण आयु, परिपूर्ण धर्म और पुरुषार्थ करना आ जाय इत्यादि *ब्राह्मण* वर्णों के काम हैं।

क्षत्रियों का कर्म राजधर्म में कहेंगे। 

*जो वैश्य हों वे ब्रह्मचर्यादि से वेदादि विद्या पढ़ विवाह करने नाना देशों की भाषा, नाना प्रकार के व्यापार की रीति, उन के भाव जानना, बेचना, खरीदना द्वीपद्वीपान्तर में जाना आना, लाभार्थ काम को आरम्भ करना, पशुपालन और खेती की उन्नति चतुराई से करनी करानी, धन को बढ़ाना, विद्या और धर्म की उन्नति में व्यय करना, सत्यवादी निष्कपटी होकर सत्यता से सब व्यापार करना, सब वस्तुओं की रक्षा ऐसी करनी जिस से कोई नष्ट न होने पावे। *

शूद्र सब सेवाओं में चतुर, पाकविद्या में निपुण, अतिप्रेम से द्विजों की सेवा और उन्हीं से अपनी उपजीविका करे और द्विज लोग इसके खान, पान, वस्त्र, स्थान, विवाहादि में जो कुछ व्यय हो सब कुछ देवें अथवा मासिक कर देवें। 

चारों वर्ण परस्पर प्रीति, उपकार, सज्जनता, सुख, दुःख, हानि, लाभ में ऐकमत्य रहकर राज्य और प्रजा की उन्नति में तन, मन, धन का व्यय करते रहें। स्त्री और पुरुष का वियोग कभी न होना चाहिए। क्योंकि— 

*पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्। *
*स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसन्दूषणानि षट्॥मनु॰॥ *

_मद्य, भांग आदि मादक द्रव्यों का पीना, दुष्ट पुरुषों का सङ्ग, पतिवियोग, अकेली जहां तहां व्यर्थ पाखण्डी आदि के दर्शन मिस से फिरती रहना और पराये घर में जाके शयन करना वा वास ये छः स्त्री को दूषित करने वाले दुर्गुण हैं और ये पुरुषों के भी हैं।_

पति और स्त्री का वियोग दो प्रकार का होता है—
कहीं कार्यार्थ देशान्तर में जाना और दूसरा मृत्यु से वियोग होना इन में से प्रथम का उपाय यही है कि दूर देश में यात्रार्थ जावे तो स्त्री को भी साथ रक्खे। इस का प्रयोजन यह है कि बहुत समय तक वियोग न रहना चाहिये। 

*क्रमश :*


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*सत्य सनातन वैदिक धर्म* की कसौटी पर *अभिनेता इरफान खान* का बयान कितना विवादित ??? विवादित इरफान या...

*सत्य सनातन वैदिक धर्म* की कसौटी पर *अभिनेता इरफान खान* का बयान कितना विवादित ??? विवादित इरफान या इस्लाम ???

नमस्ते मित्रों !
आज हम अभिनेता इरफान खान के उस बयान को जिसे तथाकथित दीन अर्थात् इस्लाम के पाखण्डी गुरूओं ने विवादस्पद घोषित कर दिया | उस बयान को वैदिक धर्म की कसौटी पर रख कर समीक्षा करेगें और अन्त में ये बताएगें कि *विवादित इरफान है या इस्लाम |*

मित्रों इस्लामी धर्मगुरू इस्लाम को दीन अर्थात् धर्म मानते है न कि कोई पंथ या सम्प्रदाय | उनके अनुसार रोजा रखना, नमाज पढ़ना और जानवरों की बलि अर्थात् कुर्बानी देना आदि आदि कर्मो को ही वो लोग धर्म मानते हैं |

जबकि वेदानुकूल आर्ष ग्रन्थों में धर्म की बहुत उच्च परिभाषा है | महर्षि दयानन्द सरस्वती जी [सत्यार्थ प्रकाश के समु० १० में (मनुस्मृति २/१)] लिखते हैं…

“जिसका सेवन राग-द्वेष रहित विद्वान् लोग नित्य करें, *जिसको ‘हृदय’ अर्थात् आत्मा से सत्य कर्त्तव्य जानें, वही धर्म* माननीय और करणीय समझें ||

यहाँ एक बात विशेष महत्त्व रखती है और वो है..

*"जिसको 'हृदय’ अर्थात् आत्मा से सत्य कर्त्तव्य जानें, वही धर्म ||*

ऋषि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में लिखते है कि…

*"मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जानने वाला है |”*

मित्रों इस बात को दुनियाँ में कोई नहीं नकार सकता कि जब भी व्यक्ति कोई गलत कार्य करता है तो ईश्वर की ओर से उसकी आत्मा को संकेत मिलता है कि ये कार्य गलत है और शास्त्र कहते हैं जिसको आत्मा सत्य कर्त्तव्य जाने उसे करना ही धर्म है |

अब मित्रों आप ही बताए कि यदि पशु बलि देने पर यदि अभिनेता इरफान खान की आत्मा इसे सही नहीं मानती और इस बात को यदि उन्होने मिडिया के सामने रखा तो ये तो धर्म ही कहलायेगा क्योकि आत्मा के अनुकूल सत् कर्त्तव्यों का आचरण ही धर्म है | और उन्होने इस बात को स्पष्ट कहा है कि…

*“कुर्बानी का मतलब अपनी कोई अजीज चीज़ कुर्बान करना होता है | ये नहीं की बाजार से आप दो बकरे खरीद लाए और कुर्बान कर दिये | आपका उन बकरों से कोई लेना देना नहीं है तो वो कुर्बानी कहा से हुई |”*

दूसरा वैदिक धर्म का अटल सिध्दान्त है कि जो जैसा कर्म करेगा उसे उसका वैसा ही फल मिलेगा अर्थात् अच्छा फल हो या बुरा उसे स्वयं ही भुगतना होगा | इरफान खान भी तो इसी बात को ही कहते है कि…

*“हर आदमी अपने दिल से पूछे कि किसी और की जान लेने से उसको कैसे पुण्य मिल जायेगा |”*

अर्थात् व्यक्ति को पुण्य या पाप उसके अपने कर्म का मिलेगा | बलि बकरे की दी और पुण्य तुम्हे मिले ये सोचना कैसी मुर्खता है भाई |

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी [सत्यार्थ प्रकाश समु० १० (मनुस्मृति २/१२)] लिखते है कि…

“वेद, स्मृति, सत्पुरूषों का आचार और *अपने आत्मा के ज्ञान से अविरूध्द प्रियाचरण,* ये चार धर्म के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्म लक्षित होता है |”

अतः मित्रों इरफान भाई ने अपने आत्मा के अनुकूल ही आचरण किया है जो धर्म है और हम हम उनके इस बयान की प्रशंसा करते है |

अब इरफान के बयान को विवादस्पद बताने वाले इस्लाम को कुरआन की कुछ आयतो से जान ले की वो कितना पाक है |

क़ुरआन सूरा २ अल बक़रा आयत ५८ में अल्ला अपने नाम से लूट की खुली छूट देता है…

*“फिर याद करो जब हमने कहा था कि "यह बस्ती इसमें प्रवेश करो, इसका पैदावार, जिस प्रकार चाहो, मज़े से खाओ, मगर बस्ती के दरवाजे में सजदा करते हुए प्रवेश करना और कहते जाना "हित्ततुन हित्ततुन” हम तुम्हारी खताओं को माफ़ करेंगे और सुकर्मियों पर और अधिक अनुग्रह करेंगे ||“*

मौलाना मुहम्मद फारूक खाँ जी 'हित्ततुन’ शब्द के दो अर्थ बताते है पहला अल्ला से अपनी खताओं की माफ़ी मागँते हुए जाना दूसरा लूट मार और क़त्लेआम के बदले बस्ती को निवासियों से माँफी माँगते हुए जाना |

क़ुरआन सूरा ४ अन निसा आयत अंश २४ में अल्ला युध्द में हाथ आयी औरतो को मुसलमानों के लिए हलाल बताता है…

*"और वे औरतें भी तुम्हारे लिए हराम हैं जो किसी दूसरे के निकाह में हों अलबत्ता ऐसी औरतों की बात और है जो (युध्द में) तुम्हारे हाथ आएँ ||*

क़ुरआन सूरा ४ अन निसा आयत १४४ में अल्ला मुसलमानों को अन्य लोगो से मित्रता के खिलाफ बताता है…

*"ऐ ईमानवालो ! मुसलमानों को छोड़ काफिरों को मित्र मत बनाओ | क्या तुम अल्ला के प्रति खुला अपराध अपने ऊपर लेना चाहते हो ||*

क़ुरआन सूरा ९ अत तौबा आयत १२३ में अल्ला इस्लाम को न मानने वालो से मुसलमानों को लड़ने की आज्ञा देता है…

*"ऐ लोगो ! जो ईमान लाये हो, अपने आस पास के काफ़िरों ले लड़े जाना और चाहिए कि वह तुमसे सख्ती महसूस करें ||”*

मित्रों यदि आपने इस लेख को आदि से अन्त तक पढ़ लिया है तो आप सहज़ ही निर्णय लगा सकते है; अभिनेता इरफान खान का बयान विवादस्पद है या उनके बयान को विवादस्पद बताने वाले मुस्लिम गुरूओं का इस्लाम और उनकी आसमानी किताब जो धन और औरतो की लूट पाट, कत्ल झगड़े आदि की खुली छूट देती है |

क़ुरआन मुसलमानों को अन्य से मित्रता करने से रोकता है जबकि वेद सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखने को कहता है यही फर्क है तथाकथित दीन इस्लाम में और सत्य सनातन वैदिक धर्म में |

आओ पाखण्डी पंथों को छोड़े और पुनः वेदों का ओर लोट चले |

इति ओ३म् …!

नोट–
अपना कोई भी प्रश्न या आक्षेप केवल fb page पर ही करे | वही जवाब दिया जाएगा |

पाखण्ड खण्डण… वैदिक मण्डण… रिटर्न…
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अभी कुछ दिन पहले मैं छुट्टी पर अपने घर ग्वालियर गया हुआ था, शाम को मैं और पिताजी “ज़ी...

अभी कुछ दिन पहले मैं छुट्टी पर अपने घर ग्वालियर गया हुआ था, शाम को मैं और पिताजी “ज़ी न्यूज़” पर सुधीर चौधरी वाला “DNA” देख रहे थे जिसमें बुरहान वानी और इस्लामिक आतंकवाद का मुद्दा चल रहा था।
अचानक पिताजी ने मुझसे पूछा “ अशोक मुसलमानों की क्या आइडियोलॉजी है कभी तुमने इस पर गौर किया है”

मैं थोड़ा संशय में पड़ गया आज पिताजी ने ये कौन सा अज़ीब प्रश्न कर दिया, मैं कुछ ज़वाब देता उससे पहले ही पिताजी ने मुझसे कहा तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।

“ एक गाँव में एक संपन्न परिवार रहता था, उनके पास खेती बाड़ी और पशुओं की कोई कमी नही थी, परिवार में दो बेटे थे जो शादीशुदा और संपन्न थे लेकिन एक बेटा बेईमान था वो हमेशा किसी न किसी बात पर अपने माता पिता और भाई से झगड़ा करता रहता था, उसकी रोज़ की कलह कलेश को देखकर मातापिता ने सारी संपत्ति दो भागों में बाँट दी, वो कलेशि लड़का अपनी सारी सम्पति लेकर दूसरे गाँव में वस गया।
लेकिन उस बेईमान लड़के के भी एक लड़का और लड़की थी जो विभाजन के समय ये कहकर की "वो दादा और दादी को छोड़कर कहीं नही जाएंगे वो दादा दादी को बहुत प्रेम करते हैं, वो हमेशा दादा दादी के साथ ही रहेंगें”
और वो दोनों दादा दादी के साथ रुक गये।
बूढे दादा दादी उन्हें बहुत प्यार करते थे, अब दादा दादी ने उन बच्चों का अच्छे स्कूल में दाखिला कराया, उन्हें अच्छी अच्छी व्यवस्था देने लगे। शुरुआती दिनों में उन बच्चों ने दादा दादी से कहा की वे कभी उन माता पिता के पास नही जाएँगे, दादा दादी में बच्चों को समझाया की तुम हर महीने अपने माता पिता से मिल सकते हो।
अब बच्चे हर महीने अपने माता पिता के पास जाते थे और दादा दादी के ख़र्चे से मौज उड़ाते थे। इस तरह उनका समय बीतता गया।

कुछ वर्षों बाद जब बच्चे बड़े हो गये, अब दादा दादी ने अपना हिस्सा बेचकर लड़के के लिए एक अच्छा व्यवसाय खुलवाया और लड़की के लिए एक अच्छा परिवार देखकर शादी कर दी, जिसमें दादा दादी ने अपनी सम्पति का चौथाई हिस्सा दहेज़ में दे दिया।

अब लड़के ने अपने व्यवसाय में घाटा दिखाकर उस व्यवसाय को बचाने के बहाने दादा दादी से और रुपये ऐंठा, फिर लड़की ने भी अपने पति के लिए व्यवसाय खुलवाने के लिए दादा दादी से एक अच्छी रक़म उधार ली, इस तरह ये मंझारा चलता रहा और दादा दादी हमेशा इस भृम में रहे की उनके नाती नातिनि उन्हें बहुत प्यार करते हैं।

लेकिन दादा दादी का दूसरा लड़का जो ये मंशा समझ रहा था ने उन बुड्ढों को समझाने की बहुत कोशिस की जिसके चलते परिवार में बहुत झगड़ा हुआ, फिर उन लड़के लड़की ने सारे गाँव में ये हल्ला मचा दिया की दादा दादी और उसके चाचा जी उन पर बहुत अत्याचार कर रहे हैं, फिर उन बच्चों ने गाँव में शोर कर दिया की इन दादा दादी के कहने पर वे अपने माता पिता के साथ नही गये और आज ये सभी हम पर अत्याचार कर रहें हैं, फिर उन बच्चों ने “पटवारी” को कुछ लालच देकर अपने पक्ष में खड़ा कर लिया और गाँव में घोषणा कर दी की वे दादा दादी की सम्पति के जायज़ हक़दार हैं और वे अपना हिस्सा लेकर दादा दादी से अलग होना चाहते हैं।
अब गाँव के कुछ लालची उनके पक्ष में खड़े हो गये और इस तरह उन बच्चों ने दादा दादी को कंगाल कर दिया और उन बूढे दादा दादी को सारे गाँव की नज़रों में अत्याचारी, बेईमान, धोखेबाज़ की पदवी दिला दी।
और फिर वो बच्चे अपने माँ बाप के साथ मिल गये।

अब दिनों बाद कहानी में ट्विस्ट आया जब दादा दादी को पता चला की “ये सारा खेल प्रीप्लान था, जिसे उनके ही उस कलेशि लड़के ने रचा था और जान बूझकर अपने बच्चों को वहाँ छोड़कर गया जिससे वो उनकी सारी सम्पति को हड़प सके”

अब मेरे पिताजी ने मुझसे कहा की “अशोक अब मुसलमानों की स्तिथि देखो, उन्होंने भारत जैसे सम्पन्न परिवार को जान बूझकर धर्म के आधार पर विभाजित करवाया और अपना हिस्सा लिया।
अब उन्होंने अपने प्लान के थ्रू कुछ मुसलमानों को भारत में ही रहने की हिदायत दी, अब उन मुसलमानों ने भी भारत के हिन्दुओँ को भरोषा दिया की वो भारत से बहुत प्यार करते हैं (ठीक वैसे ही जैसे वो बच्चे उन बूढ़े दादा दादी से करते थे)
और वो अपने मरते दम तक भारत में ही रहेंगें”

फिर कुछ सालों बाद उन मुसलमानों ने पाकिस्तान के अपने रिश्तेदारों ( माता पिता) से मिलना शुरू कर दिया, लेकिन मासूम भारत के हिन्दू यही समझते रहे की वो मुसलमान उन्हें बहुत प्यार करते हैं, इसलिये वो मुस्लिम भारत छोड़कर नही गये।
इस वात्सल्य में हिन्दुओँ ने अपनी जमीं पर उनके लिए मस्जिदें बनवायीं और उन्हें सिर आँखों पर रखा।
फिर उन मुसलमानों ने अपना रँग दिखाना शुरू किया और बेईमानी पर उतर आये और उन्होंने भारत के कई हिस्सों पर अपनी आबादी के आधार पर कब्ज़ा जमा लिया, जिसमें उस “पटवारी” जैसे वामपंथियों ने भारत में ये घोषणा कर दी की हिन्दू बहुत दमनकारी और अत्याचारी हैं, इन हिन्दुओँ ने मासूम मुसलमानों पर अत्याचार किया है और उनका हिस्सा नही दे रहे।

फिर पिताजी ने कहा की “ अशोक तुम्हें क्या लगता है, की उन दादा दादी ( हिन्दुओँ ) को आज वेवकूफ़ बनाया जा रहा है, एक्चुअल में उन दादा दादी (हिन्दुओँ )का वेवकूफ़ बनने का इतिहास बहुत पुराना है, पहले मुसलमानों ने हिन्दुओँ को तलवार के बल पर इस्लाम क़बूल कराया और जब इससे बात ना बनी तो उन्होंने हिन्दुओँ को वेवकूफ़ बनाने का एक और तरीका ईजाद कर लिया, वो था "सूफ़ी संत” जिसमें हिन्दुओँ को ढोंगी प्रेम के नाम पर इस्लाम और अल्लाह की महत्ता दिखाने लगे, उनके हर सूफ़ी गाने में सिर्फ़ इस्लाम के प्रतीकों जैसे “ अल्लाह, ख़ुदा, मौला, रसूल, सजदा जैसे शब्द ही आते थे जिसको उन मासूम दादा दादी जैसे हिन्दुओँ ने पुरजोर से अपनाया।

फिर पिताजी ने मुझसे कहा की ” अशोक भारत एक मात्र हिन्दू राष्ट्र है, लेकिन दुःख की बात है यहाँ हिन्दुओँ को आज भी मुसलमानों की मानसिकता समझ नही आयी, तुम्हें क्या लगता है अगर कश्मीर इन्हें दे दिया जाए तो समस्या ख़त्म हो जायेगी! बिल्कुल नही ख़त्म होगी, आज ये कश्मीर की माँग कर रहे हैं आने वाले कल को ये हैदराबाद माँगेगे फिर केरल फिर असम फिर पश्चिम बंगाल और इस तरह ये धीरे धीरे पुरे भारत पर कब्ज़ा करना चाहेँगे।

क्या तुम जानते हो मुसलमान हमेशा अपने प्री प्लान के थ्रू काम करते हैं, जब उन्हें किसी देश पर कब्ज़ा करना होता है तो वो हमेशा अपने आप को दो ग्रुप में डिवाइड कर लेते हैं जिसमें एक कट्टर होता है जो आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता है और दूसरा तुमसे झूठें प्रेम का ढोंग दिखाता है जो तुम्हें हमेशा ये विश्वास दिलाता है की आतंकवादी इस्लामी नही होते, उन्हें धर्म के आधार पर नही देखना चाहिए और तुम मासूम हिन्दू उनकी बात मान लेते हो, ये रक़म खर्च करके हिन्दुओँ के कुछ ग़द्दारों जैसे वामपंथी और पत्रकारों को अपनी तरफ़ मिला लेते हैं फिर वो ग़द्दार देश में हर तरह ये माहौल बना देते हैं की मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है। और धीरे धीरे तुम सभी हिन्दू अपनी सम्पति जैसे कश्मीर, बंगाल, असम, केरल, यूपी, बिहार, जैसे कई राज्यों से उन दादा दादी की तरह बेदखल कर दिए जाते हो, लेकिन वो दूसरा शाँति और प्रेम का ढोँग दिखाने वाला समुदाय तुम्हें कभी महशुस ही नही होने देता की तुम्हारे घर से बेदख़ल किया जा रहा है और तुम आँख बन्द करके मान भी लेते हो"

और सुनों जब वो तुम्हारे राज्य या देश पर कब्ज़ा कर लेते हैं तो फिर वो दोनों ( आतंकवादी कट्टर और शाँति का ढोँग करने वाले) उस राज्य या देश को आपस में बराबर बाँट लेते हैं ठीक उस कलेशि बाप और उनके बच्चों की तरह"……

अब पिताजी ने अपनी बात पर विराम दिया और
मैं आज अपने पिताजी की बात सुनकर स्तब्ध रह गया, कितनी बढ़ी बात उन्होंने कितने आसान शब्दों में समझा दी।

नोट :- पोस्ट को शेयर करें या कॉपी कट पेस्ट करके अपनी वाल पर लगायें , लेकिन इस तार्किक ज्ञान को ज़्यादा लोगों तक पहुँचाये।

धन्यवाद

आपका
Ashok Sharma


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नमस्ते मित्रो, प्रश्न - क्या ईश्वर पाप कर्म को क्षमा कर देता है उत्तर - ईश्वर कभी किसी मनुष्य के...

नमस्ते मित्रो,
प्रश्न - क्या ईश्वर पाप कर्म को क्षमा कर देता है
उत्तर - ईश्वर कभी किसी मनुष्य के किए हुए पाप कर्म को क्षमा नहीं करता । मनुष्य जो पाप कर्म करता है उसका फल उसे दुख रूप में अवश्य ही भोगना पडता है जो मनुष्य यह सोचता है कि उसके द्वारा किए जा रहे पाप कर्म को कोई देख नहीं रहा है यह उस मनुष्य की सबसे बडी अज्ञानता है मुर्खता है क्योंकि ईश्वर कण कण में विद्धमान है और स्वंय उस पाप कर्म को करने वाले मनुष्य के अंदर बैठा हुआ,मनुष्य द्वारा मन,वचन और इन्द्रियों के द्वारा किए जा रहे पाप व पुण्य कर्म को देख रहा है जो मनुष्य पाप कर्म कर देता है परंतु बाद में उसका पश्चाताप करता है और आगे से पाप कर्म नहीं करने की प्रतिज्ञा करता है प्रति दिन ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करता है ईश्वर उस मनुष्य की आत्मा के बल को इतना बढा देता है कि जब दुख उसके जीवन में आता है तो वह दुख से घबराता नहीं है योगीराज श्री कृष्ण जी महाराज ने गीता के अन्दर कहा है"अवश्यमेव हि भोक्तव्यं कृतं कर्मः शुभाशुभम्" मनुष्य जो भी शुभ और अशुभ कार्य करता है उनका फल उसे सुख व दुख रूप में अवश्य ही भोगना पडता है इसलिए जो भी कोई गुरू या व्यक्ति आपसे कहे कि वह ईश्वर से आपके पाप कर्म को क्षमा करा देगा अथवा फलां मंदिर या तीर्थ स्थान पर जाने ,दान देने या स्थान करने से आपका पाप कर्म ईश्वर क्षमा कर देगा , यह समझिए वह ठग है और आपको धोखा दे रहा है क्योंकि ईश्वर अपनी न्याय व्यवस्था में किसी की सहायता नहीं लेता और ना ही किसी की सिफारिशें मानता है ओ३म


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ओ३म् भारत इकलौता देश है जहाँ के लोग सेना पर पत्थर मारते है और जज तय तरते है सेना किस बन्दूक का...

ओ३म्

भारत इकलौता देश है जहाँ के लोग सेना पर पत्थर मारते है और जज तय तरते है सेना किस बन्दूक का प्रयोग करेगी और नेता पत्थर मारने वालो को उपचार की बात करते पर घायल सैनिको के बारे मे ठन ठन गोपाल !

पाक मे भी नवाज शरीफ के विरोध मे नीरे लग रहे है लेकिन है किसी की हिम्मत तो पाक सेना पर पत्थर मार दे ?
काले कोट वालो की ऐसी की तैसी बढ़िया ac कार मै बैठकर आदेश दे रहे है की सेना काश्मीर मे पेलेट गन का प्रयोग न करे |
जज साहब केवल एक रात काश्मीर मे सेना के जवान के साथ चौकसी पर गुजारो , अपने आप पता लग जाएगा सेना किस बन्दूक का प्रयोग करे ! चौकसी क्या खाक करोगे इतनी हिम्मत नही की घर से अदालत या बजार बिना पुलिस सुरक्षा के चले जाओ |
मै तो कहता हूँ सेना पेलेट गन का प्रयोग न करे सीधा INSAS का करे | कारण न रहे बाँस न बजे बाँसुरी , घायल होगे तो मानवाधिकार , मानवता की बात होगी , सेक्यूलर मुल्ले भी अपनी उदारता दिखाएगे , इसलिए INSAS से सीधा अल्लाह के जन्नत मे भेज दो हुर्रो के पास |

भाजपा यानी हिन्दूओ की पार्टी और उसके नेता कह रहे है घायलो को हवाई मार्ग से दिल्ली मे इलाज कराया जाएगा |
अरे नेता जी एकबार हेलमेट और हाथ मे डंडा लेकर पत्थरमारो को भगाना हमारी सेना के साथ मिलकर और फिर बताना किसका ईलाज कराना जरूरी है ??
नेता जी पतलून गीली और पीली हो जाएगी |

इसलिए बेहतर है चुपचाप रहो और सेना को अपना काम करने दो |
भारतीय सेना को कोटी कोटी नमन्
भारतीय सशस्त्र सेना की जय !!

धन्यवाद / Thank You
30/07/2016


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*भिखारी पैदा करता है इस्लाम ?*   भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमान 14.23 प्रतिशत हैं लेकिन देश के...

*भिखारी पैदा करता है इस्लाम ?*
 

भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमान 14.23 प्रतिशत हैं लेकिन देश के भिखारियों की कुल आबादी में उनकी संख्या 25 प्रतिशत है। याने लगभग दुगुनी है। देश में भिखारियों की संख्या 3 लाख 70 हजार है। उसमें मुसलमान भिखारी 92,760 हैं। हिंदू भिखारियों की संख्या 2 लाख 68 हजार है। ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन लोगों में भी भिखारी है लेकिन उनकी संख्या कुछ हजार या कुछ सौ तक ही सीमित है। 

मुसलमानों में ही भिखारी इतने ज्यादा क्यों है? इसका मुख्य कारण उनकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि है। वे लोग मुसलमान बनने के पहले क्या थे? हजार या पांच सौ साल पहले जब वे हिंदू थे, तब भी वे प्रायः गरीब थे, ग्रामीण थे, मेहनतकश थे, मजदूर थे। वे मुश्किल से गुजर-बसर करते थे। मुसलमान बनने पर भी उनकी हालत वही रही बल्कि बदतर हो गई। इस्लाम भारत में आया जरुर लेकिन वह भी जातिवाद का शिकार हो गया। मेहनतकश लोगों की जैसे हिंदुओं में कोई इज्जत और लजजत नहीं है, वैसे ही मुसलमानों में भी नहीं है। जो मुसलमान संपन्न हैं, सुशिक्षित हैं और शक्तिशाली हैं, उनका अलग वर्ग बन गया है। वे इन विपन्न, अशिक्षित और कमजोर मुसलमानों से रोटी-बेटी का रिश्ता रखने में काफी झिझकते हैं। यह वर्ग-भेद अब मुस्लिम देशों में भी फैलता जा रहा है। आर्थिक और सामाजिक सच्चाइयां मजहबी आदर्शों पर भारी पड़ रही हैं। 
From -
Ved Pratap Vaidik

www.vpvaidik.com


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Wednesday, August 3, 2016

मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा-बडा ही बहकावा :- किसी मूर्ति की पूजा तब तक नहीं की जाती जब तक उसमें...

मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा-बडा ही बहकावा :-
किसी मूर्ति की पूजा तब तक नहीं की जाती जब तक उसमें प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो जाती। साधारण व्यक्ति समझने लगता है कि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति ईश्वर-रूप में जीवित हो जाती है। भोले लोग इसे सत्य मान कर, मूर्ति पर चावल, गेहूं, घी, गुङ, दूध, पंखा, कपङा, रजाई, पैसे आदि को भोग रूप में चढाते हैं। ये ठग पुजारी सारे चढावे को डकार जाते हैं। परन्तु मूर्ति में कही भी हरकत और चेतना नहीं दिखती। पौराणिक पण्डितो को मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करते देख,ईश्वर हंसता होगा “इस पाखण्डी की प्राण प्रतिष्ठा तो मैंने की है और यह दुष्ट मेरी ही प्राण प्रतिष्ठा कर रहा है।” सोचिऐ, लोगों के साथ कितना विश्वासघात कर रहे हैं।, ये धूर्त? यहां यह प्रश्न उठता है कि पौराणिक-पण्डितों के परिवार में जब कोई सदस्य मर जाता है तो ये ठग उस युवा के मृत शरीर में प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे जीवित क्यों नहीं करते?
अन्त में इन आचार-भ्रष्ट पाषाण-पूजको से यही कहेगे कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा बहुत बडा बहकावा है, धोखा है। अत: देश व जनहित में इस कुकृत्य को तुरंत त्याग दें।


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: ​गहरी सांस (प्राणायाम) लेने के विशेष स्वास्थ्य लाभ​ डॉ पारितोष त्रिवेदी -...

: ​गहरी सांस (प्राणायाम) लेने के विशेष स्वास्थ्य लाभ​

डॉ पारितोष त्रिवेदी - www.Nirogikaya.com

हमारे पुरखों और महर्षियों ने हमेशा से श्वास लेने की आदतों पर विशेष ध्यान दिया हैं। श्वास ही प्राण है और इसीलिए हम Oxygen को भी प्राणवायु कहते हैं। सदियों से हमारी संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में प्राणायाम इसीलिए प्रभावी माना गया हैं। अब तो विदेशी भी मानने लगे है की, यदि हमें अच्छा स्वास्थ्य और जीवन चाहिए तो अपनी हर एक श्वास पर ध्यान देना चाहिए। 

अपनी आने-जाने वाली श्वास पर ध्यान देने से न सिर्फ हम शरीरिक बल्कि मानसिक विकारों से दूर रह सकते हैं। श्वास हमारे तनाव बैचेनी और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर सकती हैं अच्छी श्वास हमारे तन और मन में क्या आश्चर्यजनक बदलाव ला सकती है। प्राणायाम और ध्यान करने से हमें क्या विशेष लाभ मिल सकता हैं इसकी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :

1) दिमागी क्षमता / Brain : जब हम प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से अपनी सांसों को नियंत्रित करते हैं तो वास्तव में इससे हमारे मस्तिष्क के आकार में विस्तार होता हैं। अमेरिका में हुए अध्ययन में यह पता चला है की जब हम ध्यान / मैडिटेशन में अपनी हर सांस में ध्यान लगाते हैं तो हमारे मस्तिष्क के Cortex हिस्से में बढ़ोतरी होती हैं। अच्छी नींद के बाद गहरी सांस लेने का अभ्यास दिमागी क्षमता को बढाता हैं।   

2) दिल की धड़कन / Heartbeat : दिल की दो धडकनों के बिच जब असामान्य अंतर होता है उसे Heart Rate Variablility (HRV) नाम से जाना जाता हैं। इसमें दिल के दौरा आने का अंदेशा अधिक होता हैं। गहरी सांस प्राणायाम करने से इस स्तिथि को सुधारा जा सकता है और दिल की सेहत को अच्छी रखी जा सकती हैं। 

3) तनाव में कमी / Stress : अगर हम कमजोर सांस लेते है तो तनाव में हमारे शरीर की प्रतिरक्षा भी कमजोर हो जाती हैं यदि तनाव की स्तिथि में केवल साँसों पर ध्यान लगाया जाये तो मन की व्यग्रता कम हो जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है की ऐसा इसलिए होता हैं क्योंकि गहरी सांस लेने से हमारा नर्वस सिस्टम उत्तेजना, प्रेरणा वाली sympathetic स्तिथि से para sympathetic स्तिथि में चला जाता है जो की आराम और प्राप्ति की स्तिथि हैं प्राणायाम करने से शरीर में तनाव कम करने वाले हॉर्मोन अधिक निर्माण होता हैं। 

4) नकारात्मकता से मुक्ति / Positivity : अधिकांश लोग जब पीड़ा या तनाव में होते हैं तो उनकी साँसे उकडी रहती हैं विशेषज्ञ कहते है की किसी भी खतरे के प्रति यह हमारे शरीर की कुदरती प्रतिक्रिया होती हैं। अपनी साँसों पर ध्यान केन्द्रित करने के किसी भी व्यायाम से हमारे तन से बैचेनी, अवसाद, गुस्से और घृणा से भरे नकारात्मक विचारों को दूर करने में मदद मिलती हैं। 

5) सयंम / Patience : अच्छी तरह से सांस लेना सिखाना यह बच्चों और प्रोफेशनल के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता हैं। जो बच्चे अपने परीक्षा के पहले गहरी सांस लेना सिख जाते हैं उनका ध्यान बढ़ता है और याद किये हुए पाठ को दोहराने की योग्यता सुधरती हैं। 

6) ब्लड प्रेशर / Blood Pressure : हर रोज महज कुछ मिनटों के लिए किये हुए प्राणायाम और ध्यान से काफी हद तक आपके ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद होती हैं। वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है की गहरी सांस लेने से शरीर शांत स्तिथि में आता हैं ऐसा होने से रक्त वाहिनी अस्थायी रूप से खून को पुरे शरीर में नियंत्रित दबाव के साथ पहुचने में मदद मिलती हैं। 

7) जिन में सकारात्मक परिवर्तन / Genetic : यह सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव है तो सचमुच इस तरह होता है की हमें पता ही नहीं चलता। संभवतया इसके अच्छे परिणाम हमें हमारे आनेवाली पीढ़ियों में नजर आते हैं विभिन्न शोध, अध्ययन और महर्षियों के अनुभवों से पता चलता है की योग, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से साँसों की गति को नियंत्रित करने से हमारी जेनेटिक संरचना में प्रभावी बदलाव आते हैं। इसमें केवल तन ही नहीं बल्कि हमारे मन के स्तर पर भी परिवर्तन होते हैं। हमारे अच्छे जींस ज्यादा संवेदनशील बनते है और ऐसी क्रियाओं को बढ़ावा मिलता हैं जो न केवल शरीर बल्कि आने वाली संतति के लिए भी अच्छी होती हैं।  

इनके अलावा भी प्राणायाम और ध्यान करने से शरीर पर कई सारे लाभ होते हैं। अपने शरीर को स्वस्थ और सदृढ़ रखने के लिए आपने रोजाना योग जरूर करना चाहिए।
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जिओ healthy 👍!

: मित्रो,

अभी बारिश का मौसम होने के कारन पेशेंट की संख्या काफी बढ़ गई है । whatsapp पर भी 17 हजार से ज्यादा लोग हमसे जुड़ चुके हैं । पेशंस की संख्या बढ़ जाने के कारन अब हमें ज्यादा समय नहीं मिल पा रहा है ।आपको आपके प्रश्न का जवाब और नए पोस्ट मिलने में हो रही देरी का हमें खेद है । मेरी कोशिश रहेगी कि मैं आपके प्रश्नों का जवाब जल्द से जल्द दू और हफ्ते में दो से तीन उपयोगी पोस्ट आपको whatsapp द्वारा भेजता रहूँ।धन्यवाद।
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Tuesday, August 2, 2016

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📕 *सत्यार्थ प्रकाश*📕 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (समीक्षक) अब देखिये ईश्वर की अन्यथा आज्ञा। कि जो यह खतनः...

📕 *सत्यार्थ प्रकाश*📕
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(समीक्षक) अब देखिये ईश्वर की अन्यथा आज्ञा। कि जो यह खतनः करना ईश्वर को इष्ट होता तो उस चमडे़ को आदि सृष्टि में बनाता ही नहीं और जो यह बनाया गया है वह रक्षार्थ है; जैसा आंख के ऊपर का चमड़ा। क्योंकि वह गुप्तस्थान अति कोमल है। जो उस पर चमड़ा न हो तो एक कीड़ी के भी काटने और थोड़ी सी चोट लगने से बहुत सा दुःख होवे और यह लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों में न लगे इत्यादि बातों के लिये है। इसका काटना बुरा है और अब ईसाई लोग इस आज्ञा को क्यों नहीं करते? यह आज्ञा सदा के लिये है। इसके न करने से ईसा की गवाही जो कि व्यवस्था के पुस्तक का एक बिन्दु भी झूठा नहीं है; मिथ्या हो गई। इसका सोच विचार ईसाई कुछ भी नहीं करते॥18॥

19—तब उस से बात करने से रह गया और अबिरहाम के पास से ईश्वर ऊपर जाता रहा॥
—तौ॰ उ॰ पर्व॰ 17। आ॰ 22॥
(समीक्षक) इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर मनुष्य वा पक्षिवत् था जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर आता जाता रहता था। यह कोई इन्द्रजाली पुरुषवत् विदित होता है॥19॥
20—फिर ईश्वर उसे ममरे के बलूतों में दिखाई दिया और वह दिन को घाम के समय में अपने तम्बू के द्वार पर बैठा था॥और उसने अपनी आंखें उठाईं और क्या देखा कि तीन मनुष्य उसके पास खड़े हैं और उन्हें देख के वह तम्बू के द्वार पर से उनकी भेंट को दौड़ा और भूमि लों दण्डवत् किई॥और कहा हे मेरे स्वामी! यदि मैंने अब आप की दृष्टि में अनुग्रह पाया है तो मैं आपकी विनती करता हूं कि अपने दास के पास से चले न जाइये॥इच्छा होय तो थोड़ा जल लाया जाय और अपने चरण धोइये और पेड़ तले विश्राम कीजिये॥और मैं एक कौर रोटी लाऊं और आप तृप्त हूजिये। उसके पीछे आगे बढ़िये। क्योंकि आप इसीलिये दास के पास आये हैं॥तब वे बोले कि जैसा तू ने कहा तैसा कर॥और अबिरहाम तम्बू में सरः पास उतावली से गया और उसे कहा कि फुरती कर और तीन नपुआ चोखा पिसान ले के गूँध और उसके फुलके पका॥और अबिरहाम भुंड की ओर दौड़ा गया और एक अच्छा कोमल बछड़ा ले के दास को दिया। उसने भी उसे सिद्ध करने में चटक किया॥और उसने मक्खन और दूध और वह बछड़ा जो पकाया था; लिया और उनके आगे धरा और आप उनके पास पेड़ तले खड़ा रहा और उन्होंने खाया॥
—तौ॰ पर्व॰ 18। आ॰ 1। 2। 3। 4। 5। 6। 7। 8॥
(समीक्षक) अब देखिये सज्जन लोगो! जिनका ईश्वर बछड़े का मांस खावे उसके उपासक गाय, बछड़े आदि पशुओं को क्यों छोड़ें? जिसको कुछ दया नहीं और मांस के खाने में आतुर रहे वह विना हिंसक मनुष्य के ईश्वर कभी हो सकता है? और ईश्वर के साथ दो मनुष्य न जाने कौन थे? इससे विदित होता है कि जंगली मनुष्यों की एक मण्डली थी। उनका जो प्रधान मनुष्य था। उसका नाम बाइबल में ईश्वर रक्खा होगा। इन्हीं बातों से बुद्धिमान् लोग इनके पुस्तक को ईश्वरकृत नहीं मान सकते और न ऐसे को ईश्वर समझते हैं॥20॥
21—और परमेश्वर ने अबिहराम से कहा कि सरः क्यों यह कहके मुसकुराई कि जो मैं बुढ़िया हूं सचमुच बालक जनूँगी॥क्या परमेश्वर के लिये कोई बात असाध्य है॥
—तौ॰ पर्व॰ 18। आ॰ 13। 14॥
(समीक्षक) अब देखिये कि क्या-क्या ईसाइयों के ईश्वर की लीला! कि जो लड़के वा स्त्रियों के समान चिढ़ता और ताना मारता है!!!॥21॥
22—तब परमेश्वर ने समूद और अमूरः पर गन्धक और आग परमेश्वर की ओर से स्वर्ग से वर्षाया॥और उन नगरों को और सारे चौगान को और नगरों के सारे निवासियों को और जो कुछ भूमि पर उगता था; उलट दिया॥
—तौ॰ उत्प॰ पर्व॰ 19। आ॰ 24। 25॥
(समीक्षक) अब यह भी लीला बाइबल के ईश्वर की देखिये कि जिसको बालक आदि पर भी कुछ दया न आई! क्या वे सब ही अपराधी थे जो सब को भूमि उलटा के दबा मारा? यह बात न्याय, दया और विवेक से विरुद्ध है। जिनका ईश्वर ऐसा काम करे उनके उपासक क्यों न करें?॥22॥
23—आओ हम अपने पिता को दाख रस पिलावें और हम उसके साथ शयन करें कि हम अपने पिता से वंश जुगावें॥तब उन्होंने उस रात अपने पिता को दाख रस पिलाया और पहिलोठी गई और अपने पिता के साथ शयन किया॥ हम उसे आज रात भी दाख रस पिलावें तू जाके शयन कर॥सो लूत की दोनों बेटियां अपने पिता से गर्भिणी हुईं॥
—तौ॰ उत्प॰ पर्व॰ 19। आ॰ 32। 33। 34। 36॥
(समीक्षक) देखिये पिता पुत्री भी जिस मद्यपान के नशे में कुकर्म करने से न बच सके ऐसे दुष्ट मद्य को जो ईसाई आदि पीते हैं उनकी बुराई का क्या पारावार है? इसलिये सज्जन लोगों को मद्य के पीने का नाम भी न लेना चाहिये॥23॥
24—और अपने कहने के समान परमेश्वर ने सरः से भेंट किया और अपने वचन के समान परमेश्वर ने सरः के विषय में किया॥और सरः गर्भिणी हुई॥
—तौ॰ उत्प॰ पर्व॰ 21। आ॰ 1। 2॥
(समीक्षक) अब विचारिये कि सरः से भेंट कर गर्भवती की यह काम कैसे हुआ! क्या विना परमेश्वर और सरः के तीसरा कोई गर्भस्थापन का कारण दीखता है? ऐसा विदित होता है कि सरः परमेश्वर की कृपा से गर्भवती हुई!!!॥24॥
25—तब अबिहराम ने बड़े तड़के उठ के रोटी और एक पखाल में जल लिया और हाजिरः के कन्धे पर धर दिया और लड़के को भी उसे सौंप के उसे विदा किया॥उसने उस लड़के को एक भाड़ी के तले डाल दिया॥और वह उसके सम्मुख बैठ के चिल्ला-चिल्ला रोई॥तब ईश्वर ने उस बालक का शब्द सुना॥
—तौ॰ उत्प॰ पर्व॰ 21। आ॰ 14। 15। 16। 17॥
*_(त्रयोदश:सत्यार्थप्रकश)*
—– *स्वामी दयानन्द सरस्वती*_

*_क्रमश:_*


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आर्य कहलाने वालों जागना कब है ? सब आर्यजनों को आत्मचिन्तन कर परस्पर, मतभेदों को, विवादों को, स्वार्थ...

आर्य कहलाने वालों जागना कब है ?
सब आर्यजनों को आत्मचिन्तन कर परस्पर, मतभेदों को, विवादों को, स्वार्थ परता और अधिकारों की दौड़ को तिलांजलि देकर, ऋषि मिशन के लिए सेवक बन उठ खड़ा होना चाहिए। जिस उद्देश्य के लिए ऋषि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की थी|
वैदिक सिद्धान्ता की रक्षा करना, उन्हें प्रचारित व प्रसारित करना हम सबका पुनीत कर्त्तव्य है। क्योंकि आज संसार को इस विचारधारा की बड़ी जरूरत है। आज प्रगति के नाम से ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास, अश्लीलता, अनैतिकता,और धर्म के नाम से हिंसा आदि कुकृत्य निरन्तर बढ़ते ही जा रहा हैं। अगर इसे रोकने की क्षमता है, किसीके पास,तो मात्र ऋषि दयानन्द की ही विचारधारा के प्रचार-प्रसार के माध्यम से ही रोका जाना सम्भव है। आज नाना पन्थ, सम्प्रदाय व मजहब बढ़ते जा रहा हैं। सन्त, महन्त, महाराज, ज्ञानी और गुरुओं की भीड़ फैल रही है। धर्म, भक्ति और परमात्मा के नाम पर व्यापार हो रहा है। भक्ति के नाम तथा योग के नाम पर ढ़ोग व प्रदर्शन बढ़ रहा है, और सच्ची भक्ति घट रही है। धर्म के नाम पर सम्प्रदाय हावी हो रहा हैं। शब्दों से तो धर्म का प्रचार खूब हो रहा है। परन्तु आचरण व्यवहारिक जीवन से धर्म घट रहा है। और देश की जो अपनी विशिष्ट पहचान थी उसे तोड़ा-मरोड़ा और विकृत किया जा रहा है। वैचारिक प्रदुषण का जहर समूची भारतीय जीवन पद्धति को विषाक्त व विकृत करता जा रहा है। शायद दयानन्द के कार्यकाल में इतनी भयावह स्थिति न रही हो जितना कि आज है।
ऐसी दशा में अगर समाधान है तो केवल आर्य समाज के पास ही हैं। क्योंकि आर्य समाज मानवता वादी, राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का प्रचार आर्य समाज के जन्मकाल से ऋषि दयानन्द ने किया है। और यही जिम्मेदारी आर्य समाजियों पर देव दयानन्द ने दी है। क्योंकि इसके जो सिद्धान्त हैं और आदर्श हैं इनमें तर्क है, सृष्टि क्रम के अनुकूल है। आज विश्व में देश, धर्म, संस्कृति, परम्पराओं का सही स्वरूप कोई दे सकता है, तो मात्र आर्य समाज. ही है। किन्तु दुःख के साथ हमें लिखना पड़ रहा है, कि दयानन्द के अनुयायी ही वैदिक सिद्धान्तों को अपने अमल में नहीं लाते। आज यत्र-तत्र दल गत राजनीति आर्य समाज में भी होने लगी है। आर्य समाज में अब योग्यता के बल पर नहीं किन्तु रूपयों के बल पर अधिकारी बनाए जा रहे हैं। भले ही उन्हें वैदिक सिद्धान्तों का एक ही अक्षर भी न आता हो, मात्र वोट की राजनीति है किसी ने खूब कहा हैः-
‘बड़े शौक से सुन रहा था जमाना ।
हम ही सो गये दासताँ कहते-कहते।
आज आर्य कहलाने वाले अपने उद्देश्य तथा कर्त्तव्य से भटक रहे हैं। मात्र विवाद व स्वार्थ मे आर्य समाज की शाख को मिट्टी में मिलाया जा रहा है।
आर्य समाज का जो मुख्य कार्य वेद प्रचार तथा पाखण्ड के खिलाफ आवाज उठाना था। अज्ञान अधंकार को लोगों से दूर करने के लिए शास्त्रर्थ के माध्यम से सत्यासत्य का निर्णय करना था। राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार करना था। इस्लाम मत्-ईसाई मतों से लोहा लेने का था। वे सब गौण हो गया। और जो गौण कार्य था उसे ही अपनाया गया है। जैसा आर्य समाज में दवाखाना चलाना, शादी विवाह में बारात टिकाना। अनैतिक तरीके से आर्य समाज भवन को किराया पर चलाना आदि ही मुख्य कार्य हो गया है। शायद ही कोई समाज हो जहाँ विवाह के बाराती शराब न पीते हों। आर्य समाज में अगर यह काम बन्द होता, तो मेरे विचार से शराब बन्दी कार्य को बल मिलता।
पद लोलुपता एवं परिवार वाद के कारण प्रायः आर्य समाजों में झगड़ा और विवाद बना रहता है। शायद ही कोई आर्य समाज. ऐसा हो जहाँ विवाद न हो। कुछ प्रान्तीय सभाओं की ओर दृष्टिपात करने से पता चल सकता है। कुछ प्रान्तों में सभा की सम्पत्ति का ही विवाद चल रहा है। कहीं-कहीं नोटों के बल पर प्रान्तीय सभाओं पर लोग काजिब हैं।
बड़े अधिकारियों को प्रचार-प्रसार की कोई चिन्ता ही नहीं। वे तो मात्र बनी बनाई मंच पर फूलमाला पहनने के लिए पहुँचना ही अपना कर्त्तव्य मानते हैं। कुछ ही लोग हैं जो वैदिक धर्म प्रचार को या आर्य समाज के उद्देश्य पूरा करने के लिए आर्य समाज के प्रचारकों, उपदेशकों को पाल रहे हैं। जो आर्य समाज के छोटे-छोटे कार्यकर्ता हैं। लोगों से सम्पर्क बनाकर कुछ संग्रह करते हैं और आर्य समाज के उपदेशकों व प्रचारकों को बुलाते हैं। सिर पर कफन बाँधकर प्रचारक-उपदेशक होली दीवाली का भी ख्याल न रखकर कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु चल पड़ते हैं।
आर्य समाज के प्रचार-प्रसारमें वृद्धि हो तभी लोग आर्य समाज को जान पायेंगे। भारत में अभी ऐसे भी प्रान्त हैं जहाँ के लोग आर्य समाज को जानते तक नहीं। जहाँ आर्य समाज को लोग नहीं जानते वहाँ जाकर आर्य समाज का प्रचार करने से ही देव दयानन्द का सपना साकार हो सकता है। एवं कृण्वन्तों विश्वमार्यम् उद्घोष साकार हो सकता है। इसी उद्देश्य से ऋषि ने आर्य समाज की स्थापना की थी। इन उद्देश्यों की पूर्ति हम लोग उस समय कर सकेंगे जब मिल बैठकर ऋषि की भावना को हृदय में रखकर अपने स्वार्थ अहंकार एवं पद लोलुपता को छोड़ निष्काम भाव से प्रचार-प्रसार में संलग्न हो जायेंगें।
हम सबके सामने इस समय बड़ी चुनौती हैं। आर्य समाज की विचारधारा, आर्दश, सिद्धान्त तथा अस्तित्व की रक्षा करना |
महेन्द्रपाल पाल आर्य =वैदिक प्रवक्ता= 2/8/16=


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|| Free e-Library || यह ई पुस्तकालय है, जिसमें दर्जनों अमूल्य ग्रंथों के PDF सहेजे गए हैं, ताकि यह...

|| Free e-Library ||

यह ई पुस्तकालय है, जिसमें दर्जनों अमूल्य ग्रंथों के PDF सहेजे गए हैं, ताकि यह अधिक से अधिक लोगों के काम आ सकें, धर्म और राष्ट्र संबंधी विषय पर PDF में अमूल्य पुस्तकें इन लिंक में संग्रहित हैं, आप विषय देखकर लिंक खोलें तो बहुत सी पुस्तकें मिलेंगी, सभी पुस्तकें आप निशुल्क download कर सकते हैं, इन लिंक्स में सैकड़ों किताबें हैं, जो कई पीढ़ियों की मेहनत का फल हैं, इस हिंद महासागर से मोती चुन लें……..
Swami Dayananda - स्वामी दयानंद रचित :-
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Aadi Shankaracharya - आद्य शंकराचार्य :-
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Sri Aurobindo - श्री अरविंदो :-
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Swami Vivekanand - स्वामी विवेकानन्द :-
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Swami Ramteerth - स्वामी रामतीर्थ :-
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Sitaram Goel - सीताराम गोयल :-
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Veer Savarkar - वीर सावरकर :-
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Swami Shivanand - स्वामी शिवानंद :-
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हिन्दू, राष्ट्र व हिन्दुराष्ट्र :-
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Islam Postmortem - इस्लाम की जांच पड़ताल :-
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Books on Vedas - वेदों पर किताबें :-
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Maharshi Dayananda - महर्षि दयानंद समग्र :-
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————-Complete commentaries on Veda - सम्पूर्ण वेद भाष्य ——–
Introduction to the Commentary on the 4 Vedas - ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका :-
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*वेद को छोड़ने के दुष्परिणाम :* *1.मनमानी पूजा पद्धतियां-* पिछले 10-15 वर्षों में हिंदुत्व को लेकर...

*वेद को छोड़ने के दुष्परिणाम :*

*1.मनमानी पूजा पद्धतियां-*
पिछले 10-15 वर्षों में हिंदुत्व को लेकर व्यावसायिक संतों, ज्योतिषियों और धर्म के तथाकथित संगठनों और राजनीतिज्ञों ने हिंदू धर्म के लोगों को पूरी तरह से गफलत में डालने का जाने-अनजाने भरपूर प्रयास किया, जो आज भी जारी है। हिंदू धर्म की मनमानी व्याख्या और मनमाने नीति-नियमों के चलते खुद को व्यक्ति एक चौराहे पर खड़ा पाता है। समझ में नहीं आता कि इधर जाऊँ या उधर।भ्रमित समाज लक्ष्यहीन हो जाता है। लक्ष्यहीन समाज में मनमाने तरीके से परम्परा का जन्म और विकास होता है, जोकि होता आया है। मनमाने मंदिर बनते हैं, मनमाने देवता जन्म लेते हैं और पूजे जाते हैं। मनमानी पूजा पद्धति, चालीसाएँ, प्रार्थनाएँ विकसित होती है। व्यक्ति पूजा का प्रचलन जोरों से पनपता है। भगवान को छोड़कर संत, कथावाचक या पोंगा पंडितों को पूजने का प्रचलन बढ़ता है।

*2. धर्म का अपमान :*
आए दिन धर्म का मजाक उड़ाया जाता है, मसलन कि किसी ने लिख दी लालू चालीसा, किसी ने बना दिया अमिताभ का मंदिर। रामलीला करते हैं और राम के साथ हनुमानजी का भी मजाक उड़ाया जाता है। राम के बारे में कुतर्क किया है, कृष्ण पर चुटकुले बनते हैं। दुर्गोत्सव के दौरान दुर्गा की मूर्ति के पीछे बैठकर शराब पी जाती हैं आदि अनेकों ऐसे उदाहरण है तो रोज देखने को मिलते हैं। भगवत गीता को पढ़ने के अपने नियम और समय हैं किंतु अब तो कथावाचक चौराहों पर हर माह भागवत कथा का आयोजन करते हैं। यज्ञ के महत्व को समझे बगैर वेद विरुद्ध यज्ञ किए जाते हैं और अब तमाम वह सारे उपक्रम नजर आने लगे हैं जिनका सनातन धर्म से कोई वास्ता नहीं है।

*3 .बाबाओं के चमचे :*
अनुयायी होना दूसरी आत्महत्या है।’- ॐ को छोड़कर आज का युवा अपने-अपने बाबाओं के लॉकेट को गले में लटकाकर घुमते रहते हैं। उसे लटकाकर वे क्या घोषित करना चाहते हैं यह तो हम नहीं जानते। हो सकता है कि वे किसी कथित महान हस्ती से जुड़कर खुद को भी महान-बुद्धिमान घोषित करने की जुगत में हो। लेकिन कुछ युवा तो नौकरी या व्यावसायिक हितों के चलते उक्त संत या बाबाओं से जुड़ते हैं तो कुछ के जीवन में इतने दुख और भय हैं कि हाथ में चार-चार अँगूठी, गले में लॉकेट, ताबीज और न जाने क्या-क्या। गुरु को भी पूजो, भगवान को भी पूजो और ज्योतिष जो कहे उसको भी, सब तरह के उपक्रम कर लो…धर्म के विरुद्ध जाकर भी कोई कार्य करना पड़े तो वह भी कर लो।

*4. धर्म या जीवन पद्धति :* हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है- ये वाक्य बहुत सालों से बहुत से लोग और संगठन प्रचारित करते रहे हैं। इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और जैन सभी सम्प्रदाय है। धर्म अर्थात आध्यात्मिक मार्ग, मोक्ष मार्ग। धर्म अर्थात जो सबको धारण किए हुए हो, अस्तित्व और ईश्वर है, लेकिन हिंदुत्व तो धर्म नहीं है। जब धर्म नहीं है तो उसके कोई पैगंबर और अवतारी भी नहीं हो सकते। उसके धर्मग्रंथों को फिर धर्मग्रंथ कहना छोड़ो, उन्हें जीवन ग्रंथ कहो। गीता को धर्मग्रंथ मानना छोड़ दें? धर्म ही लोगों को जीवन जीने की पद्धति बताता है, अधर्म नहीं। क्यों संत-महात्मा गीताभवन में लोगों के समक्ष कहते हैं कि ‘धर्म की जय हो-अधर्म का नाश हो’?
सच में धर्म की तरफ आना चाहते हो तो सत सनातन वैदिक धर्म की ओर चलो ।

*5. मनमानी व्याख्या के संगठन :*
पहले ही भ्रम का जाल था कुछ संगठनों ने और भ्रम फैला रखा है उनके अनुसार ब्रह्म सत्य नहीं है शिव सत्य है और शंकर अलग है। आज आप जहाँ खड़े हैं अगले कलयुग में भी इसी स्थान पर इसी नाम और वेशभूषा में खड़े रहेंगे- यही तो सांसारिक चक्र है। इनके अनुसार समय सीधा नहीं चलता गोलगोल ही चलता है। इन लोगों ने वैदिक विकासवाद के सारे सिद्धांत और समय व गणित की धारणा को ताक में रख दिया है। एक संत या संगठन गीता के बारे में कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ ओर। एक राम को भगवान मानता है तो दूसरा साधारण इंसान। हालाँकि राम और कृष्ण को छोड़कर अब लोग शनि की शरण में रहने लगे हैं।वेद, पुराण और गीता की मनमानी व्याख्याओं के दौर से मनमाने रीति-रिवाज और पूजा-पाठ विकसित होते गए। लोग अनेकों संप्रदाय में बँटते गए और बँटते जा रहे हैं। संत निरंकारी संप्रदाय, ब्रह्माकुमारी संगठन, जय गुरुदेव, गायत्री परिवार, कबिर पंथ, साँई पंथ, राधास्वामी मत आदि अनेकों संगठन और सम्प्रदाय में बँटा हिंदू समाज वेद को छोड़कर भ्रम की स्थिति में नहीं है तो क्या है?संप्रदाय तो सिर्फ दो ही थे- शैव और वैष्णव। फिर इतने सारे संप्रदाय कैसे और क्यूँ हो गए। प्रत्येक संत अपना नया संप्रदाय बनाना क्यूँ चाहता है? क्या भ्रमित नहीं है आज का हिंदू?


*वेद बुलाते हैं तुम्हें :*
विद्वानों अनुसार 'वेद’ ही हैं हिंदुओं के धर्मग्रंथ। वेदों में दुनिया की हर बातें हैं। वेदों में धर्म, योग, विज्ञान, जीवन, समाज और ब्रह्मांड की उत्पत्ति, पालन और संहार का विस्तृत उल्लेख है। वेदों का सार है उपनिषद् और उपनिषदों का सार है सत्यार्थप्रकाश।


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*पतंजली अपने शैशव काल में थी। तब सिर्फ १,१०० करोड़ रूपए की कंपनी थी। आज पतंजली ५,००० करोड़ रूपए की कंपनी है अगले वित्तीय वर्ष का १०,००० करोड़ रु. का लक्ष्य रखा है बाबा ने। इसके अलावा, आगे बाबा की सबसे बड़ी और सबसे महत्वाकांक्षी योजना जिसपर बाबा ने काम शुरू कर दिया है, वो है, शिक्षा के क्षेत्र में!*

*पतंजली अपने शैशव काल में थी। तब सिर्फ १,१०० करोड़ रूपए की कंपनी थी। आज पतंजली ५,००० करोड़ रूपए की कंपनी है अगले वित्तीय वर्ष का १०,००० करोड़ रु. का लक्ष्य रखा है बाबा ने। इसके अलावा, आगे बाबा की सबसे बड़ी और सबसे महत्वाकांक्षी योजना जिसपर बाबा ने काम शुरू कर दिया है, वो है, शिक्षा के क्षेत्र में!*

*आपको ये जान कर प्रसन्नता होगी कि बाबा ने भारत सरकार के मानव संसाधन & विकास मंत्रालय, माने ministry of HRD से देश में विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए एक वैदिक board की स्थापना के लिए अनुमति मांगी है। जैसे देश में CBSE, ICSE और तमाम राज्यों के शिक्षा बोर्ड हैं, मुसलमानों की दीनी तालीम के लिए मदरसा board है, उसी प्रकार बाबा रामदेव ने भारत सरकार से देश में एक वैदिक board की स्थापना के लिए अर्ज़ी दी है। इस नए वैदिक board में देश की पुरातन गुरुकुल शिक्षा पद्धति को आधुनिक काल के हिसाब से remodel कर पुनर्जीवित करने का प्रयास है!*

*भारत की शिक्षा व्यवस्था पिछले ६८ साल से वामपंथियो के चंगुल में फंसी रही! वामपंथियों का शुरू से एक ही agenda रहा - भारत के गौरवशाली इतिहास को, संस्कृति को, हमारी सभ्यता को demean कर, बदनाम कर, नीचा दिखाओ और secularism के agenda के तहत भारत के मध्यकालीन इतिहास को, जब हम मुसलमानों के आधीन रहे, उस इतिहास को बच्चों को पढ़ाओ!*

*हमारे नायकों को पीछे धकेल अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब और टीपू सुलतान जैसे hero पैदा करो और राणा प्रताप, शिवाजी को भुला दो! अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति को आगे बढ़ाओ जो leader नहीं बल्कि clerk, नौकर और stenographer पैदा करती है। विद्यार्थियों में सोचने और analysis करने की क्षमता को ख़त्म करती है आधुनिक शिक्षा पद्धति। इसमें पूरा focus सिर्फ रट्टे मार के exam पास करने पे होता है।*

*बाबा रामदेव ने जो वैदिक board की परिकल्पना की है, उसमे विद्यार्थियों को भारत का गौरवशाली अतीत, इतिहास, संस्कृति और परम्परा से परिचित कराने का प्रयास है!*

*हमारे वैदिक ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र जिन्हें आज की शिक्षा छूना भी नहीं चाहती! आधुनिक पाठ्यक्रम के साथ वेद, उपनिषद् भी पढ़ाये जाएँ। ऐसे एक शिक्षा बोर्ड की स्थापना चाहते हैं बाबा रामदेव जी!*

*इसको और अधिक सरल करके बताऊँ तो स्कूल में CBSE के 5 subject हिंदी, अंग्रेजी, Maths, Science और SSD के साथ एक नया stream, एक नया subject, वेद उपनिषद् भी जोड़ दिया! योग को अनिवार्य कर दिया!अब आप सोचेंगे कि बच्चे overload होंगे? जी नहीं! बिलकुल नहीं आज NCERT कहती है कि विद्यार्थियों को सिर्फ 5 पुस्तक पढ़ाई जाएं, पर हमारे private स्कूल 17 पुस्तकें लगा के रखते हैं!*

*वैदिक बोर्ड में NCERT की उन 5 पुस्तकों के साथ सिर्फ एक पुस्तक जोड़ दी जायेगी - वैदिक शिक्षा! विद्यार्थी जब 12 साल इस बोर्ड से पढ़ के निकलेगा तो उसे ये पता होगा कि, भगत सिंह कोई terrorist नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी थे, और औरंज़ेब कोई महान राजा नहीं, बल्कि एक आततायी था!*

*बाबा रामदेव ने आचार्यकुलम के नाम से ऐसा एक वैदिक स्कूल शुरू कर भी दिया है जिसमे बच्चे सुबह उठ के योग करते हैं, यज्ञ करते हैं और फिर उसके बाद दिन में CBSE की पढ़ाई करते हैं। इसके अलावा देश भर में 9 अन्य आचार्यकुलम और बन रहे हैं। अगले 10 साल में देश में 1,000 आचार्यकुलम स्थापित करने का plan है बाबा का।*

*ये आचार्यकुलम Residential Schools होंगे, जो प्रस्तावित वैदिक बोर्ड से मान्यता प्राप्त होंगे और पूरी तरह गुरुकुल पद्धति से शिक्षा देंगे।*

*बाबा रामदेव इसके लिए देश भर में दान दाताओं से 5 एकड़ जमीन मांग रहे हैं! आपके बाप दादाओं के नाम आचार्यकुलम!*

*यदि एक अकेली JNU इतने वामपंथी साँप के पिल्ले पैदा कर सकती है, तो 1,000 आचार्य कुलम कितने देश भक्त पैदा करेंगे!*

*वन्दे मातरम!*

*मैंने तो शेयर कर दिया, कृपया करके आप भी शेयर जरूर करें!*
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सत्यार्थ प्रकाश को पढकर बडे-बडे मौलवी और पादरी बदल गये, आर्य हो गये ! (१.) वर्तमान में महेन्द्रपाल...

सत्यार्थ प्रकाश को पढकर बडे-बडे मौलवी और पादरी बदल गये, आर्य हो गये !

(१.) वर्तमान में महेन्द्रपाल आर्य जो कि अमृतसर
में फारसी भाषा के विद्वान मौलवी थे ! आज जाकिर नायक भी इनसे डिबेट करने से कतराता है !

(२.) जिसे पढ़ कर लाला लाजपत राय ने वकालत छोड़ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में पूरा जीवन लगा दिया !

(३.) जिसे पढ़ कर पण्डित लेखराम ने अपने मरते हुए बच्चे को
भी छोड़ कर , मुस्लिम होने जा रहें लाखों हिन्दुओं को बचाने
निकल पडे और ट्रेन के न रुकने पर उसमे से छलांग लगा दी और उन्हें मुस्लिम होने से बचा लिया !

(४.) जिसे पढकर पण्डित गुरुदत्त विधार्थी जो उस समय
जगदीश चन्द्र बसु के अलावा विज्ञान के इकलौते प्रोफेसर थे
को ऐसा पागल कर दिया कि वे अपने शरीर पर आर्यसमाज के नियम के लिखे कपड़े को पहन कर नुक्क्डो पर सत्यार्थ प्रकाश बाँटा करते थे ! आर्य समाज में इन जैसा आज तककोई नहीं हुआ ! इनका प्रचार करने का तरीका ही अलग था ! इन्होंने एक धोती जैसे कपडे के दोनों ओर आर्य समाज के पाँच पाँच नियम लिखवाकर शीर पर टाँग लेते थे, जिसमें पीँच नियम आगे होते थे और पाँच नियम पीठ के पीछे !

(५.) जिसे पढ़ कर राम प्रसाद बिस्मिल जो की एक जमाने
में बुरे व्यसनों में फँसे थे ! सच्चे देश भक्त बन गए और पिता
जी के कहने पर कि आर्यसमाज छोड़ दे या मेरा घर छोड़ दे
तो तत्काल घर छोड़ कर चल दिए !पिताजी ने कहा कि ये कपड़े भी मेरे दिए हैं तो उन्हें भी उतार कर बनियान में ही
चल दिए !

(६.) जिसे पढ़ कर व्यसनी मांसाहारी मुंशीराम बदल गए और संन्यासी श्रद्धानन्द बनकर अंग्रेजो की गोलियों के आगे सीना
तान के खड़े हो गए और दिल्ली आगरा के लगभग सवा तीन
लाख मुसलमानो को शुद्धि आंदोलन से फिर से आर्य बना कर
कट्टर मुस्लिम की गोली खा कर बलिदान हो गए !

(७.) जिसे पढ़ कर वीर सावरकर ने कहा कि जब तक ये
पुस्तक भारतीयो के पास है तब तक कोई विधर्मी अपने मत
की शेखी नही बघार सकता !


(८.) जिसे पढ़ कर भगत सिंह के दादा अर्जुनसिंह कट्टर
आर्यसमाजी हो गए और अपने सब बेटो को देशभक्त बना गए
और देश को भगत सिंह जेसा वीर दे गए !

(९.) जिसके बारे में अबुल कलाम आजाद ने कहा कि
पता नही क्या है इस पुस्तक में जो हिन्दू एक बार इसे पढ़ ले
तो वो अधिक जोशीला और दृढ़ देशभक्त बन जाता है !

(१०.) जिसे पढ़ कर भारत रत्न महामना मदनमोहन मालवीय जो आर्यसमाज के विरुद्ध थे ने अपने अंतिम समय जब कुछ
ब्राह्मणों से पूछा कि अब हमे कौन मार्गदर्शन करेगा तो इस ग्रन्थ को देकर कहा की यही अब तुम्हे मार्ग दिखाएगा !

(११) जिसे पढ़ कर आज भी कुछ लोग रात रात भर जाग कर
हिन्दुओ को जगाने के लिए प्राणपण से तत्पर है !

मित्रो सोचिये ऐसा क्या है इस ग्रन्थ में ???

यदि जानना चाहते हो तो इसे एक बार पढ़ के देखो
ये आपको कहीं भी आर्य समाज में मिल जायेगा !


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●आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।● ■इसके वैज्ञानिक लाभ क्या हैं।■ ब्रह्म मुहूर्त...

●आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।●
■इसके वैज्ञानिक लाभ क्या हैं।■

ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

धार्मिक महत्व - व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

पौराणिक महत्व - वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकते हैं।


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Sunday, July 31, 2016

🔥 *ओ३म्* 🔥 *अपवर्ग किसे कहते हैं (What is ApaVarg)*? अपवर्ग (Salvation) मुक्ति को कहते हैं. इस...

🔥 *ओ३म्* 🔥

*अपवर्ग किसे कहते हैं (What is ApaVarg)*?
अपवर्ग (Salvation) मुक्ति को कहते हैं. इस अवस्था को मोक्ष, कैवल्य, निर्वाण आदि नामों से भी जाना जाता है.

कवर्ग (Guttural-कण्ठ) = क ख ग घ ङ
चवर्ग (Palatal-तालु) = च छ ज झ ञ
टवर्ग (Cerebral-मूर्द्धा) = ट ठ ड ढ ण
तवर्ग (Dental-दन्त) = त थ द ध न
*पवर्ग (Labial-ओष्ठ) = प फ ब भ म*

_अपवर्ग = अ + पवर्ग = जो पवर्ग नहीं है_.

*पवर्ग शब्द में “प फ ब भ म” का क्या अर्थ है ???*
प = पाप
फ = फल
ब = बन्धन
भ = भय
म = मृत्यु

_अपवर्ग ऐसी अवस्था है, जिसमें पाप, फल, बन्धन, भय और मरण नहीं होता_.

*प्रश्न: मुक्ति कैसे मिलती है* ?
उत्तर: महर्षि पतंजलि के अनुसार, योग के आठ अङ्गो का अनुष्ठान करने से, शरीरस्थ मलदोष, चित्तस्थ विक्षेपदोष और बुद्धिगत आवरण दोष दूर होकर विवेकख्याति तक ज्ञान का विस्तार होकर जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है. (योगदर्शन 2.28, 4.31, 4.34)

*प्रश्न: क्या मुक्ति सदा (forever) के लिए मिलती है?*
उत्तर: नहीं, *limited efforts का result कभी भी unlimited नहीं हो सकता*.
*ऋग्वेद 1.24.2* के अनुसार, “मुक्ति के बाद पुनर्जन्म होता है”.
*सांख्यदर्शन 1.159* के अनुसार, “मुक्ति और बन्धन सदा नहीं रहते.”

*प्रश्न: मुक्ति की अवधि कितनी है?*
उत्तर: *मुण्डक-उपनिषद 3.2.6* के अनुसार, मुक्ति की अवधि *पराकाल* की होती है.
पराकाल = 31,10,40,000,000,000 वर्ष = 100 ब्राह्म-वर्ष
इतने समय में 36,000 बार सृष्टि और 36,000 बार प्रलय हो जाता है.

PaVarg stands for Pa, Pha, Ba, Bha, Ma.

Pa = Paap (Sin)
Pha = Phal (Outcome)
Ba = Bandhan (Bondage)
Bha = Bhaya (Fear)
Ma = Maran (Death)

Such condition where Soul is free from Sin, Outcome, Bondage, Fear and Death, that is called ApaVarg (Salvation).

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*पाँच महायज्ञ निम्नलिखित हैं*: १) *ब्रह्मयज्ञ (सन्ध्या)* २) *देवयज्ञ...

*पाँच महायज्ञ निम्नलिखित हैं*:
१) *ब्रह्मयज्ञ (सन्ध्या)*
२) *देवयज्ञ (हवन)*
३) *पितृयज्ञ*
४) *भूतयज्ञ (बलिवैश्वदेवयज्ञ)*
५) *नृयज्ञ (अतिथियज्ञ)*
*पञ्चमहायज्ञ का फल* यह है, की ज्ञान प्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ कार्यों की सिद्धि होना। उससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये सिद्ध होते हैं, इनको प्राप्त होकर मनुष्यों को सुखी होना उचित है। - (_पञ्चमहायज्ञविधि_)
न्यून से न्यून एक घण्टा ध्यान अवश्य करे। जैसे समाधिस्थ होकर योगी लोग परमात्मा का ध्यान करते हैं वैसे ही सन्ध्योपासन भी किया करें। - (_सत्यार्थ प्रकाश, तृतीय समुल्लास_)
_सदा स्त्री-पुरुष १० दश बजे शयन और रात्रि के अन्तिम प्रहर अथवा ४ बजे उठके प्रथम ह्रदय में परमेश्वर का चिन्तन करके धर्म और अर्थ का विचार किया करें, और धर्म और अर्थ के अनुष्ठान वा उद्योग करने में यदि कभी पीडा भी हो, तथापि धर्मयुक्त पुरुषार्थ को कभी न छोडे, किन्तु सदा शरीर और आत्मा की रक्षा के लिए युक्त आहार-विहार, औषध-सेवन, सुपथ्य आदि से निरन्तर उद्योग करके व्यावहारिक और पारमार्थिक कर्त्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना भी किया करें, की जिससे परमेश्वर की कृपादृष्टि और सहाय से महाकठिन कार्य भी सुगमता से सिद्ध हो सकें।_ इसके लिए निम्नलिखित मन्त्र हैं: - (*संस्कार-विधि*)
*प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मि॒त्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑ । प्रा॒तर्भगं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम ॥*
*प्रा॒त॒र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्ता । आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑ ॥*
*भग॒ प्रणे॑त॒र्भग॒ सत्य॑राधो॒ भगे॒मां धिय॒मुद॑वा॒ दद॑न्नः । भग॒ प्र णो॑ जनय॒ गोभि॒रश्वै॒र्भग॒ प्र नृभि॑र्नृ॒वन्त॑: स्याम ॥*
*उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्यामो॒त प्र॑पि॒त्व उ॒त मध्ये॒ अह्ना॑म् । उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म ॥*
*भग॑ ए॒व भग॑वाँ अस्तु देवा॒स्तेन॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम । तं त्वा॑ भग॒ सर्व॒ इज्जो॑हवीति॒ स नो॑ भग पुरए॒ता भ॑वे॒ह ॥*
- _ऋग्वेद मण्डल-७, सूक्त-४१, मन्त्र-१,२,३,४,५, यजुर्वेद अध्याय-३४, मन्त्र-३४, अथर्ववेद ३.१६.१_
*तत्पश्चात् शौच, दन्तधावन, मुखप्रक्षालन करके स्नान करें। पश्चात् एकान्त स्थान में जाकर योगाभ्यास की रीति से परमात्मा की उपासना कर सूर्योदय पर्यन्त घर आकर सन्ध्योपासना करें*।

प्रमाण:
*ब्राह्मे मुहूर्त्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत्। कायक्लेशाँश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥मनुस्मृति ४.९२॥*
रात्रि के चौथे प्रहर अथवा चार घड़ी रात (सूर्योदय से ९६ मिनट पूर्व) से उठे। आवश्यक कार्य करके धर्म और अर्थ, शरीर के रोगों का निदान और परमात्मा का ध्यान करे। कभी अधर्म का आचरण न करे। क्योंकि—
*नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्तमानस्तु कर्त्तुर्मूलानि कृन्तति ॥मनुस्मृति ४.१७२॥*
किया हुआ अधर्म निष्फल कभी नहीं होता परन्तु जिस समय अधर्म करता है उसी समय फल भी नहीं होता। इसलिये अज्ञानी लोग अधर्म से नहीं डरते। तथापि निश्चय जानो कि वह अधर्माचरण धीरे-धीरे सुख के मूल को काटता चला जाता है।
*अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः। सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः*॥ - (मनुस्मृति २.१०४)
जङ्गल में अर्थात् एकान्त देश में जा सावधान हो के जल के समीप स्थित हो के नित्य कर्म को करता हुआ सावित्री अर्थात् गायत्री मन्त्र का उच्चारण अर्थज्ञान और उसके अनुसार अपने चाल चलन को करे परन्तु यह जन्म से करना उत्तम है।


*सन्ध्या (ब्रह्मयज्ञ) के दो अर्थ होते हैं*:
१) (*सम + ध्या*) जिसमें सम्यक प्रकार से परमात्मा का ध्यान होता है।
२) (*सन्धि + आ*) जब रात से दिन की सन्धि होती है, और जब दिन से रात की सन्धि होती है, उस समय परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करना।
*सन्ध्या (ब्रह्मयज्ञ) इसके ३ अंग हैं*:
१) तप (वाह्यवृत्ति प्राणायाम)
२) स्वाध्याय (ध्यान, स्वयं के कार्यों का निरीक्षण)
३) ईश्वर-प्रणिधान (दृढनिष्ठापूर्वक परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना, उपासना)
*सन्ध्या (ब्रह्मयज्ञ) के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रकरण आते हैं*:
०) *मार्जन* – शिर और नेत्रादि पर जल प्रक्षेप (यदि आलस्य न हो तो न करना) – (पञ्चमहायज्ञविधि)
१) *न्यूनतम ३ वाह्यवृत्ति प्राणायाम “ओ३म्” के मानसिक जप सहित* – (सत्यार्थ प्रकाश, तृतीय समुल्लास)
०) गायत्री मन्त्र द्वारा शिखा बन्धन (यदि केश न गिरें तो न करना) – (पञ्चमहायज्ञविधि)
२) आचमन-मन्त्र
३) इन्द्रिय-स्पर्श
४) ईश्वरप्रार्थनापूर्वक मार्जन-मन्त्र
५) प्राणायाम-मन्त्र सहित न्यूनतम ३ वाह्यवृत्ति प्राणायाम (समन्त्रक प्राणायाम)
६) अघमर्षण-मन्त्र
७) मनसा-परिक्रमा मन्त्र
८) उपस्थान-मन्त्र
९) गुरुमन्त्र (गायत्री-मन्त्र)
१०) समर्पण और नमस्कार-मन्त्र
प्रथम वाह्य जलादि से स्थूल-शरीर की शुद्धि और राग-द्वेष आदि के त्याग से भीतर की शुद्धि करनी चाहिए, इस में प्रमाण—
*अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति*॥ - (मनुस्मृति ५.१०९)
अर्थात् जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्याचरण से मन, विद्या और तप अर्थात् सब प्रकार के कष्ट भी सह के धर्म ही के अनुष्ठान करने से जीवात्मा, ज्ञान अर्थात् पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि दृढ़ निश्चय पवित्र होता है। इस से स्नान भोजन के पूर्व अवश्य करना।
दूसरा प्राणायाम, इसमें प्रमाण—
*प्राणायामादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः*॥ — योगदर्शन २.२८
अर्थात् जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है।
*दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां च यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्*॥ - (मनुस्मृति ६.७१)
अर्थात् जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं।
*प्राणायाम की विधि*—
*प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य*। — योगदर्शन १.३४
अर्थात् “_जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे_।“ जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे। जब तक मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है। इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (*ओ३म्*) इस का जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है।
इस से मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा। स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे। भोजन, छादन, बैठने, उठने, बोलने, चालने, बड़े छोटे से यथायोग्य व्यवहार करने का उपदेश करें।
‘*आचमन*’ उतने जल को हथेली में ले के उस के मूल और मध्यदेश में ओष्ठ लगा के करे कि वह जल कण्ठ के नीचे हृदय तक पहुंचे, न उससे अधिक न न्यून। उसे कण्ठस्थ कफ और पित्त की निवृत्ति थोड़ी सी होती है। पश्चात् ‘*मार्जन*’ अर्थात् मध्यमा और अनामिका अंगुली के अग्रभाग से नेत्रादि अङ्गों पर जल छिड़के, उस से आलस्य दूर होता है जो आलस्य और जल प्राप्त न हो तो न करे।

*(प्रश्न) त्रिकाल सन्ध्या क्यों नहीं करना?*
(उत्तर) तीन समय में सन्धि नहीं होती। प्रकाश और अन्धकार की सन्धि भी सायं प्रातः दो ही वेला में होती है। जो इस को न मानकर मध्याह्नकाल में तीसरी सन्ध्या माने वह मध्यरात्रि में भी सन्ध्योपासन क्यों न करे? जो मध्यरात्रि में भी करना चाहै तो प्रहर-प्रहर घड़ी-घड़ी पल-पल और क्षण-क्षण की भी सन्धि होती है, उनमें भी सन्ध्योपासन किया करे। जो ऐसा भी करना चाहै तो हो ही नहीं सकता। और किसी शास्त्र का मध्याह्नसन्ध्या में प्रमाण भी नहीं। इसलिये दोनों कालों में सन्ध्या और अग्निहोत्र करना समुचित है, तीसरे काल में नहीं। और *जो तीन काल होते हैं वे भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान के भेद से हैं, सन्ध्योपासन के भेद से नहीं*। - (_सत्यार्थ प्रकाश_)


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*देवयज्ञ*—जो अग्निहोत्र और विद्वानों का संग सेवादिक से होता है। *सन्ध्या और अग्निहोत्र सायं प्रातः...

*देवयज्ञ*—जो अग्निहोत्र और विद्वानों का संग सेवादिक से होता है। *सन्ध्या और अग्निहोत्र सायं प्रातः दो ही काल में करे। दो ही रात दिन की सन्धिवेला हैं, अन्य नहीं*। यथा *सूर्योदय के पश्चात् और सूर्यास्त के पूर्व अग्निहोत्र करने का भी समय है*। उसके लिए एक किसी धातु वा मिट्टी की ऊपर 12 वा 16 अंगुल चौकोर उतनी ही गहिरी और नीचे 3 वा 4 अंगुल परिमाण से वेदी इस प्रकार बनावे अर्थात् ऊपर जितनी चौड़ी हो उसकी चतुर्थांश नीचे चौड़ी रहे।
उसमें चन्दन पलाश वा आम्रादि के श्रेष्ठ काष्ठों के टुकड़े उसी वेदी के परिमाण से बड़े छोटे करके उस में रक्खे, उसके मध्य में अग्नि रखके पुनः उस पर समिधा अर्थात् पूर्वोक्त इन्धन रख दे। प्रोक्षणीपात्र, प्रणीतापात्र, आज्यस्थाली अर्थात् घृत रखने का पात्र और चमसा (स्रुवा) सोने, चांदी वा काष्ठ का बनवा के प्रणीता और प्रोक्षणी में जल तथा घृतपात्र में घृत रख के घृत को तपा लेवे। प्रणीता जल रखने और प्रोक्षणी इसलिये है कि उस से हाथ धोने को जल लेना सुगम है। पश्चात् उस घी को अच्छे प्रकार देख लेवे फिर मन्त्र से होम करें।
*अग्निहोत्र का वेदों में प्रमाण*:
समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन॥1॥ -य॰ अ॰ 3। मं॰ 1॥
अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँ2॥ आ सादयादिह॥2॥ -य॰ अ॰ 22। मं॰ 17॥
सायं सायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता। वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम॥3॥

प्रातः प्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायं सायं सौमनसस्य दाता। वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतं हिमा ऋधेम॥4॥
-अथर्व॰ कां॰ 19। अनु॰ 7। मं॰ 3। 4॥
*अर्थात्* (समिधाग्निं॰) हे मनुष्यो! तुम लोग वायु, औषधी और वर्षाजल की शुद्धि से सब के उपकार के अर्थ घृतादि शुद्ध वस्तुओं और समिधा अर्थात् आम्र वा ढाक आदि काष्ठों से अतिथिरूप अग्नि को नित्य प्रकाशमान करो। फिर उस अग्नि में होम करने के योग्य पुष्ट, मधुर, सुगन्धित अर्थात् दुग्ध, घृत, शर्करा, गुड़, केशर, कस्तूरी आदि और रोगनाशक जो सोमलता आदि सब प्रकार से शुद्ध द्रव्य हैं, उन का अच्छी प्रकार नित्य अग्निहोत्र करके सब का उपकार करो॥1॥
(*अग्निं दूतं॰*) अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य ऐसी इच्छा करे, कि मैं प्राणियों के उपकार करने वाले पदार्थों को पवन और मेघमण्डल में पहुंचाने के लिए अग्नि को सेवक की नाईं अपने सामने स्थापना करता हूं। क्योंकि वह अग्नि हव्य अर्थात् होम करने के योग्य वस्तुओं को अन्य देश में पहुंचानेवाला है। इसी से उसका नाम ‘हव्यवाट्’ है। जो उस अग्निहोत्र को जानना चाहैं, उन को मैं उपदेश करता हूं कि वह अग्नि उस अग्निहोत्र कर्म से पवन और वर्षाजल की शुद्धि से (इह) इस संसार में (देवां) श्रेष्ठ गुणों को पहुंचाता है।

*दूसरा अर्थ* - हे सब प्राणियों को सत्य उपदेशकारक परमेश्वर! जो कि आप अग्नि नाम से प्रसिद्ध हैं, मैं इच्छापूर्वक आप को उपासना करने के योग्य मानता हूं। ऐसी कृपा करो कि आप को जानने की इच्छा करनेवालों के लिये भी मैं आप का शुभगुणयुक्त विशेषज्ञानदायक उपदेश करूं। तथा आप भी कृपा करके इस संसार में श्रेष्ठ गुणों को पहुंचावें॥2॥

(*सायंसायं॰*) प्रतिदिन प्रातःकाल श्रेष्ठ उपासना को प्राप्त यह गृहपति अर्थात् घर और आत्मा का रक्षक भौतिक अग्नि और परमेश्वर, (सौमनसस्य दाता) आरोग्य, आनन्द और वसु अर्थात् धन का देने वाला है। इसी से परमेश्वर (वसुदानः) अर्थात् धनदाता प्रसिद्ध है। हे परमेश्वर! आप मेरे राज्य आदि व्यवहार और चित्त में सदा प्रकाशित रहो। यहां भौतिक अग्नि भी ग्रहण करने के योग्य है। (वयं त्वे॰) हे परमेश्वर जैसे पूर्वोक्त प्रकार से हम आप को मान करते हुए अपने शरीर से (पुषेम) पुष्ट होते हैं, वैसे ही भौतिक अग्नि को भी प्रज्वलित करते हुए पुष्ट हों॥3॥

(*प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो॰*) इस मन्त्र का अर्थ पूर्व मन्त्र के तुल्य जानो। परन्तु इस में इतना विशेष भी है कि-अग्निहोत्र और ईश्वर की उपासना करते हुए हम लोग (शतहिमाः) सौ हेमन्त ऋतु व्यतीत हो जाने पर्य्यन्त, अर्थात् सौ वर्ष तक, धनादि पदार्थों से (ऋधेम) वृद्धि को प्राप्त हों॥4॥

अग्निहोत्र करने के लिये, ताम्र या मिट्टी की वेदी बना के काष्ठ, चांदी वा सोने का चमसा अर्थात् अग्नि में पदार्थ डालने का पात्र और आज्यस्थाली अर्थात् घृतादि पदार्थ रखने का पात्र लेके, उस वेदी में ढांक वा आम्र आदि वृक्षों की समिधा स्थापन करके, अग्नि को प्रज्वलित करके, पूर्वोक्त पदार्थों का प्रातःकाल और सायंकाल अथवा प्रातःकाल ही नित्य होम करें।

*अथाग्निहोत्रे होमकरणमन्त्राः* -
सूर्य्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्य्यः स्वाहा॥1॥ सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा॥2॥
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योति: स्वाहा॥3॥ सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या। जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा॥4॥
-इति प्रातःकालमन्त्राः॥

अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा॥1॥ अग्निर्वर्च्चोज्योतिर्वर्च्चः स्वाहा॥2॥
अग्निर्ज्योतिरिति मन्त्रं मनसोच्चार्य्य तृतीयाहुतिर्देया॥3॥
सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या। जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा॥4॥
- इति सायङ्कालमन्त्राः। य॰ अ॰ 3। मं॰ 9-10॥
*भाषार्थ* - (सूर्य्यो ज्यो॰) जो चराचर का आत्मा, प्रकाशस्वरूप और सूर्य्यादि प्रकाशक लोकों का भी प्रकाश करनेवाला है, उस की प्रसन्नता के लिये हम लोग होम करते हैं॥1॥
(सूर्यो वर्च्चो॰) सूर्य जो परमेश्वर है, वह हम लोगों को सब विद्याओं का देने वाला और हम से उन का प्रचार कराने वाला है, उसी के अनुग्रह से हम लोग अग्निहोत्र करते हैं॥2॥
(ज्योतिः सू॰) जो आप प्रकाशमान और जगत् का प्रकाश करनेवाला सूर्य अर्थात् संसार का ईश्वर है, उस की प्रसन्नता के अर्थ हम लोग होम करते हैं॥3॥
(सजूर्देवेन॰) जो परमेश्वर सूर्य्यादि लोकों में व्याप्त, वायु और दिन के साथ संसार का परमहितकारक है, वह हम लोगों को विदित होकर हमारे किये हुए होम को ग्रहण करे॥4॥
इन चार आहुतियों से प्रातःकाल अग्निहोत्री लोग होम करते हैं।

अब सायङ्काल की आहुति के मन्त्र कहते हैं-(अग्निर्ज्यो॰) अग्नि जो ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर है, उस की आज्ञा से हम लोग परोपकार के लिए होम करते हैं। और उस का रचा हुआ यह भौतिक अग्नि इसलिये है कि वह उन द्रव्यों को परमाणुरूप कर के वायु और वर्षाजल के साथ मिला के शुद्ध कर दे। जिस से सब संसार को सुख और आरोग्यता की वृद्धि हो॥1॥
(अग्निर्वर्च्चो॰) अग्नि परमेश्वर वर्च्च अर्थात् सब विद्याओं का देनेवाला, और भौतिक अग्नि आरोग्यता और बुद्धि का बढ़ानेवाला है। इसलिये हम लोग होम से परमेश्वर की प्रार्थना करते हैं।
यह दूसरी आहुति है॥
तीसरी मौन होके प्रथम मन्त्र से करनी।
और चौथी (सजूर्देवेन॰) जो अग्नि परमेश्वर सूर्यादि लोकों में व्याप्त, वायु और रात्रि के साथ संसार का परमहितकारक है, वह हम को विदित होकर हमारे किये हुए होम का ग्रहण करे।

*अथोभयोः कालयोरग्निहोत्रे होमकरणार्थाः समानमन्त्राः* -
ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा॥1॥
ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा॥2॥
ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा॥3॥
ओं भूर्भुवःस्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा॥4॥
ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वरों स्वाहा॥5॥
ओं सर्वं वै पूर्णं स्वाहा॥6॥
*भाषार्थ* - इन मन्त्रों में जो भूः इत्यादि नाम हैं, वे सब ईश्वर के ही जानो। गायत्री मन्त्र के अर्थ में इन के अर्थ कर दिये हैं।
इस प्रकार प्रातःकाल और सायङ्काल सन्ध्योपासना के पीछे उक्त मन्त्रों से होम करके अधिक होम करने की इच्छा हो तो, ’*स्वाहा*’ शब्द अन्त में पढ़ कर गायत्री मन्त्र से करे। जिस कर्म में अग्नि वा परमेश्वर के लिये, जल और पवन की शुद्धि वा ईश्वर की आज्ञापालन के अर्थ, होत्र = हवन अर्थात् दान करते हैं, उसे ’*अग्निहोत्र*’ कहते हैं। जो जो केशर, कस्तूरी आदि *सुगन्धि*, घृत दुग्ध आदि *पुष्ट*, गुड़ शर्करा आदि *मिष्ट*, बुद्धि बल तथा धैर्य्यवर्धक और *रोगनाशक* पदार्थ हैं, उन का होम करने से पवन और वर्षाजल की शुद्धि से पृथिवी के सब पदार्थों की जो अत्यन्त उत्तमता होती है, उसी से सब जीवों को परम सुख होता है। इस कारण अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यों को उस उपकार से अत्यन्त सुख का लाभ होता है, और ईश्वर उन पर अनुग्रह करता है। ऐसे ऐसे लाभों के अर्थ अग्निहोत्र का करना अवश्य उचित है।
*स्वाहा का अर्थ*
*स्वाहाकृतय: स्वाहा इति एतत् सु आहेति वा, स्वा वागाहेति वा, स्वं प्राहेति वा, स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा तासामेषा भवति* - _निरुक्त अध्याय-8, खण्ड-20_
*अर्थ*: _यास्काचार्य निरुक्त में_ *स्वाहा* का निम्नलिखित अर्थ बताते हैं:
१) *सु आहेति वा* : अच्छा, मीठा, कल्याणकारी, प्रिय वचन बोलना चाहिए
२) *स्वा वागाहेति वा*: जैसी बात ज्ञान में वर्त्तमान हो, वैसी सत्य बात ही बोलना चाहिए
३) *स्वं प्राहेति वा*: अपने पदार्थ को ही अपना कहना चाहिए
४) *स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा*: सुगन्धित, मीठे, पुष्टिकारक और औषधीय द्रव्यों का हवन करना चाहिए.

॥इत्यग्निहोत्रविधिः समाप्तः॥

जैसे परमेश्वर ने सब प्राणियों से सुख के अर्थ इस सब जगत् के पदार्थ रचे हैं वैसे मनुष्यों को भी परोपकार करना चाहिये।
*(प्रश्न) होम से क्या उपकार होता है?*
(उत्तर) सब लोग जानते हैं कि दुर्गन्धयुक्त वायु और जल से रोग, रोग से प्राणियों को दुःख और सुगन्धित वायु तथा जल से आरोग्य और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है।
*(प्रश्न) चन्दनादि घिस के किसी को लगावे वा घृतादि खाने को देवे तो बड़ा उपकार हो। अग्नि में डाल के व्यर्थ नष्ट करना बुद्धिमानों का काम नहीं।*
(उत्तर) जो तुम पदार्थविद्या जानते तो कभी ऐसी बात न कहते। क्योंकि किसी द्रव्य का अभाव नहीं होता। देखो! जहां होम होता है वहां से दूर देश में स्थित पुरुष के नासिका से सुगन्ध का ग्रहण होता है वैसे दुर्गन्ध का भी। इतने ही से समझ लो कि अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म हो के फैल के वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गन्ध की निवृत्ति करता है।
*(प्रश्न) जब ऐसा ही है तो केशर, कस्तूरी, सुगन्धित पुष्प और अतर आदि के घर में रखने से सुगन्धित वायु होकर सुखकारक होगा।*
(उत्तर) उस सुगन्ध का वह सामर्थ्य नहीं है कि गृहस्थ वायु को बाहर निकाल कर शुद्ध वायु को प्रवेश करा सके क्योंकि उस में भेदक शक्ति नहीं है और अग्नि ही का सामर्थ्य है कि उस वायु और दुर्गन्धयुक्त पदार्थों को छिन्न-भिन्न और हल्का करके बाहर निकाल कर पवित्र वायु को प्रवेश करा देता है।
*(प्रश्न) तो मन्त्र पढ़ के होम करने का क्या प्रयोजन है?*
(उत्तर) मन्त्रों में वह व्याख्यान है कि जिससे होम करने में लाभ विदित हो जायें और मन्त्रों की आवृत्ति होने से कण्ठस्थ रहें। वेदपुस्तकों का पठन-पाठन और रक्षा भी होवे।
*(प्रश्न) क्या इस होम करने के विना पाप होता है?*
(उत्तर) हां! क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गन्ध उत्पन्न हो के वायु और जल को बिगाड़ कर रोगोत्पत्ति का निमित्त होने से प्राणियों को दुःख प्राप्त कराता है उतना ही पाप उस मनुष्य को होता है। इसलिये उस पाप के निवारणार्थ उतना सुगन्ध वा उससे अधिक वायु और जल में फैलाना चाहिये। और खिलाने पिलाने से उसी एक व्यक्ति को सुख विशेष होता है। जितना घृत और सुगन्धादि पदार्थ एक मनुष्य खाता है उतने द्रव्य के होम से लाखों मनुष्यों का उपकार होता है परन्तु जो मनुष्य लोग घृतादि उत्तम पदार्थ न खावें तो उन के शरीर और आत्मा के बल की उन्नति न हो सके, इस से अच्छे पदार्थ खिलाना पिलाना भी चाहिये परन्तु उससे होम अधिक करना उचित है इसलिए होम का करना अत्यावश्यक है।
*(प्रश्न) प्रत्येक मनुष्य कितनी आहुति करे और एक-एक आहुति का कितना परिमाण है?*
(उत्तर) प्रत्येक मनुष्य को सोलह-सोलह आहुति और छः-छः माशे घृतादि एक-एक आहुति का परिमाण न्यून से न्यून चाहिये और जो इससे अधिक करे तो बहुत अच्छा है। इसीलिये आर्यवरशिरोमणि महाशय ऋषि, महर्षि, राजे, महाराजे लोग बहुत सा होम करते और कराते थे। जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था,अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाय। ये दो यज्ञ अर्थात् ब्रह्मयज्ञ जो पढ़ना-पढ़ाना सन्ध्योपासन ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करना, दूसरा देवयज्ञ जो अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध पर्यन्त यज्ञ और विद्वानों की सेवा संग करना परन्तु ब्रह्मचर्य में केवल ब्रह्मयज्ञ और अग्निहोत्र का ही करना होता है।
*मनुस्मृति में देवयज्ञ का प्रमाण*:
*स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः*॥- मनुस्मृति २.२८॥
अर्थ— (स्वाध्याय) सकल विद्या पढ़ते-पढ़ाते (व्रत) ब्रह्मचर्य सत्यभाषणादि नियम पालने (होम) अग्निहोत्रादि होम, सत्य का ग्रहण असत्य का त्याग और सत्य विद्याओं का दान देने (त्रैविद्येन) वेदस्थ कर्मोपासना ज्ञान विद्या के ग्रहण (इज्यया) पक्षेष्ट्यादि करने (सुतैः) सुसन्तानोत्पत्ति (*महायज्ञैः*) ब्रह्म, देव, पितृ, वैश्वदेव और अतिथियों के सेवनरूप पञ्चमहायज्ञ और (*यज्ञैः*) अग्निष्टोमादि तथा शिल्पविद्याविज्ञानादि यज्ञों के सेवन से इस शरीर को ब्राह्मी अर्थात् वेद और परमेश्वर की भक्ति का आधाररूप ब्राह्मण का शरीर बनता है। इतने साधनों के विना ब्राह्मणशरीर नहीं बन सकता।
*वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित्*॥मनु॰ २.९७॥
जो दुष्टाचारी-अजितेन्द्रिय पुरुष हैं उसके वेद, त्याग, यज्ञ, नियम और तप तथा अन्य अच्छे काम कभी सिद्धि को नहीं प्राप्त होते।


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तीसरा ‘पितृयज्ञ’ अर्थात् जिस में जो देव विद्वान्, ऋषि जो पढ़ने-पढ़ाने वाले, पितर माता पिता आदि वृद्ध...

तीसरा ‘पितृयज्ञ’ अर्थात् जिस में जो देव विद्वान्, ऋषि जो पढ़ने-पढ़ाने वाले, पितर माता पिता आदि वृद्ध ज्ञानी और परमयोगियों की सेवा करनी।
*पितृयज्ञ के दो भेद हैं*:
एक *श्राद्ध* और दूसरा *तर्पण*।
श्राद्ध अर्थात् ‘श्रत्’ सत्य का नाम है ‘श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा श्रद्धया यत्क्रियते तच्छ्राद्धम्’ जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उस को श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम *श्राद्ध* है।
और ‘तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितॄन् तत्तर्पणम्’ जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता पितादि पितर प्रसन्न हों और प्रसन्न किये जायें उस का नाम *तर्पण* है। परन्तु यह जीवितों के लिये है मृतकों के लिये नहीं।

*पितृयज्ञ का वेदों में प्रमाण*:
पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन् पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्॥20॥
पुनन्तु मा पितरः सोम्यासः पुनन्तु मा पितामहः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा। पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः। पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्नवै॥21॥
-यजुर्वेद अध्याय-१९, मन्त्र-३६, ३७
(*पितृभ्यः स्वधा*॰) जो चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्याश्रम से विद्या पढ़ के सब को पढ़ाते हैं, उन पितरों को हमारा नमस्कार है। (पितामहेभ्यः॰) जो चवालीस वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्याश्रम से वेदादि विद्याओं को पढ़ के सब के उपकारी और अमृतरूप ज्ञान के देने वाले होते हैं, (प्रपितामहेभ्यः॰) जो अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त जितेन्द्रियता के साथ सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ के, हस्तक्रियाओं से भी सब विद्या के दृष्टान्त साक्षात् देख के दिखलाते, और जो सब के सुखी होने के लिये सदा प्रयत्न करते रहते हैं, उन का मान भी सब लोगों को करना उचित है। पिताओं का नाम वसु है, क्योंकि वे सब विद्याओं में वास करने के लिये योग्य होते हैं। ऐसे ही पितामहों का नाम रुद्र है, क्योंकि वे वसुसंज्ञक पितरों से दूनी अथवा शतगुणी विद्या और बल वाले होते हैं तथा प्रपितामहों का नाम आदित्य है, क्योंकि वे सब विद्याओं और सब गुणों में सूर्य के समान प्रकाशमान होके, सब विद्या और लोगों को प्रकाशमान करते हैं। इन तीनों का नाम वसु, रुद्र और आदित्य इसलिये है कि वे किसी प्रकार की दुष्टता मनुष्यों में रहने नहीं देते। इस में पुरुषो वाव यज्ञः यह छान्दोग्य उपनिषत् का प्रमाण लिख दिया है, सो देख लेना।

(*पुनन्तु मा पितरः*॰) जो पितर लोग शान्तात्मा और दयालु हैं, वे मुझ को विद्यादान से पवित्र करें। (पुनन्तु मा पितामहाः॰) इसी प्रकार पितामह और प्रपितामह भी मुझ को अपनी उत्तम विद्या पढ़ा के पवित्र करें। इसलिये कि उन की शिक्षा को सुन के ब्रह्मचर्य्य धारण करने से सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द युक्त उमर होती रहे। इस मन्त्र में दो बार पाठ केवल आदर के लिये है॥21॥

*तर्पण के ३ प्रकार होते हैं*:
१) *देव-तर्पण*
२) *ऋषि-तर्पण*
३) *पितृ-तर्पण*
ओं ब्रह्मादयो देवास्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवपत्न्यस्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवसुतास्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवगणास्तृप्यन्ताम्॥ — इति देवतर्पणम्॥ (पारस्कर एवं आश्वलायन गृह्यसूत्र)
‘विद्वांसो हि देवाः।’ —शतपथ-ब्राह्मण ३.५.६.१०
जो विद्वान् हैं उन्हीं को देव कहते हैं। जो साङ्गोपाङ्ग चार वेदों के जानने वाले हों उन का नाम ब्रह्मा और जो उन से न्यून पढ़े हों उन का भी नाम देव अर्थात् विद्वान् है। उनके सदृश विदुषी स्त्री, उनकी ब्रह्माणी और देवी, उनके तुल्य पुत्र और शिष्य तथा उनके सदृश उन के गण अर्थात् सेवक हों उन की सेवा करना है उस का नाम ‘श्राद्ध’ और ‘तर्पण’ है।
अथर्षितर्पणम्
ओं मरीच्यादय ऋषयस्तृप्यन्ताम्। मरीच्याद्यृषिपत्न्यस्तृप्यन्ताम्।
मरीच्याद्यृषिसुतास्तृप्यन्ताम्। मरीच्याद्यृषिगणास्तृप्यन्ताम्॥
—इति ऋषितर्पणम्॥
जो ब्रह्मा के प्रपौत्र मरीचिवत् विद्वान् होकर पढ़ावें और जो उनके सदृश विद्यायुक्त उनकी स्त्रियां कन्याओं को विद्यादान देवें उनके तुल्य पुत्र और शिष्य तथा उन के समान उनके सेवक हों, उन का सेवन सत्कार करना ऋषितर्पण है।
*अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्द्धन्त आयुर्विद्या यशो बलम्॥*- मनुस्मृति अ॰२, श्लोकः१२१॥
जो सदा नम्र सुशील विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसका आयु, विद्या, कीर्ति और बल ये चार सदा बढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करते उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते।

*अथ पितृतर्पणम्*
ओं सोमसदः पितरस्तृप्यन्ताम्। अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्। बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्। सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। हविर्भुजः पितरस्तृप्यन्ताम्। आज्यपाः पितरस्तृप्यन्ताम्। यमादिभ्यो नमः यमादींस्तर्पयामि। पित्रे स्वधा नमः पितरं तर्पयामि। पितामहाय स्वधा नमः पितामहं तर्पयामि। मात्रे स्वधा नमो मातरं तर्पयामि। पितामह्यै स्वधा नमः पितामहीं तर्पयामि। स्वपत्न्यै स्वधा नमः स्वपत्नीं तर्पयामि। सम्बन्धिभ्यः स्वधा नमः सम्बन्धींस्तर्पयामि। सगोत्रेभ्यः स्वधा नमः सगोत्रांस्तर्पयामि॥
—इति पितृतर्पणम्॥
‘यः पाति स पिता’ जो सन्तानों का अन्न और सत्कार से रक्षक वा जनक हो वह पिता।
‘पितुः पिता पितामहः, पितामहस्य पिता प्रपितामहः’ जो पिता का पिता हो वह पितामह और जो पितामह का पिता हो वह प्रपितामह।
‘या मानयति सा माता’ जो अन्न और सत्कारों से सन्तानों का मान्य करे वह माता। ‘या पितुर्माता सा पितामही पितामहस्य माता प्रपितामही’ जो पिता की माता हो वह पितामही और पितामह की माता हो वह प्रपितामही।
अपनी स्त्री तथा भगिनी सम्बन्धी और एक गोत्र के तथा अन्य कोई भद्र पुरुष वा वृद्ध हों उन सब को अत्यन्त श्रद्धा से उत्तम अन्न, वस्त्र, सुन्दर यान आदि देकर अच्छे प्रकार जो तृप्त करना अर्थात् जिस-जिस कर्म से उनका आत्मा तृप्त और शरीर स्वस्थ रहै उस-उस कर्म से प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करनी वह श्राद्ध और तर्पण कहाता है।
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्॥1॥
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि॥2॥
सदा सत्य बोल, धर्माचार कर, प्रमादरहित होके पढ़ पढ़ा, पूर्ण ब्रह्मचर्य से समस्त विद्याओं को ग्रहण कर और आचार्य के लिये प्रिय धन देकर विवाह करके सन्तानोत्पत्ति कर। प्रमाद से सत्य को कभी मत छोड़, प्रमाद से धर्म का त्याग मत कर, प्रमाद से आरोग्य और चतुराई को मत छोड़, प्रमाद से पढ़ने और पढ़ाने को कभी मत छोड़। देव विद्वान् और माता पितादि की सेवा में प्रमाद मत कर।


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*चौथा वैश्वदेव*—अर्थात् जब भोजन सिद्ध हो तब जो कुछ भोजनार्थ बने, उसमें से खट्टा लवणान्न और क्षार को...

*चौथा वैश्वदेव*—अर्थात् जब भोजन सिद्ध हो तब जो कुछ भोजनार्थ बने, उसमें से खट्टा लवणान्न और क्षार को छोड़ के घृत मिष्टयुक्त अन्न लेकर चूल्हे से अग्नि अलग धर वैश्वदेव के मन्त्रों से आहुति दें और भाग करे।
हवन करने का प्रयोजन यह है कि—पाकशालास्थ वायु का शुद्ध होना और जो अज्ञात अदृष्ट जीवों की हत्या होती है उस का प्रत्युपकार कर देना।

*बलिवैश्वदेवयज्ञ का मनुस्मृति एवं वेद में प्रमाण*:
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम्। आभ्यः कुर्य्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम्॥1॥
-मनुस्मृति अ॰ 3। श्लोकः 84॥

अहरहर्बलिमित्ते हरन्तोऽश्वायेव तिष्ठते घासमग्ने। रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम॥1॥ -अथर्व कां॰ 19। अनु॰ 7। मं॰ 7॥

*भाषार्थ* - (अग्ने॰) हे परमेश्वर! जैसे खाने योग्य पुष्कल पदार्थ घोड़े के आगे रखते हैं, वैसे ही आप की आज्ञापालन के लिये (अहरहः॰) प्रतिदिन भौतिक अग्नि में होम करते और अतिथियों को (बलिं॰) अर्थात् भोजन देते हुए हम लोग अच्छी प्रकार वाञ्छित चक्रवर्ति राज्य की लक्ष्मी से आनन्द को प्राप्त होके (अग्ने) हे परमात्मन्! (प्रतिवेशाः) आप की आज्ञा से उलटे होके आप के उत्पन्न किये हुए प्राणियों को (मा रिषाम) अन्याय से दुःख कभी न देवें। किन्तु आप की कृपा से सब जीव हमारे मित्र और हम सब जीवों के मित्र रहें। ऐसा जानकर परस्पर उपकार सदा करते रहें॥1॥
ओमग्नये स्वाहा॥ ओं सोमाय स्वाहा॥ ओमग्नीषोमाभ्यां स्वाहा॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥ ओं धन्वन्तरये स्वाहा॥ ओं कुह्वै स्वाहा॥ ओमनुमत्यै स्वाहा॥ ओं प्रजापतये स्वाहा॥ ओं सह द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा॥ ओं स्विष्टकृते स्वाहा॥ - मनुस्मृति अ॰ ३, श्लोकः ८५, ८६॥
*भाषार्थ* - (ओम॰) अग्नि शब्द का अर्थ पीछे कह आये हैं। (ओं सो॰) अर्थात् सब पदार्थों को उत्पन्न पुष्ट करने और सुख देनेवाला। (ओम॰) जो सब प्राणियों के जीवन का हेतु प्राण तथा जो दुःखनाश का हेतु अपान। (ओं वि॰) संसार का प्रकाश करनेवाले ईश्वर के गुण अथवा विद्वान् लोग। (ओं ध॰) जन्ममरणादि रोगों का नाश करनेवाला परमात्मा। (ओं कु॰) अमावास्येष्टि का करना। (ओम॰) पौर्णमास्येष्टि वा सर्वशास्त्रप्रतिपादित परमेश्वर की चितिशक्ति। (ओं प्र॰) सब जगत् का स्वामी जगदीश्वर। (ओं स॰) सत्यविद्या के प्रकाश के लिए पृथिवी का राज्य और अग्नि तथा भूमि से अनेक उपकारों का ग्रहण (ओं स्वि॰) इष्ट सुख का करनेवाला परमेश्वर।
इन दश मन्त्रों के अर्थों से ये 10 प्रयोजन जान लेना।
अब आगे बलिदान के मन्त्र लिखते हैं-
*ओं सानुगायेन्द्राय नमः॥1॥ ओं सानुगाय यमाय नमः॥2॥ ओं सानुगाय वरुणाय नमः॥3॥*
*ओं सानुगाय सोमाय नमः॥4॥ ओं मरुद्भ्यो नमः॥5॥ ओमद्भ्यो नमः॥6॥*
*ओं वनस्पतिभ्यो नमः॥7॥ ओं श्रियै नमः॥8॥ ओं भद्रकाल्यै नमः॥9॥ ओं ब्रह्मपतये नमः॥10॥*
*ओं वास्तुपतये नमः॥11॥ ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः॥12॥ ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः॥13॥*
*ओं नक्तञ्चारिभ्यो नमः॥14॥ ओं सर्वात्मभूतये नमः॥15॥ ओं पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥16॥*
- मनुस्मृति अ॰ ३, श्लोकः ८७ - ९१॥
*भाषार्थ* - (ओं सानु॰) सर्वैश्वर्य्ययुक्त परमेश्वर और उसके गुण। (ओं सा॰) सत्य न्याय करनेवाला और उसकी सृष्टि में सत्य न्याय के करनेवाले सभासद्। (ओं सा॰) सब से उत्तम परमात्मा और उसके धार्मिक भक्तजन। (ओं सा॰) पुण्यात्माओं को आनन्द करानेवाला परमात्मा और वे लोग। (ओं मरुत्॰) अर्थात् प्राण, जिनके रहने से जीवन और निकलने से मरण होता है, उन की रक्षा करना। (ओमद्भ्यो॰) इस का अर्थ ‘शन्नोदेवी’ इस मन्त्र में लिख दिया है।
(*ओं वन*॰) ईश्वर के उत्पन्न किये हुए वायु और मेघ आदि सब के पालन के हेतु सब पदार्थ तथा जिन से अधिक वर्षा और जिन के फलों से जगत् का उपकार होता है, उन की रक्षा करनी। (ओं श्रि॰) जो सेवा करने के योग्य परमात्मा और पुरुषार्थ से राज्यश्री की प्राप्ति करने में सदा उद्योग करना (ओं भ॰) जो कल्याण करने वाली परमात्मा की शक्ति अर्थात् सामर्थ्य है, उस का सदा आश्रय करना। (ओं ब्र॰) जो वेद के स्वामी ईश्वर की प्रार्थना विद्या के लिये करना। (ओं वा॰) वास्तुपति अर्थात् जो गृह सम्बन्धी पदार्थों का पालन करनेवाला ईश्वर। (ओं ब्रह्म॰) वेद शास्त्र का रक्षक जगदीश्वर। (ओं वि॰) इसका अर्थ कह दिया है।
(*ओं दि*॰) जो दिन में और (ओं नक्तं॰) रात्रि में विचरनेवाले प्राणी हैं, उन से उपकार लेना और उन को सुख देना। (सर्वात्म॰) सब में व्याप्त परमेश्वर की सत्ता को सदा ध्यान में रखना। (ओं पि॰) माता पिता और आचार्य आदि को प्रथम भोजनादि से सेवा करके पश्चात् स्वयं भोजनादि करना। ’*स्वाहा*’ शब्द का अर्थ पूर्व कर दिया है और ’*नमः*’ शब्द का अर्थ यह है कि-आप अभिमान रहित होना और दूसरे का मान्य करना॥

_इसके पीछे ये छः भाग करना चाहिए_-
*शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि*॥ - मनुस्मृति अ॰ ३, श्लोकः९२
भाषार्थ - कुत्तों, कंगालों, कुष्ठी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिये भी छः भाग अलग-अलग बांट के दे देना और उन की प्रसन्नता करना। अर्थात् सब प्राणियों को मनुष्यों से सुख होना चाहिए।
इस प्रकार ‘श्वभ्यो नमः, पतितेभ्यो नमः, श्वपग्भ्यो नमः,पापरोगिभ्यो नमः, वायसेभ्यो नमः, कृमिभ्यो नमः।’ धर कर पश्चात् किसी दुःखी बुभुक्षित प्राणी अथवा कुत्ते, कौवे आदि को दे देवे।
यहां नमः शब्द का अर्थ अन्न अर्थात् कुत्ते, पापी, चाण्डाल, पापरोगी कौवे और कृमि अर्थात् चींटी आदि को अन्न देना यह मनुस्मृति आदि की विधि है।
यह वेद और मनुस्मृति की रीति से बलिवैश्वदेव पूरा हुआ।

*॥ इति बलिवैश्वदेवविधिः समाप्तः॥*


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*अब पांचवीं अतिथिसेवा*—अतिथि उस को कहते हैं कि जिस की कोई तिथि निश्चित न हो अर्थात् अकस्मात्...

*अब पांचवीं अतिथिसेवा*—अतिथि उस को कहते हैं कि जिस की कोई तिथि निश्चित न हो अर्थात् अकस्मात् धार्मिक, सत्योपदेशक, सब के उपकारार्थ सर्वत्र घूमने वाला, पूर्ण विद्वान्, परमयोगी, संन्यासी गृहस्थ के यहां आवे तो उस को प्रथम पाद्य, अर्घ और आचमनीय तीन प्रकार का जल देकर, पश्चात् आसन पर सत्कारपूर्वक बिठाकर, खान, पान आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से सेवा शुश्रूषा कर के, उन को प्रसन्न करे। पश्चात् सत्सङ्ग कर उन से ज्ञान विज्ञान आदि जिन से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होवे ऐसे-ऐसे उपदेशों का श्रवण करे और चाल चलन भी उनके सदुपदेशानुसार रक्खे। समय पाके गृहस्थ और राजादि भी अतिथिवत् सत्कार करने योग्य हैं। परन्तु—
*पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालवृत्तिकान् शठान्। हैतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥* मनुस्मृति ४.३०॥
(पाषण्डी) अर्थात् वेदनिन्दक, वेदविरुद्ध आचरण करनेहारे (विकर्मस्थ) जो वेदविरुद्ध कर्म का कर्त्ता मिथ्याभाषणादि युक्त, वैडालवृत्तिक जैसे विड़ाला छिप और स्थिर होकर ताकता-ताकता झपट से मूषे आदि प्राणियों को मार अपना पेट भरता है वैसे जनों का नाम वैडालवृत्ति, (शठ) अर्थात् हठी, दुराग्रही, अभिमानी, आप जानें नहीं, औरों का कहा मानें नहीं, (हैतुक) कुतर्की व्यर्थ बकने वाले जैसे कि आजकल के वेदान्ती बकते हैं ‘हम ब्रह्म और जगत् मिथ्या है वेदादि शास्त्र और ईश्वर भी कल्पित हैं’ इत्यादि गपोड़ा हांकने वाले (वकवृत्ति) जैसे वक एक पैर उठा ध्यानावस्थित के समान होकर झट मच्छी के प्राण हरके अपना स्वार्थ सिद्ध करता है वैसे आजकल के वैरागी और खाखी आदि हठी दुराग्रही वेदविरोधी हैं, ऐसों का सत्कार वाणीमात्र से भी न करना चाहिये। क्योंकि इनका सत्कार करने से ये वृद्धि को पाकर संसार को अधर्मयुक्त करते हैं। आप तो अवनति के काम करते ही हैं परन्तु साथ में सेवक को भी अविद्यारूपी महासागर में डुबा देते हैं।

*अतिथियज्ञ का वेद में प्रमाण*:
तद्यस्यैवं विद्वान् व्रात्योऽतिथिर्गृहानागच्छेत्॥1॥
स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वावात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति॥2॥
-अथ॰ कां॰ 15। अनु॰ 2। व॰ 11। मं॰ 1। 2॥
*भाषार्थ* - अब पांचवां अतिथियज्ञ अर्थात् जिस में अतिथियों की यथावत् सेवा करनी होती है, उस को लिखते हैं। जो मनुष्य पूर्ण विद्वान्, परोपकारी, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, सत्यवादी, छल कपट रहित और नित्य भ्रमण करके विद्या धर्म का प्रचार और अविद्या अधर्म की निवृत्ति सदा करते रहते हैं, उन को ‘अतिथि’ कहते हैं। इस में वेदमन्त्रों के अनेक प्रमाण हैं। परन्तु उन में से दो मन्त्र यहां भी लिखते हैं-

(*तद्यस्यैवं विद्वान्*) जिस के घर में पूर्वोक्त विशेषणयुक्त (व्रात्य॰) उत्तमगुणसहित सेवा करने के योग्य विद्वान् आवे, तो उस की यथावत् सेवा करें और 'अतिथि’ वह कहाता है कि जिस के आने जाने की कोई तिथि दिन निश्चित न हो॥1॥

(*स्वयमेनम*॰) गृहस्थ लोग ऐसे पुरुष को आते देखकर बड़े प्रेम से उठके नमस्कार कर के, उत्तम आसन पर बैठावें। पश्चात् पूछें कि आप को जल अथवा किसी अन्य वस्तु की इच्छा हो सो कहिये। और जब वे स्वस्थचित्त हो जावें, तब पूछें कि (व्रात्य क्वावात्सीः) हे व्रात्य! अर्थात् उत्तम पुरुष, आपने कल के दिन कहां वास किया था? (व्रात्योदकं) हे अतिथे! यह जल लीजिये और (व्रात्य तर्पयन्तु) हम को अपने सत्य उपदेश से तृप्त कीजिये, कि जिस से हमारे इष्ट मित्र लोग सब प्रसन्न होके आप को भी सेवा से सन्तुष्ट रक्खें। (व्रात्य यथा॰) हे विद्वन्! जिस प्रकार आप की प्रसन्नता हो, हम लोग वैसा ही काम करें तथा जो पदार्थ आपको प्रिय हो, उस की आज्ञा कीजिये। और (व्रात्य यथा॰) जैसे आप की कामना पूर्ण हो, वैसी सेवा की जाय कि जिस से आप और हम लोग परस्पर प्रीति और सत्सङ्गपूर्वक विद्यावृद्धि करके सदा आनन्द में रहें॥2॥

इन *पांच महायज्ञों का फल* यह है कि :
*ब्रह्मयज्ञ के करने से विद्या, शिक्षा, धर्म, सभ्यता आदि शुभ गुणों की वृद्धि।
*अग्निहोत्र* से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि होकर वृष्टि द्वारा संसार को सुख प्राप्त होना अर्थात् शुद्ध वायु का श्वास, स्पर्श, खान पान से आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अनुष्ठान पूरा होना। इसीलिये इस को देवयज्ञ कहते हैं।
*पितृयज्ञ* से जब माता पिता और ज्ञानी महात्माओं की सेवा करेगा तब उस का ज्ञान बढ़ेगा। उस से सत्यासत्य का निर्णय कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करके सुखी रहेगा। दूसरा कृतज्ञता अर्थात् जैसी सेवा माता पिता और आचार्य ने सन्तान और शिष्यों की की है उसका बदला देना उचित ही है।
*बलिवैश्वदेव* का भी फल पाकशालास्थ वायु का शुद्ध होना और जो अज्ञात अदृष्ट जीवों की हत्या होती है उस का प्रत्युपकार कर देना है। जब तक उत्तम *अतिथि* जगत् में नहीं होते तब तक उन्नति भी नहीं होती। उनके सब देशों में घूमने और सत्योपदेश करने से पाखण्ड की वृद्धि नहीं होती और सर्वत्र गृहस्थों को सहज से सत्य विज्ञान की प्राप्ति होती रहती है और मनुष्यमात्र में एक ही धर्म स्थिर रहता है। विना अतिथियों के सन्देहनिवृत्ति नहीं होती। सन्देहनिवृत्ति के विना दृढ़ निश्चय भी नहीं होता।
*अतः हम सभी मनुष्यों को प्रतिदिन पञ्चमहायज्ञ अवश्य करना चाहिए।*


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